किसी 'खास' की जानकारी भेजें। राजकुमार शर्मा : विद्यालय प्रबन्धन के लिए मिसाल

टोंक जिले के मालपुरा उपखण्ड से 8 किलोमीटर दूर पर्वत के समीप दूदू रोड पर स्थित है, ग्राम रामपुरा बास गनवर। जिसका इतिहास 150 साल से भी अधिक पुराना है। लगभग 800 व्यक्तियों की जनसंख्या वाला यह गाँव, ग्राम पंचायत गनवर का अराजस्व ग्राम है। इसमें 25 प्रतिशत सवर्ण, 30 प्रतिशत माली समुदाय, 30 प्रतिशत जाट समुदाय तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं।

यहाँ के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में सत्र (2010-11) में  74 बालक तथा 62 बालिकाएँ कुल 136 छात्र-छात्राएँ अध्ययनरत थे।

दो किलोमीटर दूर गनवर ग्राम से नन्हें-मुन्ने छात्र भी इस विद्यालय में आते हैं। इससे इस विद्यालय एवं अध्यापकों का आदर समाज में स्वतः ही परिलक्षित होता है। सामाजिक संगठनों एवं महिला समूहों ने विद्यालय की समस्याओं का समाधान करने में जैसे अतिक्रमण हटवाने में, पानी की टंकी बनवाने में, प्रांगण में मिट्टी डलवाने में, वर्षा के पानी की समुचित निकासी हेतु नाला एवं चारदीवारी निर्माण में उल्लेखनीय योगदान किया है।   

छात्र-छात्राओं को निशुल्क विद्यालय गणवेश देने की योजना रखने वाला यह विद्यालय उत्‍तरोत्‍तर शैक्षणिक गुणवत्‍ता में, नामांकन वृद्धि में, अध्यापक डायरी में तथा छात्र डायरी में अपनी विशेष भूमिका में है।

 प्रयासों की कहानी  : राजकुमार शर्मा की जुबानी

विद्यालय के लिए विकास कोष

मैंने प्रारम्भ से ही स्कूल कोष पर भी ध्यान दिया। पन्‍द्रह अगस्त, छब्‍बीस जनवरी जैसे उत्सवों पर अन्य अभिभावकों के साथ उन लोगों को बुलाने की सूची भी तैयार की जाती है जो स्कूलों को आर्थिक मदद दे सकें। इनसे प्राप्त राशि का हिसाब भी व्यवस्थित रूप से रखा जाता है।

पिछले लगभग दो-तीन साल से स्कूल के सभी शिक्षक भी 200-300 रु. प्रति माह इस कोष में देते हैं। इसकी विधिवत रसीद दी जाती है। यहाँ का वातावरण ऐसा है कि अगर तबादला होकर कोई नया शिक्षक यहाँ आता है वह भी वह भी स्वेच्छा से इसमें सहयोग देना प्रारम्भ कर देता है। इस कोष से ऐसे कार्य किए जाते हैं जो स्कूल के विकास में सहयोग कर सकें।

डायरी : अभिभावकों से जीवन्त सम्पर्क

बच्चे स्कूल से जाने के बाद अपने समय का उपयोग किस तरह करते हैं इसकी कोई जानकारी विद्यालय में अध्यापकों के पास नहीं होती है। बच्चों को जो गृहकार्य दिया जाता है, आमतौर उसके बारे में भी अभिभावकों को कोई जानकारी नहीं रहती है। निजी विद्यालयों में इस हेतु हर विद्यार्थी को एक डायरी दी जाती है। हमने भी इस समस्या के निराकरण के लिए विद्यालय के समस्त छात्र-छात्राओं को डायरी का वितरण किया तथा वर्ष भर डायरी का दैनिक निरीक्षण किया। डायरियों का व्यय विद्यालय विकास कोष से किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि अभिभावकों द्वारा दिए गए छात्र के अध्ययन के समय एवं अन्य शिकायत तथा सुझावों से विद्यालय अवगत हुआ जिससे छात्र का विद्यालय में ठहराव हुआ। अभिभावक के साथ दैनिक सम्पर्क हुआ। अध्यापक द्वारा दिए गए छात्र सम्बन्धी शिकायत सुझाव, पढ़ाई स्तर से अभिभावक अवगत हुए। अध्यापक एवं अभिभावकों के आपसी सम्पर्क से छात्र का हित हुआ तथा छात्र अनुशासित होकर अध्ययन में रुचि लेने लगे। इससे अभिभावक से विद्यालय का नियमित संवाद होता रहता है। अगर अभिभावक साक्षर नहीं भी है तो वह बच्चे से पूछता अवश्य है कि क्या बात है।

नामांकन वृद्धि के लिए प्रयास

विद्यालय के सम्बन्ध में सरकारी योजनाओं एवं प्रवेशोत्सव आदि की जानकारी के लिए विभिन्न शासकीय विभागों की मदद से पैम्पलेटस एवं फलैक्सी बोर्ड द्वारा प्रचार-प्रसार किया गया।सभी अध्यापकों का समय से पहले स्कूल आना और समय के बाद ही स्कूल से जाना सुनिश्चित किया गया। शिक्षण नियमित हो यह भी निश्चित किया गया। हर कक्षा के बच्चे के स्तर की पहचान की गई। उसके अनुसार शिक्षण शुरू किया गया। हर माह उनका टेस्ट लिया गया। यह सब करने के बाद अभिभावकों से मिला गया। स्वयं के बच्चों को भी इसी स्कूल में भर्ती करवाया। अभिभावकों से सम्पर्क के दौरान बताया कि पढ़ाई कैसे करवाई जाती है और हमारे स्कूल के बच्चों को क्या आता है। यह सम्पर्क भी नियमित किया जाता रहा। धीरे-धीरे पास के गाँवों तक यह बातें गईं। जिससे गनवर से निजी विद्यालयों में जाने वाले छात्र-छात्राएँ भी इस विद्यालय में अध्ययन के लिए आने लगे, जिससे विद्यालय का नामांकन विगत वर्षो की तुलना में बढ़ा। आज भी इस स्कूल में 40-50 बच्चे आसपास के गाँवों से पढ़ने आ रहे हैं।

गणवेश की व्यवस्था

छात्राओं के लिए ड्रेस सरकार से मिलती है। जिन छात्रों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है उनके लिए ड्रेस की व्यवस्था हम विभिन्न आयोजनों पर स्कूल को समुदाय से मिली राशि तथा शिक्षकों से स्वेच्छा से मिली राशि से करते हैं।

गाँव के महिला समूह से मदद

हमारे गाँव में महिला समूह भी कार्य करता है। मैंने महिला समूह को भी स्कूल से जोड़ा। पन्द्रह अगस्त तथा छब्बीस जनवरी को समूह को आमन्त्रित किया। उनके कार्य सामूहिक रूप से सभी के सामने रखे। उनसे चर्चा की कि यह स्कूल अपने ही गाँव के बच्चों के लिए है और हम इसके विकास के लिए किस तरह की योजनाएँ और सोच बना रहे हैं। आप लोग भी इसमें योगदान करें। उन्होंने स्कूल को पैसे देने का प्रस्ताव रखा। हमने कहा कि आप पैसे जरूर दें। और आप ही यह तय करें कि इस पैसे से इस स्कूल में क्या किया जा सकता है। वह काम भी आप ही स्कूल में करवाएँ। आगे भी वह अपने लाभ का कुछ प्रतिशत स्कूल को देने की बात कहते हैं।

हैण्‍डपम्प एक : उपयोग करने वाले अनेक

मैंने दिनांक 08.09.2007 को राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय गनवर से स्थानान्तरित होकर राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय रामपुरा बास में कार्यग्रहण किया था। विद्यालय में 4 कमरे थे एवं विद्यालय में कुल छात्र संख्या 94 थी। पेयजल हेतु एक हैण्‍डपम्प लगा हुआ था जिस पर एक तरफ औरतें स्नान किया करती थीं दूसरी तरफ पुरुष। बच्चों को पानी पीने के लिए 20-25 मिनट तक इन्तजार करना पड़ता था। विद्यालय में प्रवेश के लिए एक छोटी सी पगडण्डी थी। विद्यालय की जमीन पर अतिक्रमण था।

एक दिन जब महिलाएँ सरकारी योजना के तहत विद्यालय में मिट्टी डालकर निकलने लगीं तो मैंने महिलाओं को रोककर उनसे इस विषय पर चर्चा की। महिलाओं ने कहा कि बाहर दूसरा हैण्‍डपम्प लगवा दो तो विद्यालय परिसर में लगे हैण्‍डपम्प पर स्नान करने हेतु कोई भी महिला नहीं आएगी।

कुछ दिनों के पश्चात् ग्राम में एक विवाह समारोह में वर पक्ष के साथ, तत्कालीन जलदाय मंत्री महोदय के आगमन की सूचना प्राप्त हुई। मंत्री महोदय नहीं पधारे परन्तु वर पक्ष के मुखिया के साथ अजमेर जाने पर चीफ इंजीनियर महोदय के कोटे से ग्राम में हैण्‍डपम्प स्वीकृत हो गया जिससे विद्यालय परिसर में लगे हैण्‍डपम्प पर महिलाओं का स्नान करना बन्द हो गया और विद्यालय के समस्त बच्चों को पीने का पानी सहज रूप से मिलने लगा।

विद्यालय प्रांगण में अतिक्रमण

विद्यालय की लगभग 2 बीघा भूमि पर माली तथा जाट समुदाय का अतिक्रमण पिछले 25 वर्षों से चला आ रहा था। अध्यापकों साथियों से जब चर्चा हुई तो अतिक्रमण हटाने के लिए उनमें भी साहस छुपा हुआ नजर आया। मैंने अपने साहस के साथ उनके छुपे हुए साहस को बढ़ाया तथा साझा आत्मविश्‍वास से विद्यालय के चहुँमुखी विकास के लिए चिन्तन शुरू किया।

समस्या के बारे में जानकारी एकत्रित करने पर निम्न बिन्दु पहचाने गएः

  • विद्यालय की भूमि के बारे में विद्यालय में राजस्व रिकॉर्ड का नहीं होना।
  • माली समुदाय द्वारा पहले जाट समुदाय के अतिक्रमण को हटवाने की जिद करना।
  • जाट समुदाय द्वारा पहले माली समुदाय के अतिक्रमण को हटवाने की जिद करना।
  • कानूनी मदद लेने पर जाट एवं माली समुदाय के छात्रों के अभिभावकों का विद्यालय से शैक्षणिक जुड़ाव हटने की आशंका।
  • विद्यालय एवं समाज में मनमुटाव होने की आशंका होना।

विचार विमर्श के बाद अतिक्रमण हटाने के लिए निम्न कदम उठाने की योजना बनाई गईः

  • हल्का पटवारी गनवर से विद्यालय सम्बन्धी भूमि का सूचना के अधिकार के तहत रिकॉर्ड प्राप्त करना।
  • एस.डी.एम.सी. में, ग्राम पंचायत में तथा ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, मालपुरा को विद्यालय भूमि के सीमांकन करवाने हेतु प्रार्थना पत्र देना।
  • चिन्हित जगह पर विद्यालय भूमि का बोर्ड लगवाना।
  • सामाजिक संगठन, कलावती महिला समूह रामपुरा, जन चेतना विकास मंच पचेवर, एस.डी.एम.सी. रामपुरा तथा सरपंच गनवर से मदद लेना।
  • अतिक्रमण हटने के बाद विद्यालय भवन की भूमि पर पुनः अतिक्रमण नहीं हो इस हेतु ग्राम पंचायत गनवर, जिला परिषद सदस्य, प्रधान पंचायत समिति, मालपुरा एवं खण्ड सन्दर्भ केन्द्र प्रभारी, मालपुरा से सम्पर्क कर बजट स्वीकृत करवाना एवं चारदीवारी तथा नाला निर्माण कार्य चालू करवाना।

सरपंच महोदय के नेतृत्व में पटवारी महोदय द्वारा भूमि का सीमांकन किया गया। सीमांकित भूमि को ज्यों ही चिन्हित करने लगे मानो ग्राम में कोहराम मच गया। जाट समुदाय द्वारा अतिक्रमण को स्वयं की भूमि बताने की दलीलें शुरू हुईं तो माली समाज द्वारा कहा गया कि, ‘‘ माडसाब थाके पैदा होबे सुं पहल्या की या जमीं महांकी है। ‘‘ (मास्साब आपके पैदा होने से पहले से यह जमीन हमारी है।)

हमने विद्यालय में आपस में चर्चा करके विद्यालय भूमि पर लोहे का बोर्ड बनाकर सूचना लिख दी कि यह भूमि विद्यालय की सम्‍पति है। अगले ही दिन किसी ने वो बोर्ड उखाड़कर माली समुदाय के अतिक्रमण वाले हिस्से गाड़ दिया है। अतः एक और बोर्ड बनवाकर जाट समुदाय के अतिक्रमण में लगवाया गया। एक बोर्ड का खर्चा विद्यालय द्वारा वहन किया गया तथा दूसरे बोर्ड का खर्चा मैंने उठाया।

अतिक्रमण हटवाने के लिए एस.डी.एम.सी. रामपुरा की बैठक का आयोजन किया गया। वार्ड पंच श्री बद्री भडाना, श्री गोपीलाल, समाज सेविका श्रीमती कुन्ता शर्मा, श्रीमती कलावती शर्मा, श्री प्रहलाद माली एवं ग्राम सरपंच को भी आमन्त्रित किया गया। सभी की उपस्थिति में अतिक्रमण करने वालों की सूची तैयार की गई। ग्राम में कुल 58 घर हैं जिनमें से 17 व्यक्तियों का अतिक्रमण विद्यालय की भूमि पर था। बैठक के मध्य में ही श्री रंगलाल माली स्वैच्छिक रूप से अपना अतिक्रमण हटाने को राजी हो गए।

उपस्थित समस्त सदस्यों एवं व्यक्तियों ने राष्ट्रीय पर्व पर श्री रंगलाल माली को सम्मानित करने निर्णय किया तथा सहयोग स्वरूप श्री रंगलाल माली ने इस विद्यालय को 100 रूपये भी प्रदान किए। इससे हमारा आत्मविश्‍वास बढ़ा तथा आगे कार्य करने की प्रेरणा मिली।

अब बारी थी जाट समुदाय के लोगों से चर्चा करने की। इसी दिशा में श्री हंसराज चौधरी, श्री श्योजी राम जाट, श्री बैजनाथ भदादा को विद्यालय में आमंत्रित कर जाट समुदाय के लोगों के अतिक्रमण हटाने पर चर्चा की गई। विद्यालय द्वारा कहा गया कि माली समाज का एक अतिक्रमण हट चुका है इसलिए जाट समाज भी इस कार्य में पहल करे। जाट समाज के अतिक्रमी राजी नहीं हुए परन्तु समुदाय के मुखियाओं द्वारा इस मसले पर गम्भीरता दिखाने का आश्‍वासन दिया गया।

पालनहार योजना

समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित पालनहार योजना के अन्तर्गत कामकाजी असहाय छात्रों को लाभान्वित किया। पालनहार योजना सरकारी योजना है। इस योजना में गाँव का वह हर बच्चा चयनित होता है जिसके माता/पिता नहीं होते। इसमें हर माह एक निश्चित राशि बच्चों को मिलती है। इस सुविधा के मिलने से छात्रों को जीविका के लिए काम करने की आवश्‍यकता नहीं रही। शिक्षा के प्रति उनकी रुचि बढ़ी। नियमित अध्ययन के कारण शैक्षणिक गुणवत्‍ता में वृद्धि हुई। विद्यालय में छात्रों के नामांकन में भी वृद्धि हुई।ग्राम रामपुरा के छात्र राजू चौपड़ा के पिता कई वर्ष पूर्व निधन हो गया था। जीविका का साधन न होने के कारण उसे काम करना पड़ता था।

मैंने समाज कल्याण विभाग में पालनहार योजना के तहत छात्रवृति के लिए उसका आवेदन प्रेषित किया था। उसके लिए 650 रुपए प्रतिमाह स्वीकृत हुए। प्रथम राशि का ड्राफ्ट जब छात्र को प्राप्त हुआ तो उसकी माता रामफूली जाट विद्यालय में आई उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे और मेरे पैर पकड़कर कहने लगी कि, ‘‘ माडसाब थाकों यो अहसान म जिन्दगी भर नही भूलूली या पिस्या सूं म्हारो छोरा अब निकान पड सकेलों और म अब थाकी हर बात मानूली‘‘। ( मैं आपका अहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूँगी। अब इस पैसे से मेरा बेटा पढ़ सकेगा।) तब मैंने कहा कि बड़ी बहिन छोटे भाई के पैर नही पकड़ती। आप अगर कुछ अच्छा कार्य करना चाहती हैं तो अपने माता-पिता को समझाकर विद्यालय परिसर की भूमि से उनका अतिक्रमण हटवाने की कोशिश करना। मेरी बात का उस पर असर हुआ। घर जाकर छात्र की माँ ने अपने माता-पिता से कहा, ‘‘ मे थ्हाकी बेटी की जगह बेटो होती तो थे म्हनें जमीं की पाती देता आज म्हने थे बेटो मानकर म्हारी पाती मे म्हेने स्कूल की अतिक्रमण की जमीं पर सूं कब्जों छयोड दयों। ‘‘ (मैं आपकी बेटी के बदले बेटा होती तो मेरे हिस्से की जमीन मुझे देते। मुझे बेटा मानकर ही मेरे हिस्से की जमीन पर से कब्जा हटा लो।) उसकी यह बात सुनकर पड़ोसियों ने कहा कि गुरुजी अब विद्यालय का अतिक्रमण हट जाएगा। इस प्रकार धीरे-धीरे विद्यालय की भूमि पर से अतिक्रमणों के हटने का सिलसिला शुरू हो गया।

महत्व ज्ञान और दान का

उन्हीं दिनों ग्राम सोडा में अन्तर्राष्ट्रिय रामस्नेही सम्प्रदाय के पीठाधीश्‍वर आचार्य श्री रामदयाल जी महाराज का चातुर्मास कार्यक्रम चल रहा था। ग्राम स्तर पर मीटिंग आयोजित कर उनके ज्ञान एवं दान के महत्व पर प्रवचन करवाने का निर्णय लिया गया। इस कार्यक्रम के लिए समाज सेविका श्रीमती कुन्ता शर्मा, श्रीमती कलावती शर्मा ने पाँच-पाँच हजार रुपए विद्यालय को दिए।

श्रीकान्हा राम माली ने आचार्य के प्रवचनों से प्रभावित होकर अपनी रोडी, गोबर अतिक्रमण हटाने का संकल्प लिया। कई अन्य लोगों पर भी इसका प्रभाव पड़ा।

ब्लॉक प्रारम्भिक शिक्षा अधिकारी, मालपुरा की अध्यक्षता में तथा जिला परिषद सदस्य श्री रामदेव बैरवा के साथ अतिक्रमण के स्थान पर चारदीवारी निर्माण पर चर्चा की गई। जिला परिषद सदस्य द्वारा इस हेतु एक लाख रुपए तथा ग्राम पंचायत गनवर द्वारा तीन लाख रुपए चारदीवारी एवं नाला निर्माण के लिए दिए गए। जिसकी कार्यकारी एजेन्सी ग्राम पंचायत गनवर थी।

नवनिर्मित की जा रही चारदीवारी को जाट समुदाय के एक व्यक्ति द्वारा तोड़ दिया गया जिसपर मीनामंच सचिव श्रीमती सुनीता चन्द्रावत, अध्यक्ष श्रीमती रेणुबाला, सरपंच श्रीमती मोहनी देवी एवं महिला समूह अध्यक्ष श्रीमती कलावती सैनी ने तोड़ने वाले व्यक्ति को विद्यालय में बुलाया, समझाया। आपसी समझाइश के बाद तोड़ने वाले व्यक्ति ने पश्चाताप किया और अपने खर्चे से तोडे़ गए हिस्से को दुबारा से निर्मित कराने का संकल्प किया एवं पूरा भी किया।

यह विद्यालय अपने अन्‍य अध्यापक साथियों के सामूहिक प्रयासों से समाज और विद्यालय में मधुर सम्बन्ध स्थापित करने में उत्तरोतर वृद्धि कर रहा है। ग्राम रामपुरा ही नहीं अपितु गनवर ग्राम के गणमान्य व्यक्तियों द्वारा भी इस विद्यालय को सुन्दरतम बनाने एवं शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने के लिए तन-मन-धन से सहयोग दिया।

उपरोक्त सहयोग से विद्यालय एवं समाज का सामंजस्य परिलक्षित होता है जो कि किसी भी समाज एवं विद्यालय के विकास के लिए सर्वप्रकार से लाभप्रद है तथा इससे समूह मन की भावना का विकास भी होता है।

राजकुमार शर्मा                                        

  • संस्कृत माध्यम से व्याकरणाचार्य (नव्य व्याकरण)
  • संस्कृत एस.टी.सी., शिक्षा शास्त्री (राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली द्वारा संचालित राजीव गाँधी राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान श्रंगेरी, कर्नाटक)
  • 1998 से शिक्षक हैं।
  • राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, रामपुरा बास गनवर

उपलब्धि

  • राज्य स्तरीय संस्कृत प्रतियोगिता जयपुर में विजेता, महामहिम राज्यपाल द्वारा पुरस्कृत
  • FPAI द्वारा राजस्थान का प्रतिनिधित्व उत्तर प्रदेश में (बालिकाओं के अधिकार विषय पर)
  • जिला स्तरीय शिक्षक सम्मान समारोह 2006 में संस्‍कृत विषय हेतु पुरस्कृत

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। राजकुमार शर्मा वर्ष 2009-10 में 'शाला प्रबन्‍धन एवं नेतृत्‍व'  के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने राजकुमार शर्मा से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम राजकुमार शर्मा, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

om parkash sharma का छायाचित्र

वास्तव में जन मानस को प्रेरित कर विद्यालय व शिक्षा जगत में राजकुमार जी का प्रयास सराहनीय है अपने सहकर्मियों व स्थानीय लोगों के विश्वास को जीतकर किए गए कार्यों के लिए मैं इन्हें बधाई देता हूँ ।

pramodkumar का छायाचित्र

भाई राजकुमार जी का प्रयास दिखाई देता है ।यदि ऐसी सोच हर शिक्षक की हो जाये तो वि़द्यालयों का रूप बदलते देर न लगे ा

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