किसी 'खास' की जानकारी भेजें। शिव कुमार शर्मा : गणित मेरी कविता है

मेरा विश्‍वास है कि गणित विषय को छोटे-छोटे समूह में क्रियात्मक आधार पर समझाया जाए तो बच्‍चों में रूचि उत्पन्न होगी। सूत्रों के रटाने की अपेक्षा उनका निर्धारण सरल तरीके से समझाने से अधिगम स्थाई होगा।

समस्याएँ जो मैंने पहचानी

  • विभिन्न ज्यामितिय आकृतियों आदि के क्षेत्रफल व आयतन के सूत्र याद करने में कठिनाई का अनुभव करना।
  • रेखागणित के प्रति अरूचि होना।
  • सूत्रों को रटकर याद करना व कुछ समय बाद भूल जाना।
  • समस्या हल करते समय सही सूत्र के निर्धारण में गलती करना जिसमें समस्या का हल नहीं हो पाना। (इसकी पहचान के लिये बच्चों से मौखिक रूप से सूत्र पूछे गए व लिखित रूप से कई समस्याऐं दी गई जिनको हल करने में बच्चे कठिनाई का अनुभव कर रहे थे। गलत सूत्रों का प्रयोग कर रहे थे। जैसे - कक्षा VIII में खोखले पाईप पर रंग करने के लिये वक्र पृष्ठ के क्षेत्रफल के स्थान पर सम्पूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल (बेलन का) 2лr(r+h) के सूत्र का प्रयोग कर रहे थे। ढक्कन रहित टंकी का सम्पूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल ज्ञात करने में गलत सूत्र का प्रयोग आदि।
  • विद्यालय का वातावरण नीरस होना व सह शैक्षणिक गतिविधियों का कम होना।

हल के लिए किए गए प्रयास

अध्यापन एक कला है जो स्वयं में अनेक तकनीकी पहलुओं प्रविधियों एवं विद्याओं को समावेशित किए हुए है। इसमें पारंगत शिक्षक कठिन विषय-वस्तु को भी सरल, रोचक एवं आनन्ददायी तरीके से स्पष्ट करते हुए अधिगम को स्थायी बना सकता है।

कक्षा VIII एवं VII का गणित एवं विशेषतः रेखा गणित के प्रति व्याप्त भय एवं उपरोक्त प्रकार से की गई जाँच में कुछ समस्याएँ दृष्टिगत हुईं। उनके समाधान हेतु मैं इस निष्‍कर्ष पर पहुँचा कि-

  • विद्यार्थियों को रटने की प्रवृति से गणित पढ़ाने की बजाय ‘आओ करके देखें’, ‘खेल विधि’ आदि के द्वारा कुछ अलग ढंग से अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास किया जाए।
  • बच्चों को विभिन्न सूत्रों को रटकर याद करने की बजाय ज्यामितीय आकृति के विभिन्न भागों (पृष्ठों/फलकों) आदि को स्पष्ट करते हुए उनके द्वारा ही सूत्र का निर्धारण करवाया जाए। जिससे बच्चे सूत्र के निर्धारण को समझने के साथ-साथ विभिन्न स्थितियों में सही सूत्र का प्रयोग करते हुए समस्या का सही हल खोज सकें।

मैंने प्रयास ऐसे किया

विभिन्‍न आकृतियों के क्षेत्रफल या आयतन की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए मैंने आसपास उपलब्ध सामग्री से (जैसे अगरबती या पेस्ट ट्यूब, दवाओं आदि के खाली डिब्बों या कार्ड बोर्ड से) उस आकृति के 8-10 मॉडल तैयार कर लेता हूँ। उसके बाद 4-4 बच्चों का ग्रुप बनाता हूँ। कोशिश होती है कि ग्रुप में सभी प्रकार के बच्चे सम्मिलित हों। हर समूह में आकृति का एक मॉडल दे देता हूँ । फिर प्रत्येक समूह से मॉडल में उपस्थित पृष्ठों/फलकों की संख्या गिनने के लिए कहता हूँ । उसके बाद तत्पश्चात् प्रत्येक पृष्ठ पर एक,दो,तीन क्रमश: लिखने को कहता हूँ । फिर मॉडल को दिखाकर प्रत्येक पृष्ठ की सरल आकृति के बारे में पूछता हूँ । विद्यार्थी अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर बताते हैं व जहाँ आवश्यकता हो वहाँ उनकी सहायता करता हूँ। जैसे घनाभ के पृष्ठों की आकृतियाँ आयताकार, घन के पृष्ठ की आकृति वर्गाकार, बेलन के पृष्ठों की आकृति वृत्ताकार व वक्राकार वक्र पृष्ठ को काटकर आयताकार बनाते हुए आदि। तत्पश्चात् मॉडल की प्रत्येक सतह (पृष्ठ) पर क्रमशः लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई या उस भाग के लिए उपयुक्त शब्‍द लिखने के लिए कहता हूँ ।

प्रत्येक सरल आकृति को पृथक करवाकर आकृति को दिए गए सरल क्रमांक के आधार पर उस पृष्ठ के क्षेत्रफल के सूत्र का निर्धारण करवाया जाता है। इस क्रिया का दोहराव करवाकर इसमें पारंगत किया जाता है। इसके पश्चात् सभी सरल आकृतियों (सभी पृष्ठों) को जोड़कर पुनः जटिल ज्यामितिय आकृति का निर्माण करवाता हूँ । फिर सभी सरल आकृतियों (पृष्ठों के) क्षेत्रफलों के सूत्रों को जोड़कर सम्पूर्ण आकृति के क्षेत्रफल का निर्धारण करवाता हूँ ।

जैसे घनाभ के घन के 6 पृष्ठ है तो सभी 6 पृष्ठों के क्षेत्रफल को जोड़कर सम्पूर्ण पृष्ठों के क्षेत्रफल के लिये सूत्र का निर्धारण करवाया जाता है। बेलन में तीनों पृष्ठों के क्षेत्रफल के सूत्र को जोड़कर सम्पूर्ण पृष्ठों के लिये सूत्र का निर्धारण करवाया जाता है। इसके पश्चात् ऊपरी पृष्ठ जैसे छत या निचले पृष्ठ जैसे फर्श रहित ज्यामितीय आकृति के क्षेत्रफल के लिये सूत्र का उसमें से उक्त पृष्ठ को कम करते हुए निर्धारण करवाया जाता है। इस प्रकार से उनको सही सूत्र के निर्धारण में दक्ष कर दिया जाता है। तत्पश्चात् सूत्र में सही मानों को प्रतिस्थातिप करने की प्रक्रिया को समझाते हुए दक्षता प्रदान की जाती है। जैसे लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई, r,h आदि के मानों को लिखना।

मानों के प्रतिस्थापन के पश्चात् योग, व्यकलन, गुणा, भाग आदि से समस्या को हल करवाते हुए दक्ष किया जाता है। अन्तः में पक्षान्तरण व वज्र गुणा आदि क्रिया को समझाते हुए उक्त क्रिया को दोहराकर दक्षता प्रदान की जाती है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को बालक स्वयं समूहों में उत्सुकता से करते हैं।

यह एक उदाहरण था। जब भी मुझे आवश्‍यकता महसूस होती है मैं कक्षा में इस तरह की गतिविधि करता हूँ।

घर जाकर ताश के पत्तों, अगरबत्ती के पैकेट ,माचीस की डिब्बी आदि की नाप लेकर उनका क्षेत्रफल ज्ञात करके लाने का कार्य दिया जाता है। व अगले दिन उसकी जाँच की जाती है तथा त्रुटि होने पर सुधार करवाया जाता है।

अध्‍यापन के दौरान बीच-बीच में कोई हास्य एवं रोचक जैसे चुटकुला या प्रसंगवस आदि मे आये अटपटे शब्दों का उच्चारण करवाकर या अलग अंदाज में बात कहकर कक्षा-कक्ष का वातावरण हंसमुख रहता है जिसमे विद्यार्थियों की सक्रियता व सजगता बनी रहती है।

विद्यालयी वातावरण को सरस बनाने के लिये प्रार्थना सभा में विभिन्न रोचक गतिविधियों यथा- जीवन की रोचक घटनाएँ, महापुरूषों की जीवनी के रोचक उदाहरण, सरस प्रार्थना व समूह गान प्रारम्भ, सामान्य ज्ञान के प्रश्नोत्तर आदि कार्यक्रम किए जाते हैं। बालसभा को रोचक बनाने के लिए  उसमें एकलअभिनय, मूकअभिनय आदि करवाए जाते हैं।

प्रयास के दौरान आई बाधाएँ

  • घरेलू कार्यो से,
  • कृषि कार्यो से,
  • अभिभावकों की उदासीनता के कारण विद्यार्थियों की अनियमित उपस्थिति।

समाधान 

  • विद्यार्थियों को रोचक गतिविधियाँ कार्ड आदि से गणितीय खेल, सांप-सीढ़ी के खेल आदि करवाकर।
  • कक्षा-कक्ष एवं विद्यालय व गणित विषय के प्रति आकर्षण उत्पन्न किया गया।
  • अभिभावकों से सम्पर्क कर उन्हें विद्यार्थियों के अध्ययन के प्रति जाग्रत किया गया।
  • बच्चों द्वारा एवं स्वयं के स्तर पर तथा विद्यालय में उपलब्ध बच्ची सामग्री से मॉडल का निर्माण किया गया व इसके लिये मध्यान्तर व विद्यालय समय के पश्‍चात थोड़ा रुककर समय का प्रबन्धन किया गया। 
  • गैर शैक्षणिक कार्यो से शिक्षण की निरन्तरता में व्यवधान उत्पन्न होता है। गैर शैक्षणिक कार्यो में जाने या उन्‍हें करने से पूर्व विद्यार्थियों को पहले की गई गतिविधियों को दोहराने के अवसर देकर।

प्रयासों से आए परिवर्तन

  • विद्यार्थियों में गणित का भय दूर हो गया। बच्चे गणित के पीरियड की बेसब्री से प्रतिक्षा करने लगे। पूर्व में जो विद्यार्थी अनियमित रहते थे वे उनका नियमित हो गए।
  • विद्यार्थियों में सूत्र को रटकर याद करने की प्रवृति के स्थान पर समझकर सूत्र निर्धारण की प्रवृति का विकास हुआ। बच्चों को कोई भी त्रिवीमीय आकृति दिखाने पर वे पहले उसके पृष्ठ देखते व पृष्ठों की सरल आकृति के आधार पर विभिन्न आकृतियों के सही सूत्रों का निर्धारण कर रहे हैं। विभिन्न समस्याओं का सही हल निकाल रहे हैं। ज्यामितीय आकृतियों के क्षेत्रफल व आयतन के सूत्र बताने में उलझन की स्थिति दूर हो गई।
  • विद्यार्थियों को  मॉडल बनाने की यह प्रक्रिया इतनी रुचिकर लगी कि उन्होनें इसे अपने खेलों मे सम्मिलित कर लिया।

कुछ उपलब्धियाँ

  • बोर्ड परीक्षा सहित स्थानीय परीक्षाओं में विद्यार्थियों के गणित विषय में अच्‍छे अंक आए तथा परीक्षा परिणाम में गुणात्मक व मात्रात्मक सुधार हुआ।
  • गणित विषय की ब्लॉक स्तरीय प्रतियोगिता में जयश्री सोनी ने प्रथम स्‍थान प्राप्‍त किया। जिसमें विभिन्न आकृतियों के क्षेत्रफल के सूत्र व अन्य गणितीय अवधारणाओं से सम्बन्धित प्रश्न पूछे गए थे। विद्यार्थियों ने क्रमशः प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया व गणित विषय की जिला स्तरीय प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ।

शिव कुमार शर्मा

  • एम.एससी. (रसायन विज्ञान),एम.ए. (राजनीति विज्ञान), बी.एड.
  • 23 मार्च,2005 से शिक्षक हैं।
  • रूचियाँ - कविताएँ लिखना, काव्य पाठ  एवं मंच संचालन करना!
  • वर्तमान विद्यालय राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, नया जोगापुरा ।
  • पूर्व विद्यालय राजकीय बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय,अरठवाड़,जिला सिरोही । 

 

 


 

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए 'बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से एक कार्यक्रम की शुरुआत राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से की गई। 2009 तथा 2010 में इस कार्यक्रम के तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। शिव कुमार शर्मा वर्ष 2010 में' शिक्षण अधिगम और कक्षा प्रबन्‍धन’ श्रेणी  में चुने गए हैं। यह लेख पहचान प्रक्रिया में दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। हम शिव कुमार शर्मा, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,सिरोही के आभारी हैं।  


 

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