किसी 'खास' की जानकारी भेजें। शुरुआत करो खुद ब खुद आते हैं – आईडिया

आदर्श राजकीय उच्च माध्यमिक स्कूल ऊन में मैं और मेरे साथी रितेश का जाना हुआ। यह विद्यालय राजस्‍थान के टोंक जिले में जवाई नदी किनारे आहोर और जालोर ब्लॉक के बार्डर पर स्थित है। ऐसे तो इस रोड से कई बार आना जाना हुआ था लेकिन विद्यालय जालोर ब्लॉक का होने के कारण कभी इसमें प्रवेश नहीं किया था। हमारा ज्‍यादातर स्कूल आना-जाना आहोर ब्लॉक के स्कूल में रहा था। 26 जनवरी से पूर्व फेसबुक पर किसी शिक्षक साथी ने 10 सेकंड का एक वीडियो शेयर किया था जिसमें केवल इतना भर था कि ऊन स्कूल की साजिदा बच्चों के साथ emoji का प्रयोग कर इंग्लिश शिक्षण कर नवाचार कर रही हैं।

मैंने इस बात की पड़ताल शुरू की। इसी विद्यालय के मेरे जान पहचान वाले शिक्षकों से मैंने पूछताछ की। उनका जवाब रहा कि हैं एक साजिदा मैडम जो जालौर से आती हैं, नागोर की रहने वाली हैं, इंग्लिश में अच्छा काम करती हैं। टीएलएम से पढ़ाती हैं। इतना जानने-समझने के बाद आप जो समझ पा रहे हैं, वैसी ही मेरी समझ बनी। कुल मिलाकर अभी तक यही कहा जा सकता है कि पूर्वाग्रह टूटे नहीं थे। आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि गतिविधि से पढ़ाना/टीएलएम का उपयोग करना बेहतर शिक्षण का पैमाना है। लेकिन मुझे लगता है कि मात्र इनका उपयोग कर लेने भर से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता है कि बच्चे सीख ही रहे हैं।

29 जनवरी 2019 को प्रातः 10 बजे साजिदा अली के स्कूल में हमने प्रवेश किया। प्राथमिक कक्षाओं के ज्‍यादातर बच्चे दरी पर बैठे थे और दो बच्चे पानी के टांके पर थोड़ी ऊँचाई पर बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। एक मैडम हाथ में पुरस्कार लिए बच्चों को कक्षा से बुलाकर लाने के लिए कहा रही थीं। विचार आया कि 26 जनवरी के दिन जिन बच्चों ने प्रोग्राम में भाग लिए था उनको सम्मानित किया जा रहा होगा। यह भी विचार आ गया कि आज माननीय प्रधानमंत्री के द्वारा “मन की बात “ जिसमें परिक्षाओं को लेकर तनाव कम करने पर आज बात करने वाले हैं, उसे सुनने के लिए बच्चों को एक साथ बैठाया गया होगा। हम परिचय दे चुके थे। उसके बाद में उनके द्वारा परिचय दिया गया। साजिदा, शोभा और एक और शिक्षक का नाम बताया जिसे मैं भूल रहा हूँ। परिचय के दरम्यान थोड़ी देर के लिए डायरी, उपस्थिति रजिस्टर ऊपर-नीचे होने लगे हमने कह दिया की हम कोई जाँच-पड़ताल आदि के लिए नहीं आए हैं। जो काम चल रहा है उसे आगे बढ़ाते रहिए। साजिदा जी अपने हाथ में चमचमाता रेपर लगा बॉक्स लिए एक बच्ची के पास खड़ी थीं। शोभा जी ने बताया की अभी 26 जनवरी को साजिदा मैडम को कलेक्टर महोदय द्वारा पुरस्कृत किया गया है।

स्कूल टीम साथियों का एक-दूसरे के प्रति सम्मान और आदर भाव स्कूल को बेहतर बनाने में कितना कारगर है इसे अभी देखना बाकी था। लेकिन हाँ इतना तो कहा ही जा सकता है कि साजिदा के काम को अन्य दोनों साथी प्रोत्साहित करने के साथ-साथ जान समझ भी पा रहे थे। इस बीच साजिदा जी ने बच्चों के बीच घोषणा की। इस सप्ताह का विजेता  कोमल हैं। अगली बार कौन लेना चाहता है एक साथ कई बच्चों के हाथ खड़े हुए कि हम लेंगे हम लेंगे।

इस कार्यक्रम के बारे में जानने की इच्छा हुई कि यह क्या है? साजिदा ने कार्यक्रम का नाम बताया  “हम कक्षा 5 से आगे हैं”। यह कैसा कार्यक्रम हुआ? जानने हेतु सवाल किया गया कि ऐसा क्यों करते हैं? उद्देश्य क्या है? कार्यक्रम में क्या-क्या शामिल होता है? बताया गया कि बच्चों को मोटिवेसन देने हेतु, घर पर जाकर स्कूल कार्य (पाठ्यपुस्तकों से हटकर) करने हेतु किया जाता है। इस कार्यक्रम में GK, विषयगत संप्रत्यय, निबन्ध, कहानियाँ जो कि कक्षा 5 के स्तर की होती हैं। इसमें कोई भी बच्चा भाग ले सकता है और बच्चा यह फील कर सकता है मैं मेरी कक्षा से बाहर जाकर अन्य कक्षा के स्तर का भी सीख सकता हूँ। मैंने सुना है कि दुनिया ऐसे कई स्कूल हैं जो कक्षा/उम्र की दीवारें तोड़कर बच्चों को सिखाते हैं। शायद साजिदा जी ने भी अनुभव कर लिया हो कि बच्चों को पाठ्यपुस्तक/कक्षा-कक्ष की दीवारों से बाहर जाकर भी सिखाया जा सकता है।

मैं तो मन में यही सवाल लिए घूमता रहता हूँ कि ऐसा कोई विद्यालय या शिक्षक मिले जो यह कह सके कि राजकीय विद्यालयों में भी ऐसे बच्चे आते हैं जिनके साथ भी लगकर कुछ किया जाए तो वो भी उन (तथाकथित होशियार / सवर्ण घरों के बच्चों / निजी विद्यालय के बच्चे) जैसा सीख सकते हैं। इनमें भी सीखने की उतनी ही काबिलियत है जितनी तथाकथित होशियार / सवर्ण घरों के बच्चों / निजी विद्यालय के बच्चों में होती है। साजिदा जी ने कक्षा 2 से लेकर 5 तक के बच्चों को बुला-बुला कर इस विश्‍वास से बच्चों को हमसे  बातचीत का मौका दिया। सच में शिक्षिका का आत्मविश्‍वास से यह कहना कि-

  •     अमुख विद्यार्थी को क्या आता है?
  •     किस बच्चे से क्या पूछा जाना चाहिए?
  •     किस बच्चे के साथ क्या करना है?
  •     अमुख छात्र / छात्रा के साथ कैसे काम किया जाता है?
  •     किस बच्चे की क्या रुचि है / उसे क्या पसन्‍द है?

उन्होंने बताया की दो वर्ष पहले जब मैं यहाँ आई थी तब 80 प्रतिशत बच्चों को हिन्दी पढ़ना-लिखना नहीं आता था, इंग्लिश तो दूर की बात थी। शुरू के दो महीने में तो मैंने यह मान लिया था कि अब मैं यहाँ काम नहीं कर सकती ट्रान्सफर करवा लेती हूँ। लेकिन उसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और दो  वर्षो में तो ज्‍यादातर बच्चों को पढ़ना-लिखना आ गया। हिन्दी में बात करना आ गया, इंग्लिश पढ़ने लगे हैं, इंग्लिश में जवाब देने लगे हैं। इसी के साथ हमारी कुछ बच्चों के साथ में भाषा (हिन्दी और इंग्लिश) में पढ़ने-लिखने और बोलने को लेकर बातचीत आरम्‍भ हो गई।

कक्षा दो की छात्रा के साथ रितेश ने इंग्लिश में वार्तालाप आरम्‍भ किया जिसमें इंग्लिश भाषा में ही क्या नाम है? कौन-से स्कूल में पढ़ते हो, कौन-से गाँव में रहते हो, जिले का नाम क्या है आदि सवाल पूछे। बच्ची ने सभी के सही जवाब दिए। इस बात से भाषा के चारों कौशलों (रीडिंग, राइटिंग, लिसनिंग और स्पीकिंग) की समझ का आकलन तो नहीं किया जा सकता है लेकिन यह तो दावा किया ही जा सकता है कि बच्ची इंग्लिश में दिए निर्देशों को सुनकर समझ पा रही थी और वाक्यों में अपनी बात को संप्रेषित करने की ओर बढ़ रही है। इसी कड़ी में एक और छात्रा ने एक poem को गुजराती में, हिन्दी में और इंग्लिश में याद होना बताया और गुजराती में सुनाया भी। भाषा सीखने-सिखाने में बच्चे की सामाजिक /सांस्कृतिक जीवन का विद्यालय में उपयोग किया जाता हो/ या यूँ कहा जा सकता है कि दूसरी संस्कृति को भी उसी आदर भाव से देखा जा रहा हो।

इसके बाद दो बच्चों ने कक्षा 5 की पाठ्यपुस्तक का एक पाठ – सेठ की कहानी  को पढ़कर सुनाया। बच्चे परिचित शब्दों को तो धाराप्रवाह से पढ़ पा रहे थे लेकिन नए शब्द/ संयुक्ताक्षर को अटक-अटककर पढ़ रहे थे। एक पेराग्राफ को पढ़ने के बाद मैंने सवाल किया कि लड़का क्या करता था? थोड़ी देर तक बच्ची कुछ पंक्तियों को दुबारा से पढ़ने लगी और कुछ बताने का प्रयास कर रही थी।

एक छात्रा इंग्लिश पाठ्यपुस्तक लेकर पढ़ने के लिए आगे आ गई। यह छात्रा कक्षा 3 से थी जिसने इंग्लिश text को हिज्जे करके पढ़कर सुनाया। इसके बाद तो हम सबके चारों ओर हाथ में हिन्दी या इंग्लिश की किताब लिए बच्चों का घेरा बन गया। इस घटनाक्रम से यह तो सुनिश्चित हो चुका था कि बच्चे और शिक्षिकाओं के बीच दूरियाँ नहीं हैं, बच्चों में पढ़ने-लिखने की जो भी काबिलियत है उसे वो स्वतंत्र होकर अभिव्यक्त कर रहे हैं।

एक बच्चा जो कि मानसिक रूप से किसी बीमारी से ग्रसित था वह इन सारी प्रक्रिया के दौरान कभी बच्चों के बीच, तो कभी अकेला ही नीम की डंडी लेकर इधर-उधर हो रहा था। साजिदा ने बड़े ही प्यार से उसे अपने पास बुलाकर उसका परिचय करवाया और बताया कि इस बच्चे का ठहराव नहीं रहता है, बोलता है, कुछ-कुछ समझता भी है। इसके लिए मैं स्वयं इसके पास जाती हूँ और इसके पास जो भी होता है, उसी का उपयोग कर इंग्लिश सिखाती हूँ। जैसे अभी इसके पास नीम की डंडी है तो मैं इंग्लिश में यह क्या है? किस पेड़ की है, पेड़ों को बचाया जाना चाहिए आदि वार्तालाप करती हूँ। समावेशन के कई  आयामों में से एक आयाम पर शिक्षिका की समझ देखने को मिली कि, दिव्यांग  बच्चों को अन्य बच्चों के साथ रखकर उनकी जरूरतों के हिसाब से शिक्षण करवाया जा सकता है और मुख्य धारा से जोड़ने का काम हो सकता है।

साजिदा जी ने कहा कि आइये मैं मेरा कमरा दिखाती हूँ। यह बात सुनकर लगा की “मेरे कमरे” का भाव मुझे अन्य जगह तो कहीं भी देखने को नहीं मिला। ज्‍यादातर लहर कक्ष, गुरु मित्र कक्ष, फलां भामाशाह कक्ष, प्रधानाध्यापक कक्ष, अमुख कक्षा कक्ष आदि ही मिलते रहे हैं। मुझे लगा कि यह भावना तो तभी आ सकती है जब आप अपने विचारों को, प्रयोगों को, नमूनों को अपना समझते हुए व्यवस्थित करते हैं और उसका उपयोग सुनिश्चित करते हैं। कक्ष की ओर बढ़ते हुए बताया कि पहले यह कमरा बन्‍द रहता था। मैं लगातार इंग्लिश शिक्षण हेतु कुछ ना कुछ रोज बनाती थी। चीजें इधर-उधर हो जाती थीं, शुरू-शुरू में बच्चे नुकसान भी कर देते थे, चोरियाँ भी हो जाती थीं। इन सबसे निजात पाने के लिए सर्वप्रथम इस कमरे को मैंने और बच्चों ने मिलकर साफ किया, बच्चों के काम को यहाँ पर डिस्प्ले किया।

बैठक व्यवस्था हेतु दरी का प्रावधान किया और यह तय किया कि मैं बच्चों के साथ, बच्चों के बीच ही बैठूँगी। हमने भी तुरन्त ही पूछ लिया कि इससे क्या फायदा। साजिदा अली का जवाब आया कि बच्चों के साथ बैठने से आइडिया आते हैं दूरी बनाने से नहीं। विचार सैद्धांतिक रूप से सही भी है और मैडम के आगे पीछे 5-7 बच्चे घेरा बनाते हुए ही चलते हैं।

साजिदा द्वारा किस किस प्रकार के प्रयास किए गए हैं उसके नमूने देखे। इन नमूनों में राज्य सरकार द्वार दिए गए टीएलएम भी व्यवस्थित, उपयोग में लिए हुए दिखाई दिए। और साथ ही ऐसे ढेरों शिक्षण सहायक सामग्री जो उन्होंने अपने हाथ से व बच्चों की मदद से बनाई है। आइसक्रीम डंडी के एक सिरे पर दोनों तरफ ईमोजी बनाने हुए उसके ऊपर स्पेलिंग लिखी हुई है जिसे ऊपर नीचे करने पर स्पेलिंग के साथ हाव-भाव का चित्र दिखलाई पड़ता है। स्पेलिंग बनाने, वाक्य बनाने, शिक्षण को रुचिकर बनाने हेतु रंगों का बेहतरीन उपयोग किया गया है। बेकार पड़ी सामग्री जैसे कार्ड आदि की सहायता से इन्होंने ढेरों सामग्री बनाई है। मोजों की सहायता से पपेट बनाकर कहानी  शिक्षण करवाया जाता है। जिसमें बच्चे आनन्‍द लेते हुए सीख रहे हैं। हमने पूछा कि आपको यह सब करने का आइडिया आता कहाँ से है? सोर्स क्या है? साजिदा का जवाब रहा कि बच्चों के साथ सच में काम किया जाता है तो परेशानियाँ आती रहती हैं और इन्हीं परेशानियों का समाधान निकालने लगोगे तो “आइडिया खुद ब खुद आने लगता है” बच्चे कुछ सीखते हैं तो खुशी मिलती है।

भाषा शिक्षण में सुनने का वातावरण बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है मैंने ऑनलाइन अच्छे ऑडियो-वीडियो का कलेक्शन किया है और इस हेतु भामाशाह की मदद से स्पीकर जुटाए गए हैं। वीडियो हेतु मैंने स्‍वयं के पैसों से एक android मोबाइल खरीदा है। बच्चे इस मोबाइल का उपयोग कर सर्च करते है, सुनते हैं, देखते हैं और चर्चा करते हैं। अकसर इस तकनीक को लोग गाली देते हुए ही दिखलाई पड़ते हैं कि इसने बच्चों को खराब कर दिया। लेकिन यहाँ तो शिक्षिका भाषा सिखाने के माहौल निर्माण से लेकर, खोजबीन करने के अवसर भी तकनीक से सिखा पा रही है। उद्देश्य क्लियर है कि मुझे इससे क्या करवाना है? उस पर केन्द्रित रहते हैं तो अच्छा कर ही लेते हैं।

विगत दो वर्षो की लगन, मेहनत, सीखने के प्रतिफलों के आधार पर इनका यही कहना है कि हमारे शिक्षा तंत्र में अगर शिक्षक /शिक्षिका शुरुआत कर दें तो असम्भव कुछ भी नहीं है आइडिया तो अपने आप आते रहते हैं। विद्यालय अवलोकन के बाद यही कहा जा सकता है की शिक्षिका इस पुरस्कार की पूरी हकदार है।


प्रस्‍तुति : दिनेश चौधरी, अ़जीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक, राजस्‍थान

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