किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मोहम्‍मद फहीम : धैर्य और ईमानदारी से मनचाही सफलता

बिना विचलित हुए लगातार धैर्य और ईमानदारी से कार्य करने पर मनचाही सफलता प्राप्त की जा सकती है।

मैं राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक पद पर कार्यरत हूँ। यह शाला टोंक जिले की पीपलू तहसील के ग्राम जैबाड़िया में स्थित है। जिला मुख्यालय से यह गाँव 18 किलोमीटर दूर बनास नदी के तट पर स्थित है। यहाँ गुर्जर, बैरवा तथा कीर समाजों के लोग निवास करते हैं। यहाँ की जनसंख्या लगभग 600 है विद्यालय का औसत नामांकन 100 के आसपास रहता है।

बनास नदी इस गाँव में मुख्य भूमिका निभाती है। जब बनास में पानी होता है तो यह पानी खेती के काम आता है। जब बनास सूखी होती है तो यहाँ से बजरी भरकर ले जाई जाती है। इस गाँव में पन्द्रह वर्ष की आयु से ऊपर के लड़कों का मुख्य लक्ष्य ट्रकों में बजरी भरकर पैसा कमाना होता है। इसके सपने वे आठ वर्ष की आयु से देखने लगते हैं। इस बात का अहसास मुझे तब हुआ, जब मैंने कई लड़कों से इस बारे में बात की। कुछ बच्चे पढ़ने में बेहद कमजोर थे तथा वे पढ़ने में रूचि भी नहीं ले रहे थे। उनका कहना था कि, ‘‘अगर हम पढ़ेंगे नहीं तो कोई फर्क नहीं पड़ता। नदी में पानी होगा तो हम खेती करेंगे, नहीं होगा तो बजरी भरकर पैसा कमा ही लेंगे। ’’

मैंने उनको समझाया, ‘‘ खेती तो तुम पढ़-लिखकर भी कर सकते हो। तुम पढ़-लिख लोगे तो खेती के बारे में नई जानकारियाँ लेकर अच्छी तरह से खेती कर सकोगे। लेकिन बजरी भरकर पूरा जीवन तो नहीं गुजारा जा सकता।’’

मैं प्रतिदिन प्रार्थना में 10 मिनट इस तरह की चर्चा में लगाता था। मैंने कोशिश की कि वे पढ़ाई का महत्व समझ पाएँ।

शाला में मेरी भूमिका

मैंने दिनांक 2005 में विद्यालय में कार्य ग्रहण किया। उस समय शाला में एक प्रधानाध्यापक, एक अध्यापक एवं एक अध्यापिका कार्यरत थे। शाला का नामांकन लगभग 110 बच्चों का था।

शाला प्रधानाध्यापक ने मुझे शाला में अँग्रेजी की स्थिति से अवगत कराया।  अँग्रेजी कभी मेरा शिक्षण विषय नहीं रहा परन्तु इसमें मेरी रूचि प्रारम्भ से ही रही। अत: मुझे कक्षा एक से आठवीं तक का अँग्रेजी विषय का अध्यापन सौंपा गया है। परीक्षा प्रभारी एवं सांस्कृतिक प्रभारी भी मुझे बनाया गया है।

विद्यालय में दैनिक प्रार्थना सत्र का संचालन भी मेरे द्वारा किया जाता है। सोमवार, बुधवार, शुक्रवार को अँग्रेजी के मिनिंग्स मंगलवार और गुरुवार को सामान्य ज्ञान से सम्बन्धित जानकारी तथा शनिवार को नैतिक शिक्षा की जानकारी दी जाती है। किसी विशेष दिवस एवं घटना की जानकारी भी प्रार्थना सत्र में ही विद्यार्थियों को दी जाती है।

प्रार्थना सत्र में ही अनुपस्थित रहने वाले विद्यार्थियों से अनुपस्थिती का कारण, घर पर पढ़ने के समय के विषय में जानकारी, सफाई से सम्बन्धित जाँच कार्य भी किए जाते हैं। हमने कक्षा एक से पाँचवीं से तक के लिए 3 घण्टे तथा कक्षा छह से आठवीं से तक 5 घण्टे घर पर अध्ययन करना एक अनिवार्य नियम बनाया हुआ है। जिसके बारे में रोजाना विद्यार्थियों तथा उनके अभिभावकों से पूछा जाता है।

मेरा लक्ष्‍य

उस समय मेरा महत्वपूर्ण लक्ष्य कक्षा आठवीं के विद्यार्थिंयों को अँग्रेजी विषय की तैयारी करवाना था। क्योंकि मार्च 2005 अन्त में उनकी अँग्रेजी विषय की बोर्ड परीक्षा होनी थी। अतः पहले ही दिन से इस कार्य में लगने का निश्चय किया। मैं कक्षा छह, सात एवं आठ को सम्मिलित रूप से पढ़ाने के लिए कक्षा में गया। मैं गत पाँच वर्षों से शिक्षण कार्य से जुड़ा हुआ था। साथ ही टोंक की कुछ निजी शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन का कार्य कर चुका था, अतः मेरे मस्तिष्क में कक्षा छह, सात एवं आठ के विद्यार्थियों की छवि निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की भाँति ही बनी हुई थी। विद्यार्थियों के परिचय के बाद मैंने उनसे पूछा कि आप को अँग्रेजी विषय में कितनी कहानियाँ याद हैं। तो सभी बच्चों का जवाब था, एक भी नहीं। यह मेरे लिए एक अचरज भरी बात थी।

मैं चॉक लेकर खड़ा हो गया तथा प्यासे कौए की कहानी अँग्रेजी में बोलते हुए ब्लैकबोर्ड पर लिख दी। मैंने कहानी को पढ़ते हुए साथ साथ बच्चों से भी बुलवाया तथा उसका हिन्दी अनुवाद करवाया। फिर मैंने कक्षा आठ के एक विद्यार्थी को खड़ा करके कहा कि अब आप पढ़कर मुझे और सब बच्चों को सुनाइए। वह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ा रहा। मैंने उसे अनेक प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया परन्तु वह बोर्ड पर लिखी हुई कहानी पढ़ने को तैयार नहीं हुआ। मैंने सोचा शायद वह शर्म एवं झिझक में ऐसा कर रहा है। मैंने दूसरे दो बच्चों को बुलाया तो उनकी भी यही प्रतिक्रिया थी।

तब मैंने उनसे पूछा कि, ‘‘आपकी समस्या क्या है? ’’

एक बालिका कुछ झिझकते हुए खड़ी हुई और बोली कि, ‘‘मास्टर साहब हमें तो यह समझ में ही नहीं आ रहा कि आप ने बोर्ड पर यह कौन सी एबीसीडी में कहानी लिखी है।’’

यानी की कक्षा छह,सात, आठ के विद्यार्थियों को उस समय अँग्रेजी वर्णमाला के स्माल लैटर्स की पहचान भी नहीं थी। मेरे सामने शाला की शैक्षिक स्थिति स्पष्ट थी। इन बच्चों के लिए अँग्रेजी भाषा किसी बड़े भयानक दैत्य के समान ही थी। अतः मुझे मेरा भविष्य का मिशन स्पष्ट नजर आ रहा था। मुझे विद्यार्थियों में  अँग्रेजी के डर को दूर करके उनमें इस विषय से सम्बन्धित रूचि एवं समझ विकसित करना है। उन्हें इस बात से अवगत कराना है कि भविष्य में यह भाषा उनके जीवन में कितनी उपयोगी साबित होगी।

फिलहाल मेरा तात्कालिक उद्देश्य लगातार आठ दिन कक्षा आठ के बच्चों के साथ परिश्रम करना था। किन्‍तु अप्रैल में कक्षा एक से सातवीं की परीक्षाएँ प्रारम्भ हो जाने के कारण कुछ अधिक कार्य नहीं हो पाया। अब मेरा लक्ष्य सत्र 2005-06 में बेहतर प्रयास से शैक्षणिक स्तर में सुधार करने का था।

अब शाला स्टाफ में भी कुछ परिवर्तन हो गया था। अब शाला में एक प्रधानाध्यापक,  मुझ सहित दो अध्यापक एवं दो अध्यापिकाएँ हो गए थे। अतः हमने कक्षा एक,दो,तीन तथा कक्षा चार, पाँच तथा कक्षा छह,सात के तीन ग्रुप बनाए तथा कक्षा आठ को अलग रखा। मैंने सबसे पहले प्रार्थना में बच्चों से अँग्रेजी विषय में बात करना प्रारम्भ किया।

पहले दो माह तक प्रार्थना में रोजाना पाँच नए मिनिंग याद करवाए। प्रारम्भ में मैंने बच्चों को सुनना और बोलना विधि के माध्यम से शिक्षण कार्य करवाया। कक्षा में अंग्रेजी वर्णमाला की पहचान एवं छोटे 5 मिनिंग्स बोर्ड पर लिखवाकर बुलवाना, याद करवाना, कॉपी में दो बार कक्षा में ही लिखवाना दो बार घर से लिखकर लाने का कहना। कॉपी में गृहकार्य डालना आदि प्रयास प्रारम्भ किए गए। साथ-साथ पाठ्यपुस्तक भी पढ़ाना।

पाठ्यपुस्तक के पाठ का एक बार सिर्फ मैं पढ़कर सुनाता। बच्चों से उसे घ्यान पूर्वक सुनने का कहता। फिर पाठ का एक एक शब्द बोलता तथा विद्यार्थियों को उसका अनुसरण करने को कहता। पाठ को छोटे-छोटे पेरेग्राफ में बाँटकर उसका हिन्दी अनुवाद समझाता तथा बाद में उन बच्चों से भी पाठ का उच्चारण करवाता। यह प्रक्रिया सम्पूर्ण सत्र चलती रही। पाठ के मुश्किल मिनिंग बोर्ड पर लिखवाए जाते। पाठ का जब दोहरान किया जाता तो प्रत्येक पाठ में से पाँच या छह छोटे-छोटे वाक्य उसके हिन्दी अनुवाद के साथ बोर्ड पर लिखवाए जाते। पहले मैं उन वाक्यों को पढ़कर सुनाता, बच्चों से दोहराने को कहता। फिर कुछ विद्यार्थियों को बोर्ड पर बुलाकर उनसे बोलने को कहता तथा अन्य बच्चों को उसका अनुसरण करने को कहता। इसके बाद प्रत्येक विद्यार्थी दो बार उन वाक्यों को अपनी कॉपी में लिखते एवं दो बार गृहकार्य के रूप में घर से लिखकर लाते।

परिवर्तन नजर आया

मुझे शाला के वातावरण में तथा शाला के विद्यार्थियों में परिवर्तन के लक्षण नजर आने लगे थे। शाला में बालकों की नियमित उपस्थिति सुधर रही थी। स्तर में सुधार आता जा रहा था। पढ़ाई के प्रति विशेष रूप से अँग्रेजी विषय के प्रति रूचि बढ़ती जा रही थी। हर विद्यार्थी अपने घर पर जाकर रोजाना 1-2 घण्टे पढ़ने लगा था। अपने बड़े भाई-बहनों से भी पढ़ाई में मदद लेने लगा था। यह सभी जानकारियाँ मुझे ग्रामवासियों तथा विद्यार्थी के अभिभावकों से मिल रही थीं क्योंकि मैं लगातार उनके सम्पर्क में था। वे भी शाला में आकर मुझसे सम्पर्क करते थे। सभी अपने बच्चों की प्रगति से प्रसन्न थे।

दो सत्र सुखद अनुभवों के साथ गुजर गए। परन्तु सत्र 2007-08 के अनुभव काफी दुखद रहे। क्योंकि दो अध्यापिकाओं ने विद्यालय से अपना डेप्यूटेशन अन्य स्थानों पर करवा लिया था। और इस कारण से शाला की पढ़ाई का बाधित हो रही थी।  इसके विरोध में ग्रामवासियों ने विद्यालय में तालाबन्दी कर दी गई थी।

(किन्तु इसका एक उजला पक्ष यह है कि ग्रामवासी इस बात के लिए सचेत हैं कि इससे उनके बच्चों का नुकसान हो रहा है और उन्हें इसका विरोध करना चाहिए।-सम्पादक)

सुखद बात यह थी कि मेरे लिए यह रही कि कक्षा आठ के में सत्र 2007-08 में 14 विद्यार्थी बोर्ड की परीक्षा में बैठे जिसमें से 07 विद्यार्थी उत्तीर्ण और 07 अनुत्तीर्ण हुए। किन्तु सभी 14 विद्यार्थी अँग्रेजी में पास थे। सभी के अंक 50 प्रतिशत से अधिक थे। अतः मुझे लगा कि मेरे परिश्रम का फल तो मिल ही गया।

सत्र 2008-09 तथा 2009-10 में वापस सभी व्यवस्थाएँ पटरी पर आ गईं तथा शाला का माहौल बेहतर हो गया। एक अध्यापक तथा प्रबोधक डेप्यूटेशन पर शाला में आ गए। दोनों ही अध्यापक अति परिश्रमी तथा अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित होने के कारण हम तीन लोगों की एक मजबूत टीम बन गई। अतः अब हमने अपनी इच्छानुसार विषयों का चयन कर लिया। मैंने कक्षा एक से आठ तक  विषय के अध्यापन का कार्य अपने हाथ में लिया। अतः अब में कक्षा एक से ही बालकों के साथ जुड़कर उनमें शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ाने का प्रयास कर रहा हॅू।

अब शाला के विद्यार्थी अँग्रेजी के अधिक से अधिक शब्दों का सही उच्चारण करने लगे हैं। अपने दैनिक जीवन में तथा शाला में छोटे-छोटे अँग्रेजी के वाक्य बोलने का प्रयास करने लगे हैं। उनकी झिझक दूर हो रही है। अनेक अन्तर्मुखी बच्चों में भी बहुत सुधार देखने को मिला है। वे बोर्ड पर आकर अँग्रेजी मीनिंग एवं वाक्य बोलने का प्रयास करने लगे हैं। कक्षा छह का मनीष गुर्जर तो गाँव में सबसे ज्यादा अँग्रेजी जानने वाले के रूप में प्रसिद्ध है। कक्षा पाँच की सपना बैरवा, कक्षा चार का अजीत बैरवा एवं मनीषा बैरवा कक्षा तीन का सुरेन्द्र गुर्जर भी मनीष की राह पर चल निकले हैं।

सत्र 2009-10 में शाला से केवल कक्षा आठ के उत्तीर्ण विद्यार्थियों की टी.सी. ही गई और गाँव के 18 विद्यार्थी जो निजी विद्यालयों में जाने लगे थे, वापस हमारी राजकीय शाला में लौट आए। जिसका कारण उन बालकों के अभिभावकों ने शाला का सुधरा हुआ शैक्षिक वातावरण तथा शिक्षण के प्रति अध्यापकों की समर्पण की भावना बताया। अतः वर्तमान सत्र शाला विकास एवं शाला के विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास के लिए अति उत्तम रहा है। इस सत्र में ही शाला प्रबन्धन समिति ने भी प्रभावशाली तरीके से कार्य करना प्रारम्भ किया। विद्यार्थियों में इतना अनुशासन आ गया है कि अगर कभी किसी कारणवश एक अध्यापक को ही शाला संचालन करना पडे़ तो भी कोई अव्यवस्था उत्पन्न नहीं होती। प्रत्येक कक्षा विशेष रूप से छठवीं से आठवीं अपने कार्यों में एवं पढ़ाई में अपने आप लगे रहते हैं। कुछ होशियार विद्यार्थी कक्षा को सम्भाल लेते हैं। स्वयं के अध्ययन के प्रति उनकी रूचि एवं जिज्ञासा लगातार बढ़ती जा रही है।

जो मैंने सीखा

इन प्रयासों तथा गत पाँच वर्ष के शिक्षण द्वारा कुछ सिद्धान्तों का निमार्ण हुआ। अगर आप अपने प्रयास को नियमितता के साथ करते हैं तो आपके कार्यों में और निखार आएगा तथा विद्यार्थियों का आप में मजबूत विश्वास जागृत होगा। वे भी अपने कार्यों में निरन्तरता लाने का प्रयास करेंगे। उनमें अनुशासन का विकास होगा। बच्चे अगर अपने शिक्षक में अनुशासन एवं परिश्रम करने की आदत देखते हैं तो वह स्वयं भी इसके लिए उत्साहित होते हैं।        

मोहम्मद फहीम

  • एम.ए. (इतिहास) बी.एड, कम्प्यूटर डिप्लोमा
  • रा.उ.प्रा.विद्यालय जैबाड़िया, टोंक, राजस्‍थान
  • 2005 से शिक्षक
  • रूचि : पढ़ना, पढ़ाना, क्रिकेट । ‘‘इण्डियन सोशल वेलफेयर ऐसोसियशन’’ नामक सामाजिक संस्था से गत 10 वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ। यह संस्था अल्पसंख्यक एवं पिछड़े वर्गों हेतु विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु निःशुल्क कोचिंग एवं लायब्रेरी सुविधा प्रदान करती है। अल्पसंख्यक समाज के लिए शिक्षा के विकास के लिए प्रयासरत है।


 

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। मोहम्‍मद फहीम  वर्ष 2009-10 में बेहतर शैक्षणिक प्रयास के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने मोहम्‍मद फहीम से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम मोहम्‍मद फहीम , राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

arvindcares का छायाचित्र

भाषा इंटरनेशनल की और से आपका अभिनन्दन - इस छोटे प्रयासों के अच्छे दूरगामी परिणाम मिलेंगे - हमें आप पर गर्व है ! www.bhasha.asia

pramodkumar का छायाचित्र

आपके इस प्रयास को शत शत वन्‍दन ा

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