किसी 'खास' की जानकारी भेजें। रास्‍ता इधर है : हरी राम

अकसर स्कूल में बच्चे दिन भर एक साथ पढ़ते हैं, खेलते हैं और एक ही बर्तन से पानी पी लेते हैं , लेकिन भोजनावकाश में कुछ यूँ  घटित होता है कि कुछ जाट बच्चों का एक समूह मेगवाल भील (पिछड़ी जाति) बच्चों की उपयोग में ली गयी थालियों में भोजन नहीं करते हैं। बल्कि वे अपने लिये कुछ थालियाँ और कटोरियाँ अलग से छिपाकर रखते हैं। उन्हें समझाने का प्रयास किया जाए तो आसपास वाले ही आपको रोक देते हैं कि इस मसले को ज्यादा तवज्जोह नहीं दें। मैं जब पूछता हूँ क्यों ??? और फिर आखिर ये बच्चे कब इस दीवार को तोड़ेंगे ???? और ऐसी शिक्षा का क्या मतलब होता है फिर ??? जवाब मिलता है यहाँ जो सिस्टम है उसके अनुसार चलने में फायदा है वरना फालतू में पंगा हो जाएगा।

लेकिन ये जवाब तो मुझे संतुष्ट नहीं कर पाते और फिर बने बनाए सिस्टम में चलना कहाँ सम्भव होता है हमारे लिए ??? बने बनाए सिस्टम में तो मशीन ही चल सकती है इंसान तो नहीं। और फिर एक दिन मैंने उन सब थालियों को समेटकर अन्‍दर रखवा दिया, जिनमें जाटों के बच्चे अलग खाना खाते हैं। दूसरे दिन उन बच्चों को वह थाली कटोरी नहीं मिली तो उन्‍होंने खाना नहीं खाया। अगले दिन रसोइया दादी बोली कि माट्सा इनके घरवाले हमें ओळमा (ताना) दे रहे हैं कि आप हमारे बच्चों को भोजन नहीं करवाते। मैंने दादी से कहा तो आपको बोलना था इनसे पूछिये कौन रोके है इनको भोजन करने से। लेकिन यहाँ स्कूल में खाना तो एक साथ ही खाना पड़ेगा। फिर बच्चों को समझाया, बच्‍चो इससे कुछ नहीं होता। मैंने कहा, अगर मैं इन थालियों, जिनमें ये मेगवाल भील बच्चे खाते हैं, में खा लूँ तो ??? वहीं खड़ी दादियाँ, बच्चे और चपरासी एक स्वर में बोले हाँ खाके दिखाओ।

मैंने उन्हीं थालियों में से एक थाली में खाना लेकर खाना ज्यों ही पहला निवाला मुँह में लिया सभी बड़े अचरज से देखने लगे। मैंने खाना खत्‍म किया और कहा, अब बोलो क्या कहोगे। अगर मुझे कुछ बीमारी या कोई गड़बड़ हो जाए तो इन थालियों में भोजन मत करना वरना तो खा ही लेना। दादी से लेकर चपरासी तक सब निरुत्तर हो गए। लेकिन उनके मन में कुछ चल रहा होगा। चपरासी बोलते हैं अब इस मास्टर का क्या करें ??? ये तो ऐसे ही करेगा उलटे सीधे काम।

मैं उन्हें कुछ नहीं बोलता हूँ, बल्कि मैं तो अपनी क्रिया की प्रतिक्रिया देखने को उत्सुक होता हूँ। इस सब घटनाक्रम के दौरान बच्चों को जरूर कुछ समझ आ गया। दूसरे दिन प्रतिक्रिया आई। उनमें से कई बच्चे जिन थालियों में खाना खाने से मना कर रहे थे उनमें भोजन करने लगे लेकिन शत प्रतिशत सफलता अभी नहीं मिली है। खैर देर सबेर वो भी मिल ही जाएगी।

हालाँकि अभी तक पंगा तो नहीं हुआ और मुझे लग रहा है अगर ढंग से समझाऊँगा तो होगा भी नहीं। अब ऐसा भी लग रहा है कि इस भेदभाव ऊँचनीच की दीवार को तोड़ने के प्रयास दिल से किए नहीं गए होंगे तभी तो जिस मारवाड़ से इतने IAS IPS RAS RPS बन रहे हैं वहाँ अभी तक वही पुराना सिस्टम जातिगत भेदभाव चले जा रहा है। संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार की बात करते करते ये असमानता कैसे सहनकर सकते हैं।  

जब भी इस प्रकार का भेदभाव देखता हूँ तो मन व्यथित हो जाता है। एक तो संविधान की अवहेलना दूसरी  इंसानियत को ठेंगा दिखाया जाता है तो सोचता हूँ उन बच्चों का क्या दोष है जो उनके साथ भेदभाव हो रहा है। मेरे अनुसार शिक्षा का पहला उद्देश्य तो बच्चे को एक इंसान बनाना ही होता है जो ऐसे माहौल में तो सम्‍भव नहीं लगता। दूसरा ये बच्चे सामाजिक समरसता कैसे सीखेंगे जब इस उम्र में ऐसे माहौल से रह रहे हैं। कुंठाएँ तो उनको भी घेरेंगी और दूसरी जातियों के प्रति वे भी गलत सोचना शुरू कर देंगे जिसके भयावह परिणाम तो आने निश्चित हैं। मेरे अनुसार हमारे आसपास का माहौल सुकून भरा होगा तो ही आगे की शिक्षा सहज ढंग से पूरी कर पाएँगे। इसलिए कोशिश करता हूँ कि इस ऊँच-नीच और असमानता की दीवार को तोड़ने में अपना योगदान दे सकूँ।


हरी राम, अध्यापक, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय धारासर, ब्लॉक – बायतु, जिला बाड़मेर, राजस्थान | लेखक पिछले तीन वर्षों से उक्त विद्यालय में अध्यापक हैं और पिछले काफी समय से अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के साथ विभिन्न माध्यमों से लगातार जुड़े रहे हैं | प्रस्‍तुति : मयंक रतूरी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,बाड़मेर

 

 

                                         

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

हरी राम का प्रयास मानवता से ओतप्रोत हे। यही सच्ची शिक्षा भी है कि मानव मानव में किसी भी प्रकार हो रहा भेदभाव दूर कर समरस समाज का निर्माण करे। शिक्षक भी प्रायः इन सब चीजों की अनदेखी करते हैं। हरीराम जी ने मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी है। देर सबेर वहां सब ठीक हो जायेगा‚ थाली ही नही बच्चे एक ही थाली में भी खाने लगेंगे। सराहनीय पहल।

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