किसी 'खास' की जानकारी भेजें। राजकीय प्राथमिक विद्यालय,माता जी का फला

प्रतापगढ़ शहर से चित्तौड़ की ओर लगभग 35 किलोमीटर चलने के बाद धोलापानी थाना क्षेत्र आता है। यही सड़क के बाएँ ओर जंगल की तरफ एक कच्चा रास्ता जाता है। इस रास्ते के इर्दगिर्द थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लगभग 20 से 25 घर बसे हुए हैं। लगभग 2 किलोमीटर चलने के बाद एक टेकरी पर स्थित है, राजकीय प्राथमिक विद्यालय, माता जी का फला, जो स्थानीय बच्चों को शिक्षा की सहज उपलब्धता के लिए 21 जनवरी 2013 को खोला गया। पहले इस बस्ती के बच्चों को दूर स्थित स्कूल में अध्ययन के लिए जाना पड़ता था, जिस कारण सभी बच्चे विद्यालय नहीं जा पाते थे।

विद्यालय में दो कक्षाकक्ष, एक बरामदा और एक प्रधानाध्यापक कक्ष बना हुआ है। भवन को ठीक से रंगरोगन व साजसज्जा की हुई है। इसके बगल में एक रसोईघर बना हुआ है, जहाँ मध्याह्न भोजन बनता है। इसके बाईं ओर थोड़ी दूरी पर बालक-बालिकाओं के लिए शौचालय बने हुए हैं। विद्यालय की चारदीवारी अभी अधूरी है लेकिन चारों ओर लगे हुए पेड़ इस कमी को काफी हद तक पूरा करते हैं। विद्यालय से देखने पर चारों ओर पेड़ नजर आते हैं। सामने की ओर कहीं-कहीं पेड़ों की ओट के कुछ घर दिखाई देते हैं। वहीं विद्यालय के पीछे एक टेकरी पर देवस्थान (धार्मिक स्थल) बना हुआ है, जिसे स्थानीय लोग माता जी का फला कहते हैं।

लगभग 20-25 घरों की आबादी होने के बावजूद भी इस विद्यालय में वर्तमान में 92 बच्चों का नामांकन है तथा औसत उपस्थित 85 से 90 के बीच रहती है। इसका कारण विद्यालय के शिक्षकों (श्री भोपराज टांक और श्रीमती नीता नंदावत) के द्वारा किये जा रहे सतत प्रयास हैं। जब शिक्षकों से इसके कारणों पर बातचीत की गई तो उन्होने अपने द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रियाओं के बारे में बताया।

जनवरी 2013 में विद्यालय आरम्‍भ होने पर शिक्षक श्री भोपराज टांक विद्यालय में आए थे। उस समय इस बस्ती से लगभग 35 बच्चों का नामांकन पास स्थित गाँव के विद्यालय में था। लेकिन लगभग 12 से 15 बच्चे ही नियमित विद्यालय जाते थे। ऐसे में शिक्षक द्वारा सबसे पहले समुदाय में सम्पर्क करते हुए बच्चों को विद्यालय भेजने हेतु अभिभावकों से निवेदन किया गया। एक-दो बार के प्रयास से यह सम्‍भव नहीं था, ऐेसे में शिक्षक प्रतिदिन समुदाय में सम्पर्क करते।

आरम्भ में उनके सामने कई चुनौतियाँ भी आईं, उदाहरण के लिए अभिभावकों का लडकियों को विद्यालय ना भेजना, क्योंकि वे घर पर छोटे बच्चों को रखती थीं या फसल के समय बच्चों को विद्यालय न भेजना इत्यादि। ऐसे में शिक्षक ने छोटे बच्चों को साथ स्कूल लाने की इजाजत दे दी। इसके साथ उन्होंने कुछ दूसरी प्रक्रियाएँ भी अपनाईं । विद्यालय में अभिभावकों को बुलाकर उनसे बच्चों के द्वारा किए जा रहे काम को साझा करना, उनसे शिक्षा के महत्व पर बात करना, स्कूल में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करना और लड़के व लड़कियों को समान अवसर देते हुए दोनों को समान रूप से पुरस्कार वितरण करना, सभी बच्चों को मंच पर बोलने के अवसर देते हुए सभी को पुरस्कृत करना आदि।

लगातार प्रयासों से धीरे-धीरे बच्चे नियमित आने लगे, लेकिन बच्चों व अभिभावकों के उत्साह को बनाए रखने के जरूरी था कि विद्यालय में बच्चों के साथ बेहतर शिक्षण हो। इसके लिए भी उन्होंने निबंध लेखन, चित्रकला आदि गतिविधियों को शिक्षण में स्थान दिया। पाठ्यपुस्तक के अलावा अन्य शिक्षण सहायक सामग्रियों का उपयोग करते हुए शिक्षण कराना। इन प्रयासों को तब और गति मिली जब जुलाई 2014 में विद्यालय में शिक्षिका नीता नंदावत को नियुक्त किया गया। नीता जी ने अँग्रेजी और गणित विषय में प्रयास आरम्भ किए तो भोपराज जी ने हिन्दी और पर्यावरण अध्ययन पर। कुछ दिशा इस दौरान शिक्षा विभाग द्वारा आयोजित शिक्षण प्रशिक्षणों से भी मिली। इन प्रयासों से धीरे-धीरे बच्चे अपने कक्षा स्तर की अपेक्षित क्षमताओं व दक्षताओं पर पहुँच गए।

बच्चों की प्रगति का एक महत्वपूर्ण प्रार्थना सभा का रोचक व विविधतापूर्ण होना भी है। शिक्षकों ने इसे बेहतर बनाने के लिए नियमित किए जाने वाले कार्यों के अलावा उसमें कुछ गतिविधियाँ भी जोड़ी ताकि बच्चे अधिक से अधिक भागीदारी करें। उन्होंने प्रार्थना, गायत्री मंत्र, प्रतिज्ञा, राष्ट्रगान के अलावा सामाजिक कुरीतियों (धूम्रपान, मद्यपान आदि) पर चर्चा, अखबार वाचन, प्रश्‍न पूछना, पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता के मुद्दों पर बातचीत आदि को भी जोड़ा। इससे बच्चे खुलकर अपनी बात रखने व प्रश्‍न पूछने के प्रति प्रेरित हुए व उन्होंने अभिभावकों के सामने भी कुछ मुद्दों पर अपनी बात रखनी शुरू की है। इसका एक उदाहरण कुछ इस प्रकार है। स्थानीय समुदाय में शराब पीने का प्रचलन है और अभिभावक अक्सर बच्चों से शराब या धूम्रपान की सामग्री मँगवाते हैं। एक दिन एक बच्चे से उसके पिता ने शराब लाने को कहा तो बच्चे ने शराब न लाने व उसके पीने से होने वाले नुकसान की बात कही। इस पर उसके पिता ने उसे मारा तो वह बच्चा पास स्थित धोलापानी थाने में चला गया। बच्चे की बात सुनने के बाद थाने से एक सिपाही उसके साथ गाँव गया और उसके पिता से कहा कि बच्चा ठीक कह रहा है और उसकी बात सुननी चाहिए। इसके बाद उसके पिता ने बच्चे पर कभी दबाव नहीं बनाया और शराब पीनी भी कम कर दी। वर्तमान में यह अभिभावक नियमित विद्यालय में आता है और बच्चों की प्रगति के बारे में जानकारी लेता है।

इन प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि आसपास के गाँवों से भी बच्चे इस विद्यालय में प्रवेश के लिए आने लगे। इसके साथ समुदाय के कुछ लोगों के रिश्‍तेदारों के बच्चे भी उनके पास रहते हुए इस विद्यालय में पढ़ रहे हैं। सभी बच्चे (लड़के-लड़कियाँ) प्रतिदिन विद्यालय आते हैं, फसल कटने के समय बच्चों को विद्यालय से गायब हो जाने जैसी समस्या इस विद्यालय में देखने को नहीं मिलती। शिक्षकों से इसका कारण पूछने पर वे कहते हैं कि 'यदि बच्चों को विद्यालय में अच्छा वातावरण और पढ़ने को मिलेगा तो वे नियमित आते हैं।'


वीरेन्‍द्र कुमार, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, जयपुर, राजस्‍थान।

 

 

 

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