किसी 'खास' की जानकारी भेजें। शिक्षक अभ्यास के द्वारा शिक्षण-कौशल हासिल करते हैं

परिचय

गवर्नमेंट मॉडल प्राइमरी स्कूल, कपकोट, उत्तराखंड कपकोट मुख्य सड़क से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित है। स्कूल तक पहुँचने के लिए आपको एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़ना होगा, कुछ गोशालाएँ पार करनी होंगी और कुछ घरों और खेत के आसपास से गुज़रना होगा। और यदि आप फुर्तीले नहीं हैं तो हो सकता है कि आपका शरीर बिच्छू घास से रगड़ जाए जिसकी चुभन से आपको दर्द होगा, शरीर पर लाल चकत्ते भी हो सकते हैं और आपको लगेगा कि काश आपके पैर और अधिक चुस्त और चाल तेज़ होती! जैसे ही स्कूल की इमारत नज़र आती है, एक सुखद अहसास होती है क्योंकि यह स्कूल न तो शोर-शराबे वाला है और न ही बेहद शांत। यदि आप ध्यान से सुने तो आपको पहली मंजिल की किसी कक्षा से निकलने वाली 14 के पहाड़े की लयबद्ध सस्वर ध्वनि और किसी अन्य कक्षा से अंग्रेजी में सस्वर पठन की आवाज़ सुनाई देगी। जहाँ एक ओर बच्चे और शिक्षक कक्षाओं में बेहद जीवंत रूप से बातचीत में लगे हुए दिखाई देंगे वहीं दूसरी ओर भोज माताएँ मध्याह्न भोजन (एमडीएम) पकाने के लिए राशन इकट्ठा करने के लिए दौड़-भाग करती हुई दिखाई देंगी – यह जीएमपी स्कूल, कपकोट की सामान्य दिनचर्या है।

यदि आप प्रवेश द्वार पर लगे एक ‘नाटकीय’ (और मनोरंजक भी) साइन बोर्ड ‘NAIL CHECKPOINT’, जो आगंतुकोंका ध्यान आकर्षित करता है, को छोड़ दें तो जीएमपी स्कूल पहाड़ों में स्थित किसी भी अन्य सरकारी प्राथमिक विद्यालय की तरह ही है- एक मध्यम आकार का आंगन, एक मंजिला इमारत में कक्षाएँ और दोनों मंजिलों पर एक कार्यालय, एक रंगीन और साफ-सुथरा बाहरी भाग और ढलान वाली टीन की छत। कक्षाएँ थोड़ी नम हैं और उनमें सीलन की गंध है लेकिन दिखने में वे साफ और सुव्यवस्थित हैं। पाँचवीं कक्षा के बच्चे चटाई पर बैठते हैं, लेकिन कई अन्य कक्षाओं में मेज़ और कुर्सियाँ ​​हैं। हर कक्षा की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि सफ़ेद दीवारों पर शायद ही कोई जगह खाली हो। बच्चों या शिक्षकों द्वारा तैयार किए गए चार्ट, बड़े पोस्टर और चित्र दीवारों पर लटकाए गए हैं। पाँचवीं कक्षा में एक दीवार पत्रिका (भित्ति पत्रिका) है जो कपड़े से बनी है जो लगभग दीवार के बराबर ही है और इसे तीन तरफ से ढकती है। इसका प्रत्येक भाग किसी एक थीम के लिए नियत है और उस पर इस थीम पर आधारित कलाकृति, लघु निबंध और कविताएँ प्रदर्शित की गई हैं, जिन्हें बड़े करीने से पिनों की सहायता से लगाया गया है। निचली मंज़िल की एक अन्य कक्षा के कोने में दोपहर के भोजन के लिए अनाज का भंडारण किया गया है जिससे जगह की कमी का अंदाज़ा लगता है। बाद में यह पता चला की यहाँ कुछ और कक्षाओं का निर्माण करने और बच्चों के खेलने के लिए कुछ और खुली जगह बनाने की योजना है।

संदर्भ

कपकोट, उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का एक गाँव है जो बागेश्वर शहर से 25 किमी दूर स्थित है। इसमें जिले का प्रशासनिक उपखंड, कपकोट तहसील भी शामिल है। उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित कपकोट सरयू नदी के किनारे 331 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ की स्थलाकृति घाटियों, स्थानीय गर्त और उच्च भूमि द्वारा चिह्नित है, जिसमें भूमि के उपयोग की प्राथमिक गतिविधि खेती-बाड़ी है। मुख्य रूप से ग्रामीण आबादी वाले इस क्षेत्र की औसत साक्षरता दर लगभग 82% है। जिस क्षेत्र में स्कूल स्थित है, वहाँ कम से कम 8-10 निजी स्कूल, एक इंटरकॉलेज और कुछ अन्य उच्च शिक्षा संस्थान हैं। कई परिवार, जो ऊँचाई वाले क्षेत्रों में रहते हैं, स्कूल और कॉलेजों से निकटता के कारण कपकोट में अस्थायी रूप से निवास करते हैं।

एक जन्मजात शिक्षक

हेड मास्टर और जीएमपी स्कूल के गणित के शिक्षक ख्याली दत्त शर्मा के बारे में पहले-पहल जो धारणा मेरे मन में बनी, उसने मुझे आगे होने वाले अनुभवों के लिए तैयार किया। मृदुभाषी, संकोची और बेहद विनम्र – मुझे पता था कि मुझे उनसे अपने बारे में बात करने के लिए उन पर दबाव डालना होगा क्योंकि वे ऐसे व्यक्ति थे ही नहीं जो अपने बारे में कुछ कहें। हालांकि जब मैंने उनकी गणित की पाँचवीं कक्षा देखी तो इस बात की पर्याप्त जानकारी मिली कि ख्याली दत्त शर्मा (केडीएस) क्यों एक असाधारण शिक्षक और प्रशासक के रूप बहुत विशिष्ट हैं तथा उनकी कहानी बताई जानी चाहिए।

केडीएस कपकोट में पले-बढ़े, कॉलेज की पढ़ाई की और जीएमपीएस कपकोट में आने से पहले उसी क्षेत्र के स्कूलों और एक निजी इंटर कॉलेज में कार्यरत थे। वे एक शिक्षक के पुत्र हैं, उन्होंने भौतिक शास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की और जीवन की राह स्वाभाविक रूप से अपने पिता के नक्शेकदम पर चले। जब यह रिपोर्ट लिखी गई तब उनकी उम्र उनतालीस साल थी, वे अभी भी अविवाहित थे तथा अपने वृद्ध माता-पिता के साथ एक पहाड़ी पर रहा करते जहाँ से पैदल स्कूल जाने में लगभग 30 मिनट लगते हैं। अपने पोस्ट-ग्रेजुएशन के बाद वे बीएड करने लगे और उन्होंने बताया कि उस साल राज्य में कुछ राजनीतिक और कानूनी विवादों के कारण उन्हें कोर्स पूरा करने में एक वर्ष के नियत समय से ज़्यादा समय लग गया। केडीएस ने इसे एक सुअवसर के तरह देखा और शिक्षण-कला को सीखने तथा अभ्यास करने का विस्तारित अवसर माना। अपने बीएड के दिनों के दौरान उनके एक ऐसे शिक्षक ने उनकी प्रशंसा की जिनकी सराहना वे स्वयं करते थे। केडीएस कहते हैं कि यह उनकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उस शिक्षक ने उनकी एक कक्षा के अवलोकन के बाद उनसे कहा,‘ख्याली, तुम एक जन्मजात शिक्षक हो!’

उन्हें अपनी कक्षा में पढ़ाते हुए देखकर कोई भी बता सकता है कि केडीएस अपने पेशे से इतना प्यार क्यों करते हैं। पाँचवीं कक्षा के छात्रों को ‘चतुर्भुज’ के बारे में पढ़ाते समय केडीएस अपने विद्यार्थियों के साथ बातचीत करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक बच्चे ने अवधारणा को समझ लिया है। बच्चों की शंकाओं का बड़े धैर्य के साथ समाधान करते हुए वे आयत, समांतर चतुर्भुज और चतुर्भुज के बीच के अंतर को समझाने के लिए बोर्ड पर चित्र बनाते हैं। पाठ्यपुस्तकों और नोटबुक्स का कम से कम प्रयोग किया जाता है और छात्रों को प्रोत्साहित किया जाता है कि सभी के लिए वे बोर्ड पर चित्र बनाकर अपनी समझ का प्रदर्शन करें लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता। एक बार वे अवधारणा की व्याख्या के लिए एक दिलचस्प उदाहरण का इस्तेमाल करते हैं जो हाल हीं में कक्षा में एक विधायक के आने से जुड़े अनुभव पर आधारित थाI उन्होंने छात्रों को समझाने के लिए उन्हें याद दिलाया कैसे विधायक पहले एक सामान्य व्यक्ति थे, लेकिन कुछ विशेषताओं को प्राप्त करने के बाद (जैसे कि चुनाव जीतना) उन्हें ‘विधायक’ के रूप में जाना जाने लगा। इसी तरह से कुछ शर्तों को पूरा करने और कुछ गुणों को प्राप्त करने के बाद ही कोई चतुर्भुज एक समांतर चतुर्भुज बन जाता है। ऐसा करते हुए केडीएस चुनाव से जुड़े लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और नागरिकता के महत्व के बारे में छात्रों के ज्ञान का परीक्षण भी कर लेते हैं।

बाद में अपने अध्यापन के बारे में विचार करते हुए केडीएस ने कहा कि वे जान जाते हैं कि कम से कम कुछ छात्र अवधारणा को नहीं समझ पाए हैं और इसलिए जब तक यह सुनिश्चित न हो जाए कि सारे बच्चे समान स्तर पर पहुँच गए हैं, आगे बढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता। उनका मानना ​​है कि एक शिक्षक को प्रत्येक बच्चे के समझ के स्तर को आंकने में सक्षम होना चाहिए और इसके लिए बातचीत सबसे अच्छा ज़रिया है। उनके अनुसार, किसी अवधारणा को पढ़ाने के दौरान बच्चों का आकलन करना महत्वपूर्ण है और जहाँ यह निर्धारित करना आसान है कि बच्चा उस अवधारणा को नहीं समझ पाया है, वहीं निश्चयात्मक रूप से यह बता पाना बहुत कठिन है कि बच्चा उस अवधारणा को समझ गया है। उनका मानना ​​है कि नई अवधारणाओं को ज्ञान के सशक्त बुनीयाद पर ही निर्मित किया जाना चाहिए। अगर बच्चा विभिन्न संदर्भों में किसी अवधारणा को लागू करने में सक्षम है तो इससे पता लगता है कि बच्चे ने अवधारणा को समझ लिया है। एक शिक्षक के रूप में वे इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं। केडीएस का मानना ​​है कि शिक्षक अपने छात्रों से शिक्षण के कौशल हासिल करते हैं। एक अच्छे शिक्षक के पास कुछ अंतर्निहित क्षमताएँ होती हैं, लेकिन कक्षा में समय बिताने से ही वे प्रखर हो सकती हैं। इसलिए शिक्षक के लिए यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि वह अपने शिक्षण में अंतर्दृष्टि विकसित करने और उसमें लगातार सुधार करने के लिए शिक्षण का अभ्यास करता रहे।

लीडर या नेतृत्वकर्ता

केडीएस ने अपनी कक्षा को ‘चुंबकीय क्षेत्र’ का कोर बताया। दूसरे शब्दों में शिक्षक कक्षा में जो कुछ करता है, वही सबसे महत्वपूर्ण है और उसमें दूसरों को कक्षा में आकर्षित करने की शक्ति होनी चाहिए। वैसे केडीएस की अपनी उपलब्धियाँ उनके शिक्षण और कक्षा अभ्यासों से परे हैं। समुदाय में इतना प्रतिष्ठित दर्जा हासिल करने के प्रमुख कारणों में से एक यह है कि स्कूल का कार्यभार संभालने (अप्रैल 2016 से) के मात्र तीन वर्षों में ही उन्होंने स्कूल का कायापलट कर दिया।एक अन्य स्कूल में प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक और कपकोट के एक इंटर कॉलेज में पाँच साल कार्य करने के बाद केडीएस ने धीरे-धीरे इस क्षेत्र में एक मेहनती, ईमानदार और एक उत्कृष्ट गणित शिक्षक होने की नेकनामी हासिल की। जल्द ही उनके प्रयासों को जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा मान्यता मिली, जिनको उनमें संस्था को बदलने और नेतृत्व करने की क्षमता दिखाई दी। पाँच साल की सेवा के बाद उनका स्थानान्तरण और पदोन्नति होनी थी और उन्हें किसी दूसरे स्कूल में भेजे जाने की बात थी, किन्तु केडीएस से वर्तमान जीएमपीएस कपकोट में ही रहने का अनुरोध किया गया। इस स्कूल को ‘मॉडल स्कूल’ बनाया जा रहा था जिसके लिए एक ऐसे नेतृत्वकर्ता की ज़रूरत थी जो इस क्षेत्र के लोगों के सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को देखने का तरीका बदल सके।

जब केडीएस स्कूल में आए तो स्कूल में केवल 46 बच्चे थे। केवल तीन साल बाद अब इसमें 316 छात्र, आठ स्थायी शिक्षक और सभी बुनियादी सुविधाएँ हैं जो इसके विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करती है। नामांकन में वृद्धि के अलावा इस स्कूल को इस बात के लिए भी ख्याति प्राप्त है कि यह राज्य के कुछ ऐसे स्कूलों में से एक है जो लगभग हर साल कुछ बच्चों को जवाहर नवोदय विद्यालय भेजता है। नवोदय विद्यालय में चुने जाने के लिए पाँचवीं कक्षा के बच्चों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर एक कठिन प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। इन उपलब्धियों के बारे में केडीएस से बात करना, जैसा कि अपेक्षित था, आसान नहीं था। उन्होंने इसके लिए कोई श्रेय नहीं लिया और स्कूल की सफलता का कारण कई अन्य कारकों को बताया जैसे – सभी बुनियादी संरचनाओं संबंधी संसाधनों को उपलब्ध कराने के लिए डीईओ का समर्थन; गहन रूप से प्रेरित उनके शिक्षक; और समुदाय, जो साल दर साल जीएमपी स्कूल में अपने बच्चों को भेजने के महत्व को पहचानने और स्वीकार करने लगे हैं।

कपकोट के लोग

सामान्य तौर पर कपकोट के लोग शिक्षा को महत्व देते हैं और अपने बच्चों के लिए उच्च आकांक्षाएँ रखते हैं। सुदूर गाँव में लगभग सभी के पास, कम से कम, हाई स्कूल का प्रमाणपत्र है और कई बच्चे तो ऐसे हैं, जिन्होंने पेशेवर डिग्री हासिल की है और रोजगार की तलाश में देश के विभिन्न हिस्सों में जा बसे हैं। अपनी व्यक्तिगत कहानी को साझा करते हुए केडीएस ने विनम्रतापूर्वक हमें बताया कि अपने शुरुआती वर्षों में जब उन्होंने इंटरकॉलेज में गणित विषय पढ़ाया और निजी ट्यूशन पढ़ाने का काम किया तो उनकी कक्षाओं में आने वाले बच्चे गणित में अच्छा प्रदर्शन करने लगे और उनमें से कम से कम 42 छात्र आगे चल कर इंजीनियर बन गए! धीरे-धीरे एक शिक्षक के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती गई और जब उन्होंने जीएमपी स्कूल का कार्यभार संभाला तो इसने निजी स्कूलों के बच्चों को आकर्षित करना शुरू कर दिया – यानी चुंबकीय क्षेत्र वाला रूपक कारगर साबित हो रहा था। हालांकि, ऐसा हमेशा नहीं था।

केडीएस ने दो दिलचस्प कहानियाँ सुनाईं जो वास्तविक घटनाओं से प्रेरित हैं और वर्षों से समुदाय की मानसिकता को आकार देने में नेतृत्वकर्ता और उनकी टीम के प्रयासों के प्रभाव को स्पष्ट करती हैं। पहली घटना यह थी कि प्रवेश परीक्षा में अपने प्रदर्शन के आधार पर कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में पाँचवीं कक्षा की एक बालिका का चयन हुआ। कुछ दिनों बाद बालिका की माँ बहुत सारे अन्य अभिभावकों के साथ स्कूल आईं और शिक्षकों के साथ एक अनौपचारिक बातचीत के दौरान रोने लगीं। केडीएस ने कहा कि उन्हें लगा कि माँ को इस बात का दुख है कि उनकी बेटी जल्द ही दूर चली जाएगी और उन्हें उसकी याद आएगी। जब केडीएस ने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की और उनसे पूछा कि वे इतना क्यों रो रही थीं तो माँ ने कहा कि वे इसलिए रो रही थीं क्योंकि उन्हें अपनी गाय बेचनी पड़ेगी! बात दरअसल यह थी कि गाय केवल उस बालिका द्वारा दूध दुहे जाने की आदी थी और उसके चले जाने के बाद वह दूध देना बंद कर देती। केडीएस ने कुछ कौतुकता के साथ कहा कि स्कूल के कारण परिवार द्वारा अपनी गाय को बेचने की खबर ने समुदाय में काफी हलचल मचा दी। उन्हें उस परिवार को दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में लाने के लिए दोषी ठहराया गया।

यह बताने के लिए कि माता-पिता की मानसिकता पिछले कुछ वर्षों में कैसे बदली है, उन्होंने एक घटना और सुनाई। कुछ साल पहले तीसरी कक्षा के एक लड़के को कुछ दिनों से हर दिन यह बात याद दिलाई जा रही थी कि उसे एक नई नोटबुक लानी है क्योंकि उसकी कक्षा की नोटबुक खत्म होने वाली थी। यह सोचकर कि बच्चा भुलक्कड़ और लापरवाह हो रहा है, केडीएस ने उसके माता-पिता को स्कूल में बुलाया। अगले दिन स्कूल में बुलाए जाने की वजह से गुस्साए हुए माता-पिता स्कूल आए और यह कहते हुए नई नोटबुक भेजने से इनकार कर दिया कि उनके पास शैक्षिक वर्ष के मध्य में नई नोटबुक खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं और अगर इस कारण से उनके बच्चे की पढ़ाई प्रभावित होती है तो हो, उन्हें इसकी परवाह नहीं। निस्सन्देह, नोटबुक स्कूल द्वारा प्रदान की जाती हैं। कहानी में मोड़ तब आया जब उसी लड़के ने पाँचवीं कक्षा में नवोदय स्कूल की परीक्षा पास कर ली। केडीएस ने बड़े गर्व के साथ अपने कार्यालय में रखी स्टील की अलमारी की ओर इशारा करते हुए बताया कि 15,000 रु. की यह अलमारी उसी बच्चे के माता-पिता ने बेटे की सफलता के लिए आभार प्रकट करने के लिए भेंट स्वरूप दी!

दिन-प्रतिदिन का कार्य

स्कूल की नियमित गतिविधियों को साझा करने के क्रम में केडीएस कुछ ऐसे दैनिक कार्यों का वर्णन करते हैं जिन्हें सुनकर श्रोता आश्चर्यचकित और अविश्वास से भर जाते हैं। केडीएस रोज़ सुबह 8 बजे स्कूल आते हैं और रात को 10 बजे घर जाते हैं। पाँचवीं कक्षा के सभी बच्चे और कभी-कभी तो चौथी कक्षा के बच्चे भी रोज़ शाम के 6 बजे तक स्कूल में रहते हैं। कम से कम तीन से चार शिक्षक भी स्कूल में रुकते हैं। दोपहर के समय अग्रलिखित गतिविधियों का आयोजन किया जाता है – टीम शिक्षण और बच्चों के साथ विभिन्न विषयों में अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए किए जाने वाले समूह सत्र; ‘गणित के खेल’ खेलना; रुचिपूर्ण सामान्य विषयों पर चर्चा; और उन बच्चों की गृहकार्य और उपचारात्मक शिक्षण में सहायता करना जिन पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रतिदिन बच्चों के साथ इस तरह का गहन जुड़ाव बुनियादी अवधारणाओं को स्पष्ट करने में शिक्षकों की मदद करता है और इस प्रक्रिया में नवोदय और कस्तूरबा स्कूलों की प्रवेश परीक्षाओं के लिए बच्चों को तैयार करता है। बच्चों के जाने के बाद शिक्षकों का बाकी समय प्रशासनिक कामों को पूरा करने और अगले दिन के पाठों की तैयारी करने में बीतता है।

दिलचस्प बात यह है कि हालाँकि बच्चों को प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए तैयार किये जाने पर ज़ोर दिया जाता है ताकि उनके बेहतर भविष्य का निर्माण हो, लेकिन कहीं भी किसी को यह आभास नहीं होता है कि केडीएस या अन्य शिक्षक केवल इन उच्च स्तर वाले छात्रों पर ही ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। केडीएस स्वीकार करते हैं कि स्कूल के प्रत्येक बच्चे में इन उच्च स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करने की क्षमता नहीं है, लेकिन यह उनका कर्तव्य है कि वे इस बात को सुनिश्चित करें कि उनके स्कूल का हर बच्चा अच्छी तरह से सीखे और अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचे। और उनका मानना ​​है कि इसके लिए शिक्षक में कड़ी मेहनत और अध्यवसाय का गुण होना आवश्यक है।

जीएमपी स्कूल में शिक्षण-अध्ययन के अनुभव को असाधारण बनाने में योगदान देने के लिए केडीएस अपने सहयोगियों की प्रेरणा को ही श्रेय देते हैं और यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। दुःसाध्य भू-भाग, अनिश्चित जलवायु और उस क्षेत्र में घात लगाकर बैठे तेंदुओं का ख़तरा हालत को बद से बदतर कर देते हैं। यह सब देखकर बड़ा आश्चर्य होता है कि वह कौन सा उद्देश्य है जो इस दूर-दराज के समुदाय में इन सभी लोगों यानी प्रधानाध्यापक, शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों को अपने लक्ष्य का इतने आदर्श रूप से पालन करने के लिए प्रेरित करता है? क्या वे एक सामूहिक उद्देश्य से प्रेरित होते हैं या हर एक की अपनी प्रेरणा है, खुद को साबित करने का जज़्बा है? क्या कोई विश्वास के साथ यह कह सकता है कि यह किसी एक व्यक्ति का समर्पण है, उसकी निष्ठा है और अपने कार्य के प्रति उसका प्यार है जिसने दूसरों को उस पर विश्वास करने और उसके परिकल्पना का अनुसरण करने के लिए प्रेरित किया है? या क्या यह एक ऐसी ताकत है जो उसे अपने आस-पास के लोगों से मिलती है और जो उसे आगे बढ़ाती है? शायद इन सवालों के कोई निश्चित उत्तर नहीं हैं और न ही केडीएस इस तरह की बातें सोचते हैं। जब उनसे उनकी भविष्य की आकांक्षाओं के बारे में पूछा जाता है तो केडीएस किसी उच्च महत्वाकांक्षा की बात नहीं करते। वे वर्तमान में विश्वास करते हैं और जो कुछ वे कर रहे हैं उसे जारी रखने की इच्छा रखते हैं, पूरी आस्था के साथ।

निष्कर्ष

केडीएस से मिलने के बाद कपकोट से बाहर निकलते हुए हम सब लम्बे समय तक एक चिंतनपूर्ण चुप्पी में डूबे रहे। निस्संदेह, केडीएस से मिलना वास्तव में एक विनम्र अनुभव था। उनकी कहानी एक ऐसी कहानी है जो निश्चित ही सुनाने लायक है। यह प्रेरणादायक है, आशाओं से भरी है और इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी क्षमताओं में विश्वास करता है, संपूर्ण समुदाय को अपने साथ काम करने के लिए प्रेरित कर सकता है ताकि उन लोगों के सपनों को साकार किया जा सके जिनके लिए शायद शिक्षा ही एकमात्र साधन है जो उन्हें सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता दे सकती है और गरीबी से मुक्ति दिला सकती है।

हमने यह भी महसूस किया कि केडीएस की सफलता के आकलन के लिए इस ‘कहानी’ को केवल उन बच्चों की संख्या के संदर्भ में देखना, जिन्हें केडीएस ने अपने स्कूल में दाखिल किया है या जो बच्चे जवाहर नवोदय विद्यालय में गए हैं, बेहद संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाना होगा। गणित के शिक्षक के रूप में अपने स्वयं के अभ्यास पर उनका गहन चिंतन; अपने काम के प्रति उनका दृढ़ समर्पण; अध्यवसाय और कड़ी मेहनत के माध्यम से हर बच्चे को सिखाने का उनका नज़रिया; उनकी विनम्रता; और अपने विज़न में विश्वास करने के लिए दूसरों को प्रेरित करने की उनकी क्षमता उन्हें एक असाधारण व्यक्ति, शिक्षक और नेतृत्वकर्ता बनाने के संकेतक हैं जो ख्याली दत्त शर्मा वास्तव में हैं भी।

आभार: मैं श्री ख्याली दत्त शर्मा को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने समय निकालकर हमसे बातचीत की और अपनी जीवन कहानी को इतने सच्चे और स्पष्ट रूप से साझा किया। मैं जीएमपीएस कपकोट के बच्चों और शिक्षकों को भी इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहूँगा कि उन्होंने मुझे अपनी कक्षा का अवलोकन करने की अनुमति दी और कक्षा के अंदर और बाहर दोनों जगह बड़े मित्रवत ढंग से मुझसे बातचीत की। सबसे महत्वपूर्ण बात, मैं अपने सहयोगी अमित कुमार (सदस्य, जिला संस्थान, बागेश्वर, अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन) के प्रति उनके समय एवं प्रयास के लिए आभार प्रकट करता हूँ जिसके कारण यह दस्तावेजीकरण संभव हुआ। इस यात्रा की तैयारी, श्री शर्मा के साथ हमारी बातचीत और उसके बाद भी उनके इनपुट से मुझे स्थानीय संदर्भ और उसमें निहित चुनौतियों के बारे में व्यापक समझ विकसित करने में मदद मिली।


लेखक : अंकुर मदान, संकाय, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय  अनुवादक: नलिनी रावल

https://practiceconnect.azimpremjiuniversity.edu.in से साभार।

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