किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मोहम्‍मद असलम : अच्‍छा शिक्षक शिक्षण तक सीमित नहीं रहता...

राजकीय प्राथमिक विद्यालय मीणा व बैरवा बस्ती कुरेडा टोंक जिले में बनास नदी के ऊपरी एवं पश्चिमी भाग में स्थित है। शाला के प्रधान अध्‍यापक मोहम्‍मद असलम का कहना है कि ‘ विद्यालय में शाला प्रधान की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उचित प्रबन्धन के बिना विद्यालय, किसी भी प्रकार का विकास नहीं कर पाता है। विद्यालय एक उद्यान है, जिसकी सुन्‍दरता को माली (शिक्षक) अपने प्रयासों से निखारता है। यदि माली की देखभाल और प्रयासों में कमी हो तो बाग उजड़ जाता है।’

उनका मानना है कि-

  • विद्यालय में संस्था प्रधान की वही भूमिका होती है जो एक बड़े परिवार के संचालन में एक मुखिया की होती है।
  • शाला प्रधान द्वारा सहायक अध्यापकों, अभिभावकों के सहयोग से विद्यालय में शिक्षण कार्य एवं रख रखाव तथा शिक्षा में आधुनिक प्रयोग आदि कार्यों को बच्चों के हित में हमेशा बेहतर बनाए रखना आवश्यक है। 
  • शिक्षक को शिक्षण सिद्धान्तों की जानकारी होना आवश्यक है। क्योंकि शिक्षक का प्रमुख कार्य अधिगम परिस्थितियों को उत्पन्न करना है। इसके लिए शिक्षक को शिक्षण का कार्य एवं प्रकृति भली प्रकार समझनी चाहिए।
  • सिद्धान्त शिक्षक को अवधारणाओं एवं नियमों की जानकारी देते हैं एवं उनसे शिक्षण के बहुपक्षीय स्वरूपों का बोध होता है। जिससे शिक्षक को शिक्षण व्यवस्था के लिए दिशा मिलती है।
  • सिद्धान्त,  अधिगम तथा शिक्षण के सहसम्बन्ध को व्यवस्थित करते हैं  और शिक्षक को दोनों में सम्मिलित घटकों की जानकारी देते हैं। शिक्षण का कोई एक तरीका नहीं है। बच्चा पढ़े, उसे पढ़ना आए, इसके लिए अनेक तरीके अपनाने पड़ते हैं। मैंने देखा है कि हमने तो बच्चे को पढ़ा दिया लेकिन जब उससे पूछा गया तब पता चला की उसे तो कुछ समझ ही नहीं आया। यहाँ मेरा मानना यह है कि विषय की प्राथमिक अवधारणा को बच्चे को समझाने के लिए सैद्धान्तिक तरीकों का ही प्रयोग करना चाहिए। इससे उसकी पढ़ने के साथ-साथ समझ भी बनती है।
  • शिक्षण की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकती। सामाजिक घटक शिक्षण को प्रभावी करते हैं, परन्तु सामाजिक घटक तथा मानवीय घटक परिवर्तनशील होते हैं।

समस्याओं की पहचान 

मैंने सबसे पहले समस्याओं को चिन्हित किया। वे कुछ इस तरह थीं-

  • अक्टूबर 2007 में जब मैं आया, विद्यालय की स्थिति कहने को अच्छी थी। शाला प्रांगण में एक हैण्डपम्प लगा हुआ था। चार बड़े हाल बने हुए थे। फिर भी अध्यापक पेड़ के नीचे अध्ययन कराते थे। स्कूल सड़क से लगा हुआ था। स्कूल में चारदिवारी नहीं थी।
  • पोषाहार व्यवस्थित नहीं था। मध्यान भोजन में एक ही तरह (घूघरी) का खाना बनता था। खाना खाने के लिए बच्चों के बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
  • शौचालय नहीं थे।
  • नामांकन 107 बच्चों का था। औसत उपस्थिति 65 बच्चों की रहती थी। उसमें कौन कब आ जा रहा है पता ही नहीं चलता था। बच्चों का ठहराव नहीं था। बच्चे स्कूल ड्रेस भी पहनकर नहीं आते थे।
  • शिक्षक पूरी संख्या में होते नहीं थे। शिक्षक कम होते थे (दो या तीन)। इसलिए कुछ कक्षाओं को एक साथ बैठाना पड़ता था।
  • कक्षाओं में भी बैठक व्यवस्था ठीक नहीं थी। बच्चे झुण्ड में बैठते थे। बैठने का कोई क्रम नहीं था। कक्षा के कुछ लड़के एक साथ, कुछ लड़कियाँ एक साथ।
  • कोई शैक्षणिक योजना नहीं थी कि एक साथ बैठी हुई अलग-अलग कक्षाओं को कैसे पढ़ाया जाए। शैक्षिक स्तर कमजोर था।
  • बच्चों के अभिभावक स्कूल बुलाने पर भी नहीं आते थे। जो रास्ते से गुजरते, वह स्कूल में ही आकर दो पल ठहरते, बीड़ी पीते और चले जाते।

मैंने इन समस्याओं को हल करने के प्रयास शुरू किए। सकारात्मक सोच रखते हुए अपने साथी शिक्षकों के साथ चर्चा की। इसमें विद्यार्थियों का सहयोग भी लिया गया। कार्य योजना को बिना दबाव के लागू करने का प्रयास किया। विद्यालय में नए विचार, नई कार्य शैली व रोचक शिक्षण को लागू करना कठिन कार्य था। लेकिन कोशिशों से रोजाना थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन आता गया। इन परिवर्तनों को देख मन में आगे कुछ करने की इच्छा शक्ति और प्रबल होती गई।

मेरी कार्य योजना निम्न मुख्य बिन्दुओं पर आधारित रही -

  • अपने विचारों पर सहायक अध्यापकों के साथ सहमति बनाना।
  • सहायक अध्यापकों के विचारों को जानकर उनकी रुचि अनुसार कार्य का निर्धारण करना व बाँटना।
  • सहयोगी शिक्षकों के विचारों को प्राथमिकता देना। मैं जब यहाँ आया, मैंने स्कूल की स्थिति और बच्चों की शैक्षणिक स्थिति देखी। इस स्थिति को कैसे बेहतर किया जाए, इस पर साथी शिक्षकों से चर्चा की। मैंने कहा कि इस बारे में हर शिक्षक अपने-अपने दस-दस तरीके सोचकर, लिखकर लाए ताकि हम उन सभी पर चर्चा कर आगे की योजना बना सकें । सभी के अपने-अपने सुझाव थे। जिन सुझावों पर चर्चा करने के बाद लगा कि इनसे बेहतर परिणाम आ सकते हैं, उन्हें स्वीकार कर लिया गया। जो सुझाव रखे गए उनके आधार पर आगे की कार्य योजना बनाई गई। इस योजना के तहत जिस शिक्षक ने जो कक्षा माँगी और समय माँगा वो उसे दिया गया।
  • शिक्षा विभाग, साथी स्टाफ, अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क करते रहने के बाद स्कूल की बाउंड्री बनवाई। शौचालयों का निर्माण करवाया। रसोई का निर्माण करवाया।
  • कक्षा आठ की बालिकाओं को स्कूल ड्रेस उपलब्ध करवाई। लड़कियों के लिए सिलाई, पेन्टिंग आदि सरकारी योजनाएँ, लाईब्ररी (एसएस तथा एपीएफ) को व्यवस्थित कर शुरू कीं।
  • बच्चों में उत्साह बढ़ाने के लिए उन्हें पुरस्कृत करना आरम्भ किया। पुरस्कार में कॉपी पैन आदि अपने खर्चे से वितरित करना।
  • स्कूल में फलों के पौधे लगाना तथा उसमें बच्चों का भी सहयोग लेना आदि।
  • प्रार्थना से लेकर शाला समय पश्चात तक समय सारणी का उपयोग कर लक्ष्य प्राप्त करना। शाला मध्यान्ह में भी विचार विमर्श करना। शाला सत्र के आरम्भ से ही कार्य योजनाओं का प्रारम्भ किया।
  • प्रत्येक समस्या पर सामूहिक चर्चा के आधार पर निस्तारण का प्रयत्न करना।
  • कभी कभी स्थिति जटिल हो जाती है, उसे तुरन्त प्रभावी ढंग से संभालने की कोशिश  करना।
  • विभिन्न उत्सवों तथा विभिन्न गतिविधियों द्वारा अभिभावकों,जन प्रतिनिधियों एवं गणमान्य व्यक्तियों को विद्यालय से जोड़ना सबसे महत्वपूर्ण प्रयास है।
  • विद्यार्थियों में शिक्षण के साथ अच्छे आचरण भी पैदा करना। अच्छे आचरण से अर्थ है कि समय पर कार्य किया जाए। बड़ों की बात मानी जाए। साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए आदि। मेरा मानना है कि अगर आप बच्चों का आचरण ठीक कर देते हैं, तो उनके अच्छे परिणाम की संभावनाएँ बहुत अधिक हो जाती हैं।

शैक्षिक सुधार के लिए प्रथम तीन माह का लक्ष्य

शिक्षण में गुणवत्ता लाने के लिए क्या प्रयास किए जाएँ तथा ऐसे कौन-कौन से आयाम रखे जाएँ जिससे बच्चे में नब्बे दिनों में लिखना, पढ़ना व अपने स्तर पर कार्य करने की क्षमता का विकास हो सके, इस पर मैंने सहयोगी अध्यापकों से सत्र के प्रारम्भ में व्यापक चर्चा की। 90 दिन इसलिए क्योंकि बच्चों को उस कक्षा का पाठ्यक्रम भी पूरा करवाना होता है। यह योजना कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों के लिए बनाई गई। सभी शिक्षकों से इस पर निरन्तर चर्चा की जाती रही।

सबसे पहले यह तय किया गया कि हर कक्षा में प्रत्येक बच्चे को जो आता है, उससे आगे का शिक्षण कार्य किया जाए। कक्षा की आवश्‍यक दक्षता तक सभी बच्चों को लाने के लिए सबसे पहले यह पता किया गया कि इन्हें कितना आता है। उसके लिए विधिवत तो कोई प्रश्न पत्र नहीं बनाया। किन्तु अलग-अलग कक्षा के बच्चों से अलग-अलग विषय पर कुछ प्रश्न पूछे गए। बड़ी कक्षा के बच्चों से किताबें पढ़वाई गईं। इसके लिए पाठ्यपुस्तक के अलावा अन्य सामग्री का इस्तेमाल भी किया गया। जैसे कहानी की किताबें चार्ट आदि। कक्षा पाँच के बच्चों को भी हिन्दी की किताबें पढ़ना नहीं आता था।

गणित में गिनती और दो तक के पहाड़े भी कुछ ही बच्चों को आते थे। लिखने में तो लगभग सभी बच्चे कमजोर थे। मैंने पहले हिन्दी, गणित तथा अँग्रेजी में सभी बच्चों से विषय से सम्बन्धित सामान्य दक्षता वाले प्रश्‍न पूछे। जैसे-हिन्दी और अँग्रेजी में अक्षर पहचान, किताब का वाचन, लेखन, प्रश्न-उत्तर। गणित में गिनती, पहाड़े, जोड़ बाकी, गुणा, भाग, सवाल आदि।

इस प्रक्रिया के बाद उनके तीन ग्रुप बनाए गए। सभी कक्षा के समान ग्रुपों को एक साथ कर दिया गया। यह हिन्दी, गणित और अँग्रेजी भाषा को लेकर बनाए गए। इनके तीन अलग-अलग सेक्शन बनाए गए। इन ग्रुप में कार्य करने के लिए सामूहिक रूप से तय किया गया। इसमें लंच से पहले इन विषयों के बारे में गतिविधियों (लेखन, वाचन, समझ बनाने पर कार्य) के माध्यम से बताया जाता तथा उसके बाद किए गए कार्य को परखा जाता था। प्रश्न देकर भी कार्य करवाया जाता था। यह इसलिए तय किया गया कि नहीं आने पर उसे तुरन्त ही दुरस्त करवा दिया जाए। इसके तहत एक मिनट में कौन कितने शब्द पढ़ सकता है? कितने शब्द लिख सकता है? हिन्दी व अँग्रेजी में रोज नकल करने के लिए तीन पेज का कार्य देना। उस लिखे हुए को पढ़वाना। यह नियमित किया जाता था। इसी क्रम में जो सीखता जाता था, वह अगले ग्रुप में शिफ्ट भी होता था।

प्रत्येक वर्ग में एक-एक घन्टे के लिए विषयवार अध्यापकों को लगाया गया। यह कार्य 10 जुलाई से 10 सितम्बर तक किया गया। हर सप्ताह हम शिक्षक बैठकर उस पर चर्चा करते थे कि कौन कहाँ पहुँचा। कैसा लग रहा है? इन सभी कार्य को नियमित चैक किया जाता था। उसी समय पर आवश्यक होने पर सुधार भी किया जाता था। ऐसा करने पर एक महीने के अन्दर ही हमें नजर आने लगा कि बच्चे सीखने लगे हैं।

इसमें कक्षा में सामूहिक प्रदर्शन द्वारा गृह कार्य व कक्षा कार्य एवं दैनिक कार्य अभ्यास द्वारा लेखन, पठन, वाचन क्रिया को करवाए जाने का लक्ष्य भी निर्धारित था। मैंने इस पर जोर दिया कि कक्षा में बच्चों के साथ सामूहिक गतिविधियाँ भी की जाएँ। जैसे सभी से चित्र बनवाकर उसका प्रदर्शन करवाकर अच्छे चित्र बनाने वाले बच्चों को पुरस्कृत करना। कौन-कौन बच्चे साफ आए हैं। उन्हें पुरस्कृत करना, यह पुरस्कार मैं अपने निजी खर्चे पर लाता था। टी.वी. पर सामूहिक कार्यक्रम देखना- डिस्कवरी, दूरदर्शन।

प्रार्थना सत्र को प्रभावी बनाया

स्वस्थ मन, स्वस्थ काया, अच्छे भविष्य की ओर ले जाते हैं। प्रारम्भ में स्कूल में लोगों का जुड़ाव नहीं था। शैक्षणिक स्तर कमजोर था। बच्चों का ठहराव नहीं था। ऐसी अनेक समस्याएँ थीं। इनके ही हल सोचने पर मुझे लगा कि स्कूल के प्रार्थना सत्र को भी रोचक बनाने की आवश्यकता है। मैं निरन्तर बच्चों के सम्पर्क में भी रहता था। तब अधिकतर बच्चे बीच-बीच में किसी दर्द की बात कहके घर जाने को कहते थे। मैंने प्रार्थना में बच्चों को व्यायाम करवाना शुरू कर दिया। मैंने व्यायाम में सभी व्यायाम योग वाले लिए ताकि एक साथ दो काम हो सके। व्यायाम का व्यायाम और दर्द से छुटकारा। इन व्यायामों में अलोम-विलोम, प्राणायाम, कपालभारती ( खाली पेट) तथा पेट दर्द, सिर दर्द आदि होने पर किये जाने वाले व्यायाम भी उन्हें सिखाता था। जिनका प्रयोग अस्वस्थ्य होने पर वह घर पर करते थे तथा अपने माता पिता को भी बताते थे। इससे इस बात का प्रचार अभिभावकों तक हुआ।

पोषाहार वितरण में सुधार

पोषाहार पूर्व में पुराने ढंग से बनाया जाता था। बच्चे उसे खाने में रुचि नहीं लेते थे। इसका कारण साफ था कि एक ही तरह का भोजन बच्चों को अधिक दिन तक नहीं भाता है। मैंने  पोषाहार में दैनिक परिवर्तन किया। धीरे-धीरे बच्चों को यह भोजन अच्छा लगने लगा। बच्चों को गुणवत्ता वाला भोजन दिया जाने लगा। चावल को विभिन्न प्रकार से तैयार किया जाने लगा। जिसको बच्चे बड़े चाव से खाते हैं। इससे उनका स्कूल में ठहराव होने लगा।

पेयजल तथा शौचालय की व्यवस्था 

ऐसा विद्यालय जहाँ 150 छात्र-छात्राओं का नामांकन हो। वहाँ पेयजल व्यवस्था, वह भी स्वच्छ जल। यह बडा ही जटिल कार्य था। जब मैं यहाँ स्थानान्तरित होकर आया तो यहाँ पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी। इस वजह से छात्र,छात्राएँ विद्यालय प्रांगण से ग्राम की ओर निकल जाते थे। एक योजना के तहत मैंने यहाँ एक टैंक व एक बड़ा टांका बनाया। इसमें वर्षा का जल एकत्रित किया जाता है। टैंक के दो भाग किए गए। एक में प्रांगण के एकत्रित जल को इकट्ठा किया जाता है और उसके पानी को पेड़-पौधों के लिए उपयोग किया जाता है। दूसरे टैंक के पानी को पीने के काम लिया जाता है।

बालक-बालिकाओं के लिए पृथक शौचालयों का निर्माण किया। पहले बालिकाएँ विद्यालय से घर जातीं थीं और अधिकतर तो वापस ही नहीं आती थीं। मैंने इसके लिए अनेक जगह सम्पर्क किए। अन्त में पैसे की व्यवस्था तो सर्वशिक्षा अभियान से हुई किन्तु इसके लिए निरन्तर फोलोअप किया गया। अभिभावक कमेटी (एस.एम.सी.) को सक्रिय किया गया। गाँव के अन्य लोगों को भी जोड़ा गया।

शौचालयों की देखभाल के लिए स्कूल स्तर पर एक समिति का गठन किया गया। समिति में मेरे अलावा सात विद्यार्थियों को रखा गया। समिति के कार्यों में शौचालयों की देखरेख, उनका रखरखाव, दैनिक रूप से उनकी साफ सफाई किया जाना मुख्य था।

विद्यालय में अन्य व्यवस्थाएँ

विद्युत कनेक्‍शन

विद्यालय में विद्युत कनेक्शन करवाया गया। इसके बिल का विद्यालय में कोई बजट नहीं होता।  संस्था प्रधान अपने स्तर से बिजली का बिल जमा कराते हैं। यह स्कूल मॉडल कलस्टर है। इसके तहत ही स्कूल में टी.वी था, उसे लगवाया। स्कूल में पहले डिश थी। उसकी (कार्यक्रम) लिस्ट माँगी गई। उसमें से जिनके बारे में मैं जानता था उन्हें छाँटा गया जैसे: डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफी, डी.डी.1, बाल भारती, कार्टून आदि। बच्चों ने जब टीवी पर ये सामूहिक कार्यक्रम देखें तो उनके सामान्य ज्ञान और जानकारी में वृद्धि हुई।

प्राथमिक उपचार और समुदाय से सम्बन्ध 

देसी व अँग्रेजी दवाओं के माध्यम से विद्यालय में प्राथमिक उपचार किया जाना प्रारम्भ किया गया। पेट दर्द, खाँसी, सिर दर्द आदि के लिए उपचार बताना तथा देशी दवाओं यानी लोंग, लहसुन, हल्दी, आँवला, हरड़, गोंद, बड़ी इलायची आदि (आयुर्वेदिक दवा) का उपयोग करना। हालाँकि इसमें पहले से मेरी रूचि नहीं थी। मैंने इससे सम्बन्धित किताबें पढ़ीं। लोगों से मिला। विद्यालय में बच्चों का उपचार किया,दवा दी। उनसे यह जानकारी अभिभावकों तक पहुंची। अभिभावकों ने भी छोटी-मोटी तकलीफ होने पर इलाज के लिए स्कूल में आना-जाना शुरू हुआ। इसके माध्यम से उनसे चर्चा होने लगी। इन सबसे स्कूल की एस.एम.सी. मजबूत बनी। समुदाय का जुड़ाव स्कूल से हुआ। लोगों ने छोटी-छोटी मदद (बच्चों को पुरस्कार निर्माण में कुछ राशि या सामग्री/मजदूरी की सहायता) देना शुरू किया।                             

मीना मंच तथा अन्य योजनाएँ

महिला समूह के लिए सरकार द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों से समुदाय को अवगत कराना।

पालनहार योजना से समुदाय को अवगत करवाना। महिला-अभिभावकों द्वारा शाला में साप्ताहिक गतिविधि द्वारा जानकारी दिया जाना।

सिलाई प्रशिक्षण-एसएसए द्वारा महिला सशक्तिकरण व्यावसायिक योजना के अन्तर्गत विद्यालय में व्यावसायिक प्रशिक्षण चलाया गया। जिसमें 60 बालिकाओं ने अध्ययन के दौरान लाभ उठाया। आज बालिकाएँ स्कर्ट, शर्ट, टॉपर, काज, बटन, पेन्ट की चेन, हुक आदि कार्य कर लेती हैं।

पेन्टिंग व कुकिंग सम्बन्धी व्यावसायिक प्रशिक्षण में रुचि अनुसार दो ग्रुप बनाए गए। इसमें अलग-अलग प्रशिक्षण दिया गया। इसे सीखकर बालिकाओं ने विद्यालय की दीवारों पर भी चित्र बनाए। इसका उद्देश्‍य उन्हें आत्म निर्भर बनाना था।

शाला को सुन्दर बनाने में पेड़-पौधों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस कार्य के लिए 25 बच्चों का विद्यालय स्तर पर चयन किया गया। उनके साथ मिलकर क्यारियाँ बनाना, गमलों में पर्यावरण सम्बन्धी पेड़-पौधे लगाना एवं उनकी देखभाल किया जाना शुरू किया गया। इससे विद्यालय हरा भरा हो रहा है। बच्चों में पर्यावरण सम्बन्धी प्रवृति जागृत हो रही है।                     

मोहम्मद असलम

  • शाला प्रधान
  • एम.ए. बी.एड.
  • राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, मीणा व बैरवा बस्ती कुरेड़ा 
  • नोडल प्रभारी कम संकुल सन्‍दर्भ प्रभारी, कुरेडा, सर्वशिक्षा अभियान, टोंक

 

 

 


वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। मोहम्‍मद असलम वर्ष 2010 में  'शाला नेतृत्‍व एवं प्रबन्‍धन' के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने मोहम्‍मद असलम से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इसी बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम मोहम्‍मद असलम ,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

टिप्पणियाँ

KARTIK CHANDRA SAHU का छायाचित्र

i had been to observe his work as part of my job when i was in APF, really one of the excellent teacher in school leadership & management. What has been written here , you can see & feel the work in the school. Not only in his work , a sense of simplicity & responsible person in his personal life. Kartik

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