किसी 'खास' की जानकारी भेजें। रतन लाल चौधरी : टी.एल.एम. बिन सब सून

अपने प्रयासों की पूर्ण सफलता के प्रति मैं आश्वस्‍त हूँ। फिर भी मेरी कोशिश रहती हैं मैं  और बेहतर कर सकूँ। मेरे लिए बाल-हित सर्वोपरि हैं। मैं चाहता हूँ इसे और अधिक बालोपयोगी, व्यवस्थित एवं नियमित बना सकूँ। पर्याप्त टी.एल.एम.  निर्माण हो, उसका सदुपयोग हो, जो बालकों के शैक्षिक उन्नयन में सहायक हो ।

मेरा विद्यालय और मैं

मेरा विद्यालय टोडारायसिंह तहसील के दूरदराज के गाँव - सीतारामपुरा धाकड़ान में स्थित है। गाँव में कुल 25 परिवार हैं। गाँव में अधिकतर लोग खेती एवं पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हैं।

यह विद्यालय सन् 1997 से स्थापित है जिसमें प्राथमिक स्तर कक्षा 1 से कक्षा 5 तक संचालित है। अपूर्ण चार दिवारी के बावजूद भी 100 पेड़-पौधों वाली शाला वाटिका से विद्यालय शोभायमान है। सन् 2000 से मैं इस विद्यालय में कार्यरत हूँ। विद्यालय में शुरू से हम दो अध्यापक हैं। मेरे साथी अध्यापक श्री पारिक बी.कॉम.,बी.एड. हैं एवं परिश्रमी, मिलनसार तथा अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित है। कक्षा 1 से कक्षा 5 तक गणित एवं पर्यावरण अध्ययन विषय के शिक्षण कार्य के साथ प्रधानाध्‍यापक के समस्त कार्य एवं अभिभावक सम्पर्क कार्य शुरू से मेरे जिम्मे हैं। गणित एवं अँग्रेजी विषय के शिक्षण कार्य के साथ-साथ अन्य हिस्से के सहशैक्षिक, भौतिक, लेखा एवं अन्य कार्य साथी शिक्षक के जिम्मे हैं। हम दोनों में अच्छा तालमेल है। आपसी सहयोग, कार्य विभाजन एवं शाला हित में हम हमेशा तत्पर हैं। शाला के बालकों से हमें भरपूर स्नेह एवं सम्मान प्राप्त है। हमारा अभिभावक सम्पर्क भी अच्छा है।

विगत 5 वर्षों से शाला का नामांकन औसत 72 है। विगत सत्रों की नामांकन स्थिति एवं ठहराव दर शत प्रतिशत रही है। इस गाँव की जनसंख्या 240 है। इस सत्र में विद्यालय का कुल नामांकन 57 है जिनमें 43 बालक-बालिकाएँ समीपस्थ गाँव-पन्द्राहेड़ा से 2 किमी. पैदल चलकर इस विद्यालय में पढ़ने आते हैं। जबकि वहाँ एक माध्यमिक एवं एक प्राथमिक विद्यालय है। हर साल आधे से अधिक बालक-बालिकाएँ अतिरिक्त नामांकन उपलब्धि स्वरूप समीपस्थ ग्राम-पन्द्राहेड़ा से आते रहे हैं।

मैंने विद्या भवन कला संस्थान उदयपुर से पेपरमेशी (मिट्टी-कुट्टी कार्य) एवं कताई बुनाई उद्योग विषय के साथ चित्रकला में दो वर्षीय डिप्लोमा भी किया हुआ है। जिससे चित्रकला, मिट्टी-कुट्टी का कार्य यथा खिलौने, मूर्ति,प्लास्टर ऑफ पेरिस कार्य, मॉडल्स, मुखौटे, कट आउट्स, फ्लेश कार्ड्स के साथ वस्त्र निर्माण प्रक्रिया में मेरी रुचि रही है। इस विद्यालय में सेवा देने से पूर्व जिन दो विद्यालयों में मैंने शिक्षण कार्य किया है वहाँ भी मेरा प्रयास अपनी कला एवं कौशल को सम्बन्धित विषय वस्तु से जोड़कर बालक-बालिकाओं तक पहुँचाने का रहा है। मैं चाहता हूँ मेरे बालकों को विषय वस्तु का समग्र ज्ञान हो। मैं उनके हस्तलेख पर विशेष ध्यान देता हूँ। मेरा प्रयास उन्हें सहज, रूचिपूर्ण, आनन्ददायी, गुणात्मक एवं जीवनोपयोगी शिक्षा देने का रहता है। कला-नैतिक एवं समाजोपयोगी शिक्षा से उन्हें जोड़ने की मेरी सर्वथा कोशिश रहती है।

बातें जो मुझे परेशान करती थीं

विद्यालय में दो ही कक्षा-कक्ष हैं। दो शिक्षक एवं पाँच कक्षाओं का शिक्षण कार्य मुझे एवं मेरे बालकों दोनों के लिए कठिनाई पूर्ण था। जब मैं किसी एक कक्षा को पढ़ाता, दूसरी कक्षा में व्यवधान होता। बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हटकर कहीं ओर ही रहता। कक्षा-कक्ष का वातावरण भी उबाऊ होता। बच्चे शोर मचाते क्योंकि उनके पास कोई कार्य नहीं होता।

केवल पाठ्य पुस्तक के माध्यम से शिक्षण कार्य करवाकर गृह कार्य देना एवं जाँच लेना, प्रश्नोतर सुनना इतने भर से न मैं सन्तुष्‍ट था न ही साथी अध्यापक। बालकों को कक्षा में करवाई जाने वाली गतिविधियों जैसे कहानी, गीत, चर्चा, प्रयोग, खेल, अभिव्यक्ति, संवाद, अभिनय आदि के लिए अवसर नहीं था। कक्षा-कक्ष की अन्तःक्रियाएँ नहीं दिखाई देतीं।

किसी कक्षा को अनुशासित रखने के लिए बड़ी आयु की बालिका या बालक को खड़ा कर देते तो वह बालकों को डाँट-पीटकर या उनके नाम शिकायत करने के लिए लिखकर डराता। बालक, बालिकाओं से अलग समूह में नजर आते। बालिकाएँ भी कक्षा-कक्ष में, मध्यान्तर या खेल सत्र में अलग समूहों में रहतीं।

बालकों में भय व झिझक प्रकट होती थी। बालक शाला आने में आना-कानी या बहाने बाजी करते। इन सब बातों को महसूस कर मुझे आत्मग्लानि या पीड़ा होती थी। मुझे लगता मैं अपने कार्य को ढंग से नहीं कर पा रहा हूँ।

कभी-कभार तो अभिभावकों की ओर से शिकायतों का सामना करना पड़ता था। बालक शाला से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात नहीं कर पाते। उनके कार्य व्यवहार से भी मुझे अच्छा नहीं लगता था। मेरे विद्यालय में समीपस्थ गाँव-पन्द्राहेड़ा से अभिभावक उन्हीं बच्चों को प्रवेश दिलाते जो शरारती, उद्धण्ड, अनियमित या पढ़ाई में कमजोर होते। कभी-कभी तो बेहद कमजोर शैक्षिक स्तर वाले बालक-बालिकाओं को प्रवेश दिलाते। उनकी मान्यता थी कि अगर अपने पास-पड़ोस के बालकों से बिछुड़कर सीतारामपुरा जाएगा तो रोजाना आने-जाने एवं एकाकीपन के कष्ट से उसमें बदलाव आएगा। बच्चों में किसी भी प्रकार से यथा शिक्षा, खेल,सफाई आदि का अभाव था। सीटीएस सर्वे के अनुसार लक्षित नामांकन से विद्यालय पिछड़ा हुआ था अतः अतिरिक्त नामांकन उपलब्ध करना भी आवश्यक था। मेरे स्वयं के पुत्र व पुत्री का शैक्षिक स्तर भी कमजोर नजर आने लगा जो कि वहीं अध्ययनरत थे या स्वयं मेरी कक्षा के ही छात्र थे। अतः कोई उपाय जो कि इस समस्या से निजात दिला सके अत्यावश्यक था।

बदलाव की राह : बहुस्‍तरीय कक्षा शिक्षण

मैंने सोचा कि कोई नया बदलाव लाया जाए। आनन्ददायी शिक्षण से बालक कम पढ़े भले ही उनकी गति धीमी रहे पर जितना या कुछ उन्हें मिले उसे वे ग्रहण करें। वह उनके व्यवहार में व कार्य में झलके। बच्चे आपस में खुलकर बातचीत करें। भय मुक्त एवं बेझिझक शिक्षण में शामिल हों। उनका आत्मविश्वास बढे़।

प्रवेशोत्सव के दौरान एक दिन हमने बहुस्तरीय कक्षा शिक्षण पर चर्चा की। मेरे मनोभाव एवं मंसूबे से मेरे साथी को अवगत कराया। बातचीत के बाद लगा कि वो भी यही चाहते हैं। अतः हमने इसी शिक्षण प्रक्रिया को अपनाकर सभी कक्षा, विषय एवं पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर समय सारणी बनाई।

जिसमें प्रार्थना, मध्यान्तर एवं अन्त में खेल सत्र का समय रखा। सुबह के सत्र में कक्षा1,2,3 को दो समूहों में बाँटकर मैं गणित व पर्यावरण अध्‍ययन पढ़ाता। मेरे साथी अध्‍यापक कक्षा 4,5 को दो समूहों में हिन्‍दी व अँग्रेजी पढ़ाते। मध्‍यांतर व खेल सत्र के बीच मैं कक्षा 4,5 को गणित व पर्यावरण अध्‍ययन पढ़ाता। साथी अध्‍यापक कक्षा 1,2,3 को हिन्‍दी व अँग्रेजी पढ़ाते।

हमने कक्षा 3,4,5 से होशियार बच्चों को प्रेरक साथी बनाया। उनकी एक सूची तैयार कर दीवार पर लगाई। जिस प्रकार घर में बड़े भाई-बहिनों के साथ छोटे भाई-बहिन अध्ययन करते हैं तो इसका लाभ दोनों पक्षों को मिलता है। अनुसरण द्वारा बालक सहजता से एवं अच्छा सीखते हैं। इसी बात को ध्‍यान में रखकर हमने विद्यालय में इसे आजमाया। इस कार्य हेतु अन्य बालक-बालिकाओं का भी सहयोग लिया जाता है। उन्हें भी प्रेरित किया जाता है। प्रेरक साथी को कार्य हेतु प्रोत्साहित किया जाता है इस प्रकार स्वस्थ प्रतिस्पर्द्वा उनके मध्य हो।

शिक्षण अधिगम सामग्री का निमार्ण

बहुस्तरीय कक्षा शिक्षण में महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षण अधिगम सामग्री(टी.एल.एम.) का रहा है। इसके लिए विद्यालय विकास एवं प्रबन्धन समिति के सदस्‍यों से विचार विमर्श के बाद टी.एल.एम. निमार्ण समिति गठन किया। इसमें प्रेरक साथी, साथी अध्यापक एवं मेरे साथ कुछ और बालक-बालिका जिन्होंने इस कार्य में रूचि दिखाई को शामिल किया गया। कार्यशाला में योजनानुसार कक्षा एवं विषयानुसार निर्माण हेतु टी.एल.एम. निश्चित की ।

निर्माण कार्य में जहाँ ड्राईंग या निर्माण की विशेष विधि की आवश्यकता होती उस कार्य को मैंने किया। अन्‍य कामों में साथी अध्यापक एवं प्रेरक शिक्षार्थियों का पूर्ण सहयोग मिला।

एक ही कक्षा-कक्ष में एक ही समय विभिन्न विषय पढ़ाए जाते हैं। विषयवार बहुत से ऐसे शिक्षण बिन्दु हैं जो कि कक्षा के स्तर अनुसार किसी दूसरी कक्षा के पाठ्य क्रम में भी शामिल हैं। जैसे भोजन,आवास,संख्या ज्ञान,भिन्न आदि जो कि कक्षा एवं विषय वार अलग हैं। अत:एक कक्षा-कक्ष में बैठकर दो समूहों में अध्ययन कराते समय समान शिक्षण बिन्दु का चयन किया गया जो कि दोनों कक्षाओं के लिए लाभप्रद हों। ऐसे में बड़ी कक्षा को अध्ययन कराते समय छोटी कक्षा के लिए पाठ की तैयारी होती एवं छोटी कक्षा को पढ़ाते समय बड़ी कक्षा के लिए। दोहरान कार्य के लिए विषयवार ऐसे शिक्षण बिन्दुओं की सूची मैंने तैयार की ।

प्रति सत्र मिलने वाली टी.एल.एम. राशि से कुछ रेडीमेड सामग्री खरीदी। कुछ कच्ची सामग्री जैसे बकरम,थर्माकोल, हार्डबोर्ड, कार्ड शीट, ड्राईंगशीट, गुब्बारे, मोमबत्ती गेंद आदि भी खरीदी। टी.एल.एम. निमार्ण कार्यशाला आयोजन से पहले समिति सदस्‍यों से बातचीत की गई। कार्यशाला शाला स्तर पर अनुकूल समय पर की गई । टी.एल.एम. निर्माण हेतु वेस्ट मेटेरियल (जैसे चूड़ी, मटकी,तार, फ्यूज बल्ब,डिब्बे, ब्रश आदि) के संकलन में सभी बच्चों ने रुचि दिखाई। बच्‍चों ने ऐसी सामग्री का संग्रहण करके उससे कार्यशाला की तर्ज पर स्वविवेक एवं स्व प्रेरणा से टी.एल.एम. या अन्य उपकरण या वस्तु बनाईं।

कार्यशाला में अन्य बच्चों का भी पूरा ध्यान रखा गया। हम चाहते थे सामग्री तैयार होने तक, उसे चिपकने, सूखने या प्रदर्शन या उपयोग होने तक उसे कोई न छुए। उसे क्षतिग्रस्त होने से बचाना भी आवश्यक होता। हालाँकि मेरी कोशिश रहती है मेरे बच्चे जिज्ञासु हो उनकी जिज्ञासाएँ शान्त करके मुझे तसल्ली मिले। कार्यशाला का आयोजन, इस कार्य का लेखा-जोखा रखना, टी.एल.एम. को व्यवस्थित करना, उसका वर्गीकरण करना आदि मेरे लिए एक अतिरिक्त कार्यभार था। पर चूँकि मेरी इसमें रूचि थी, मुझे किसी सम्मान या पारितोषिक का लालच नहीं था। यह मेरी स्वप्रेरणा से किया गया था। इस प्रयोग से मुझे आत्म संतोष था और मेरे परिश्रम के फल को प्राप्त करने का अवसर, जो मुझे मेरे बालकों में स्पष्ट झलकने लगा। समीपस्थ ग्राम पन्द्राहेड़ा से शाला आने वाले बच्चों में कई ऐसे बच्चे थे जिन्हें कार्य कुशलता पुश्तों से प्राप्त थी। जैसे कुम्हार, खाती, रेगर आदि। इन बच्चों के सहयोग से मुझे टी.एल.एम. निर्माण कार्य एवं उपयोग में सहुलियत मिली एवं अन्य बच्चों को विभिन्न पेशेवर जातियों के कार्य, कार्य प्रणाली, वस्तु निर्माण प्रक्रिया की समझ।

कुछ शिक्षण सामग्री प्रत्येक कक्षा एवं स्तर के लिए उपयोगी थी जैसे घर, मकान का मॉडल, त्यौहार पर्व के माहवार कलैण्डर जो कि थर्माकोल शीट या बकरम व हार्ड बोर्ड से बने थे। ये अधिक स्‍थायी थे। मुखौटे,खिलौने, चार्ट्स, फ्लेश कार्ड्स को अलग रखा गया। यह अधिक स्थायी नहीं थे, पर इनसे बालकों का ज्ञान बनता है इनके माध्यम से प्राप्त अधिगम जल्दी भूलते नहीं हैं। टी.एल.एम. निर्माण में मैंने कुछ तरीके दूरदर्शन के माध्यम से, पूर्व ज्ञान एवं कौशल से, डीपीईपी द्वारा शाला को प्रदत्त शिक्षण वर्धन मंजूषा एवं साथी अध्यापक जी से प्राप्त किया। शाला में उपलब्ध सामग्री के रख-रखाव के चार दिवारी के सहारे अलमारियॉं बनवाई गईं। सामग्री को कक्षा, विषय, पाठ्यक्रम अनुसार वर्गीकृत करके हेतु अलग-अलग अलमारी खण्डों में रखा गया।

टी.एल.एम. का उपयोग प्रवेशोत्सव, राष्ट्रीय पर्व या अन्य अवसरों पर भी किया जाता है। मुखौटे लगाकर संवाद विधा वाले पाठों को पढ़ाने से बालक-बालिकाओं को आनन्द भी मिलता है। उनमें झिझक दूर होती है पात्र अनुसार एकल अभिनय एवं मूक अभिनय करने का कौशल आता है।

हालाँकि टी.एल.एम. के उपयोग एवं रख-रखाव में पूरी सावधानी बरती जाती है परन्तु दीमक, चूहे एवं कबूतर कक्षा-कक्ष  में लगी हुई या रखी सामग्री को क्षतिग्रस्त कर डालते हैं। कच्ची सामग्री से निर्मित टी.एल.एम. की उम्र अगर कक्षा-कक्ष  में नियमित उपयोग हो तो अधिक नही होती। वर्षा या सीलन से भी इसके रंग, कागज, एडेसिव को नुकसान पहुंच ही जाता है। अत: प्रति वर्ष सामग्री का पुन:निमार्ण किया जाता है। आवश्यकतानुसार टी.एल.एम. कार्यशाला में निर्मित कर ली जाती है।

शिक्षा कार्य में टी.एल.एम. उपयोग से बालकों के शैक्षिक स्तर में कितना सुधार हुआ है इसकी जाँच की जाती है। प्रश्नोत्तर परीक्षा, गृह कार्य, मौखिक एवं लिखित अभिव्यक्ति के माध्यम से मूल्यांकन होता है। कक्षा-कक्ष  में विषयाध्यापक की गैर मौजूदगी में भी टी.एल.एम. के कारण उनके पास कुछ करके सीखने के अवसर प्राप्त हैं। पर्यावरण अध्ययन विषय में विशेष रूप से टी.एल.एम. उपयोग के अधिक अवसर एवं आवश्यकता है।

कुछ और बातें

बालकों को हीन भावना, भय, ईर्ष्या, कमजोरी का आभास नहीं होने दिया जाता। कक्षा-कक्ष की गतिविधियों में भाग लेने वाले प्रत्येक बालक-बालिका को उसके कार्य उपरान्त प्रशंसा एवं प्रोत्साहन मिलता है। चाहे वह धन्यवाद स्वरूप ही हो। यदि कारणवश त्रुटि, शरारत या दुरूपयोग नजर आता है तो उसे कार्य पश्चात् उसका मार्गदर्शन सहयोग या समझाईश दी जाती है। इसका भी ध्यान रखा जाता है कि कौन-सा बालक-बालिका किस स्तर पर एवं किस प्रकार कठिनाई महसूस कर रहा है। चूँकि मेरा विद्यालय ग्रामीण परिवेश में स्थित है अधिकतर बच्चों के अभिभावक निर्धन है फिर भी यथा संभव भ्रमण एवं अवलोकन के अवसर प्रदान किए जाते है। बालक खेतों या कच्चे रास्ते से होकर विद्यालय पहुँचते हैं अतः खेती, फसल, आवास, ग्राम्य जीवन को समझने के भरपूर अवसर उन्हें प्राप्त हैं।

मेरे विद्यालय के शिक्षण कार्य शैली की प्रशंसा भी मुझे सीतारामपुरा व पन्द्राहेडा दोनों गांवों में सुनने को मिली है। शिक्षित एवं अशिक्षित दोनों प्रकार के अभिभावकों की प्रतिक्रिया मेरा उत्साहवर्द्धन करती है।

हर वर्ष समीपस्थ ग्राम से हमारे विद्यालय की विभिन्न कक्षाओं में नामांकित करवाने के लिए उनके अभिभावकों से प्रस्ताव मिलते हैं। अग्रिम अध्ययन कक्षा 6 में प्रवेश लेने के बाद प्रतिवर्ष परीक्षा परिणाम में मेरे विद्यालय के बालक-बालिकाओं को शीर्ष स्थान कायम रहा है।

अपने प्रयासों की पूर्ण सफलता के प्रति में आश्वस्‍त हूँ। फिर भी मेरी कोशिश रहती हैं मैं इसे और बेहतर कर सकूँ। मेरे लिए बाल-हित सर्वोपरि हैं। मैं चाहता हूँ इसे और अधिक बालोपयोगी, व्यवस्थित एवं नियमित बना सकूँ। पर्याप्त टी.एल.एम.  निर्माण हो उसका सदुपयोग हो जो बालकों के शैक्षिक उन्नयन में सहायक हो ।

 
 

रतन लाल चौधरी

  • एम.ए.(राजनीति विज्ञान), बी. एड.
  • प्रधानाध्यापक
  • राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सीतारामपुरा धाकड़ान, ब्लॉक-टोडारायसिंह, जिला-टोंक, राजस्‍थान  

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। रतनलाल चौधरी वर्ष 2010 में ' शिक्षण अधिगम और कक्षा प्रबन्‍धन’ श्रेणी में चुने गए हैं। यह लेख पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। हम रतनलाल चौधरी,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं। 


 

 

17292 registered users
6659 resources