किसी 'खास' की जानकारी भेजें। युसूफ मोहम्‍मद : शिक्षा अधिकारी ऐसे भी होते हैं..

नाम युसूफ मोहम्मद, बी.ई.ई.ओ. प्रारम्भिक, ब्लॉक एवं जिला- चित्तौड़गढ़। पचपन पार की उम्र, दो बार हृदयाघात झेल चुके हैं पर जुनून है शिक्षा में सुधार लाने का। कंधे पर खिलौने और रंगबिरंगी पुस्तकों का झोला लिए पहुँच रहे हैं हर प्रशिक्षण केन्‍द्र पर। वे शिक्षकों को आदर्शवादी भाषण नहीं देते, भय नहीं दिखाते, बस कुछ ऐसी छोटी-छोटी बातें बताते हैं जो आसानी से की जा सकती हैं। आठ दिवसीय सी. सी.ई. आधारित शिक्षण प्रशिक्षण शिविर में आते हैं, लगभग दो घण्‍टे शिक्षकों से संवाद करते हैं। उनकी समस्याएँ भी धैर्य से सुनते हैं और फिर उनका परिचय कराते हैं - पाठ्यपुस्तकों से, अपने अनोखे अन्‍दाज में।

जून माह में आयोजित सीसीई आधारित 8 दिवसीय प्रशिक्षणों के दौरान तीन बार इनके सत्र में उपस्थित रहने का मौका मिला। हर बार नई बातें जानी। यह मेरा एक छोटा सा प्रयास है कि उनके द्वारा कही गई बातों को आप सबसे साझा करूँ।

19 जून 2015 को यू.पी.एस. आदर्श, चित्तौड़गढ़ में उनके द्वारा लिए गए सत्र की झलकियाँ :

सरकारी विद्यालयों में घटती नामांकन की समस्या से आज हम सभी शिक्षक परेशान हैं। प्राइवेट विद्यालयों से दिन-ब-दिन बढ़ती प्रतिस्पर्धा में हमारे पास पहली और दूसरी कक्षा में ठहराव सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। सरकारी विद्यालयों में इस बीमारी की जड़ यह है कि हमें पहली व दूसरी कक्षा को पढ़ाना नहीं आता। जब 6 साल का बच्चा स्कूल में आता है तो हम उसे स्लेट पर अक्षर लिखकर दे देते हैं कि इसे लिख!

बाल मनोविज्ञानी कहते हैं कि एक महीने तक बच्चे का हाथ किसी चीज को लिखने में सक्षम नहीं है, लेकिन आपने नीरस काम दे दिया। दो-तीन दिन तक ये सब देखकर बच्चा चला जाता है। उसे इस सबमें कोई रुचि नहीं, इसलिए बच्चे को सीधे पढ़ना लिखना न सिखाएँ।

दो काम करें;

  • पहला बहुत सारा सामान (शिक्षण सहायक सामग्री) लाएँ,
  • दूसरे किताब में जैसा लिखा गया है, वैसे काम करवाएँ।

शिक्षण सहायक सामग्री: वर्ष 2007 से 2012 तक 500 रुपये प्रति शिक्षक प्रति वर्ष शिक्षण सहायक सामग्री खरीदने हेतु दी गई थी। सामग्री या तो आई नहीं, या उसे इस्तेमाल नहीं किया गया। इस सामग्री को निकालकर इस्तेमाल करें, नक्शे चार्ट आदि को प्रदर्शित करें। अपना थैला खोलकर दिखाते हुए वे बोले, ‘बहुत सारा सामान चाहिए, जैसे- स्केल, पैन्सिल, रबर, प्लास्टिक के बॉल-बल्ला, गुब्बारे, छोटी कारें, स्टेन्सिल, रंगीन किताबें, वर्क-बुक, कुछ खिलौने आदि’।

 

ये सामान आप चाहें तो:

  • अपने किसी फंड से लाएँ,
  • यदि नहीं, तो जिनका वेतन 12000 रुपए है- वे 100 रुपया महीना, 20000 है वे 200 रुपए महीना, 30000 है वे 300 रुपए महीना इस हेतु स्कूल को दान दें।
  • अन्यथा दो डिब्बे रखो; एक विद्यालय में, एक घर में, जो आए उस व्यक्ति से दान देने को कहें।
  • अपने घर के बच्चों के खिलौने जो अब काम में नहीं आ रहे हैं, उन्‍हें लाइए।
  • येन केन प्रकारेण लाइए पर ये सामग्री लाइए, इसके बिना गुजारा नहीं।

जैसे एक मदारी खेल दिखाने आता है, एक डुगडुगी बजाकर, बाँसुरी बजाकर बुलाता है। पूरे टाइम जब तक वो खेल दिखाता है बच्चे तो क्या बड़े भी हिलते नहीं हैं। शिक्षण को ऐसा रुचिकर बनाने की जरूरत है।

किताबें : न आपने पढ़ी हैं न बच्चों को दिखाई, बस बैग में रख दीं, इनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इन किताबों का इस्तेमाल करें। एक पेज रोज पढ़ाएँ, उस पर जो लिखा है वो कराऍं। ‘रुनझुन’ हाथ में लेकर दिखाते हुए वे बोले, ‘इसमें 113 पेज हैं, एक्सट्रा पन्नों को हटा दें तो 100 दिनों में 100 पेज पढ़ाने हैं। कुल 16 पाठ हैं और सी.सी.ई. के अनुसार, ढाई महीने में केवल 4 पाठ पढ़ाने हैं, इतनी धीमी गति से पढ़ाना है। सबसे पहले ‘शिक्षकों के लिए’ पढ़िए जिससे आप ये जान पाएँगे कि ये किताब क्या सोचकर लिखी गई है और आपको इसका प्रयोग कैसे करना है।’

अपने काम की योजना ऐसे बनाएँ: पहले दिन से लेकर एक महीने तक कुछ लिखित काम न कराएँ, किताब में दी गई गतिविधियाँ कराएँ। बच्चे का हाथ कुछ लिखने के काबिल नहीं है। एक महीने तक बच्चे को सुनना, समझना और बोलकर बताना आना चाहिए। बच्चा सीखना तब शुरू करता है जब वो आपका दोस्त बन जाए। बच्चे से बातचीत करें। बच्चे शरमीले होते हैं और शुरू में कई बार पूछने पर बात का जवाब देते हैं। 15 दिन में वे स्कूल आना, बैठना और आपसे बातचीत करना शुरू करेंगे। बातचीत का अर्थ ये है कि आप उन्‍हें ये महसूस कराएँ कि आप उनके दोस्त हैं। गाँव का चित्र दिखाएँ और गाँव पर बात करें, हर बच्चा अपनी अलग कहानी सुनाएगा।

जब मई माह में नामांकन का पहला दौर चला तो मैंने ये प्रस्ताव किया कि जो नए बच्चे आएँ हैं, उन्हें एक शीट और मोम-कलर दे दें और जो करना चाहे करने दें। एक दिन हम सीसोदिया का सांवदा में एक स्कूल में पहुँचे। बच्चों को शीट और कलर दिए। उन्होंने दोनों तरफ चित्र बनाए।

कुल 8 बच्चों में पहला और दूसरा रैंक दिया।

कैलाश जो प्रथम आया था, उसे बुलाकर मैंने पूछा,

  • अठे आ, ये तू मांड्यो ?
  • हाँ। 
  • तू कई मांड्यो ?
  • मुं हाथ मांड्यो।

अब ध्यान से देखने पर उस चित्र में एक पंजे की आकृति उभरी। इस बच्चे ने अपनी हथेली रखकर पंजे की आकृति बनाई। लेकिन जब उसने दूसरों को आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाते देखा तो उस पंजे की आकृति पर रंगों से गोल-गोल कर दिया। हमने उस बच्चे को प्रथम स्थान इसलिए दिया कि उसने छोटे छोटे पैटर्न बनाए जिससे ये अनुमान लगा कि ये जल्दी लिखना सीख जाएगा। जो बड़े पैटर्न बना रहे हैं, उन्हें बड़े से छोटे पर आने में समय लगेगा।

दूसरे स्थान पर आए बच्चे से जब यही सवाल पूछे तो उसने कहा, मैं तो हाथी मांड्या और ढांढा रा सींग मांड्या। उसने कुछ आकृतियाँ ३ जैसी जिसमें उसका इशारा सींग की ओर था और कुछ ^ जैसी बनाई थीं। ये उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि बच्चों से बातचीत करें तो हर बच्चा अपनी एक अलग कहानी सुनाएगा। यदि मैं उस बच्चे से ये कहता कि तुमने क्या बनाया तो वो नहीं बताता। लेकिन जब मैंने उसकी भाषा में पूछा तो उसे लगा कि ये तो मेरे जैसा ही है, और जवाब भी दिया।

किताब के पहले पन्ने पर जो चित्र है, उसे खोलें। ‘मेरे गाँव’ पर बात करें। हर बच्चा अलग-अलग कहानी सुनाएगा। यहाँ हम उसे इसमें अपनी ओर से कुछ चित्र या अपना कुछ भी जोड़ने को कहें। बातचीत हिन्दी में नहीं बल्कि मेवाड़ी में करें जिससे वह यह सोचता है कि ये मेरे अपने हैं।

किताब में भी यही लिखा है कि भाषा कैसे सिखाएँ, उसे ज्ञात भाषा से अज्ञात भाषा कि ओर ले जाएँ।

किताब में आगे के चित्रों- खमनोर का बस स्टैंड, मेले कि मौज पर सिर्फ बातचीत करें जिससे कि वे खुल जाएँ और आपसे बातचीत करने लगें। फिर आती है एक कहानी, चित्र के आधार पर उन्हें कहानी सुनाएँ।

किताबें वर्कबुक की तरह हैं, अगर आप पढ़ा रहें हो तो ये काली रंगी होनी चाहिए। अगर साफ मिली तो इसका आशय यह है कि आप पढ़ा नहीं रहे हैं। आनन्‍दपोथी विद्यालयों में बहुतायत से हैं, वो वर्कबुक है, उसे भी रंग दें।

बच्चा एक सीधी लाइन नहीं बना पाता, लिखेगा कैसे? लिखने का अभ्यास करने हेतु, सबसे पहले आड़ी रेखा का पैटर्न बनाना सिखाएँ, रोज एक नया पैटर्न बनवाएँ। 15 दिन तक पैटर्न ही सिखाएँ, यही वैज्ञानिक तरीका है। पुराना तरीका छोड़ दें। 3 तरह कि कॉपी बनवाएँ, एक प्लेन, एक 2 लाइन वाली और एक 4 लाइन वाली। बादलों कि आकृति के साथ वर्षा रूप में सीधी खड़ी रेखा और तिरछी रेखाओं का अभ्यास कराएँ। यह काम करवा के रोज एक शीट उस के पोर्टफोलियो में लगा दें। बाज़ार में 150 रुपये में 500 कागजों की एक रिम आती है। रोजाना 20-25 कागज  दें तो भी ये एक महीने चल जाएगा।

सादा कागज और स्टाम्प पैड लेकर अँगूठे/ अँगुली के छाप से भी चित्र बनवाएँ। किताब में इनकी मदद से आकृतियाँ बनवाएँ। किताब में करीब 10 कविताएँ दी गई हैं, हावभाव के साथ इन का पाठ कराएँ।

अँग्रेजी की किताब में शिक्षकों के लिए पेज को पढ़ें, हर पेज के बारे में लिखा हुआ है, कि ये क्यों दिया गया है। पहले पेज पर कुछ चित्र दिए गए हैं जिनका हिन्दी और अँग्रेजी में एक ही नाम है, जैसे कार, जीप, बस, ट्रेन आदि। अँग्रेजी की किताब हिन्दी की एक कविता से शुरू होती है।

कविताओं का बहुत महत्व है हमारे लिए। सरकारी विद्यालय में एक बड़ा फर्क यह है कि प्राइवेट स्कूल का बच्चा पोयम सुनाता है जबकि सरकारी स्कूल का नहीं। जब बच्चा घर जाकर अभिभावक को कविता सुनाएगा तो सबको लगेगा की वह सीख रहा है। कहीं ढूँढने की जरूरत भी नहीं, किताबों में बहुत हैं।

नए सत्र से टाइम टेबल टीचर का अपना होगा। शिक्षक को पढ़ाने का तरीका बदलना होगा। एक महीने तक:

पहले 2 पीरियड – कविता सिखाएँ।  

2 पीरियड- परिचय देना सिखाएँ

2 पीरियड- पैटर्न बनाना सिखाएँ

आखिरी 2 पीरियड- खेल खिलाएँ।

सी.सी.ई. कहता है कि हर शिक्षक के पास अपनी सुविधा के अनुसार टाइम टेबल होगा। शिक्षक ये नोट करेंगे कि बालक में क्या परिवर्तन आएँगे।

बच्चों को हिन्दी और अँग्रेजी में अपना परिचय देना सिखाएँ। चार लाइन का परिचय 2 महीने में सिखाना है। एक महीने तक पहली से पाँचवी तक के सभी बच्चों को एक साथ ये सब कराएँ। जैसे-

  • मेरा नाम रेणु है।
  • My name is Renu.
  • मैं 6 साल की हूँ।
  • I am 6 years old.
  • मैं कोटा में रहती हूँ।
  • I live in Kota.
  • मुझे आइसक्रीम पसन्‍द है।
  • I love icecream.

युसूफ जी “आ आ लल्ला” का रुचिपूर्ण प्रस्तुतीकरण करते हुए शिक्षकों को इसे सिखाने के तरीके बताते हैं जिसमें दोना और रसगुल्ला का समावेश करना भी शामिल है। इस प्रक्रिया में वे बेसलाइन व स्तरीकरण करने का भी सुझाव देते हैं।

अँग्रेजी की किताब में पहली कविता का एक शब्द “fist” लिखते हुए जब उन्होंने शिक्षकों से इसका अर्थ पूछा तो शांति छा गई। उन्होंने इस शब्द को बोर्ड पर लिखा और पूरी कविता को एक्शन सहित करके इन शब्दों के मायने बताए। इस किताब के माध्यम से हमें सिर्फ इन शब्दों कि पहचान सीखनी है, लिखना नहीं है।

हिन्दी की किताब में “चक चक चइया घूम रहा मोटर का पहिया” के माध्यम से मोटर शब्द कि पहचान करना सिखाते हुए ढेर सारी गतिविधियाँ कराते हुए फिर उसे लिखने का अभ्यास करना बताया। अगले पाठ में रेल लिखना सिखाते हैं। हर पाठ में एक शब्द सिखाते हैं। इस पद्धति से ही लिखना सिखाएँ।

माचिस के डिब्‍बी की सहायता से अक्षरों के 12 ताश बनाकर  म, क, न, मा, का और ना लिख लें और इनकी सहायता से शब्द बनाना सिखाएँ। इस तरह, बादल, खिड़की आदि शब्दों की सहायता से मात्राओं के ज्ञान का जिक्र करते हुए वे शुद्धि पर ज़ोर देते हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि छुट्टी की अर्जी में अकसर अध्यापक दिन को दीन लिख देते हैं। एक अध्यापिका जो सेवानिवृत्त होने जा रही हैं, उन्होंने son की जगह sun लिखा। पूरे सेवाकाल की समाप्ति पर यदि ऐसी गलतियाँ होती हैं तो प्रश्न चिन्ह लग जाता है। दूसरे आप सबको अधिकारियों से डरना नहीं चाहिए, खा नहीं जाएँगे वो। आपको उनसे घबराने की जरूरत नहीं है। वे कुछ पूछते हैं तो आप चुप हो जाते हो। ऐसे में आपको आता है फिर भी गलती हो जाती है। आप खुद कॉन्फिडेंट हों, और बच्चों को भी कॉन्फिडेंट बनाएँ।

गणित की किताब भी पैटर्न से शुरू होती है। आरम्‍भ में खेलने के लिए साँप-सीढ़ी है। पहले पाठ में पैटर्न है, एक में कलर करें एक खाली छोड़ें, फिर दो तीन चार और पाँच गिनकर 1 से 5 तक की संख्या का ज्ञान कराया जाता है।

इसके बाद क्रमबद्धता, आकार, छोटे बड़े आदि का ज्ञान कराया जाता है। शिक्षक पेज पढ़ने पर आप इसका महत्व समझ पाएँगे। पहली और दूसरी कक्षा की किताबों का प्रयोग जरूर करें तभी तीसरी कक्षा में जाने के लिए बच्चा तैयार हो पाएगा।

पहली कक्षा में गिनती 1 से 10 तक सिखाने के लिए कैल्कुलेटर, फीता, कैलंडर, विद्यालय में उपलब्‍ध माध्यम से सिखाएँ। सौ मानकों की गिनमाला में 10-10 के मनके दिखाते हुए 1 से 10 की गिनती, उलटी गिनती भी बताएँ। बच्चों से पूछें, 10 में से 1 गया तो क्या बचा। ऐसा करने पर आपको दो तरह के बच्चे मिलेंगे, जिन्हें अनुभव है वो तुरन्‍त उत्तर बताएँगे, जबकि कुछ गिन के बताएँगे, उन्हें अपने तरीके से करने दें। गणित के सवाल कैसे हल करने हैं, यह तरीका उन्हें शिक्षक नहीं बताएँ।

एक गेंद से कई खेल खेले जा सकते हैं। 5-5 की टीम बनाकर नियम बना लें। गेंद को दीवार पर फेंके और पकड़ें, हर बार गिनें और बोलें, चूक गए तो काउंट नहीं होगा। छोटे बच्चे नहीं कर पाएँगे क्योंकि उनका हाथ सधा हुआ नहीं है या बोलने में ध्यान चला जाता है। खेल सामंजस्य सिखाते हैं। इस तरह स्कोर लिख कर गिनती सिखाते जाएँ, हर टीम को अपने स्कोर की संख्या की पहचान तो हो ही जाएगी। गुब्बारे, गुल्ली-डण्‍डा, चम्मच-नींबू रेस, रुपए का हिसाब आदि पूछकर भी उसे संख्या और लम्‍बाई और मात्रा का मापन सिखाया जा सकता है। इस तरह खेल-खेल में बच्चों के साथ बहुत सारे कार्य किया जा सकते हैं।

बच्चों का हाथ सधा हुआ नहीं होता इसलिए स्टेंसिल की मदद से बच्चे लिख सकते हैं। 1-30 तक की गिनती को कैलेण्‍डर की सहायता से सुदृढ़ कर सकते हैं। इसके अलावा 10-10 रुपए मूल्य की सचित्र किताबें हैं जैसे- एनिमल्स, प्लांट्स, सब्जियाँ, पक्षी, गुड हैबिट्स, स्वतन्त्रता सेनानी, आल इन वन आदि, जिन्हें बच्चे देख सकते हैं, रंग भर सकते हैं, इनमें से देखकर चित्र बना सकते हैं।

एक अध्यापक सवाल करते हैं कि जहाँ अध्यापक एक ही हो, वहाँ इतना सब कैसे करें? एक ने पूछा, मैं तो हिन्दी पढ़ाती हूँ, बाकी विषयों के शिक्षक नहीं पढ़ाते तो क्या करें? इस सवाल के उत्तर में वे तरीका बताते हैं। अपनी बात को समेकित करते हुए वे कहते हैं कि “न तो आपको कक्षा को पढ़ाना है, न ही विषय को पढ़ाना है, आपको सिर्फ बच्चों की सीखने में मदद करनी है, आप बस इतना सा कर दो” ये संदेश यदि फील्ड तक पहुँच जाए तो सभी शिक्षक अच्छी तरह से काम कर सकेंगे और बच्चे सीख जाएँगे। ये बदलाव इतनी जल्दी नहीं आएगा, मेरा रिटायरमेंट होने तक ये बदलाव आएगा, 4 साल में सम्‍भवतया। वे अपने सत्र का समापन शायरी से करते हैं, कहते हैं हालत आप सबके बिलकुल विपरीत हैं-

ख्वाब पत्तों की तरह आँखों के दरख्तों से झड़ें हैं,

ज़िन्दगी के मोड़ पर हम एक ठूंठ से खड़े हैं,

कौन किस्मत की लकीरों को मिटा पाया है,

किस्मत के थपेड़े तो सब को सहने ही पड़े हैं।

किस्मत से टीचर बने हैं तो ये थपेड़े तो सहने ही होंगे। आगे वे कहते हैं,

अगर जिंदगी जलेबी की तरह गोलमोल हो ही गई है,

तो क्यों न इसे चाशनी में डुबोकर मिठास ले ली जाए।

जो 4 पंक्तियाँ पहले कहीं, उसके उलट 4 पंक्तियाँ कहूँगा-

जब भी कभी भी किसी ने भी गुलाबों की चाहत की है,

ये तय है उसे कांटों से जख्‍म खाने ही पड़े हैं,

चाँद मिलता नहीं सबको रोशनी के लिए,

कुछ को तो जिगर अपने जलाने ही पड़े हैं।

तो दुःखी होने की ज़रूरत नहीं है। पूरी दुनिया को बदलने की बजाय खुद को बदल लें। इसके साथ यह उम्मीद रखते हुए कि जो कुछ उन्होंने शिक्षकों को बताया उसका वे उपयोग करेंगे, वे कहते हैं, ‘आपके जीवन कि सफलता तब है कि जब आप बुजुर्ग हो जाएँ तो आपके शिष्य आपको पहचानकर पास आकर बात करें, सम्मान करें।’  

इस तरह लगभग दो घण्‍टे की चर्चा में पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले बच्चों को पढ़ाने के कारगर तरीके बताते हैं जिससे सभी शिक्षक सहमत भी होते दिखाई देते हैं। शिक्षा का अलख जलाए, बदलाव की उम्मीद लिए, साजो-सामान से भरा अपना झोला समेट के वे चल देते हैं, दूसरे प्रशिक्षण कक्ष की ओर...।


अम्बिका नाग, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन राज्‍य संस्‍थान, जयपुर, राजस्‍थान

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

यूसुफ मोहम्मद साहब का काम सराहनीय है। ऐसे अधिकारी होने से शिक्षकों का काम करने का हौसला बढता है‚ बधाई

pramodkumar का छायाचित्र

कई लेखों में मैंने अपने विचार रखें है भले ही संक्षिप्त हों। पर वह दिखाये नहीं जा रहे ‚ क्योंॽ यह तो पाठक के साथ अन्याय है।

namita89 का छायाचित्र

युसूफ भाई जैसे शिक्षक अधिकारी हर एक राज्य में हर एक स्कूल में आ जाये तो स्कूल सिस्टम काफी बेहतर तरीके से बढ़ सकते हैबधाई

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