किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मोटर साइकिल वाले गुरुजी

राजस्थान के टोंक जिले के निवाई ब्लॉक में एक प्राथमिक स्कूल है ,रैगरों की ढाणी भावता। यह निवाई से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस स्कूल में दो शिक्षक पदस्थ है। स्कूल में कुल 24 बच्चों का नामांकन है। दो कमरों का स्कूल है। मध्याह्न भोजन कक्ष और शौचालय भी बने हुए हैं। स्कूल के आसपास चार दिवारी है। चार दिवारी के अन्दर स्कूल भवन के अलावा एक छोटा नीम का पेड़ भी लगा हुआ है। बच्चों के लिए पीने के पानी के लिए हैंडपम्प की व्यवस्था है। इसी स्कूल में पदस्थ हैं शिक्षक लोकेश खिंची ।

लोकेश युवा हैं। शिक्षकीय पेशे में आए हुए लगभग दो वर्ष का समय हुआ है। अपनी मेहनत व लगन से ही स्कूल व बच्चों के लिए कुछ न कुछ करने में लगे रहते हैं। लोकेश से मैं सर्वप्रथम सर्व शिक्षा अभियान के एक प्रशिक्षण में मिला था। इस प्रशिक्षण के बाद से ही वह हमारे साथ सघन रूप से जुड़े हैं। पढ़ने-लिखने में रूचि रखते हैं। लोकेश ने अपनी पढ़ाई जवाहर नवोदय विद्यालय से की और बाद में बी.एस.टी.सी किया।

लोकेश स्कूल आने के लिए अपनी मोटर साइकिल का उपयोग करते हैं। यह मोटर साइकिल भी बच्चों को बुलाने में उनकी मदद करती है। लोकेश जैसे ही गाँव में पहुँचते हैं वे अपनी मोटर साइकिल का हॉर्न बजाना शुरु कर देते हैं। हॉर्न की आवाज सुनकर बच्चे समझ जाते हैं कि गुरुजी आ गए हैं। बच्चे घर से अपना बस्ता लेकर गुरुजी की गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़े चले आते हैं। लोकश भी बच्चों के घर के बाहर जाकर हॉर्न बजाते हैं और अगर कोई बच्चा हॉर्न की आवाज सुनकर बाहर नहीं आता है तो उनके घर वालों से बच्चे के बारे में जानकारी लेते हैं।

इस तरह स्कूल पहुँचते-पहुँचते लगभग सारे बच्चे गाड़ी के पीछे हो लेते हैं । इस पूरी प्रक्रिया में बच्चों में ऐसा उत्साह दिखाई पड़ता है जैसे गाँव में कोई मदारी आता है और बच्चों की टोली मजे से उसके पीछे चलती है। यह लोकेश के प्रतिदिन की दिनचर्या का हिस्सा है।

स्कूल का आरम्भ प्रार्थना सभा से होता है। प्रार्थना सभा में सभी बच्चों का चार्ट बना हुआ। इसमें सभी का बारी-बारी से नम्बर आता है। प्रार्थना सभा में बच्चे लोकगीत, कहानी कविता, अपने अनुभव आदि सुनाते हैं, गतिविधियाँ करते हैं। स्कूल की साफ-सफाई व बच्चों की बैठक व्यवस्था का कार्य शिक्षक व बच्चे मिलकर करते हैं। लोकेष बच्चों के साथ घुल-मिलकर कार्य करते हैं। शैक्षणिक कार्य के दौरान गोल घेरे में बैठते हैं और मिलकर शिक्षण का कार्य करते हैं। खेल गतिविधियों में भी बच्चों के साथ ही मिलकर खेल खेलते हैं। बच्चों की अलग-अलग रुचियों का ध्यान रखते हैं।

इसका एक उदाहरण है सोनू। वह कक्षा चार का विद्यार्थी है। उसे पढ़ाई में ज्यादा मजा नहीं आता है या कहें पढ़ाई वाली गतिविधियों से वह बचना चाहता है। जब सोनू पर पढ़ने के लिए ज्यादा जोर डाला गया तो उसने स्कूल आना ही बन्द कर दिया। काफी मशक्कत की, फिर भी वह स्कूल आने को तैयार नहीं हुआ। तो लोकेश ने सोनू से बातचीत कर हल निकाला। सोनू ने कहा मुझे खाना बाँटने  (मध्याह्न भोजन) वाला काम दो व खेल का लीडर बनाओ तो स्कूल आऊँगा। कम से कम सोनू स्कूल तो आए इसलिए उसे लोकेश ने यह जिम्मेदारियाँ भी दी। लोकेश इसी तरह अपने साथी शिक्षक तथा बच्चों के साथ हिल-मिलकर एक-दूसरे की समस्याओं को जानने व समाधान करने का प्रयास करते हैं।

लोकेश पाठ्यक्रम की पुस्तकों पर कार्य करने के साथ ही अन्य शैक्षणिक गतिविधियाँ भी अपने स्कूल में आयोजित करते हैं और बच्चों के साथ मिलकर कम लागत की गतिविधियों की तैयारी करते हैं। पिछले दिनों में उन्होंने अपने स्कूल में एक बालमेले का आयोजन किया। बालमेले में बच्चों ने ही सन्दर्भ व्यक्ति की भूमिका में कार्य किया। इस बालमेले में एक अन्य स्कूल के बच्चों व शिक्षकों को आमंत्रित किया गया। बच्चों के अभिभावकों ने भी बालमेले में भागीदारी की।

लोकेश ने अपनी पढ़ाई-लिखाई नवोदय विद्यालय में की है। वे अपने स्कूल के ही कक्षा 5 व 4 के बच्चों को स्कूल समय के बाद बचे समय में नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा की तैयारी करवाते हैं (ट्यूशन नहीं)। बच्चे भी काफी मेहनत कर रहे हैं। लोकेश भी इन बच्चों के साथ उतनी ही लगन से काम कर रहे है। स्कूल में दर्ज बच्चों के साथ ही उनके छोटे भाई-बहन भी स्कूल आते हैं। अगर उन छोटे बच्चों को स्कूल आने से मना करें तो उनके बड़े भाई-बहन भी स्कूल नहीं आएँगे, क्योंकि उन्हें उनकी देखभाल करने के लिए घर रुकना पड़ता है। लोकेश छोटे बच्चों को भी पढ़ाते हैं।

वे प्रशिक्षणों व अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में पूरी रुचि के साथ भागीदारी करते हैं। नियमित रूप से अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के ब्लॉक गतिविधि केन्द्र पर आते है। स्कूल की समस्याओं एवं बच्चों के साथ काम के दौरान आने वाली शैक्षणिक समस्याओं पर चर्चाकर हल निकालने का प्रयास करते है। लोकेश कई बार प्रशिक्षणों व अन्य छुट्टियों के चलते जब ज्यादा दिनों तक स्कूल नहीं जा पाते हैं तो कहते हैं कि काफी दिन से स्कूल नहीं जा पाया। गाँव वाले पता नहीं क्या सोच रहे होंगे ? उन्हें बच्चों, स्कूल के साथ ही पालकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भी अहसास रहता है। इसीलिए पालकों का भी उनको बहुत विश्‍वास व सहयोग मिलता है।

लोकेश खिंची छोटी कद काठी के हैं, लेकिन बच्चों के साथ काम ऊँचे स्तर का करते हैं।


 

राकेश कारपेण्‍टर,निवाई,टोंक, राजस्‍थान से भेजे गए आलेख का सम्‍पादित रूप। फोटो भी राकेश ने ही उपलब्‍ध कराए हैं।

  

 

 

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

दैहिक कद मायने नहीं रखता ।महत्‍तवपूर्ण है कि सपनों का कद कितना उंचा है । लोकेश जी के सपने और काम दोनो उंचे हैं । इनके काम में बच्‍चों के प्रति अपनापन और समर्पण दिखता है ।

kavitamadke का छायाचित्र

You do very good and inspiration job .Nothing is impossible for teacher who do job from very scincerly like u .All the best .

17370 registered users
6658 resources