किसी 'खास' की जानकारी भेजें। शिक्षक, जो विद्यालय को 'विद्यालय' बनाते हैं...

इस बार ग्रीष्मकालीन शिक्षक प्रशिक्षण में भाग लेने गया तब मेरी मुलाक़ात एक बहुत जुझारू शिक्षक बिरमपुरी जी से हुई। प्रशिक्षण में उनकी सहभागिता और उनके स्कूल में किए गए कामों के उदाहरण किसी को भी प्रेरित कर सकते थे। मैं भी बहुत प्रभावित हुआ और उनके उदाहरण को लेते हुए मैंने दो पेज लिखे और उनके सामने रखे कि अगर इसमें कोई त्रुटि हो तो आप सही करके कल दे दीजिएगा। अगले दिन वह मुझे छह पेज देते हैं जो उन्होंने ख़ुद लिखे थे अपने साथी शिक्षकों की मदद से, अपने स्कूल में जो जो काम अभी तक किया है उसके बारे में।

बिरमपुरी और उनके साथी शिक्षक की डायरी से...  

सितम्‍बर 2012 में तीसरी श्रेणी भर्ती परीक्षा में RPSC से चयनित होकर हम चार अध्यापकों ने U.P.S किशनपुरा, झाड़ली, तहसील मालपुरा, जिला टोंक,राजस्‍थान में पदभार ग्रहण किया। गणित विषय से दिनेश कुमार जांगिड़, सामाजिक विज्ञान विषय से बिरमपुरी गोस्वामी, संस्कृत विषय से ब्रजराज जात तथा हिन्दी विषय से पहलवान वर्मा ने कार्य भार सम्‍भाला ।

जब हम लोग विद्यालय में पहुँचे तो वहाँ एक शिक्षक कैलाश सिंह जाट एवं 25 बच्चे मौजूद थे। मालपुरा से लेकर किशनपुरा तक पहुँचने में हमें उस गाँव के बारे में कई लोगों ने तरह-तरह की बातें बताईं। यह गाँव ऐसा है, यह गाँव वैसा है। यहाँ सम्‍भलकर रहना एवं लोगों से सम्‍पर्क कम रखना, क्योंकि सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया जाता। इस डर के कारण हमने छह माह तक लोगों से सच में सम्‍पर्क नहीं किया। यह बात तो हमने प्रत्यक्ष रूप से भी देखी कि वहाँ के लोगों की स्थानीय भाषा इतनी अशोभनीय थी कि कोई भी डर ही जाए।

धीरे-धीरे हमने लोगों की आवाजाही, रहन-सहन व बोल-चाल देखा तो हमें अनुभव हुआ कि गाँव वाले तो अच्छे लोग हैं, जबकि लोगों ने व्यर्थ ही इनके बारे में भ्रामक बातें बना रखी हैं। फिर धीरे-धीरे हम लोगों ने गाँव वालों से सम्‍पर्क बनाया तो गाँव वालों का विद्यालय से जुड़ाव होने लगा। विद्यालय हालाँकि 8वीं तक था लेकिन अध्यापक न होने के कारण कक्षा 7वीं तक ही बच्चे थे। 8वीं में एक भी विद्यार्थी नहीं था। सत्र के करीब ढाई माह बीत जाने के बाद हमने प्रयास करके 8वीं कक्षा में 2 बालिकाओं को प्रवेश दिया और फिर लग गए बच्चों को पढ़ाने में। कहते हैं मेहनत कभी बेकार नहीं जाती है। हम शिक्षक साथियों की मेहनत भी रंग लाई और दोनों ही बालिकाएँ शानदार अंकों के साथ उत्तीर्ण हुईं, जिसमें एक बालिका को पुरस्‍कार में लेपटोप मिला। यह उपलब्धि देखकर हम साथियों को भी पूरा विश्वास हो गया कि...  

                    “रुक मत ओ मुसाफिर, कदम बढ़ता चल ।

                  निश्चित ही मंजिल पग चूमेंगी, आज नहीं तो कल।”

अब हमने मिलकर तय किया कि किशनपुरा सरकारी विद्यालय को लोगों के सामने एक मिसाल के रूप में स्थापित करेंगे। गाँव वालों की धारणा यह बनी हुई थी कि सरकारी विद्यालय में पढ़ाई नहीं होती है, प्राइवेट विद्यालय में जाने वाले बच्चे अँग्रेजी अच्छी जानते हैं। यह बात हमारे लिए एक बड़ी चुनौती थी जिसे हमने सहर्ष स्वीकार करते हुए दूसरे शिक्षा सत्र में अँग्रेजी व गणित पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। कुछ ही दिनों में बच्चों में अँग्रेजी मीनिंग व अँग्रेजी पहाड़ों का प्रभाव दिखने लगा जो कि प्राइवेट विद्यालय में जाने वाले बच्चों से श्रेष्ठ था। गाँव वालों को यह देखकर बड़ी हैरानी हुई। फिर उनकी समझ में आया कि सरकारी विद्यालय में पढ़ाई होती है।

और धीरे-धीरे बच्चों का नामांकन बढ़ने लगा जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया।

विद्यालय का वातावरण : विद्यालय के प्रांगण में एक गड्ढा था। जिसमें बरसाती पानी भर जाता था। विद्यालय के बाहर मुख्य द्वार पर जानवरों का गोबर जमा किया जाता था, जिससे विद्यालय परिसर दुर्गंध से भरा रहता था। धीरे-धीरे गाँव वालों से सम्‍पर्क बढ़ने पर वे भी हमारी मेहनत कि सराहना करने लगे। कहने लगे कि विद्यालय को और अच्छा बनाओ जिसमें हमारे भी सहयोग की जरूरत हो तो हमें बताओ। हमने गाँव वालों के सामने सीधा-सा प्रश्न किया –

शिक्षक : आप विद्यालय को क्या मानते हैं ?

गाँव वाले : जी विद्यालय तो मन्दिर ही है।

शिक्षक : मन्दिर में सफाई होती है या गंदगी।

गाँव वाले : मन्दिर तो साफ सुथरा ही होता है साहब।

शिक्षक : तो फिर आपके इस मन्दिर के सामने यह गोबर क्यों ?

गाँव वाले : (सन्नाटा छा गया... कुछ देर बाद) ठीक है साहब ! जिनका गोबर है उनसे बात करेंगे।

दो दिन बाद गाँव वालों ने कहा कि हमें एक माह का समय दो। इस दौरान हम इस गोबर को उठाकर अपने खेतों में डाल लेंगे और भविष्य में यहाँ कभी गोबर नहीं डालेंगे ।

फिर हमने गाँव वालों से बात करके शाला प्रांगण में जो गड्ढा था उसमें करीब 40-50 ट्रॉली मिट्टी डलवाकर उसे समतल करवाया। इस कार्य में गाँव वालों का उत्साह व सहयोग देखने लायक था। हम लोग भी देर रात तक रुककर इस काम को करवा रहे थे। गाँव वाले और बच्चे हमारे चाय-पानी और भोजन का बहुत ख्याल रखते थे। उनका यह प्यार-प्रेम देखकर हमें बड़ा आश्चर्य होता था। यह आत्मीयता और लगाव धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि अब तो हम लोगों का किशनपुरा छोड़कर जाने का मन ही नहीं करता। इसके बाद हमने कुछ ट्रॉली उपजाऊ मिट्टी डालकर विद्यालय प्रांगण में कई पौधे लगाए और गाँव वालों को एक-एक पौधा गोद दिया। गोद लेने वाले परिवार से आने वाले बच्चे उस पौधे की देखभाल करते हैं। आज वे पौधे राह चलते हर किसी का ध्यान अपनी ओर खीचते हैं।

सह-शैक्षणिक गतिविधियाँ : पढ़ाई के साथ-साथ हम लोग विद्यालय में कई तरह की गतिविधियाँ भी कराते हैं जिसमें बालिकाओं को मेहन्‍दी डिजाइन सिखाना, बालकों को पेंटिंग व चित्रकला सिखाना, नृत्य व संगीत, सुलेख प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता आदि कई तरह की प्रतियोगिताएँ करवाते हैं। 15 अगस्त व 26 जनवरी के अलावा भी वार्षिक उत्सव का आयोजन करते हैं, जिसमें बच्चे और गाँव वाले बड़ -चढ़कर भाग लेते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जब हमने शुरुआत की थी तो गाँव वालों को यक़ीन नहीं आया कि उन्हीं के गाँव के नन्हे-मुन्ने बच्चे ऐसे शानदार कार्यक्रम कर सकते हैं। जब हमने पहली बार 15 अगस्त का कार्यक्रम किया तो गाँव से पधारे मुख्य अतिथि महोदय का तो यह कहना था कि, “हमारा देश जरूर 1947 में आजाद हो गया था लेकिन हमारा गाँव तो आज आजाद हुआ है।’’  उनका भी कहना सही था क्योंकि हम लोगों के गाँव में आने से पहले वहाँ कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होता था। केवल झण्डारोहण होता था, उसमें भी गाँव वालों की सहभागिता नहीं होती थी। आज स्थिति यह है कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार प्रस्तुति देखकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए गाँव वालों से 20-25 हजार रुपए जमा हो जाना सामान्य बात है।    

पोषाहार : जब हम लोग सितम्‍बर 2012 किशनपुर आए थे तो स्थिति अत्यन्‍त सोचनीय थी। पोषाहार बनाने में नियमितता नहीं थी और सारे बच्चे खाना भी नहीं खाते थे। शायद भोजन स्वादिष्ट नहीं बनता होगा। इस ओर भी हम साथियों ने ध्यान दिया और धीरे-धीरे सुधार किया भोजन नियमित भी बनने लगा और सारे बच्चे खाने भी लगे। बच्चों के साथ हममें से भी कोई एक साथी भोजन करता है, जिससे न खाने वाले बच्चे भी खाने लग गए। आज स्थिति यह है कि विद्यालय  में बना खाना घर के खाने की तरह स्वादिष्ट होता है और सभी बच्चे मंत्र बोलकर भोजन करते हैं।

प्रार्थना : पहले विद्यालय में प्रार्थना ही नहीं होती थी। हमने प्रार्थना शुरू करवाई। बच्चे प्रार्थना नहीं जानते थे तो हमने उनको पहले सिखाया और फिर वो रोज प्रार्थना करने लगे। प्रार्थना में धीरे-धीरे कई चीज़ें जुड़ती गईं। आज स्थिति यह है कि प्रार्थना, गीत, प्रेरक प्रसंग, सुभाषित, अमृत वचन, समाचार वाचन, प्राणायाम, मंत्रोच्चार आदि सभी चीजें प्रार्थना में शामिल हैं और सबसे विशेष बात यह है कि सारा प्रार्थना कार्यक्रम बच्चे स्वयं संचालित करते हैं।

विद्यालय गणवेश एवं स्वच्छता : पहले बड़े बच्चों में कुछ एक को छोड़कर कोई भी गणवेश में नहीं आता था। छोटे बच्चों का हाल यह था कि चड्डी तो दूर कि बात है नंगे ही चले आते थे। साफ-सफाई से न बच्चों को कोई मतलब था और न गाँव वाले ध्यान देते थे। हमने इस ओर भी थोड़ी सख्ताई के साथ ध्यान दिया और धीरे-धीरे सुधार होने लगा। जो बच्चे नहाकर नहीं आते थे उनको विद्यालय में ही शिक्षकों द्वारा नहलाना शुरू कर दिया। शर्मिन्‍दा होकर गाँव वालों ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। आज स्थिति यह है कि सभी बच्चे नहाकर साफ-सुथरे गणवेश में आते हैं। विशेष बात यह है कि जिन बच्चों का नामांकन नहीं है वो भी शाला गणवेश में आते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कक्षा में एक स्वच्छता प्रमुख बनाया हुआ है और यह स्वच्छता प्रमुख अपनी कक्षा के प्रत्येक छात्र-छात्रा की स्वच्छता का ध्यान रखता है तथा कमी रहने पर अध्यापकों को सूचित करता है। हम उस कमी को विद्यालय में ही पूरी करवाते हैं। हमने तेल, साबुन, काँच, कंघा, नेल कटर आदि स्वच्छता से संबन्धित सभी संसाधन विद्यालय में उपलब्ध करवा रखे हैं।

शिक्षकों का आदर सम्मान : आज सम्पूर्ण शिक्षक समाज में यह शिकायत देखने को मिलती है कि गाँव वाले हमारी बात नहीं मानते, गाँव वाले शिक्षकों को आदर सम्मान नहीं करते। जब हम लोग जब शुरू में किशनपुरा गए थे तो हमें ऐसा ही कुछ महसूस होता था, लेकिन हमारा मधुर व्यवहार कहें या कोई चमत्‍कार, गाँव वालों का रवैया बदलते देर नहीं लगी। आज आए दिन गाँव में से चाय-पानी के बुलावे आते हैं। गाँव में किसी के यहाँ कैसा भी छोटा-मोटा कार्यक्रम हो हमारे विद्यालय परिवार को बच्चों सहित बुलाया जाता है। गाँव वालों से आज इतनी दोस्ती और लगाव है कि हम शिक्षकों को ऐसा लगता है जैसे इस गाँव से पिछले जन्मों का कोई रिश्ता हो। स्थिति यह है कि हम शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में भी विद्यालय जाकर गाँव वालों से मिलते हैं।

और एक घटना तो ऐसी घटी कि उसमें गाँव वालों का शिक्षकों के प्रति प्रेम और सम्मान देखकर हम अपने आँसू नहीं रोक पाए। 26 जनवरी 2016 को विद्यालय में गणतन्त्र दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा था। तभी अचानक हमारे शिक्षक साथी पहलवान वर्मा जी मंच संचालन करते हुए मूर्छित होकर गिर पड़े। यह देख कई गाँव वालों ने दौड़कर उनको सम्‍भाला उनको कमरे में ले जाकर लिटाया और कोई हवा कर रहा था तो कोई हाथ पैरों की मालिश कर रहा था और खास बात यह है कि यह सब लोग बड़े-बुजुर्ग थे। सारे गाँव में दुख की ऐसी लहर दौड़ गई जैसे कि उनके अपने घर का कोई सदस्य बेहोश पड़ा हो। कुछ ही देर में गाँव वाले तुरन्‍त गाड़ी ले आए और हमारे साथी को अस्पताल ले गए, वहाँ उनका इलाज हुआ। भगवान का शुक्र था कि उन्हें जल्दी ही आराम मिल गया अन्यथा गाँव वाले उन्हें जयपुर तक ले जाने को तैयार थे। दिनभर गाँव वाले उनके समाचार पूछने आते रहे। सार -सम्‍भाल का यह सिलसिला कई दिनों तक चला। आज भी गाँव वालों के उस निश्छल भाव को याद करते है तो हमारी आँखें भर आती हैं। आज स्थिति यह है कि हमें गाँव में कोई भी समस्या नहीं है और अपने घर की तरह हम रह रहे हैं ।

हमारी आगामी योजना एवं सरकार से अपेक्षाएँ : हम शिक्षक साथियों के अथक प्रयास करके पिछले दो-तीन वर्षों में विद्यालय को काफी ठीक स्थिति में ला खड़ा किया है। यह हमारी मेहनत का ही परिणाम है कि सत्र 2015-16 में UPS किशनपुरा को आदर्श विद्यालय घोषित किया गया है। आगे हम यह चाहते हैं कि हमारा किशनपुरा विद्यालय न केवल टोंक जिले में अपितु सम्पूर्ण राजस्थान प्रदेश में एक ऐसे उदाहरण के रूप में स्थापित हो जिसे देखकर हताश एवं निराश शिक्षकों को एक नई उम्मीद मिले, एक नया विश्वास मिले, एक नया रास्ता मिले जिससे वह भी अपने विद्यालय के बच्चों को सही मार्ग दिखा सकें।

लेकिन यह सब हम केवल अपने दम पर नहीं कर सकते है, इसके लिए हमें विभागीय और राजकीय सहयोग की आवश्यकता है। सर्वाधिक तो विद्यालय परिसर के चार दीवारी की आवश्‍यकता है क्योंकि उसके अभाव में बहुत मेहनत से लगाए हुए पौधों को जानवर खा जाते और नष्ट कर देते हैं। आवारा पशु शाला परिसर में गोबर कर जाते हैं। जिससे काफी परेशानी होती है। फिर विद्यालय में कक्षा-कक्ष की कमी है जिसके कारण दो-दो कक्षाओं को सम्मिलित रूप से बैठाते हैं। अगर कक्षा-कक्ष बन जाएँ तो सभी कक्षाएँ अलग-अलग बैठ सकेंगी और उनका स्तर और अच्छा हो सकेगा । दूसरी हमारी समस्या है कि विभागीय व्यवस्था के नाम पर कभी सेकेन्डरी सेट अप स्टाफिंग पैटर्न के रूप में हमारी टीम को बिखरने का डर बना रेहता है। यदि हमारी यह टीम बिखर गई तो फिर शायद हम इतना अच्छा कुछ न कर पाएँ ।

संदेश :  साथियों ! बिलकुल निराश होने की जरूरत नहीं है। गाँव वाले बुरे नहीं होते। हाँ हो सकता है कोई एक-दो अपवाद हों, जो सर्वत्र होते हैं। आपको बस एक नई शुरुआत करने की जरूरत है फिर गाँव वाले भी आपके साथ होंगे और बच्चे तो आपके अपने ही हैं।


प्रस्‍तुति : अदनान बुलंद खान, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक,राजस्‍थान

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

very nice work

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