किसी 'खास' की जानकारी भेजें। रामेश्‍वरी लिंगवाल : टेढ़ी-मेढ़ी राहों की हमसफर

 

रामेश्वरी लिंगवाल नाउम्मीदी के इस माहौल में उम्मीदों का खुला आसमान हैं। वे राजकीय प्राथमिक विद्यालय नवीन ज्ञानसू उत्तरकाशी में अध्यापिका हैं। रामेश्वरी के होने से उत्तरकाशी का यह स्कूल खास हो गया। वे एक साधारण टीचर और असाधारण व्यक्तित्व हैं। उनके विद्यार्थी उनकी जान हैं और वे अपने बच्चों की ताकत हैं। उन्होंने पिछले कुछ सालों में वह कर दिखाया, जिसके लिए किसी को भी हजार बार सोचना पड़ता। एक फोन आया था कहीं से कि उत्तरकाशी में कुछ बच्चे कूड़ा बीन रहे हैं। ये बच्चे किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं। उन्होंने कहा, कि हमने जनगणना की ड्यूटी की थी लेकिन ये बच्चे कहीं नहीं थे। मैं हैरान थी कि उत्तरकाशी में ऐसे बच्चे कहाँ से आए जो कहीं दर्ज ही नहीं हैं। और ये बच्चे स्कूल आने की बजाय कूड़ा क्यों बीन रहे हैं। ये करीब दस बच्चे थे। जिस फोन से इनके उत्तरकाशी में होने की खबर मिली थी उसमें असल में इनकी चोरी-चकारी की हरकतों के प्रति चिन्‍ता थी। लेकिन रामेश्वरी की चिन्‍ता तो कुछ और ही थी। वे एक शिक्षिका हैं, उनकी चिन्‍ता बच्चों के भविष्य की थी।

‘तो आपने क्या किया’.... उन्होंने बताया ‘मैं अगली सुबह होने का इन्‍तजार कर रही थी बस। सुबह होते ही मैं उस जगह पहुँची जहाँ इन बच्चों के कूड़ा बीनने की सम्‍भावनाएँ बताई गई थीं। बच्चे उस वक्त वहाँ नहीं थे। मैं काफी देर तक यहाँ-वहाँ भटकती रही। करीब एक घण्‍टे बाद मुझे बोरे का झोला जैसा लटकाए कुछ बच्चे दिखे। बस स्टैण्‍ड के पास की बात है। जैसे ही मैंने उनके करीब जाने की कोशिश की वो भाग गए।

मैं मायूस तो हुई लेकिन टूटी नहीं। मैंने उनके घर पता किए और उनके घर पहुँची। घर क्या एक पॉलीथीन से जमीन का एक टुकड़ा ढाँककर उसमें कुछ जिन्‍दगियाँ ठुँसी हुई थीं। बच्चों के माँ-बाप भी कूड़ा बीनते थे और माँगा हुआ खाना और सामान लाकर घर चलाते थे। उनके करीब जाने पर बदबू आ रही थी। मुझे देखकर वो चौंके। मैंने उनसे सिर्फ इतना कहा, आपके बच्चों को अगर एक टाइम बढ़िया खाना मिलने लगे तो क्या आपको अच्छा नहीं लगेगा...मैं जानती थी जिस हालात में जिन लोगों से बात करने मैं गयी हूँ, वहाँ शिक्षा की बात करना भी अपना ही मजाक उड़ाने जैसा है। हालाँकि मेरी यह बात भी उन्हें हजम नहीं हुई। वे व्यंगात्मक ढंग से मुस्कुराए। ‘हम अपने बच्चे बेचेंगे नहीं’ यह उनकी तुरन्‍त की गई प्रतिक्रिया थी। मैंने गहरी साँस ली। फिर से समझाया, कोई खरीद नहीं रहा आपके बच्चों को। मैं तो उन्हें एक वक्त का बढ़िया खाना देने की बात कर रही हूँ।  

‘नहीं चाहिए। हम ऐसे ही ठीक हैं।’ उन्होंने मुँह मोड़ लिया। मैंने कहा, ‘कैसे माँ-बाप हैं आप अपने बच्चों को ठीक से खाना भी नहीं देना चाहते।’

“हाँ, नहीं देना चाहते। बस। अब आप जाइए। ‘वे सम्‍भवतः अपनी और अपने बच्चों की जिन्‍दगी को उन्हीं अभावों में सुरक्षित पाते थे। उनके लिए उससे बाहर निकलना किसी खतरे को मोल लेना जैसा था। सदियों से उपेक्षित जीवन जीते जी हम उसके आदी हो जाते हैं, उसी में सुरक्षित महसूस करने लगते हैं, कहीं पढ़ा था, वो पढ़ा हुआ आँखों के सामने था।’

दो टूक जवाब सुनकर रामेश्वरी लौट आईं । लेकिन पढ़ने-लिखने की उम्र में बोरा कंधे पर डालकर गली-गली कूडा बीनने वाले बच्चों के आपराधिक होने की सम्‍भावनाओं को देखकर चुप रह पाना रामेश्वरी के लिए आसान नहीं था। वो सारी रात सो नहीं पाईं।

अगली सुबह वे फिर उन कूड़ा बीनने वालों के सामने थीं। उन्होंने फिर से अपनी बात कहनी शुरू की ‘जिस तरह की झूठन और सड़ा हुआ खाना आपके बच्चे खा रहे हैं ये ज्यादा दिन जियेंगे नहीं’। ‘हम जी लेते हैं मैडम...हमें आदत है।’ वो बेहद सहजता से अपने हालात के प्रति अपनी स्वीकार्यता दर्ज कराते हैं। उनकी यह स्वीकार्यता कितना बड़ा सवाल है एक सभ्य समाज के आइने के सामने...।  

‘तो तुम्हारे बच्चे भी सड़ा हुआ खाना खाते हुए सड़ा हुआ जीवन जीते रहें यही चाहते हो तुम। वे बाकी बच्चों की तरह अच्छा जीवन जी लेंगे तो तुम्हें तकलीफ हो जाएगी।’ रामेश्वरी ने कहा और वापस लौट आईं।

‘गुस्सा तो मुझे आ ही गया था।’ रामेश्वरी ने साफगोई से कहा। लेकिन रात में सोने से पहले गुस्सा कहीं दूर जा चुका था।

कैसा समाज है जिसमें एक शोषित को शोषण में ही आनन्‍द मिलने लगा है। वो उससे बाहर निकलना ही नहीं चाहते। उन्हें अगर अपने लिए सोचने की, कुछ करने की आजादी मिल भी जाए तो क्या होगा...कुछ भी तो नहीं। वे तो अपने जीवन में सुख आते देख घबरा जाते हैं और वापस अपनी अभावों की चादर में छुप जाना चाहते हैं। कैसी विडम्बना है...इसी उहापोह में रामेश्वरी की रात कटी और अगले दिन सुबह वे बस स्टॉप पर पहुँची तो देखा पुलिस उन बच्चों को खदेड़ रही है। उनके घर भी तोड़ रही है। दरअसल इन्हें हार्ड कोर क्रिमिनल समझा जाता है और व्यवस्था को चाक-चौबन्‍द रखने के लिए पुलिस ऐसे लोगों को ठिकाने लगाती रहती है। रामेश्वरी को इस घटना में उम्मीद नजर आई। वे  फिर पहुँच गई उन लोगों के पास। उन्होंने कहा, ‘अगर तुम्हारे घर पुलिस न तोडे़ तो’...अब वो उनकी बात सुन रहे थे।

‘माने...?’ उन्होंने पूछा

रामेश्वरी ने जरा ज्यादा लम्‍बी साँस ली और धीरे से कहा, ‘अगर तुम लोग अपने बच्चों को स्कूल पढ़ने भेजना शुरू करो तो मैं पुलिसवालों से बात कर सकती हूँ कि वो तुम्हारे घर न तोड़ें।’

‘पर आप तो बच्चों को खाना देने की बात कर रही थीं, इसमें स्कूल कहाँ से आ गया।’ उन्होंने हैरत से पूछा।

वे मन ही मन मुस्कुराई। ‘खाना तो स्कूल में ही मिलता है ना...स्कूल भेजोगे तो वहीं खाना मिलेगा इन्हें।’

‘और पुलिसवाले हमारा घर नहीं तोड़ेंगे....’ वो बरसाती से ढँके उस कोने की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त होना चाहते थे। रामेश्वरी एक भी सिरा हाथ से जाने देना नहीं चाहती थी। तुरन्‍त उनकी सुरक्षा की हामी भरी किस बूते पता नहीं और बच्चों का हाथ पकड़कर स्कूल ले आईं।

इस बीच उनके दिमाग में चल रहा था कि आखिर उनकी कोई उपस्थिति कहीं दर्ज क्यों नहीं थी रिकॉर्ड में। वे शायद जनगणना के बाद यहाँ आए थे। जनगणना में चूँकि वो खुद शामिल थीं तो इसका यह फायदा था कि उन्हें उस इलाके के लोगों की जानकारी थी। वे कहती हैं कि मुझे लगा जब हम यहाँ जनगणना कर रहे होंगे, तब शायद ये कहीं और कूड़ा बीन रहे होंगे। बहुत मुमकिन है कि ये लोग देश के किसी रिकॉर्ड में दर्ज ही न हों। न सही दस्तावेजों में, उन्हें जिन्‍दगी में दर्ज होने का तो पूरा हक है ही।

खैर, थोड़ा हौसला तो बढ़ा ही था कि पहली समस्या का पहला पड़ाव तो पूरा हुआ कम से कम। कूड़ा बीनने वाले ऐसे बच्चे जिनकी असली शक्ल गन्‍दगी में छुप गई थी और जिनके पास से बदबू का भभका उठता था, उन्हें बाकी बच्चों के साथ कैसे बिठाया जा सकता था। दूसरे बच्चे भी भाग जाएँगे और अगले दिन उनके माँ-बाप झगड़ा करने आ जाएँगे सो अलग।

रामेश्वरी उन बच्चों को अपने घर ले गई। उन्हें साबुन लगा लगाकर अपने हाथों से नहलाया। मैल की इतनी पर्तें थीं कि छूट ही नहीं रही थीं। खैर नहा-धोकर वे  जब सामने खड़े हुए तो देखती ही रह गईं। प्यार तो तब भी बहुत आया था, जब उन्हें पहली बार कूड़ा बीनते देखा था लेकिन उस प्यार में एक दर्द भी शामिल था कि इनकी ये जगह तो नहीं। अब जो प्यार आया उसमें दर्द नहीं आने वाले कल की चमक शामिल थी। उन्हें अपने बच्चों के कपड़े पहनने को दिए और अगले दिन से स्कूल आने को कहा।

अब उनके कॉपी किताबों और यूनिफॉर्म की बारी थी। इन बच्चों की नाप तो स्कूल यूनिफॉर्म के लिए गई नहीं थी इसलिए सरकारी यूनिफॅार्म आने में वक्त लग सकता था। लेकिन बाकी बच्चों से ज्यादा जरूरत तो इन्हें थी यूनिफॉर्म की ताकि वो खुद को अलग महसूस न करें। कहते हैं न कि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो असम्‍भव कुछ भी नहीं होता। स्कूल की प्रिंसिपल -- सम्पत्ति कुंडलिया ने आगे बढ़कर उनकी मदद की। मिलकर पैसे इकट्ठे किए। उनके बस्तों का, कॉपी किताबों का यूनिफॉर्म का इन्‍तजाम किया और अगली चमकती हुई सुबह का इन्‍तजार करने लगी। स्कूल पहुँची तो निगाहें स्कूल के गेट पर कि कब आएँगे बच्चे। लेकिन वे नहीं आए। रामेश्वरी की आवाज भीग जाती है यह कहते हुए कि ‘यकीन मानिए मेरी आँखों में आँसू आ गए। मुझसे रहा नहीं गया और मैं उन्हें ढूँढने चल पड़ी। वे मुझे बस स्टेशन के पास फिर से कूड़ा बीनते नजर आये...मुझे काटो तो खून नहीं। मैं वापस उनके घर की ओर दौड़ी तो पता चला पुलिस ने घर तोड़ दिए हैं।’

उन्हें अब अपनी गलती का अहसास हो चुका था। वे बच्चे अपने मां-बाप के पुलिस से बचाव के एवज में स्कूल भेजे जाने वाले थे।

अब दूसरी रणनीति पर काम करने का समय था। उन्होंने कुछ साथियों से जिसमें प्रशासन के लोग भी शामिल थे अपनी बात कही। अच्छी बात यह हुई कि बात बन गई। अगले दिन बच्चे स्कूल तो आ गए लेकिन उनकी स्थिति अब भी वही थी। कोई बच्चा उनके पास बैठने को राजी नहीं था। फिर से उन्हें नहलाने-धुलाने का कार्यक्रम शुरू हुआ।

हमने देखा कि उन्हें सिर्फ मिलने वाले खाने में ही रुचि थी। वे दूसरे बच्चों को पकड़कर पूछते, ‘ऐ....भात कब मिलेगा...’ भात ही उनके स्कूल आने का सबब था और हमारे पास उन्हें स्कूल लाने का एकमात्र रास्ता। भात की खुशबू। अभी पढ़ने की तो कोई बात ही नहीं थी बस उनके स्कूल आने और भात खाने की बात थी। लेकिन यह भी बहुत आसान नहीं था। उन्हें अनुशासन में रहने की आदत तो थी नहीं। भाषा भी उनकी स्कूल के अनुशासन को भंग करने वाली होती थी लेकिन हमने उन्हें अनुशासन का कोई पाठ नहीं पढ़ाया बस वक्त दिया कि वे स्कूल आते रहें। अगर वे स्कूल आते रहे, तो बाकी सब सम्‍भल जाएगा। इसके बावजूद भात के लिए देर तक स्कूल में बैठना उन्हें अक्सर उबाऊ लगता और वे भाग जाते।

उन्हें लेने घर जाती तो वे छुप जाते। फिर नए सिरे से सब सम्‍भालना पड़ता। यह सब बताते हुए रामेश्वरी बीते हुए वक्त को जी रही थीं।

’फिर मैंने छोटे से सवाल से एक बड़ी सी बात को आगे बढ़ने का रास्ता खोला। अचानक मैंने देखा कि इस फिर के जवाब में उनके चेहरे की चमक कई गुना बढ़ गई है। फिर क्या हमसे न पूछिए आइए मिलिए इन बच्चों से। कितना सुन्‍दर लिखते हैं ये, कितना सुन्‍दर पढ़ते हैं। बात करिए तो फूल झरते हैं...आइए मिलिए ना...’

दो अलग-अलग क्लासरूम में बच्चे ही बच्चे। उत्साह से भरी हुई वे एक-एक कर बच्चों को सामने लाती हैं, ये अंजलि है आप इसकी कॉपी देखिए...सचमुच मोतियों जैसे सुन्‍दर अक्षर कॉपी में बिखरे हुए। कहीं कोई गलती नहीं। अंजलि स्वभाव से शर्मीली है। पूरे वक्त उसका सुन्‍दर सा गोल-मटोल चेहरा जमीन की ओर गड़ा रहता है। फिर पिंकू, भोला, संजली, कोकिला, वर्षा, विकास, माधुरी, हीरा न जाने कितने चेहरे सामने आते हैं। स्कूल में अब उनका मन लगता है। अक्षरों को जोड़कर शब्द बनाना उन्हें किसी खेल सा लगता है। अपनी कॉपियों में वे कभी बादल, कभी नदी, कभी पर्वत खड़ा करते हैं उसमें अपनी पसन्‍द के रंग भरते हैं। अब उन्हें सिर्फ भात के बनने का इन्‍तजार नहीं रहता।

‘इन्हें पढ़ाना आसान तो न रहा होगा....इसके लिए कौन सी रणनीति अपनाई आपने....’ मैं उनसे पूछती हूँ। हाँ, आसान तो नहीं था। जिसने कभी पेंसिल न पकड़ी हो उसे सीधे क्लास दो, तीन या चार में बिठा देना। मैंने उन्हें उनके आसपास की चीजों से पढ़ाना शुरू किया। पाठ्यक्रम का ध्यान नहीं दिया क्योंकि मेरी पहली चिन्‍ता उनका रिजल्ट नहीं, उनका स्कूल में आने का मन होना थी। उनकी दुनिया, उनके दोस्तों और आसपास से जोड़ते हुए उन्हें लिखना फिर पढ़ना सिखाया। जैसे तुम्हें खाने में क्या पसन्‍द है पूछने पर किसी ने कहा कि दाल। तो उनसे कहा, दाल कैसी होती है। उसका रंग कैसा होता है....दाल कैसे लिखा जाएगा...उन्हें इसमें मजा आ रहा था। कोई हरी दाल बना रहा था कोई पीली दाल। कौन सा फल पसन्‍द है बताते हुए विकास की आँखों में चमक आ गई थी जब उसने अंगूर बताया...फिर अचानक वह रोने लगा कि एक बार उसने किसी दुकान वाले से अंगूर माँगे थे तो उसने कैसे मारकर भगा दिया था...मेरी आँखें भर आई थीं कैसे शब्दों के साथ जुड़ी यादें उनके अर्थ ही बदल देती हैं....किसी भी बच्चे का स्कूल में मन लगना पहली जरूरत है। वह जैसे भी लगाया जा सकता है वह तरीके मैं तलाशती रहती हूँ। आज जब इन बच्चों को पढ़ते हुए, बढ़िया काम करते हुए देखती हूँ तो लगता है जी ली हूँ जरा सा।


रामेश्वरी लिंगवाल से प्रतिभा कटियार की बातचीत पर आधारित। अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेश्‍न, देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक से साभार।)

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pramodkumar का छायाचित्र

' लगता है जी ली हूँ जरा सा ', शिक्षिका रामेश्‍वरी का यह कथन जीवन की सार्थकता सिदध करता है । उनके प्रयासों में गति है और जीवन का प्रवाह भी । कूडा बीनते बच्‍चों को प्रकाश की राह पर सतत गतिमान रखने की द्रढ इच्‍दाशक्ति का चरमोत्‍कर्ष दिखता है तो  अपने कर्तव्‍य के प्रति समर्पण और संवेदना भी ।उनके इस प्रयास को कोटिश: नमन ।

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