किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मोहम्‍मद सगीर खान : आकांक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश

इस विद्यालय की स्थापना सन् 1962 में प्राथमिक विद्यालय सौलतपुरा के रूप में हुई थी। यह ग्राम पंचायत तहसील उनियारा में है। यह तहसील मुख्यालय अलीगढ़ से 8 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित है। यहाँ पर मीणा, बैरवा एवं मैरोठा समुदाय के लोग निवास करते हैं। मुख्य धन्धा खेती अथवा मजदूरी है। आठ-दस लोग सरकारी सेवा में हैं।

मैंने जनवरी 2003 में इस विद्यालय में कार्य ग्रहण किया। विद्यालय की गतिविधियों से अवगत हुआ और जो कुछ समस्याएँ महसूस कीं वे इस तरह से हैं-

  • प्रार्थना सभा का आयोजन न होना
  • बच्‍चों द्वारा गृह कार्य नहीं करना
  • बच्चों को अँग्रेजी पढ़ना न आना
  • विद्यालय का वातावरण रोचक न होना
  • विद्यार्थियों की खुलकर अभिव्यक्ति न होना
  • विद्यार्थियों का ठहराव कम होना
  • समुदाय से जुड़ाव का अभाव।

माता-पिता अपने बच्चों को जीवन की कला सिखाने, संस्कारी बनाने, वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने, ज्ञानवान बनाने और सामाजिक समरसता सिखलाने के लिए स्कूल भेजते हैं। वे बच्चों को अध्यापक को सौंपकर चिन्‍ता मुक्त हो जाते हैं। अतः हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अभिभावकों की आकांक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करें। मैंने इसी बात को ध्‍यान में रखकर प्रयास शुरू किए।

प्रार्थना सभा का आयोजन

यह कहा जाता है कि शुरुआत अच्छी हो तो अन्त भी अच्छा होता है। प्रार्थना बच्‍चों को ऊर्जावान, शक्तिवान और सामर्थ्‍यवान बनाती है। अनुशासन पैदा करती है। यदि हम सामूहिक रूप से कोई सन्‍देश देना चाहते हैं तो प्रार्थना सभा उसके लिए महत्वपूर्ण माध्यम है। प्रार्थना सभा में बच्‍चों को स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अवसर देकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सामान्‍य ज्ञान के प्रश्‍नोत्‍तर द्वारा उनकी जानकारी बढ़ाई जा सकती है। अतः मैंने प्रार्थना का नियमित आयोजन करवाने का निश्‍चय किया। प्रार्थना सभा को रोचक बनाने के लिए निम्‍नलिखित गतिविधियाँ करवाते हैं-

  • कक्षा 4 व 5 के विद्यार्थी रोजाना एक कहानी सुनाते हैं, उस पर चर्चा करते हैं। बच्चे  प्रेरक प्रसंग सुनाते हैं। कभी कभी शिक्षक भी सुनाते हैं।  
  • बच्चे हाजिरी बोलते समय यस सर के स्‍थान पर जिले का नाम बोलते हैं। हर बच्‍चे को एक जिले का नाम पहले से ही दे दिया जाता है।  
  • एक बच्चे को अध्यापक की भूमिका देकर कोई विषय उसे समझाने के लिए कहा जाता है। अन्‍य बच्चे प्रश्‍न पूछते हैं और अध्‍यापक की भूमिका निभा रहा बच्‍चा उनके जवाब देने की कोशिश करता है। कहीं अटकने पर अध्यापक सहायता करते हैं।
  • अँग्रेजी में बोलने के अभ्‍यास के लिए बच्चे प्रश्‍न पूछते हैं। वह किसी का नाम लेकर प्रश्‍न पूछते हैं। जैसे What is Your Name  और उत्तर देने वाला छात्र प्रश्‍न पूछने वाले का नाम लेकर जवाब देता है कि sonu my name is Reena और वह Ok Sit Down कहता है। Reena Thank You Sonu कहती है और Sonu You are Welcome कहता है।
  • कभी एकल अभिनय कराया जाता है। कभी दोहे बुलवाकर उनके अर्थ समझाए जाते हैं।

इन गतिविधियों से मैंने पाया कि बच्‍चे इनमें रुचि से भाग लेते हैं। कई बच्‍चे पूर्व तैयारी करके आते हैं।

एल.के.जी. का प्रारम्भ

सरकारी स्कूलों में वर्तमान समय में एल.के.जी. कक्षाओं का प्रावधान नहीं है। आँगनबाडि़यों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। लेकिन वहाँ ज्‍यादा कुछ हो नहीं पाता है। कभी-कभी ग्रामवासी छोटे बच्‍चों का नाम स्‍कूल में लिखने कि जिद करते हैं। पहली में भरती करना ठीक नही लगता। क्‍योंकि पहली में भर्ती करने पर अगले साल दूसरी फिर तीसरी मे आगे बढ़ाना होगा । जबकि बच्‍चे की आयु कम होती है। अतः इसका समाधान करने और बच्चों में सीखने के प्रति रोचकता और ललक पैदा करने के लिए एल.के.जी. का प्रारम्भ किया। एल.के.जी. कक्षा में बच्‍चों से उनके परिवार, खेत, पशुओं, भोजन आदि के बारे में बात करते हैं।  

अँग्रेजी पढ़ने के लिए प्रेरित करना  

जब मैंने कार्यग्रहण किया, तो पहली दूसरी कक्षा में अँग्रेजी नही पढ़ाई जाती थी। तीसरी, चौथी, पाँचवीं कक्षा के बच्चों को किताब पढ़ना नहीं आता था। इसलिए मैंने एल.के.जी. कक्षा से ही अँग्रेजी शिक्षण शुरू किया। छोटी-बड़ी ABCD  का ज्ञान मैंने रोचक तरीके से करवाया । पहली कक्षा में मिनिंग लिखकर देना शुरू किया। चार लाईन की कापियों में निर्धारित मापदण्डानुसार लिखकर दिया। निरन्तर गृहकार्य चेक किया। थोड़ा सा प्रयास करने पर भी उनको प्रोत्साहित किया। शरीर के अंगों के नाम याद करवाने के लिए खेल खिलाया। दिनों के नाम याद करवाने के लिए एक लकड़ी के गत्तों पर दिनों के नाम लिखे। पहले नाम बताए और फिर उन्हें रोज क्रम से जमवाया। प्रत्येक बच्चे से किताब की मिनिंग पढ़वाए। और नहीं आने पर प्यार से समझाया। कक्षा के अन्य बालक भी सहायता करते थे। रोचकता पैदा करने से यह लाभ हुआ कि कक्षा तीन के बच्‍चे किताब पढ़ लेते हैं। दूसरी कक्षा के बालक फलों के नाम , सब्जियों, शरीर के अंगों के नाम, जानवरों के नाम, पक्षियों के नाम, रंगों के नाम, अँग्रेजी में दस तक कि गिनती बिना देखे लिख लेते हैं और 100 तक की गिनती पहचान लेते हैं।

रोचक शैक्षिक वातावरण का निर्माण    

पहले बच्चे आधी छुट्टी के बाद भाग जाते थे। लड़कियाँ स्कूल कम आती थीं। उनसे घर के कार्य करवाए जाते थे। मैंने बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए अपने स्तर पर योजना बनवाई। जिससे शैक्षिक रूप से बच्चे नवाचार के माध्यम से रुचिकर शिक्षा प्राप्त कर सकें। इस हेतु मैंने भाषा शिक्षण की गतिविधियों में कुछ नवाचार किए जो इस प्रकार से हैं-

  • सभी बच्चों में सीखने की क्षमता होती है। केवल सीखने का माहौल तैयार करने की आवश्‍यकता होती है। मैंने कक्षा की दीवार पर दोहे लिख रखे थे। मैं दूसरी कक्षा के बच्चों को मैदान में ले जाकर एक शब्द बोलता और वे उसे ढूँढने जाते। जो बच्चा सबसे पहले शब्द खोजता उसे प्रथम घोषित किया जाता। उसकी पीठ थपथपाई जाती। अन्य बच्चों को भी प्रोत्साहित किया जाता था। इससे यह लाभ मिला कि बच्चों को जब भी मौका मिलता वे दीवार पर लिखे शब्दों को पढ़ने की कोशिश करते। इस गतिविधि ने खेल-खेल में बच्चों को शब्द पढ़ना सिखा दिया। हालत यह हो गई कि इधर शब्द बोला नहीं कि सभी बच्‍चे शब्‍द की दिशा में दौड़ पड़ते। मैं चॉक से दीवार पर नए शब्द लिखकर पढ़वाने लगा। मैंने पाया कि यदि विद्यालय की दीवारों पर छोटे-छोटे अनेक बोर्ड बना दिए जाएँ तो ये बच्चों के लिए उपयागी सिद्ध होंगे। बच्चे आते-जाते, खेलते-कूदते उन शब्दों पर ध्यान लगाएँगें और इस प्रयास में वे कब पढ़ना सीख गए, उन्हें भी पता ही नहीं चलेगा।
  • मैंने पाया कि कुछ बच्चे स्थानीय भाषा के प्रभाव के कारण कुछ शब्‍दों का गलत उच्चारण करते हैं। मैंने ऐसे शब्‍दों की लिस्ट बनाई। इनका सही उच्चारण करवाने  के लिए गोल घेरे में बिठाकर बच्चों से शब्‍द बुलवाए। जो बच्चे सही बोलते, वे बारी-बारी से गोले का चक्कर लगाते हुए सही शब्‍द का उच्चारण करते। जैसे बच्चा मिल्क मिल्क मिल्क मिल्क कहते हुए गोले का चक्कर लगाते हुए वापस अपने स्थान पर बैठता। इसे सुनते हुए शेष बच्‍चे भी सही उच्चारण करने लगते। फिर भी कोई बालक सही उच्चारण नही कर पाता, तो उसे धैर्य के साथ प्रोत्साहित करते हुए उसके दोष को दन्त तालू और जीभ का अभ्यास करवाकर दूर करने की कोशिश की जाती है।
  • एक लड़के और एक लड़की को खड़ा करके बारी-बारी से प्रत्येक से पूछते कि किसके लिए क्‍या बोला जाएगा He is a boy या She is a Girl । इसी तरह these /  those का प्रयोग this व that का प्रयोग करवाते हैं।  
  • बारी-बारी से प्रत्येक बच्चा यह खेल खिलाता है। वह बोलता है Tippy Tippy Top Top । फिर अन्‍य बच्चे बोलते हैं। फिर बच्चा बोलता है Touch Your Nose और बच्चे अपनी नाक पकड़ते हैं। जो बच्चा गलत अंग पकड़ता है वह आउट हो जाता है। इस तरह यह खेल चलता है।
  • कक्षा के वातावरण को और हल्का बनाने के लिए अँग्रेजी कविताएँ बुलवाते हैं।  एल.के.जी., कक्षा एक एवं दो के विद्यार्थी उचित आरोह-अवरोह और लय के साथ कविताएँ बोलते हैं। बच्चों से अलग-अलग कविताएँ बुलवाई जाती हैं।
  • अँग्रेजी शब्दों पर बातचीत की जाती है। जैसे Jeep। यदि तुम्हें जीप मिल जाए तो क्या करोगे। बच्चे कहते हैं चलाएँगे। अध्यापक तेज या धीरे, बच्चे तेज। गाड़ी स्टार्ट करते हैं ड्रॉ...। फिर कहते हैं और तेज। फिर बच्चे और तेज आवाज करते हैं। हम स्टॉप कहते हैं। बच्चे रूक जाते हैं। इस तरह Start और Stop के निर्देश को समझकर गतिविधि करने लगते हैं। आगे कुछ इस तरह का संवाद होता है। दीपेश यदि आपको जीप मिल जाए तो क्या करोगे। दीपेश चलाउगों। तेज या धीरे। बच्चा तेज। किस किसको बिठाओगे। देशराज, काली, तुल्स्या, बन्टी को। किसको नहीं बिठाओगे। नमोनारायाण को। क्यों! यो मोसू गैला में लडे़ छः। इस तरह बच्चों में अँग्रेजी सीखने के प्रति रोचकता पैदा करने का प्रयास किया।
  • कक्षा 4 व 5 के विद्यार्थियों से अपने साथियों के नाम बोर्ड पर लिखने के लिए कहा जाता है। वो खुशी से लिखने जाते हैं। गलती होने पर साथी मदद करते हैं। फिर कभी मम्मी का नाम, पापा का नाम, भाई का नाम, बहिन का नाम लिखवाया जाता है। इससे उनमें Splling उच्चारण के हिसाब से बनाने की आदत विकसित होती है और उनमें नए शब्द लिखने की उमंग पैदा होती है।
  • अँग्रेजी में एक छोड़कर एक संख्या बोलना जैसे पहला बच्‍चा two फिर दूसरा four तीसरा six बोलता है। जो गलत क्रम से बोलता है वह आउट हो जाता है। इससे English Counting का अभ्यास होता है।
  • विद्यार्थियों को परिवेश से सम्बधित विषय देकर अँग्रेजी में अधिक से अधिक शब्द लिखकर लाने के लिए कहा जाता है। जैसे School में क्या-क्या होता है या Postoffice, Forest आदि में।
  • आगे-पीछे की प्रत्येक दो कक्षाओं के बीच अँग्रेजी अन्ताक्षरी का आयोजन किया जाता है। पहले लड़कियों को बोलने का अवसर दिया जाता है, फिर लड़कों को। कभी-कभी समूह में कभी व्यक्तिगत रूप में पुरस्‍कृत भी किया जाता है। एक बार पुरस्‍कृत होने वाले को दुबारा नहीं किया जाता है। इस तरह से सभी को पुरस्‍कार प्राप्त करने का अवसर मिलता है। कई बार पुरस्‍कृत बच्‍चों को Judge के रूप में निर्णय करने का मौका दिया जाता है।

गृह कार्य

यह देखने में आया है कि बच्‍चे गृहकार्य नही करके लाते थे। मैंने उन्हें गृहकार्य का महत्‍व समझाया। मैंने नियमित रूप से जाँचना प्रारम्भ किया। एल.के.जी. कक्षा, प्रथम कक्षा, द्वितीय कक्षा, के बच्चे को उनके सीख स्तर के अनुसार गृहकार्य देकर चार लाईन की कॉपी में लिखने के लिए दिया जाता है। और उनकी कापी में  Good , Very Good आदि लिखकर प्रोत्साहित किया। अब बच्‍चे गृहकार्य नियमित रूप से करके लाते हैं और चेक करवाने के लिए मेरी प्रतीक्षा में रहते हैं।

भौतिक वातावरण को आकर्षक बनाना

विद्यालय बाउण्‍ड्री टूटी हुई थी। पेड़ लगाने पर जानवर खा जाते थे अथवा बच्चे नष्ट कर देते थे। इस हेतु ग्रामवासियों को साथ लेकर विकास अधिकारी उनियारा से सम्पर्क किया। उन्होंने 30,000/-रूपये शिक्षा मद से पास करके बाउण्‍ड्री पूरी करवाई। ग्रामवासियों के सहयोग से लोहे का फाटक लगवाया। पौधारोपण किया उसमें प्राकृतिक खाद का उपयोग किया। बीच-बीच में फूलदार पौधे लगवाए। विद्यार्थियों में पौधों का वितरण इस प्रकार किया गया था कि बच्चे समय-समय पर पानी डालना खाद डालना निराई-गुडाई का ध्यान रखते थे। उनमें होड़ लगी रहती है कि किसका पेड़ अधिक बढ़ रहा है। बच्चों के उत्साह को निरन्तर बनाए रखने के लिए बच्चों के साथ मैं ग्रीष्म अवकाश में भी प्रतिदिन दो बार पौधों को पानी पिलाने जाता था। दीपावली अवकाश में एक बार पानी पिलवाने जाता था ।

विद्यालय की दीवारों पर प्लास्टिक पेन्ट करवाया। उन पर दोहे, मानचित्र, प्रार्थनाएँ आदि लिखवाईं। इससे बच्चों में नक्‍शा देखना, दोहे, प्रार्थनाएँ याद होने जैसे सकारात्मक परिणाम मिले।

समुदाय से जुड़ाव

मैंने विकास की रीढ़ समुदाय को मानते हुए उसे विद्यालय से जोड़ने का प्रयास किया। इस हेतु मैंने निम्न प्रयास किए –

  • समय-समय पर बच्चों की प्रगति से अभिभावकों को अवगत करवाया।
  • ग्रामवासियों के कार्यक्रम, शादी समारोह, धार्मिक आयोजन और समय-समय पर होने वाले सुखद और दुखदः कार्यक्रम में भाग लिया।
  • विद्यालय को प्राथमिक से उच्च प्राथमिक एवं माध्यमिक में क्रमोन्नत करवाने में सहयोग लिया।
  • बच्चों को समय-समय पर पुरस्‍कृत करवाया। इस हेतु समुदाय की मदद ली।

इस तरह कार्य करने में बच्चों ग्रामवासियों एवं अधिकारी गण का पूरा सहयोग मिला और हमने निम्न सफलता अर्जित की-

  • जनवरी 2008 मे उच्च प्राथमिक मे कर्मोन्नत एवं सत्र 2009-10 में माध्यमिक में  कर्मोन्नत ।
  • बच्‍चे निसंकोच होकर अपने विचार व्यक्त करने लगे। प्रश्‍न पूछने लगे।
  • क्वालिटी एश्‍योरेंस में “ए“ ग्रेड।
  • शतप्रतिशत नामांकन व ठहराव।
  • अँग्रेजी विषय का स्तर प्राईवेट स्कूल से बेहतर है।
  • 3 बच्चों का आई.आई.टी.में चयन। एक को डाकघर में नौकरी दो का चयन  गणित के अध्यापक के रूप में।

इस तरह नवाचारों का प्रयोग करने से सार्थक परिणाम मिले हैं। यह कार्य मैं भविष्य में भी जारी रखना चाहूँगा। 

(उनके कुछ और प्रयासों के बारे में  एक शिक्षक के विचार,प्रयोग और अनुभव लिंक पर पढ़ा जा सकता है।)

 मोहम्‍मद सगीर खान

  •  अध्यापक
  •  राजकीय माध्‍यमिक विद्यालय,सौलतपुरा,उनियारा,टोंक,राजस्‍थान
  •  2009 में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से महामहिम उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मानित  

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। मोहम्‍मद सगीर खान वर्ष 2010-11 में बेहतर शैक्षणिक प्रयासों के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने मोहम्‍मद सगीर खान से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम मोहम्‍मद सगीर खान, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

ratanchoudhary का छायाचित्र

waakai आप खाश hain

om parkash sharma का छायाचित्र

पहली बात तो जो मेरे विचार मैं आती है कि अब विद्यालयों में प्रार्थना सभा में केवल प्रार्थनाएँ नही होती अपितु इनके साथ अनेक गतिविधियाँ करवाई जाती हैं अत: इसे प्रार्थना सभा के स्थान पर प्रात:कालीन सभा ही कहना समीचीन लगता है। मैं आपके सराहनीय प्रयासों की प्रशंसा करता हूँ कि आप प्रात:कालीन सभा में अनेक गतिविधियाँ करवाते हैं पर सभी गतिविधियों का लाभ तो तभी है जब छात्र इन्हें समझ के साथ करें। मैंने अनुभव से जाना है कि छात्र विद्यालय छोड़्कर जाते हैं लेकिन उन्हें उस राष्ट्रीय गीत और गान का अर्थ पता नहीं जिसे वे प्रतिदिन विद्यालय में गाते हैं।

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