किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मैना कुमारी : स्‍तर के अनुसार शिक्षण

मैं राजकीय बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय, भासू , में कार्यरत हूँ। यह विद्यालय टोडारायसिंह तहसील से 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यहाँ के अधिकांश लोग मुख्यतया कृषि, पशुपालन और मजदूरी का कार्य करते हैं। यहाँ तीन निजी विद्यालय,  एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय व राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय हैं। सम्पन्न वर्ग के लोग अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ने भेजते हैं। अधिकांश अभिभावक अनपढ़ हैं। वे शिक्षा में कोई रुचि नहीं लेते हैं। वे लड़कियों को अपने साथ कृषि कार्य, पशुपालन (पशुओं को चराने के काम में) अन्य कार्यों में लगा देते थे। छोटी लड़कियों को घर की रखवाली के लिए घर पर ही छोड़ जाते थे  । इसके कारण लड़कियाँ नियमित रूप से विद्यालय नहीं आ पा रही थीं। नतीजा यह कि इससे वे पढाई में बहुत पिछड़ रही थीं। कक्षा 5 का जो स्तर होना चाहिए था, लड़कियाँ उस स्तर को प्राप्त नहीं कर पा रही थीं।

मेरी भूमिका

जनवरी 2008 को मेरी प्रथम नियुक्ति इसी विद्यालय में हुई। उस समय इस विद्यालय में 5 अध्यापिकाएँ व एक अध्यापक थे। मेरे साथ एक और अध्यापिका की नियुक्ति हुई थी। इस प्रकार हमारे विद्यालय में कुल 8 शिक्षक थे। जब मैंने पढ़ाना शुरू किया तो कुछ ही दिनों में जाना कि लड़कियों की शैक्षिक स्थिति काफी कमजोर है। उन्हें हिन्दी में बात करना नहीं आता था। अनुशासन की कमी थी। किसी छात्रा को पानी पीने के लिए या अन्य कार्य से कक्षा से बाहर जाना होता था या कक्षा में वापस आना होता था तो वो किसी अध्यापक से पूछकर नहीं जाती थी। या आधी छुट्टी में ही घर चली जाती थी। बहुत सी छात्राएँ अध्यापकों या अपने से बड़ों को आप या आपके के स्थान पर तू या तुम कहकर सम्बोधित किया करती थीं । अतः सर्वप्रथम तो मैंने उन्हें सही ढंग से रहने व बोलने का तरीका बताया। मैं हमेशा हिन्दी में ही बात किया करती थी। यदि हिन्दी के किसी शब्द को वे नहीं समझ पाती थीं तो उसका अर्थ उन्हें उनकी स्थानीय भाषा के शब्द के आधार पर समझाती थी।

छात्राओं को कक्षा में अनुशासन बनाए रखने का भी प्रयास किया। जैसे कक्षा पाँच की एक लड़की उठकर अचानक बाहर चली गई। थोड़ी देर पश्‍चात वह वापस बिना पूछे कमरे में आ गई। मैंने उससे वापस कक्षा से बाहर जाने को कहा। वह कक्षा से बाहर चली गई। मैंने उससे पूछकर अन्दर आने को कहा तो वो चुपचाप खड़ी रही कुछ भी नहीं बोली। फिर मैंने उसे बताया कि तुम्हें इस प्रकार बोलना है-

‘‘मैडम क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ?‘‘

उसने मेरे शब्दों को दोहराकर अन्दर आने की आज्ञा माँगी। मैंने उसे अन्दर आने की अनुमति दी। उससे बाहर जाने का कारण पूछा तो उसने बताया उसे टॉयलेट जाना था इसलिए वो बिना पूछे चली गई। मैंने उसके साथ कक्षा की सभी छात्राओं को समझाया कि कोई भी बिना आज्ञा लिए कक्षा से बाहर नहीं जाएगी और न ही बिना पूछे कक्षा में आएगी। तथा साथ ही कक्षा में पंक्ति में बैठना, कक्षा के बाहर एक पंक्ति में जूते चप्पल खोलना, अध्यापक के कक्षा में आने पर खड़ा होना आदि  सिखाया।

इन सब बातों का उन पर बहुत असर हुआ। अब वे अनुशासन में रहने व सही ढंग से बोलने की कोशिश करती हैं। कक्षा दो व तीन की बच्चियाँ भी मुझसे टूटी-फूटी हिन्दी में बात करने की कोशिश करती हैं। राजस्थानी शब्दों का प्रयोग करते हुए वो हिन्दी में बात करने की कोशिश करती हैं तो मुझे उनकी बातें सुनकर बहुत प्रसन्नता होती है। पहले छात्राएँ थाली में भोजन लेकर अलग-अलग स्थानों पर बैठकर भोजन किया करती थीं। मैंने व एक अन्य अध्यापिका ने मिलकर उन्‍हें बरामदे में एक पंक्ति में सही ढंग से भोजन करना सिखाया। अब छात्राएँ आधी छुट्टी में अपनी थाली लेकर स्वंय बरामदे में आकर बैठ जाती हैं। हम दोनों अध्यापिकाएँ भी वहीं रहती हैं ताकि व्यवस्था बनी रहे और गन्दगी न फैले।

कुछ समय पहले रेडियो द्वारा अँग्रेजी शिक्षण का एक कार्यक्रम चला था, जिसके अन्तर्गत रेडियो के माध्यम से अँग्रेजी सिखाई जाती थी। इस कार्यक्रम में विद्यालय में किसी शिक्षक-शिक्षिका ने रुचि नहीं दिखाई। मैंने कक्षा तीन,चार तथा पाँच को 12 से 12.30 बजे तक रेडियो पर आने वाले कार्यक्रमों द्वारा अँग्रेजी सिखाने का कार्य करवाया। रेडियो में जो भी क्रियाएँ करने के लिए कहा जाता मैं वो छात्राओं से करवाती थी। इससे वे अँग्रेजी में गिनती, कविता, पशु-पक्षियों के नाम, फल-सब्जियों के नाम, दिन व महिनों के नाम तथा छोटे-छोटे वाक्य बोलना सीख गईं।

शिक्षण कार्य करवाते समय बीच-बीच में खेल व अन्य गतिविधियाँ छात्राओं से करवाती हूँ जिससे उनकी शिक्षण में रुचि बनी रहती है। कुछ छात्राएँ नियमित रूप से विद्यालय नहीं आ पाती थीं। जिसके कारण वे अपने कक्षा स्तर से बहुत पिछड़ गई थीं। यदि वे विद्यालय आती भी थीं तो अधिक समय तक विद्यालय में रुकती नहीं थीं। यदि विद्यालय के गेट में ताला लगा दिया जाता था तो चहारदीवारी छोटी होने के कारण लाँघकर या फाटक पर चढ़कर भाग जाया करती थीं। कुछ छात्राएँ तो पोषाहार मिलने तक ही कक्षा में टिक पाती थीं। मैंने उन्हें विद्यालय से जोड़ने को प्रयत्न किया तथा उनके स्तर के अनुसार शिक्षण कार्य करवाया।

शैक्षणिक स्थिति

कक्षा पाँच में पढ़ने वाली छात्राएँ सोना कीर व कोकिला कीर की शैक्षणिक स्थिति कमजोर ही थी। इनके अभिभावक मुख्य रूप से कृषि कार्य करते थे। नदी के किनारे व बाँध के पास ककड़ी, खरबूजे, प्याज, तरबूज आदि फसलें उगाने का कार्य करते हैं। इस कारण उन्हें स्थायी रूप से कुछ समय के लिए वहीं जाकर रहना पड़ता है। अतः यह बच्चियाँ भी अभिभावकों के साथ चली जाया करती थीं। जब महीने भर बाद वापस विद्यालय पहुँचती थीं तो महीने डेढ़ महीने में जो पढ़ाया गया है उससे तो वे महरूम रहती ही थीं साथ ही उन्हें जो कुछ पहले आता था, निरन्तर अभ्यास न करने की वजह से उसे भी भूल जाया करती थीं। इन लड़कियों को सही ढंग से ए बी सी डी के शब्द व गिनती के अंकों की भी पहचान नहीं थी।

जब कक्षा चार में गणित विषय पढ़ाना शुरू किया तो पाया कि कुछ बालिकाओं को तो गिनती में अंकों का भी ज्ञान नहीं था। कक्षा चार की गणित की किताब से उन्हें जोड़, बाकी, विस्तारित रूप, आरोही-अवरोही क्रम आदि से सम्बन्धित सवाल हल कराए तो पाया कि कक्षा की बहुत ही कम लड़कियाँ इन सबको समझ पा रही हैं। मैंने उनमें से कुछ लड़कियों को खड़ा करके ब्लैकबोर्ड पर सवाल हल करने के लिए कहा। उनसे किताब में लिखी संख्याओं को श्यामपट्ट पर लिखने को कहा। उन्होंने उस संख्या को गलत लिखा। लिखी गई संख्या को पढ़ने के लिए कहा तो उसको भी गलत पढ़ा। छात्राओं में इकाई, दहाई, सैंकड़ा व हजार की समझ नहीं बनी थी। कुछ छात्राओं को इकाई, दहाई, सैंकड़ा का ज्ञान था लेकिन उन्हें जोड़, बाकी, गुणा, भाग इत्यादि सवाल हल करना नहीं आता था। कुछ को सामान्य जोड़ बाकी आदि से सम्बन्धित सवाल तो आते थे किन्तु हासिल के जोड़, बाकी, गुणा, भाग नहीं आते थे। यदि जोड़ बाकी आते भी थे तो उन्हें गुणा भाग के सवाल हल करना नहीं आता था। क्योंकि बहुत सी लड़कियों को तो 5 तक के पहाड़े भी मुश्किल से याद थे या याद ही नहीं थे।

समस्या जो मैंने पहचानी

सबसे प्रमुख समस्या यह थी कि कक्षा की सभी छात्राओं का स्तर कक्षा चार से कम था। साथ ही सभी छात्राओं का शैक्षणिक स्तर भी एक समान नहीं था। कक्षा में तीन स्तर थे। एक स्तर उन छात्राओं का था जो अन्य छात्राओं से ठीक स्थिति की थीं, दूसरा स्तर उन छात्राओं का जो औसत स्तर की थीं अर्थात वे बहुत ज्यादा कमजोर भी नहीं थीं तो होशियार भी नहीं थीं, वे पढ़ने में ठीक-ठाक थीं। तीसरा स्तर उन छात्राओं का था जिनकी शैक्षणिक स्थिति बहुत निम्न थी। अर्थात वे पढ़ने में बहुत कमजोर थीं। उन्हें अंकों का ठीक ढंग से ज्ञान नहीं था।

इस प्रकार सभी स्तर की छात्राओं को एक साथ लेकर पढ़ाना बहुत मुश्किल कार्य था। इस स्थिति में मुझे ऐसा लगता था कि मैं केवल कुछ ही छात्राओं को शिक्षण  कार्य करवा रही हूँ। क्योंकि बाकी छात्राओं की इसमें कोई सहभागिता प्राप्त नहीं हो पाती थी। ऐसे में शिक्षण कार्य बहुत नीरस व अरुचिकर लगता था। बाकी छात्राएँ मूक दर्शक की भाँति चुपचाप बैठी रहती थीं। वे अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं देती थीं। ऐसे में कुछ छात्राएँ अन्य कार्य या शैतानियों में व्यस्त हो जाती थीं। कोई भी छात्रा ज्यादा समय तक मौन स्थिति में नहीं बैठ सकती थी, क्योंकि जो चीज उनको पढ़ाई जा रही है यदि उसका पूर्वज्ञान उन्हें नहीं है तो वो उनको समझ में नहीं आ सकती। और जब कोई चीज उनको समझ में नहीं आ रही है, तो वे कब तक चुप बैठकर उसे समझने का प्रयास करेंगी।

जैसे कि मैं एक बार कक्षा चार में गुणा करने से सम्बन्धित प्रश्‍नावली करा रही थी। एक छात्रा उसमें रुचि न लेकर आसपास की छात्राओं पर कागज आदि फेंककर उनका ध्यान भी अपनी तरफ खींच रही थी। मैंने उसे दो-तीन बार टोका और सवाल समझने के लिए कहा। मेरे डाँटने पर वह छात्रा चुप बैठकर सवाल हल करने का तरीका समझने लगी। मैंने सोचा कि उसने इतना ध्यान दिया है तो उसे गुणा करने का तरीका समझ में आ गया है। मैंने उस छात्रा को एक गुणा करने के लिए दिया। लेकिन वह नहीं कर पाई। मैंने उसे दो तीन बार समझाया कि सवाल हल करने का तरीका क्या है? उस लड़की ने बताया कि उसे तो पहाड़े व जोड़ (हासिल) ही नहीं आते हैं।

बहुत विचार करने तथा साथी अध्यापिकाओं से बात करने के पश्‍चात इस समस्या का कारण यही समझ में आ रहा था कि लगातार विद्यालय न आने या लम्बे अन्तराल के पश्‍चात विद्यालय आने के कारण छात्राएँ अपनी कक्षा के स्तर से बहुत पिछड़ गई थीं।

अपने छोटे भाई बहनों के कारण नियमित रूप से विद्यालय न आने वाली छात्राओं को मैंने सुझाव दिया कि वे उन्हें भी अपने साथ विद्यालय में ले आया करें। इसके बाद वे छात्राएँ उन्हें अपने साथ विद्यालय लेकर आने लगीं।

हमने घर-घर जाकर अभिभावकों से सम्पर्क किया। हमारे विद्यालय में कार्यरत अध्यापिका श्रीमती संध्या पारीक इसी गाँव (भासू) की निवासी हैं। अतः स्थानीय निवासी होने के कारण उन्होंने अभिभावकों से सम्पर्क करने में मेरा बहुत सहयोग दिया, क्योंकि वे यहाँ की छात्राओं व उनके अभिभावकों की परिस्थितियों के बारे में अधिक जानकारी रखती थीं। गाँव के कुछ प्रतिष्ठित लोगों से भी हमने बात की कि वे उन लोगों को जाकर समझाएँ जो लड़कियों को विद्यालय नहीं भेजते हैं।

शुरू-शुरू में कुछ लोगों के विरोध हमें झेलने पड़े। कुछ ने कहा- अगर लड़की को स्कूल भेजेंगे तो हमारे घर का काम कौन करेगा। स्कूल जाकर क्या सीखेगी? घर पर घर का काम तो सीखेगी। आगे लड़की को घर ही तो सम्भालना है। कुछ ने कहा-आप पढ़ाते लिखाते तो हो नहीं, हमारी लड़की को तो कुछ भी पढ़ना नहीं आता। हम विद्यालय क्यों भेजें? एक महिला ने कहा-हम तो मेहनत मजदूरी करने निकल जाते हैं, पीछे से हमारे घर की व जानवरों की देख-रेख के लिए तथा जानवरों को चराने के लिए किसी का घर पर रहना तो जरूरी है। एक व्यक्ति ने कहा-पढ़ लिखकर हमारी बच्चियों की कौन सी नौकरी लग जाएगी। आजकल नौकरी लगना इतना आसान थोड़े ही है?

मैंने उन्हें समझाया , आप मुझे देखिए, हम घर का काम तो करते ही हैं, साथ ही स्कूल में भी पढ़ाते हैं। यदि हमारे माँ-पिता ने मुझे नहीं पढ़ाया होता, तो क्या हम आज इस स्थिति में होते? आप अपनी लड़कियों को नियमित रूप से विद्यालय नहीं भेजते हो तो उन्हें पढ़ना कहाँ से आएगा? यदि आपकी बच्ची पढ़ लिख जाएगी तो यह आवश्‍यक नहीं कि वह नौकरी ही करे। पढ़ी लिखी लड़कियाँ घर की जिम्मेदारियाँ भी अच्छी तरह से उठा सकती हैं। वह कोई उद्योग धंधा खोलकर आत्मनिर्भर भी बन सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने अधिकारों व कर्तव्यों को अच्छी तरह समझ सकती है। यदि उस पर कोई अत्याचार करता है या शोषण करता है तो वह उसके खिलाफ आवाज़ उठा सकती है तथा सम्मान के साथ जी सकती है।

इस प्रकार मैं उनसे नियमित रूप से सम्पर्क कर बात करती थी जिसके  सकारात्मक परिणाम बाद में देखने को मिले।

जो छात्राएँ अपने कक्षा स्तर से बहुत पिछड़ गई थीं, उनकी स्थिति को समझने के बाद मैंने इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए अपने साथी अध्यापकों से विचार विमर्श किया जिससे बच्चों के स्तर सुधारने व नियमित रूप से विद्यालय न आने वाले बच्चों को विद्यालय से जोड़ने पर बातचीत हुई।

     तत्कालीन स्थिति के सन्दर्भ में मैंने कुछ लक्ष्य निर्धारित किए-

  • विद्यालय न आने वाली छात्राओं को विद्यालय से जोड़ना।
  • नियमित रूप से विद्यालय ना आने वाली छात्राओं के अभिभावकों से सम्पर्क कर समस्या का समाधान करना।
  • छात्राओं के शैक्षणिक स्तर की पहचान करना।
  • छात्राओं को उनके स्तर के अनुसार शिक्षण कार्य करवाना।
  • छात्राएँ जिस कक्षा में पढ़ रही हैं, उस कक्षा के स्तर को प्राप्त कराना।

अपेक्षित स्थिति प्राप्त करने के लिए मैंने समय सीमा भी निर्धारित की। जैसे कि मुझे अंकों का ज्ञान करवाने के लिए 10-15 कालांश चाहिए थे। मुझे लगभग 8-10 दिनों में सब छात्राओं को अंकों का ज्ञान करवाना था तो मेरे सामने समय सीमा की भी पाबन्दी थी। इसके लिए मैंने अतिरिक्त कक्षाएँ भी लीं। विद्यालय समय 10:30 का होता है तो मैं छात्राओं को 9:30 बजे विद्यालय बुला लेती थी। छात्राओं को विद्यालय समय से पहले बुलाने पर कुछ अभिभावकों ने आपत्ति भी उठाई। मुझे भी घर से जल्दी निकलना पड़ता था, सो मेरे घर वालों ने भी विरोध किया, क्योंकि मेरे ऊपर घर की भी कुछ जिम्मेदारियाँ थीं। इसके लिए मुझे सुबह जल्दी उठना पड़ता था ताकि मैं घर का भी कार्य समय पर निपटा सकूँ। घर वालों को तो मैंने समझा दिया था किन्तु छात्राओं के अभिभावकों को समझाने में मुझे थोड़ी दिक्कत आई। हमारी प्रधानाध्यापिकाजी ने इसमें मेरी मदद की उन्होंने कहा, मैडम को भी घर से 9 या पौने 9 बजे निकलना पड़ता है। यदि ये चाहें तो आराम से घर का कार्य निपटा कर 10:30 बजे विद्यालय आ सकती हैं किन्तु आपके बच्चों की भलाई के लिए यह जल्दी आती हैं। कुछ ग्रामीणों ने भी उन्हें समझाने में हमारी मदद की।

स्‍तर सुधारने का प्रयास

छात्राओं का स्तर एक समान नहीं था। छात्राओं को एक साथ एक अध्ययन बिन्दु पर अध्ययन कराना मुश्किल कार्य था। अतः इन परिस्थितियों से निपटने के लिए एवं छात्राओं का स्तर सुधारने के लिए मैंने एक योजना बनाई कि क्यों न उन्‍हें  उनके स्तर के अनुसार शिक्षा दी जाए। इस सम्बन्ध में मैंने प्रधानाध्यापिका व अन्य अध्यापिकाओं से बातचीत की। कुछ शिक्षकों ने मुझे सलाह दी कि मैं उन छात्राओं को जिनका स्तर अपनी कक्षा के स्तर से बहुत निम्न था उन्हें दूसरी या तीसरी कक्षा में बिठाऊँ ताकि वे शुरू से वापस पढ़ना सीख सकें। मुझे यह विचार कुछ ठीक नहीं लगा क्योंकि छोटी कक्षाओं में सिखाने की गति थोड़ी धीमी होती है। यदि मैं उन छात्राओं को छोटी कक्षाओं में बिठाती हूँ तो भी वे केवल उस छोटी कक्षा के स्तर को ही प्राप्त कर सकती है। फिर मैंने सोचा की कोशिश करने में क्या हर्ज है मैंने कक्षा चार की तीन चार छात्राओं को कक्षा दो में बिठा दिया।

पहले तो चौथी कक्षा की छात्राएँ दूसरी कक्षा में बैठने को राजी ही नहीं हुईं। उन्हें बहुत समझाने के बाद वे दूसरी कक्षा में बैठ गईं। एक-दो दिन दूसरी कक्षा में बैठने के बाद दो छात्राओं ने तो विद्यालय आना ही बन्द कर दिया। उन्हें बुलाने के लिए अन्य छात्रा को भेजा तो खबर आई कि उन्हें कक्षा चौथी से दूसरी कक्षा में कर दिया गया है, इसलिए अब वे विद्यालय नहीं आएँगी। कुछ छात्राओं के अभिभावक विद्यालय में ही आ गए। वे कहने लगे कि हमारी लड़की तो चौथी कक्षा में पढ़ती है फिर आपने इसे दूसरी कक्षा में कैसे बिठा दिया? हमारी लड़की रोज स्कूल आते वक्त रोती है कि मैडम ने तो मुझे दूसरी में कर दिया है, मैं विद्यालय नहीं जाऊँगी। मैंने व अन्य अध्यापिकाओं ने उन्हें समझाया कि ये लड़कियाँ पढ़ने में कमजोर हैं थोडे़ दिन यदि वे इस कक्षा में बैठेंगी तो उन्हें सही ढंग से गिनती, जोड़-बाकी व किताब पढ़ना आ जाएगा। बहुत समझाने पर अभिभावक मान गए,  लेकिन बच्चों के मन में हीन भावना आती ही है कि पूरी कक्षा मे से हमें ही छोटी कक्षा में क्यों बिठाया गया। बच्चों का मन बहुत ही कोमल होता है। अतः मुझे स्थिति और भी खराब होती नजर आई। मैंने उन छात्राओं को वापस चौथी कक्षा में बिठाया तथा विद्यालय नहीं आने वाली छात्राओं को भी बुलाकर समझाया व वापस उन्हें उसी कक्षा में बिठाया जिसमें वे थीं। बाकी अध्यापकों को मेरा उन्हें कक्षा में वापस बैठाना अच्छा नहीं लगा। वे कहने लगे कि आप छात्राओं का स्तर भी सुधारना चाहती हैं और उन्हें छोटी कक्षा में भी नहीं बिठाती हो तो छात्राओं की कमजोरी दूर कैसे होगी। मैंने उन्हें समझाया कि क्यों न हम एक कक्षा में ही छात्राओं को उनके स्तर के आधार पर शिक्षा दें।

उन्होंने कहा कि यह कैसे सम्भव हो सकता है? मैंने उन्हें समझाया कि कक्षा में तीन स्तर के बच्चे होते हैं, होशियार, औसत व निम्न स्तर के या कमजोर बच्चे। उनके स्तर के अनुसार बच्चों के कक्षा में ही तीन समूह बना कर उन्हें वही सिखाया जाए जो उन्हें नहीं आता है।

मेरी बात सुन कर एक अध्यापिका ने कहा कि कहना तो बहुत आसान है किन्तु करना बहुत मुश्किल है। इसके लिए बहुत मेहनत व समय की आवश्‍यकता होगी। यदि बच्चों ने सहयोग नहीं दिया तो यह योजना धरी की धरी रह जाएगी। मैंने उन्हें समझाया कि हम यदि बच्चों का स्तर सुधारने की कोशिश अभी से नहीं करेगें तो बच्चों की कमजोरी बढ़ती ही चली जाएगी। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाएगी। बच्चे अपने कक्षा स्तर से बहुत अधिक पिछड़ जाएँगे और हो सकता है कि ये बच्चे विद्यालय आना ही छोड़ दें या बड़ी कक्षा में जाकर अनुतीर्ण हो जाएँगे तो इनके अभिभावक ही इन्हें इनकी पढ़ाई छुड़वा लेगें।

इस प्रकार मैंने बच्चों को पढ़ाने की जो योजना बनाई उस पर किसी ने असहमति प्रकट नहीं की तो सहमति भी प्रकट नहीं की।

प्रयास कुछ इस तरह किया

सबसे पहले छात्राओं के स्तर का निर्धारण करना था। इसके लिए मुझे ज्यादा परेशानी नहीं हुई क्योंकि मैं कक्षा चार की छात्राओं को गणित विषय पढ़ा रही थी तो मुझे उनके स्तर के बारे में ज्यादा जानकारी थी। कुछ जानकारी मैंने अन्य विषयाध्यापकों से ली । थोड़ी बहुत जानकारी उनका टेस्ट, कक्षा टेस्ट तथा मौखिक परीक्षा के आधार पर प्राप्त की। प्राप्त जानकारी के आधार पर मैंने कक्षा की छात्राओं के नाम की एक समूहवार सूची बना ली। पहले समूह में होशियार छात्राओं के नाम, दूसरे समूह में उन छात्राओं के नाम लिखे जो औसत स्तर की थीं तथा तीसरे समूह में उन छात्राओं के नाम लिखे जिनका स्तर अन्य छात्राओं से बहुत कम था।

छात्राओं को तीन समूहों में बैठाकर उन्हें जहाँ तक की जानकारी है उससे आगे की जानकारी दी। जैसे प्रथम समूह जिसमें होशियार छात्राएँ होती थीं, उन्हें पाठ्यपुस्तक की किसी प्रश्‍नावली का सवाल हल कराकर या समझाकर बाकी के सवाल हल करने के लिए कह देती थी। दूसरे समूह में औसत स्तर की छात्राएँ थीं । उन्हें उनके स्तर के अनुसार यदि सामान्य जोड़ बाकी, पहाड़े आदि आते थे तो हासिल के जोड़, बाकी आदि कराना सिखाती थी। दूसरे समूह को सिखाती जब तक तीसरे समूह को गिनती या उल्टी गिनती आदि लिखने का कार्य करवाती थी ताकि उनको भी अंकों की पहचान हो।

दूसरे व तीसरे समूह को सिखाने के लिए कभी-कभार खेल इत्यादि गतिविधियों का सहारा भी लिया जाता था। जैसे इकाई, दहाई, सैंकड़ा की जानकारी कराने के लिए लड़कियों को सामने खड़ा करके उन्हें इकाई, दहाई, सैंकड़ा का नाम दे दिया जाता था। खड़ी लड़कियों को अपने हाथों की अँगुलियों से कोई भी अंक बनाने के लिए कहा जाता था। बैठी हुई छात्राओं को समझा दिया जाता था कि ईकाई में एक संख्या होती है, दहाई में 10, इकाई व दहाई को मिलाकर बोला जाता है तथा सैंकड़ा में 100 होता है। इस प्रकार खेल के माध्यम से बच्चे जल्दी व रूचि के साथ पढ़ना सीखते हैं। इसी प्रकार आरोही व अवरोही की अवधारणा स्पष्ट करने के लिए 4-5 अलग अलग कद की छात्राओं को अन्य छात्राओं के सामने खड़ा किया जाता था, फिर उन्हें लम्बाई के आधार पर बढ़ते क्रम (आरोही क्रम) में या घटते क्रम (अवरोही क्रम) में खड़ा करके छात्राओं को समझाया जाता था। व्यापक रूप से समझाने के लिए अन्य सहायक सामग्री का भी उपयोग किया जाता था।

इस प्रकार से स्तर के अनुसार अध्ययन कराने में भी मुझे कुछ समस्याओं का सामना भी करना पड़ा। जैसे मुझे औसत स्तर के बच्चों व कमजोर बच्चों को अधिक समय देना पड़ता था। होशियार छात्राएँ तो थोडी सी देर में ही अपना कार्य पूरा कर लेती थीं। तो मैंने उनका सहयोग कमजोर बच्चों की सहायता करने में लिया। उनको कमजोर बच्चों को सिखाने या उनका कार्य जाँचने में व्यस्त रखा जाता था। जिससे अनुशासनहीनता की स्थिति भी नहीं रहती थी। यदि मुझे लगता था कि बच्चे पढ़ने में रूचि नहीं ले रहे या थक गए है तो बीच बीच में कोई खेल या अन्य गतिविधियाँ करवायी जाती थीं। जिससे छात्राएँ खेल-खेल में पहाड़े मौखिक जोड-बाकी आदि सीख जाती हैं।

इस तरह की गतिविधियों में कमजोर बच्चों की अधिक से अधिक सहभागिता प्राप्त की जाती थी, जिससे बच्चों की सीखने में तो रुचि बढ़ती ही थी साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ता था। कमजोर में यदि सुधार देखा जाता था तो प्रार्थना सभा में या पूरी कक्षा में उनकी प्रशंसा कर प्रोत्साहित किया जाता था। कभी बच्चों को पुरस्कार भी दिए जाते थे। जिससे उनका मनोबल बढ़ता था।

परिवर्तन नजर आया  

प्रयास के फलस्वरूप बहुत परिवर्तन देखने को मिला। छात्राओं के स्तर मे सुधार देखा गया। अब मुझे ऐसा नहीं लगता था कि मैं केवल कुछ ही छात्राओं को अध्ययन करवा रही हूँ। क्योंकि कक्षा की सभी लड़कियों की सहभागिता मुझे प्राप्त हो रही थी। बालिकाओं को भी पढ़ने में रुचि आ रही थी। छात्राओं को पहले जहाँ अंकों की भी सही पहचान नहीं थी। उन्होंने अब जोड, बाकी, गुणा, भाग आदि से सम्बन्धित सवाल हल करना सीख लिया था। कक्षा 4 की एक छात्रा पूजा मेघवंशी जो बीच में एक लम्बे अन्तराल तक विद्यालय नहीं आ पाई थी। उसे 100 तक की गिनती भी सही ढंग से नहीं आती थी, न ही वह अंकों को पहचानकर बता पाती थी। लेकिन वह बालिका गिनती ही नहीं 15 तक के पहाडे़ बोलना व लिखना,  हासिल के जोड़, बाकी व छोटे-छोटे गुणा व भाग करना सीख चुकी है व नियमित रूप से विद्यालय भी आती है। अलग-अलग समूह बनाकर पढ़ाने से छात्राओं के शैक्षणिक स्तर में तो सुधार हुआ ही है, साथ ही बालिकाओं में आत्मविश्वास की भावना में भी वृद्वि हुई है।

अब छात्राएँ मुझसे किसी भी विषय पर खुल कर बात करती हैं। यदि उन्हें कुछ समझ में नहीं आता है तो बेझिझक मेरे पास आकर मुझसे सवाल पूछती है। छात्राएँ विद्यालय समय से पूर्व घर नहीं जाती हैं। बिना पूछे कक्षा से बाहर नहीं जातीं, न ही अन्दर आती हैं। हिन्दी में बात करने की कोशिश करती हैं। गणित के साथ अन्य विषय में भी छात्राओं में सुधार हुआ हैं। गणित विषय में जो सुधार हो रहा था, उसके बारे में अन्य अध्यापकों से मेरी बात होती रहती थी। मैं उन्हें बताती रहती थी कि किस प्रकार कमजोर छात्राओं में लगातार सुधार होता जा रहा है। कुछ अध्यापिकाओं की मुझे इसके लिए तारीफ भी मिली।

कुछ अध्यापिकाएँ मेरे पढ़ाने के तरीके से प्रभावित भी हुईं। एक अध्यापिका श्रीमती विजय लक्ष्मी चौहान ने तो इस तरीके से अँग्रेजी विषय में शिक्षण कार्य भी करवाया। हमारी प्रधानाध्यापिका श्रीमती विनोद शर्मा ने भी इस प्रकार के शिक्षण कार्य करवाने पर हमारी प्रशंसा कर हमें प्रोत्साहित किया तथा अन्य अध्यापिकाओं को भी यह तरीका अपनाने की सलाह दी।

मेरा प्रमुख सिद्वान्त यही है कि बच्चों को उनके स्तर के अनुसार ही शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षण कार्य को रुचिकर बनाने के लिए खेल व अन्य गतिविधियों का भी सहारा लिया जाना चाहिए। बच्चों की अधिक से अधिक सहभागिता प्राप्‍त करनी चाहिए। शिक्षण कार्य में बच्चा जितना सक्रिय रहता है, वह उतना ही अधिक सीख रहा है। शिक्षण शिक्षक केन्द्रित न होकर बाल केन्द्रित होना चाहिए।

मैना कुमारी खटीक

  • एम.ए.,बी.एड.,
  • राजकीय बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय, भासू,टोडारायसिंह, टोंक
  • खाली समय में किताबें पढ़ना व संगीत सुनना पसन्द है

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009-10 तथा 2010-11 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। मैना कुमारी खटीक वर्ष 2009-10 में ‘शिक्षण में सीखने-सिखाने के बेहतर प्रयास’ के लिए चुनी गई हैं। यह लेख पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं।

टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने मैना कुमारी से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इसी बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं।

हम मैना कुमारी, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

om parkash sharma का छायाचित्र

मैना कुमारी खटीक जी का प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं जिसके लिए वे सम्मान की अधिकारिणी है।न केवल पिछड़े क्षेत्र और ग्रामीण अंचल में काम कर रहे अध्यापकों के सामने ही इस प्रकार की समस्याएँ आती हैं अपितु लगभग सभी सरकारी विद्यालयों में इस प्रकार की समस्याएँ आती हैं। बच्चे एक दूसरे से बेझिझक व बहुत जल्दी सीखते हैं। यदि विद्यार्थियों को समूहों में बाँटकर प्रतिभाशाली बच्चों को जो दिए गए निर्देशों को जल्दी समझ जाते हैं को उनके सहपाठी पढ़ाई में कमजोर बच्चों को सिखाने की जिम्मेदारी सौंप दी जाए तो जहाँ कमजोर बच्चे जल्दी सीखने लगेंगे वहीं प्रतिभाशाली बच्चों मे विश्वास उत्पन्न होने के साथ नेतृत्व की भावना का विकास भी होगा तथा जिन बच्चों को अध्यापक द्वारा समझाने की फिर भी आवश्यकता रहती है उन को समझाने के लिए शिक्षक को समय भी मिल जाएगा। ऐसा प्रयोग करके भी बच्चों में सुधार लाया जा सकता है।

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