किसी 'खास' की जानकारी भेजें। विज्ञान के दीवाने शिक्षक नरेन्‍द्र कर्मा

खरगोन जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित एक गाँव है मोठापुरा । गाँव में माध्यमिक स्कूल है। स्कूल में कुल 39 बच्चे दर्ज है। 2 नियमित शिक्षक  है व 1 अतिथि शिक्षक है।  इस गाँव की आबादी लगभग 700 है जिसमें मुख्य रुप से पाटीदार समाज के लोग निवास करते हैं लेकिन इस स्कूल में आने वाले बच्चे, अनुसूचित जाति के ज्यादा है। इसी स्कूल में पदस्थ हैं शिक्षक नरेन्द्र कर्मा।

नरेन्द्र कर्मा विज्ञान विषय के शिक्षक हैं और सन् 2009 से इस स्कूल में हैं। उनसे हमारी पहली मुलाकात विज्ञान किट कार्यशाला में हुई थी। उसके बाद से उनसे फोन पर सम्‍पर्क होता रहा। वाट्सअप से वह अपने स्कूल में जो भी गतिविधि या विज्ञान के प्रयोग कराते उसकी फोटो व जानकारी हमारे साथ साझा करते रहते हैं। हमने उनके स्कूल जाना तय किया। फोन पर उनसे बात की तो उन्होंने बताया कि आप आइए लेकिन गाँव में आज गमी हो गई है, तो बच्चे तो नहीं मिलेंगे। लेकिन मैं स्कूल में ही हूँ।

उनसे बातचीत शुरु हुई। उन्होंने अपना छोटा-सा विज्ञान का पिटारा हमें दिखाया और अपने अनुभव हमें सुनाना शुरू किए।

उन्होंने बताया कि, ‘विज्ञान सिर्फ किताब से पढ़ा भर देने का विषय नहीं है, अगर हम विज्ञान में बच्चों को कुछ करके देखने के अवसर दें तो वह आसानी से सीख जाते हैं और फिर किताब से रटाने की जरुरत नहीं पड़ती है।

मैं अपनी कक्षा में बच्चों को प्रयोग करके दिखाता हूँ और बच्चों को खुद से प्रयोग करके देखने के मौके भी देता हूँ। मैं एक दिन काजल बनाने की विधि बच्चों को पढ़ा रहा था। मैंने सोचा क्यों न काजल बना कर देखें और हमने तेल की बाती जलाकर उससे कक्षा में ही काजल बनाया। बच्चों को काफी आश्‍चर्य हुआ था कि काजल ऐसे बनता है ?  पर बच्चों को मजा भी बहुत आया। अगर मैं उन्हें काजल बनाकर बताने के बजाय किताब से याद करने को देता तो उनको ज्यादा मेहनत करनी पड़ती और थोड़े दिनों में भूल जाते। लेकिन इस प्रयोग को कराने के बाद वह काजल बनाना भी जानते है और विधि भी बता देते हैं।

बच्चों को प्रयोग कराने से आसानी से समझ आ जाता है। ऐसे ही एक दिन कक्षा  में बीजों मे अंकुरण का पाठ पढ़ा रहा था तो मैंने देखा की बच्चों को प्रांकुर और मूलांकुर को समझने में दिक्कत आ रही है और वह बार-बार भूल जा रहे हैं कि कौन-सा प्राँकुर है और कौन-सा मूलाँकुर है। मैंने बच्चों से चना व मूँग के बीज  मँगवाए और उसे पानी में भिगोकर रख दिया। दो-तीन दिन बात जब हमने देखा तो उसमें प्राँकुर व मूलाँकुर निकल आए थे और बच्चों को समझाया कि किस हिस्से को मूलाँकुर कहते है और किस हिस्से को प्राँकुर। मैं बच्चों के साथ स्कूल में भी कार्य करता हूँ व कुछ प्रयोग सामग्री घर पर भी ले जाता हूँ और आसपड़ोस के बच्चों को भी कुछ प्रयोग करा देता हूँ, जिससे मेरी भी तैयारी हो जाती है।

स्कूल में जो माइक्रेास्कोप है वह खराब हो गया है। विज्ञान किट कार्यशाला में हमें कोशिका पर कार्य करना बताया था और हमारे स्कूल में माइक्रोस्कोप था नहीं, तो  मैंने सोचा क्या करूँ ? इसके बाद मैंने पता किया कि लिक्खी स्कूल में माइक्रोस्कोप है तो वहाँ जाकर मैं वह माइक्रोस्कोप माँगकर ले आया और बच्चों को प्याज की झिल्ली बनाकर दिखाई व बच्चों को भी मजा आया।’

हमने जब उनके स्कूल में देखा कि दीवार पर बनाई गई रैक पर छोटी-छोटी डिब्बियों में आवश्‍यक रसायन रखे हैं लेकिन रैक की ऊँचाई अधिक है। हमने उनसे जानना चाहा कि ऐसा क्यों किया ? उन्होंने कहा कि बच्चों को यह रसायन दिखते रहते हैं तो वह भी हमें याद दिलाते रहते हैं। लेकिन इनमें से कुछ बच्‍चों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं इसलिए उनकी पहुँच से थोड़ा दूर ही रहें तो बेहतर है।  

बच्चों को वह समय-समय पर कार्डशीट पर विज्ञान के चित्र बनाने को देते हैं। शीट पर बच्चे समूह में चित्र बनाते हैं और इनको दीवार पर लगा देते हैं। ये चित्र साल भर लगे रहते हैं और बच्चे भी देखते रहते हैं। बच्चों को लगता है कि हमारा भी कुछ लगा है।

नरेन्द्र कर्मा कहते हैं कि मैं इस स्कूल तक ही सीमित नहीं रहना चाहता हूँ। मुझे लोनार जनशिक्षा केन्द्र की प्रशिक्षण कार्यशाला में आने को कहा तो मैंने वहाँ पर भी शिक्षकों को यह प्रयोग कराए। कुछ प्रयोग शिक्षकों ने भी करके देखे। मुझे लगता है कि शिक्षकों की इस तरह की कार्यशालाएँ और होनी चाहिए जिसमें वे खुद से प्रयोग करके देख सकें, ताकि बच्चों को कराने में उन्हें कोई दिक्कत न आए।

उन्‍हें अकादमिक कार्य करना पसन्‍द है। वे चाहते हैं उनके पास एक झोला हो जिसमें प्रयोग कराने की तमाम सामग्री हो। बस वे स्‍कूल दर स्‍कूल घूमते रहें और शिक्षकों व बच्चों के साथ विज्ञान के कुछ प्रयोग करवाते रहें।


प्रस्‍तुति : राकेश कारपेण्‍टर, स्रोत व्‍यक्ति, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, खरगोन, म.प्र.।

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