किसी 'खास' की जानकारी भेजें। विजयश्री राठौड़ : हर एक बच्‍चे पर ध्‍यान

राजस्‍थान के टोंक जिले का राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बालापुरा (लावा) मिनी सचिवालय ग्राम पंचायत लावा से 10 किलोमीटर दूर एक छोटी सी ढ़ाणी में स्थित है। इस ढ़ाणी को स्थानीय लोग झोझा की ढ़ाणी या बालापुरा के नाम से भी जानते हैं।

ढ़ाणी में 50-60 घर हैं, जिनकी जनसंख्या 300 के लगभग हैं। यहाँ मुख्य रूप से जाट समुदाय के लोग निवास करते हैं। जिनकी जीविका का प्रमुख साधन कृषि,पशुपालन एवं मजदूरी है। यह गाँव अपनी दैनिक आवश्कताओं की पूर्ति के लिए ग्राम लावा पर निर्भर है।

पेयजल, सड़क, विद्युत, चिकित्सा आदि मूलभूत सुविधाओं से वंचित इस ग्राम में शिक्षा के प्रति जागरूकता कम रही है, विशेष रूप से बालिका शिक्षा के प्रति। समुदाय की यह सोच रही है कि बालिकाओं को पढ़ाकर क्या करेंगे उन्हें तो चूल्हा-चौका करना ही पड़ेगा।

विद्यालय 1999 में खुल गया था। लेकिन अभी भी विद्यालय भवन में पर्याप्त कमरे नहीं हैं। चारदिवारी का अभाव है। विद्यालय एवं गाँव दोनों के लिए एक ही हैण्डपम्प है, जो कि विद्यालय प्रागंण में स्थित है।

जब मैं इस विद्यालय में आई तो मेरे सामने निम्‍न चुनौतियाँ थीं-

  • उच्च प्राथमिक विद्यालय होने पर भी 1 से 8 तक की कक्षाओं के लिए केवल चार शिक्षक।
  • महिला अध्यापिका के प्रति लोगों का पूर्वाग्रह।
  • विद्यार्थियों का लगातार अनुपस्थित रहना ।
  • छोटे बालकों का विद्यालय के प्रति भय।
  • स्थानीय लोगों का विद्यालय एवं शिक्षकों के प्रति असन्तोष।
  • विद्यालय में अँग्रेजी व विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापकों का अभाव। 

मेरे द्वारा किए गए प्रयास : शिक्षण की जिम्‍मेदारियाँ

125 बालक-बालिकाओं एवं कक्षा 1 से 8 तक के विद्यालय में केवल चार शिक्षक ही नियुक्त थे, जिससे पढ़ाई व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल पाती थी। अध्यापक गण यदि उच्च प्राथमिक कक्षाओं में अध्यापन करवाते तो प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई बाधित होती थी, और यदि प्राथमिक कक्षाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता तो उच्च प्राथमिक कक्षाओं में पाठयक्रम ही पूरा नहीं हो पाता था। जिससे ग्रामीणों में असन्तोष था। इस असन्तोष को दूर करने एवं स्टाफ सदस्यों में विश्‍वास जमाने के लिए मैंने प्राथमिक व उच्च प्राथमिक दोनों की स्तर की कक्षाओं में कठिन विषय जैसे-कक्षा 7 की विज्ञान, अँग्रेजी, कक्षा 8 की विज्ञान, अँग्रेजी कक्षा 6 की अँग्रेजी कक्षा 5 व 1,2 की हिन्दी कक्षा 3 की अँग्रेजी एवं कक्षा 4 की पर्यावरण अध्ययन आदि विषय एवं कार्यभार लेने की पहल की जिसमें मुझे स्टाफ का पूर्ण सहयोग भी प्राप्त हुआ। स्टाफ सदस्यों के सहयोग से हम सबने फिर से नई समय सारणी बनाई तथा सभी ने अच्छी प्रकार से शिक्षण कार्य करवाया।

महिला शिक्षक बनाम पूर्वाग्रह

जब गाँव में मेरी नियुक्ति हुई तो लोगों के मन में महिला शिक्षिका के प्रति यह धारणा थी कि महिला शिक्षक केवल स्वेटर बुनने, बातें करने में ही रुचि रखती है तथा पुरुषों की अपेक्षा अच्छा शिक्षण नहीं करवाती है। साथ ही महिला होने के नाते उनका पूरा ध्यान अपने घर एवं उससे जुड़ी समस्याओं पर ही लगा रहता है। इसलिए मेरे लिए यह आवश्‍यक हो गया कि मैं लोगों की इस धारणा को बदल सकूँ।

मैंने विद्यालय प्रागंण में स्थित हैण्डपम्प पर आने वाली महिलाओं से बातचीत प्रारम्भ की। मैं उनसे स्थानीय भाषा में ही वार्तालाप करती। मैंने उन्हें बताया कि मैं उनके ही क्षेत्र की रहने वाली हूँ। ग्राम लावा के बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय में भी पैराटीचर के रूप में अध्ययन करवा चुकी हूँ। यदि वे मेरे शिक्षण के बारे में जानना चाहें तो इस विद्यालय में आते-जाते पता कर सकती हैं। मैं उनके घर पर जाती तथा उनके दुख-सुख और घरेलू बातों को सुनती। उनसे बातचीत करके मैंने उन्हें बताया कि मैं उनके बच्चों के प्रति पूर्णतया समर्पित रहूँगी। बार-बार प्रयास करने पर तथा अच्छे से शिक्षण  कार्य करवाने पर उनका विश्‍वास मुझ पर जमने लगा। लगभग एक महिने के उपरान्त एक बालिका  की माँ  ने मुझसे कहा कि ‘‘ मैडम जी तो म्हाकी ही ज्यान छः मासू अलग कोनी।’’

गाँव की महिलाओं एवं बच्चियों को यदि किसी सामान की आवश्यकता होती तो वह मैं उन्हें ग्राम लावा से लाकर देती थी।

महिलाएँ विद्यालय प्रांगण में स्थित हैण्डपम्प पर ही स्नान करती थीं। मैं उन्हें ऐसा नहीं करने के लिए समझाया। धीरे-धीरे उन्होंने स्नान आदि कार्य विद्यालय में स्थित हैण्डपम्प पर करने बन्द कर दिए।

मेरा मानना था कि महिलाओं का बच्चों की परवरिश में ज्यादा ध्यान रहता है। यदि में इनसे सम्पर्क करूँगी तो ये जरूर ही बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय भेजेंगी। इसीलिए मैंने महिलाओं से ज्यादा सम्पर्क किया। जिससे महिलाओं और मेरे बीच आत्मीयता बढ़ी। विद्यालय के कई  बच्चों  की माँ ,नानी, दादी से मेरी बहुत अच्छी पहचान हो गई। साथ ही साथ मैंने शिक्षण पर ध्यान दिया जिससे बच्चों की सीख में वृद्वि और उनका विद्यालय के प्रति रूझान बढ़ा। धीरे-धीरे महिला शिक्षक के प्रति पूर्वाग्रह समाप्त होने लगे।

बच्‍चे बच्‍चे पर ध्‍यान

लगातार अनुपस्थित या बीच-बीच में घर पर रूकने वाले बच्चों को स्कूल से जोड़ने की कड़ी में मैंने फोरन्ता की माँ से सम्पर्क किया। उन्होंने बताया की फोरन्ता के पिता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। इसलिए वे तथा फोरन्ता के मामा दोनों मिलकर खेती का कार्य करते हैं। फोरन्ता को घर के कार्य, जानवरों को पानी पिलाने एवं अपने छोटे भाई को रखने के कारण घर पर रोक लेते हैं। पढ़ाना चाहते हैं परन्तु घर के कार्य भी आवश्‍यक हैं। मैंने सलाह दी कि फोरन्ता अपने छोटे भाई को विद्यालय में ला सकती है। वहाँ उसे वह आगंनबाड़ी में ले जाएगी। वह चाहे तो खेल की घण्टी में जाकर जानवरों को पानी व चारा दे सकती है। वह कुछ देरी से भी विद्यालय आ सकती है। मेरे द्वारा यह कहने पर वह उसे विद्यालय भेजने के लिए सहर्ष तैयार हो गईं। उसकी माँ ने बताया था कि वह एक साल फेल भी हो चुकी है। वही फोरन्ता आज अँग्रेजी की किताब पढ़ लेती है तथा गणित के सवाल हल कर लेती है। अब फोरन्ता अनुशासित एवं होशियार बच्ची है।

ऐसा ही एक विद्यार्थी धनराज भी लगातार अनुपस्थित रहता था। मैंने उसकी दादी से सम्पर्क किया। उसकी दादी ने बताया कि वह बहुत ही शर्मिला एवं डरपोक है। विद्यालय में कुछ बडे़ बच्चों को झगड़ते हुए देखकर उसके मन में विद्यालय के प्रति भय बैठ गया है। अगर मैं प्रयास करूँ तो धनराज वापस विद्यालय में आ सकता है। मैंने उनसे मदद माँगी। धनराज की दादी दो-तीन दिन तक धनराज के साथ विद्यालय में आईं । वे कुछ समय विद्यालय में रहतीं तथा फिर चली जातीं। मैंने कक्षा के सभी बच्चों से कह दिया कि वे सब धनराज का विशेष ध्यान रखेंगे। यदि धनराज ने किसी के बारे में शिकायत की तो उसे सजा मिलेगी। एक-दो बार मैंने धनराज का अनावश्‍यक पक्ष भी लिया। उसे टॉफी-पेन्सिल आदि दी। धीरे-धीरे धनराज का विश्‍वास जमने लगा और आज धनराज का भाई मनराज भी विद्यालय में पढ़ता है।

समुदाय से सम्‍पर्क

स्टाफ की कमी के कारण पूर्व में शिक्षण कार्य सुचारू रूप से नहीं चल पाता था। गाँव के लोग विद्यालय व स्टाफ की कमी के प्रति असन्तोष रखते थे। उन्हें लगता था कि बाकी अध्यापक जान-बूझकर बच्चों पर पूरा समय नहीं देते हैं। जबकि उन्हें स्टाफ की परेशानियों व कमी के कारण होने वाली वाली कठिनाईयों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। न ही समुदाय व शिक्षकों के बीच इन समस्याओं को लेकर संवाद होता था। समुदाय के लोग विद्यालय व स्टाफ की कमी के प्रति सचेत नहीं थे। कुछ लोग अपने बच्चों को दूसरे विद्यालय में पढ़ने भी भेजते थे।

एक ऐसे ही बालक लोकेश व उसकी बहन शिमला को बम्बोरी के एक निजी विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा जाता था। उनकी माँ से मैंने सम्पर्क किया। माँ ने बताया कि निजी विद्यालय में समय-समय पर गृह-कार्य दिया जाता है तथा प्रत्येक विद्यार्थी पर अच्छे से ध्यान दिया जाता है। मैंने उन्हें बताया कि स्टाफ की कमी के कारण हो सकता है, हमारे विद्यालय में जैसा वे चाहती हैं वैसा शिक्षण नहीं हो पा रहा है। मैंने उनसे 15 दिन का समय माँगा और कहा कि वे मेरा शिक्षण कार्य देखें और उसके बाद मुझे बताएँ कि क्या कमी है। उन्होंने विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों से जानकारी ली तथा लोकेश व शिमला के साथ अपनी बच्ची अंकिता का नामाँकन भी विद्यालय में करवाया। आज वे मुझसे ही नहीं सभी स्टाफ सदस्यों से शिक्षण कार्य से संतुष्ट हैं। वह स्वयं अपने बच्चों पर ध्यान देती हैं तथा कार्य के बारे में जानकारी रखती हैं।

बच्‍चे सीखें भी यह प्रयास किया

लगातार सम्पर्क करते रहने पर अधिकांश अभिभावकों से पता चला कि उनके बच्चों को तीसरी कक्षा में आ जाने पर भी अँग्रेजी का ज्ञान कम था। जैसे निरमा व सरिता को ए से जेड, बलवान को मीनिंग, तो फोरन्ता को अक्षरों की पहचान नहीं थी। निरमा को उसकी नानी रखती थी। वह मेरे पास आई और उन्होंने रोते हुए बताया की निरमा की माँ संजना अधिकतर बीमार रहती है। वह अपनी बच्चों की देखभाल अच्छे से नहीं कर सकती है। उसकी मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं है। नानी को डर था कि कहीं निरमा भी वैसी ही ना रह जाए। मैंने उन्हें कहा कि निरमा सामान्य बच्चों जैसी ही है। कुछ दिनों बाद निरमा उन्हें अंग्रेजी मीनिंग व कविता बोलकर सुनाएगी।

मैंने निरमा को ए से जेड तक के सब अक्षर सिखाए। साथ ही सभी बच्चों की कॉपियों में ए से जेड तक की ए बी सी डी डालकर उन्हें याद करवाया। जब पहचान व उनकी याद पक्की हो गई तो उन्हें रोजाना एक जैसे-ए के तीन मीनिंग किताब के अनुसार कॉपी में लिखकर नकल करने को कहती। इसी तरह से तीन दिन लिखने में और एक दिन सबको याद करने का देकर पांचवें दिन से उनसे वह मीनिंग सुनती। मीनिंग सुनाने पर उन्हें टॉफी, रंग, पेन्सिल आदि देती, उन्हें खेल करवाती। इससे बच्चों की रूचि अँग्रेजी शिक्षण में बढ़ने लगी और वे याद करने लगे। कक्षा में उनकी कॉपी में नकल करने को देती। घर पर काम करने को देती, कक्षा में उनकी प्रतियोगिता करवाती की लड़के ज्यादा मीनिंग बताते हैं कि लड़कियाँ। बिना देखे कौन ज्यादा मीनिंग लिख सकता है। एक-दूसरे को मीनिंग पूछना और गलत मीनिंग के पोइन्ट गिनकर हार-जीत का फैसला करना, प्रार्थना सत्र के सामान्य ज्ञान में एक दिन अँग्रेजी शिक्षण का रखकर मीनिंग सुनना, कविताएँ सुनना। कक्षा में बिना देखे मीनिंग लिखवाना। अधूरे मीनिंग पूरा करना आदि के द्वारा उनका सीखना पक्का करवाती।

अक्टूबर 2008 में जब मैंने विद्यालय में कार्य प्रारम्भ किया तो वहां अँग्रेजी व विज्ञान जैसे विषय को पढ़ाने के लिए शिक्षकों का अभाव था। मैंने कक्षा 7 व 8 की विज्ञान व अँग्रेजी कक्षा 6 की अँग्रेजी विषय को पढ़ाने की जिम्मेदारी ली। इन दोनों विषयों को मैंने अपनी समझ के अनुसार पढ़ाने की तैयारी की। सर्वप्रथम अँग्रेजी विषय में मैंने बच्चों को मीनिंग याद करने की आदत डाली। कक्षा 8 व 7 में उस समय 45 के लगभग बच्चे थे जिनमें से 40 बच्चों को उच्चारण नहीं आता था। शब्दों की पहचान नहीं थी। मीनिंग के साथ-साथ मैं उन्हें प्रत्येक शब्द का उच्चारण पढ़ाने के दौरान बताती। साथ ही जो कठिन शब्द होते उन्हें पेन्सिल से चिन्हित रखवाकर बताती। कहानी शिक्षण में बच्चे जल्दी याद कर सकें इसके लिए में उन्हें अँग्रेजी में कहानी लिखाकर उसका उच्चारण देवनागरी में भी लिखवाती। मैं जानती थी कि इससे उनमें याद करने एवं समझने कि प्रवृति का विकास हो रहा था। परन्तु साथ ही साथ 10 कहानियों में उन्हीं शब्दों को बार-बार उच्चारित करने से उनका ज्ञान व पहचान पक्की भी हो रही थी।

विज्ञान विषय में मैं जैसे उत्तल व अवतल लैन्स के फोकस, फोकस बिन्दु,केन्द्र को चित्र द्वारा बताती। सवेदनाएँ, रक्त, परिसचंरण तंत्र आदि को मैं चित्रों द्वारा बोर्ड पर समझाकर विज्ञान शिक्षण करवाती थी।

कक्षा चार में विज्ञान (पर्यावरण) शिक्षण में मैंने उदाहरणों, चित्रों एवं खुद करके देखना व सीखना इस पद्धति पर ध्यान दिया। पौधे में विभिन्न भागों की जानकारी दी। मैं उन्हें विद्यालय में लगे पौधों को दिखाती। मुझे प्रसन्नता है कि किताब के दिए चित्र में कहीं भी पर्व सन्धि नहीं बताई गई है। परन्तु मेरे द्वारा पढ़ाए गए बच्चे पर्व सन्धि भी पहचान सकते हैं। कक्षा चार में धूप घड़ी भी बच्चों को बनाकर बताई है। छाया के पाठ को बच्चे खेल के रूप में खेलते हैं। इस प्रकार से धनराज, मनराज, फोरन्ता, शिमला, उसके भाई-बहन अंकिता व लोकेश,सुलोचना ,कुलदीप अशोक, निरमा रामनरेश ऐसे बच्चे हैं जो मुझे कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं तथा इनसे जुड़कर मुझे गर्व का अनुभव होता है।

मेरा कहना है कि

  • प्रत्येक विद्यालय में एक महिला अध्यापक होना आवश्‍यक है। क्योंकि महिला अध्यापिका में वात्सलय स्नेह व प्रेम ऐसे गुण हैं जो बच्चों में डर, झिझक व संकोच को दूर करके उन्हें आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं।
  • अध्यापक को नियमों में आबद्ध नहीं करना चाहिए यदि वह अपने शिक्षण  को प्रभावी बनाने के लिए कुछ नया व लचीलापन लाना चाहते हैं तो वह अधिकार उनको देना चाहिए ।
  • प्रत्येक विद्यालय में पर्याप्त अध्यापक होने चाहिए।
  • अध्यापक एवं बच्चों का मूल्यांकन फेल या पास से नहीं ग्रेड सिस्टम से होना चाहिए। इससे आत्मसम्मान को चोट नहीं पहुँचती अपितु और अच्छा करने और फिर से प्रयास करने का भाव उत्पन्न होता है।
  • अध्यापकों के श्रेष्ठ कार्य के लिए आवश्‍यक नहीं कि प्रमाण पत्र दिए जाएँ। सराहना के द्वारा भी उन्हें अपने कार्य को अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है।
  • अध्यापकों का बच्चों के साथ ऐसा आत्मीय व्यवहार हो कि बच्चे अध्यापक से इतने घुले -मिले रहें कि वे घर परिवार वालों से अधिक विश्‍वास अध्यापकों पर करें।
  • प्रत्येक विद्यालय में विषय अध्यापक आवश्‍यक रूप से होने चाहिए। विशेष रूप से गणित,विज्ञान,अँग्रेजी।

मैं यह नहीं कहती की मैंने अपने कार्य क्षेत्र में बहुत ज्यादा अच्छा कार्य किया है। परन्तु इतनी तसल्ली होती है कि कुछ किया है। भविष्य में भी मैं विद्यालय एवं बच्चों के साथ ही नहीं अपने साथ यह प्रयास जारी रखना चाहती हूँ। क्योंकि अपने किए कार्य से मेरा अपना सन्तुष्ट होना जरूरी है। विद्यालय केवल एक व्यक्ति से नही चल सकता है,स्टाफ की मेहनत एवं सहयोग ही हमारे विद्यालय की एक अलग पहचान बनाते हैं।

श्रीमती विजयश्री राठौड़

  • प्रबोधक,एम.ए.,बी.एड.
  • राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बालापुरा लावा (ब्लॉक मालपुरा), जिला टोंक, राजस्थान
  • 3 अक्टूबर 2008 से शिक्षक

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। श्रीमती विजयश्री राठौड़ वर्ष 2010 में बेहतर शैक्षणिक प्रयासों के लिए चुनी गई हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। हम श्रीमती विजयश्री राठौड़, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

 

 

टिप्पणियाँ

Vikas Singh Thakur का छायाचित्र

very nice....uuu rrr a great Teacher

roshanvikshipt का छायाचित्र

प्रेरक है

17598 registered users
6696 resources