किसी 'खास' की जानकारी भेजें। शिक्षक, समुदाय और स्कूल

आमतौर आज जैसे ही शिक्षक की बात आती है तो शिक्षकों को लेकर नकारात्मक रवैया चर्चा में शामिल हो जाता है। लेकिन इन सबके बीच आज भी कुछ शिक्षक ऐसे हैं जो इस नकारात्मक छवि के उलट बेहतर प्रयास कर रहे हैं। उनके इसी प्रयासों के चलते समुदाय के लोगों का भी उन्हें पूरा समर्थन व सहयोग मिलता है।

हम लोग वर्तमान में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के साथ मिलकर शिक्षक विकास का कार्य कर रहे हैं।  इसी के चलते अलग - अलग स्कूलों में आना जाना होता है और बहुत सारे शिक्षकों  से मिलना जुलना होता है। ऐसे ही एक दिन में स्कूल गया था। उस दिन उस स्कूल में शाला प्रबन्धन समिति की बैठक आयोजित होना थी।

उस बैठक में गाँव पालकगण आए हुए थे। दो-तीन युवा थे। चार-पाँच बुजुर्ग थे। पाँच-छह महिलाएँ भी इस बैठक में आई हुईं थीं। इस तरह लगभग 12 से 15 लोग उपस्थित थे। मुझे यह सब देखकर थोड़ा आश्‍चर्य तो हुआ कि शाला प्रबन्धन समिति की बैठक में इतने लोग कैसे आ सकते हैं। लेकिन जब शिक्षकों व पालकों से बात की तो पता चला कि शाला प्रबन्धन समिति सदस्यों का प्रशिक्षण चल रहा है। इसी के चलते इतने पालक आए हैं।

थोड़ी देर पालक इधर-उधर घूमते रहे और इसके बाद पालक एक कमरे बैठ गए जहाँ उनका प्रशिक्षण होना था। मैं भी उन पालकों के साथ प्रशिक्षण कक्ष में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद एक शिक्षक प्रशिक्षण हाल में आए। शिक्षक ने कुर्ता पजामा पहना हुआ था। शाला प्रबन्धन समिति के प्रशिक्षण का मॉड्युल हाथ में था। शिक्षक आकर उन पालकों के बीच दरी पर बैठ गए तथा उनके साथ कुछ शिक्षक भी आ गए। वह भी उनके समीप बैठ गए।  

शिक्षक ने सभी पालकों को नमस्कार किया। इसके बाद शिक्षक ने अपनी राजस्थानी भाषा में पालकों को एक गीत सुनाया ......रे भाया या जिन्दगाणी रे। इस गीत को पालकों ने भी शिक्षक के साथ दोहराया और आनन्द लिया। शिक्षक के द्वारा पालकों के साथ उनकी भाषा में गीत गाने से माहौल सहज हो गया था। शिक्षक ने पूरी चर्चा के दौरान पालकों से पूरे सम्मान के साथ बातचीत की। शिक्षक वहाँ उपस्थित एक-एक पालक (चाहे वह महिला हो या पुरुष) के नाम से परिचित थे और सम्मानीय सम्बोधन के साथ उनका नाम लेकर उनसे उनकी स्थानीय बोली में बातचीत कर रहे थे। पालक भी सहज होकर उनसे बातचीत कर रहे थे।

शिक्षक ने पालकों के साथ जिस तरह से बातचीत की पालकों को बात करने के मौके दिए उनकी भावनाओं का सम्मान किया व उनकी बातें सुनी। शिक्षक के इस तरीके ने मुझे काफी प्रभावित किया। इस शिक्षक के बारे में और जानने समझने की मेरे मन में जिज्ञासा पैदा हुई।

प्रशिक्षण के उपरान्त उनसे मेरी बातचीत हुई। वह तो मुझे जानते थे। क्योंकि नोडल की बैठकों में उनसे अनौपचारिक रूप से मिला था। लेकिन मैं उन्हें सिर्फ शक्ल से ही जानता था। उन्होंने अपना परिचय दिया मेरा नाम गोविन्द नारायण जाट है। मैं रा.उ.प्रा.विद्यालय सिन्दरा में प्रधानाध्यापक तथा नोडल प्रभारी भी हूँ। उस दिन बस इतना ही परिचय हुआ। 

कुछ दिनों बाद में उनके स्कूल रा.उ.प्रा.विद्यालय, सिन्दरा गया। स्कूल बाहर से देखने में ही काफी व्यवस्थित लग रहा था। स्कूल का अच्छा खेल मैदान था। जिसमें दोनों तरफ एक कतार में सुन्दर नीम के पेड़ लगे हुए थे। शिक्षक गोविन्द नारायण जाट अपने कक्ष में एक शिक्षक के साथ कुछ कार्य में व्यस्त थे। अपना काम खत्म करने के बाद वे अपना स्कूल दिखाने लगे। सभी शिक्षकों से मिलवाया। बच्चों से बातचीत करवाई।

मैंने उनसे शाला प्रबन्धन समिति की बात करना शुरू की। उन्होंने कहा इस पूरे निवाई ब्लॉक में अगर कोई शाला प्रबन्धन समिति सक्रिय है तो वह हमारे स्कूल की है। इसके लिए में अपने शिक्षक साथियों व उन पालकों का आभारी हूँ।

मैंने उनसे पूछा कि आपने ऐसा क्या किया आपको इतने बढ़िया सदस्य मिल गए। इस प्रश्‍न के जवाब में उन्होंने कहा यही स्कूल नहीं इसके पूर्व में जब अन्य दूसरे स्कूल गोपालपुरा में था तब से समुदाय के साथ मेरे रिश्‍ते बहुत अच्छे हैं। मैं हर पालक को नाम से जानता था। चाहे वह महिला हो पुरुष। उनसे आगे बढ़कर कोई भी बात छेड़ देता था। उनके घर-परिवार की बात करने के बाद बच्चों के बारे में बात कर लेता था। मैं कई बार रात को गाँव में रुका हूँ और समुदाय के साथ बैठकर बातें की हैं। गाँव वालों के दुख-सुख के कार्यक्रमों में शरीक होता था। इसी के चलते स्कूल गोपालपुरा में 100 प्रतिशत उपस्थिति रहती थी।

मेरा एक सिद्धान्त है कि मैंने पालकों को स्कूल बुलाकर कभी अकेले में कोई बात नहीं की। उन्हें कक्षा में बिठा लेता था। खुद कक्षा लेता था और वह पालक बैठकर देखते थे। कक्षा लेने के बाद बच्चों के सामने ही उनसे बात करता था। अगर उनके बच्चे कक्षा में होते तो उनके सामने ही बात करता। उनके शैक्षणिक स्तर की जानकारी उनको देता था। इस प्रक्रिया ने मुझे समुदाय के साथ नजदीक से जोड़ा। मैं उनका सम्मान करता था और वह मेरी बातों का।

उन्होंने आगे बताया। सिन्दरा स्कूल की शाला प्रबन्धन समिति का जब गठन होना था तो हमने शिक्षकों  के साथ मिलकर पालकों की एक सूची बनाई। हमने 50 से 60 पालकों का चयन किया। और शिक्षकों को जिम्मेवारी दी कि इन सबसे हमें सम्पर्क करना है। शाला प्रबन्धन समिति के गठन के दिन ये पालक तो आएँ ही आएँ ऐसा प्रयास हम करेंगे। हमारे इस प्रयास से अपेक्षा से अधिक पालक जुडे़।

अब जब सब पालक जुड़ गए तो हमने हमारा शाला प्रबन्धन समिति के गठन का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा और गलती से मैंने कह दिया कि कौन शाला प्रबन्धन समिति का अध्यक्ष बनना चाहता है अपना हाथ खड़ा कर दे। थोड़ी देर तक कोई हाथ नहीं खड़ा हुआ। लेकिन इसके बाद एक महिला ने अपना हाथ खड़ा कर दिया। महिला को मैं ऐसे तो जानता था लेकिन इतना अच्छे से नहीं जानता था कि यह कौन है ? क्या करती है ? मैं थोड़ा विचलित हुआ और मैंने सोचा कि शायद कुछ गलती हो गई। गलत प्रस्ताव रख दिया हाथ खड़ा करने का और उस महिला के अलावा अन्य लोगों ने हाथ भी खड़ा नहीं किया।

मैं दुविधा में फँस गया था। मैंने अन्य पालकों से पूछा कोई अन्य भी बनना चाहेगा। पालकों ने उनके नाम की ही मोहर लगा दी। और यही चयन का तरीका हमारे लिए बहुत अच्छा साबित हुआ। शाला प्रबन्धन समिति अध्यक्ष का बहुत ही सक्रिय सहयोग हमें मिलता है।

गोविन्द जाट कहते हैं लेकिन सिन्दरा में आकर मैं वह नहीं कर पा रहा जो मैंने गोपालपुरा में किया। पालकों को कक्षा में बैठाकर उनके बच्चों के बारे में ज्यादा नहीं बता पा रहा हूँ। क्योंकि यहाँ के पालक ज्यादातर मजदूर हैं और सुबह-सुबह ही मजदूरी के लिए निकल जाते हैं। लेकिन फिर भी शाला प्रबन्धन समिति की मिटिंग नियमित होती है और उस बैठक में सदस्यों की भागीदारी और सक्रियता अपेक्षा से कहीं अधिक रहती है।

एक अन्‍य दिन मैं सिन्दरा स्कूल गया हुआ था। शिक्षक गोविन्द जाट और मैं स्कूल मैदान में बैठकर चर्चा कर रहे थे। तभी तीन महिलाएँ स्कूल में आईं। जिसमें से एक महिला के हाथ में मटका था। दूसरी के हाथ में एक रजिस्टर व तीसरी उनके साथ थी।

हम चर्चा कर रहे थे तो वह हमारे पास से बिना कुछ कहे सीधे निकल रही थीं। तभी शिक्षक गोविन्द जाट की नजर उन पर पड़ी तो उन्होंने उन्हें टोकते हुए कहा अजी बहन जी कहाँ सीधे-सीधे निकल रहे हो कुछ बोल तो लो। इस प्रश्‍न के जवाब में महिला ने कहा जी आप बातें कर रहे थे। इसलिए कुछ नहीं बोले। गोविन्द जी ने उनका परिचय हमसे करवाया। इन तीनों महिलाओं में से एक आँगनवाड़ी कार्यकर्ता थी। दूसरी व तीसरी महिला बच्चों के लिए मध्यान भोजन बनाती हैं।

आँगनवाड़ी कार्यकर्ता का परिचय देते हुए गोविन्द जी ने कहा कि इनके तीनों बच्चे हमारे स्कूल में पढ़ते हैं। बहुत होशियार बच्चे हैं। ये इन बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भर्ती करा रही थीं। लेकिन मैंने इनसे आग्रह किया तो इन्होंने उन बच्चों को हमारे स्कूल में ही भर्ती करवाया। इनके बच्चों के यहाँ होने से हमें भी हमारी जिम्मेदारी का अहसास होता है। क्योंकि हमने इनसे वादा किया है कि आपके बच्चों का शिक्षण प्राइवेट के बच्चों से कही कम नहीं होगा। इसका ख्याल मुझे भी है और हमारे शिक्षकों को भी।

 


राकेश कारपेण्टर,स्रोत व्यक्ति अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन ब्लाक गतिविधि केन्द्र एवं पुस्तकालय,निवाई,टोंक, राजस्थान

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

बहुत अच्‍छा प्रयास । जब काम के प्रति , समुदाय के प्रति समर्पण का भाव पैदा होता है तो ऐसे ही प्रेरक परिणाम निकलते हैं । बधाई

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