किसी 'खास' की जानकारी भेजें। शासकीय प्राथमिक शाला धौराभाठा के शिक्षक

इन दिनों धमतरी जिला के विद्यालयों में गुणात्मक शिक्षा विकास के लिए हर स्तर पर पहल हो रही है न सिर्फ विभाग बल्कि शिक्षक भी अपने  स्तर पर कुछ अलग करके शिक्षण प्रक्रिया में बच्चों के सीखने-सिखाने की दिशा में  अपनी पारम्‍पारिक शैली में बदलाव लाते हुए समझ,विचार,तर्क,चिंतनशील और वैज्ञानिक सोच पर आधारित शिक्षा प्रदान करने की शुरुआत कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिला मुख्यालय से लगभग 15–16 किलोमीटर की दूरी पर धमतरी विकास खण्‍ड के सम्बलपुर संकुल में स्थित है शासकीय प्राथमिक शाला धौराभाठा। यहाँ 92 बच्चे हैं। स्‍कूल के चार शिक्षक बच्चों को पढ़ाते ही नहीं, उनसे सीखते भी हैं।

वर्तमान में संस्था के प्रभारी प्रधानपाठक राकेश चन्‍द्राकर हैं। शिक्षण प्रक्रिया और विषय के प्रति उनकी समझ काफी सुलझी हुई प्रतीत होती है। बच्चों में गणित और अँग्रेजी के भय को पल में छू-मंतर करने वाले और निजी जीवन की विभिन्न घटनाओं को शिक्षण का आधार बनाने में माहिर राकेश जी का कहना है कि, “बच्चों के साथ साथ बड़ों को भी इबारती सवालों से जूझना पड़ता है लेकिन मुझे लगता है गणित शिक्षण के पूर्व भाषा की समझ को बेहतर करना जरूरी है। हमारे दैनिक जीवन में घटित घटनाओं को जोड़ते हुए सीखने में बच्चों को बहुत आनन्‍द आता है और सीखने कि दर में वृद्धि भी होती है।” आगे वे कहते हैं कि,“ पाठ्यपुस्तक तो एक मात्र तरीका है, पर साथ ही पुस्तकालय की विभिन्न किताबें हम शिक्षकों के लिए  बहुत लाभकारी सिद्ध होती हैं। इसलिए केवल पाठ्यपुस्तक पर आधारित शिक्षण काफी नहीं है।”

यहाँ के शिक्षक नियमित सहायक शिक्षण सामग्री का उपयोग बच्चों को सीखने-सिखाने में करते हैं। प्रतिदिन सभा में कुछ काम की बातें बताई जाती हैं। बच्चों के लिए लाभकारी नीति बनाने के लिए सामूहिक निर्णय लिया जाता है। शिक्षक एक-दूसरे की कक्षा का अवलोकन कर सकारात्मक सुझाव देते हैं। एक-दूसरे की विशेषताओं–कमियों की खुलकर चर्चा करते हुए समाधान का प्रयास करते हैं।

बच्चों की किताबें और शिक्षकों की किताबें अलग-अलग हैं। जिसे उन्होंने बाल पुस्तकालय और शिक्षक पुस्तकालय के रूप मे व्यवस्थित किया। कुछ दिनों बाद यह एक अलग कमरे में अस्तित्व में आ जाएगा। कमरा अभी निर्माणाधीन है। शिक्षकों का मानना है कि पुस्तकालय शिक्षकों के शैक्षिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन है।

कक्षा का वातावरण लिखित समृद्ध माहौल से युक्त है। विद्यालय भवन का प्रत्येक भाग सीखने-सिखाने के लिए उपयोगी बनाया गया है। BALA (Building aid Learning aid ) अवधारणा के तहत विद्यालय के हर उपयोगी वस्तु के नाम लिखित रूप मे होने से बच्चे देखकर नाम की अवधारणा को सहज रूप में समझते हैं। नाम के चार्ट, आज और कल की गतिविधि हेतु बॉक्स और मौसम को जानने-समझने हेतु गत्ते के कार्ड। सभी कक्षाओं में उपस्थिति चार्ट के माध्यम से बच्चे स्वयं अपनी हाजिरी लगाते हैं। शिक्षक कहते हैं कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण गतिविधि है बच्चों को नाम, दिनांक, दिन, अंक, संख्या, जोड़-घटा और औसत सिखाने के लिए । स्थानीय संसाधन का शैक्षिक गतिविधियों में बेहतर उपयोग करके कबाड़ से जुगाड़ कि अवधारणा स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।

शिक्षक रोशन ध्रुव की मान्यता है कि बच्चों को स्वतंत्र वातावरण और मौका देकर ही बेहतर सिखाया जा सकता है। भय या दण्ड से बच्चे कभी भी नहीं सीखते। पिछले कुछ सालों से वह कक्षा पहली के बच्चों को पढ़ा रहे हैं। पिछले सत्र के सेवाकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षकों को भाषा पर पकड़ मजबूत करने पर आधारित रहे हैं। रोशन का कहना कि, ‘आरम्भिक कक्षाओं में भाषा को वर्णमाला, बारहखड़ी, मात्रा या पाठ पूरा करने वाली प्रक्रिया से सिखाना मुश्किल है बल्कि समग्र भाषा शिक्षण प्रक्रिया से बच्चे जल्दी और स्थायी सीखते हैं।’  

मुझे भी गत वर्ष सेवाकालीन प्रशिक्षण में शामिल होने का मौका मिला था। मैंने वहाँ देखा था कि रोशन ध्रुव ने सभी शिक्षकों के मध्य भाषा सिखाने के अपने प्रयास को मजबूती के साथ रखने का प्रयास किया था। और जब स्कूल में उनके काम को देखने का मौका मिला तो उनके विचार और काम में जरा भी अन्‍तर नहीं दिखा। एक-दो बच्चों को छोड़कर कक्षा पहली के सभी बच्चे किताब और अन्य पठन सामग्री को पढ़ पा रहे थे। शिक्षक से बात करने पर वह कहते हैं कि, ''वर्ण का अपना कोई अस्तित्व या चित्र भाषाई ग्राह्य पटल पर नहीं बनता है जबकि वाक्य या शब्द बोलते ही एक शब्द – चित्र या आकृति बनता हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि बच्चे किसी वाक्य के मायने आसानी से समझ पाते हैं और पढ़ने के साथ समझने की गति में वृद्धि होती है। वह आगे कहते है कि बच्चों के नाम को ही हथियार बनाया और इन नाम के शब्दों से नए शब्द बनाने और और वाक्य संरचना की ओर आगे बढ़ना बच्चों के लिए लाभकारी सिद्ध होता हुआ दिखाई देता है। जब किसी गतिविधि को कराता हूँ तो उसके उद्देश्य मेरे सामने स्पष्ट होता है और जो बच्चे उस गतिविधि के माध्यम से नहीं सीख पाते हैं तो मेरे मन नवीन गतिविधि की तलाश शुरू हो जाती है।''

शिक्षक तामेश्वर निषाद सदैव काम को महत्व देते दिखाई देते हैं। कलाकारी उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। रंगों के समायोजन, विभिन्न कबाड़ के समान का शिक्षण सहायक सामग्री के रूप इस्तेमाल, कक्षा की दीवारों की आकर्षक वस्तुओं के माध्यम से शिक्षण में मदद लेना और भाषा शिक्षण के साथ गणित और पर्यावरण शिक्षण को आसपास के वातावरण के साथ जोड़कर हरदम नवीन तरकीबों का सहारा लेने में दक्ष हैं।

शिक्षिका हेमलता रात्रे मृदुभाषी और बच्चों के साथ सदा मित्रवत व्यवहार रखती हैं। सीखने के गुण के चलते ही वह आपस में सभी शिक्षकों से उनके कामों को बेहतर तरीके से अनुकरण करते हुए अपने कक्षा के बच्चों को सिखाती हैं।

ये चार शिक्षक इस विद्यालय की कायाकल्प करने की जुगत में लगे हुए हैं।

प्रभारी प्रधानपाठक राकेश चन्‍द्राकर का मानना है कि,“ जब हम लाख कोशिश के बाद भी बच्चों को सिखा नहीं पाते हैं तो इसका मतलब होता है कि सिखाने के तरीकों मे बदलाव की जरूरत है। अगर हम यह जान लेते हैं कि विद्यालय के कौन से बच्चे की सीखने की गति अन्य बच्चों से कम है तो शिक्षक का लक्ष्य तय हो जाता है कि मुझे अन्य बच्चों कि अपेक्षा उस या उन बच्चों के लिए कुछ बेहतर गतिविधि या शैक्षिक प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता है। हमारे लिए कोई भी बच्चा आगे या पिछड़ा नहीं होता है। बच्चे तो बच्चे होते हैं। हमें हरेक बच्चे को समान अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है बच्चे प्राकृतिक रूप से सीखने के लिए उत्साहित होते है। बच्चे असीमित क्षमताओं के साथ पैदा होते है हमे उनके मित्र बनकर मदद करना है। फिर देखें बच्चे कैसे सीखते हैं। ”

शिक्षकों का मानना है कि बाह्य वातावरण से अधिक आंतरिक सीखने-सिखाने की प्रक्रिया पर जोर बहुत आवश्यक है। बच्चे की उम्र निकल जाने पर पुनः उसी कक्षा में वापस नहीं आ सकते हैं यह हमेशा याद रखना होगा। और आज सिखाने की भरपूर तैयारी शिक्षकों के पास होना बहुत जरूरी है। इन बच्चों के पालकों के नजरिए को भी समझने की आवश्यकता है। हम उपलब्ध समय में कितना बेहतर कर सकते हैं इस पर विचार और चिंतन सतत होना चाहिए । 

निश्चय ही शासकीय विद्यालय के इन शिक्षकों के जज्बे और उनकी मेहनत को सलाम और बच्चों के साथ इनकी सहृदयता को स्वीकार करना ही होगा तब जाकर शिक्षा के उद्देश्य को साकार होता देख सकते हैं।


प्रस्तुति : नरेन्द्र ‘नन्द’,जिला संस्थान, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,शंकरदाह, धमतरी ,छत्तीसगढ़ ,8458806946

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

धौराभाठा का प्रा。 वि。 सही मायने में बच्चों की रचनाधर्मिता को उद्घाटित कर रहा हे। चारों शिक्षक⁄िशक्षिका अपने काम में दक्ष हैं और सम्यकरूप से अपने दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। सबको साधुवाद।

17564 registered users
6680 resources