किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मूल्यवर्धन ने दिखाई राह, बदल दिया जीवन

शिरीष खरे

यह एक ऐसे बच्चे की कहानी, जिसके गुस्से और आए दिन के झगड़ों से तंग आकर उसमें किसी तरह के बदलाव की उम्मीद उसकी शिक्षिका तक छोड़ चुकी थीं, लेकिन आज यही अपने स्कूल और मोहल्ले में एक आदर्श बच्चे के तौर पर पहचाना जाता है। परिवार में माँ अपने बच्चे के बर्ताव में आए इस अन्‍तर के लिए शिक्षिका और स्कूल को जिम्मेदार मानती हैं, जबकि स्कूल की शिक्षिका इसके पीछे मूल्यवर्धन की कहानी सुनाती हैं। वे बताती हैं कि मूल्यवर्धन ने पहले उन्हें बदला। इसलिए, वे अपने स्कूल के बच्चों को बदल सकीं। लेकिन, उस बच्चे में आया बदलाव इतना मुश्किल और सुखद था कि इसे सिर्फ वही समझ सकती हैं। आइए जानें, बच्चे और शिक्षिका के बीच के सम्‍बन्‍ध, एक-दूसरे के प्रति आपसी समझ और सीखने की छोटी लेकिन महत्त्वपूर्ण प्रकिया के बारे में... 

''बच्चे क्या होते हैं, मिट्टी का गोला होते हैं, अपने हिसाब से ढाल लेंगे।''- दो साल पहले तक शमा शेख अपने स्कूल में पढ़ने वाले हर बच्चे के बारे में ऐसा ही सोचा करती थीं। लेकिन, फिर उन्होंने जाना कि सारे बच्चे अलग-अलग मिट्टी के होते हैं। सबका स्वभाव एक जैसा नहीं होता। उन्होंने सोचा कि बच्चे के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए उन्हें ही बच्चों के हिसाब से ढलना होगा। और इन दो साल में शमा शेख ने अपने को पूरी तरह बच्चों के हिसाब से ढाल लिया।

शमा शेख जिला परिषद प्राथमिक शाला- कुंभारवाड़ी की शिक्षिका हैं। यह स्कूल जिला-मुख्यालय रत्नागिरी से करीब 40 किलोमीटर दूर लांजा ब्लॉक के अन्‍तर्गत आता है। हमने शमा से पूछा कि ऐसा कैसे हुआ तो यह बात बाद में। शमा शेख अपनी बातों से हमें दो साल पीछे ले जाती हैं। वे एक ऐसे बच्चे के बारे में बताती हैं जिसके व्यवहार को बदलने की बात उन्होंने सोचनी भी बन्‍द कर दी थी।

वे कहती हैं, ''शोर और शरारत तो सभी बच्चे करते हैं, लेकिन वह बच्चा न शोर करता, न शरारत करता, न पढ़ता-लिखता और न ही कुछ सुनता-समझता था। दो साल पहले वह पहली में था। अब आप सोचेंगे कि पहली के बच्चे के बारे में इतना क्या सोचना! मगर, इस छोटी उम्र में भी मैं बता नहीं सकती कि उसमें कितना गुस्सा भरा हुआ था! उसका गुस्सा देख तो कई बार मैं भी डर जाती।''

शमा शेख जिस बच्चे के बारे में बात कर रही हैं वह है- कक्षा तीसरी में पढ़ने वाला अर्थव (परिवर्तित नाम) । शमा बताती हैं कि तब अर्थव घर, स्कूल और मोहल्ले में अपने से छोटे और बड़ों बच्चों से लड़ता रहता था, वह कभी किसी बच्चों को पीटता और कभी खुद पिट जाता था। शमा उसके इस व्यवहार से चिंतित रहतीं। जैसा कि शमा बताती हैं कि उन्होंने अर्थव के व्यवहार में सुधार लाने के लिए बहुत मेहनत की। लेकिन, अर्थव की जिद और उग्रता में कोई कमी आते न देख उन्होंने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया। हालाँकि, एक शिक्षिका होने के नाते वे अपनी इस हार से खुश नहीं थीं।

फिर एक छोटी-सी चुप्पी के बाद शमा की आँखों में चमक आ जाती है। और फिर वह कहती हैं, ''कमाल हो गया! उसे बदला हुआ देख मेरा खुद अपने पर विश्वास बढ़ गया। यही लगता है कि ऐसे कोई हालात नहीं जो बदले न जा सकें।''

हम आपको बता दें कि शमा शेख से बातचीत के लिए स्कूल के एक छोटे-से कार्यालय में बैठने से पहले हमने पूरा स्कूल घूम लिया। हमने गौर किया कि हर लिहाज से छोटा होने पर भी स्कूल का पूरा परिसर बहुत सुन्‍दर और साफ-सुथरा है। खपड़ों वाली छत के इस भवन में एक कार्यालय के अलावा दो बड़े कमरे और एक हॉल है। इस भवन के बाहर स्कूल परिसर में ही दो शौचालय हैं। परिसर के बगीचे में लगे नारियल के लम्‍बे वृक्ष दूर से ही आकर्षित करते हैं।

स्कूल की प्रधानाध्यापिका नेहा कामत ने हमें बताया कि मराठी माध्यम का यह स्कूल वर्ष 1985 में स्थापित हुआ था। कहने के लिए यह कुंभारों (मटका बनाने वाले कारीगर) की बस्ती है, लेकिन 600 की आबादी वाली इस बस्ती में कोई परिवार अब मटका नहीं बनाता। ज्यादातर पुरुष दो किलोमीटर दूर लांजा में मजदूरी करने जाते हैं, जबकि महिलाएँ दूसरों के घरों में काम करती हैं। इस स्कूल में सिर्फ 17 बच्चे पढ़ते हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए यहाँ दो शिक्षिकाएँ हैं।

ऐसा कैसे हुआ? इस बारे में पूछने पर शमा शेख बताती हैं कि दो साल पहले उन्होंने लांजा में ही मूल्यवर्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया था। चार दिनों के प्रशिक्षण में उन्होंने जाना कि इसका पाठ्यक्रम बहुत अच्छा है। शमा कहती हैं, ''मूल्यवर्धन में अपनाई जाने वाली शिक्षण की पद्धति से मैं सबसे ज्यादा प्रभावित हुई। मुझे लगा कि यह बच्चों को सिखाने का बहुत प्रभावशाली तरीका है।''

दरअसल, पुणे स्थित समाजसेवी संस्था 'शांतिलाल मुथ्था फांउडेशन' ने एक दशक पहले 'मूल्यवर्धन' नाम से एक कार्यक्रम विकसित किया है, जिसे राज्य सरकार के सहयोग से राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में चलाया जा रहा है। इसमें स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों पर आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों को लोकतांत्रिक नागरिक बनाना है।

फिर शमा ने बताया कि अब हमें आर्यन और बाकी बच्चों से मिलना चाहिए।

एक दूसरे दृश्य में अब हम कक्षा के भीतर बैठकर बच्चों की गतिविधियाँ देख रहे हैं। सभी बच्चे एक वृत्ताकार में बैठे हैं। ये बच्चे मूल्यवर्धन कक्षा-तीसरी की विद्यार्थी गतिविधि पुस्तिकाएँ खोलकर बैठे हुए हैं। एक के बाद एक हर बच्चा अपनी जगह पर खड़ा होकर एक कहानी की कुछ पंक्तियों को पढ़ रहा है। कहानी का नाम है- गलतफहमी। यह कहानी चन्‍दू और सागर नाम के दो दोस्तों में गलतफहमी के कारण हुए झगड़े के बारे में है।

कहानी पूरी पढ़ने के बाद बच्चे इस कहानी के बारे में बात करते हैं। इस दौरान, हम भी उनके साथ चर्चा में शामिल हो जाते हैं। वे बताते हैं कि दो दोस्तों को आपस में होने वाले झगड़े से कैसे बचा जाना चाहिए।

हमने देखा कि बहुत सारे बच्चों के साथ वृत्ताकार में बैठकर अर्थव भी इस चर्चा में शामिल है। हमने अर्थव से पूछा कि यदि आप चन्‍दू होते तो आप क्या करते? उसने कहा, ''यदि मैं चन्‍दू होता तो सागर से माफी माँगता, क्योंकि चन्‍दू के पापा ने चन्‍दू के लिए जो पेन खरीदा था, वैसा ही पेन सागर के पास भी था, और चन्‍दू गलती से समझ बैठा कि सागर ने उसका पेन चुराया है।'' फिर हमने उससे पूछा कि इसमें माफी माँगने की क्या बात है, यदि वह चन्‍दू होता तो माफी क्यों माँगता? अर्थव ने उल्टा हमसे पूछा, ''यदि हमसे गलती होती है तो उसे मानने या सॉरी बोलने में क्या कोई बुराई है?''

इसके बाद, हमने अर्थव से जानना चाहा कि मूल्यवर्धन में उसे क्या पसन्‍द है और क्यों? उसने बताया कि वैसे तो मूल्यवर्धन में उसे बहुत कुछ पसन्‍द है, पर कहानियाँ उसे सबसे ज्यादा पसन्‍द हैं, क्योंकि उन कहानियों बहुत कुछ ऐसा था जो उसे पता नहीं था, जैसे गलतफहमी कहानी को पढ़कर सारे बच्चे एक-दूसरे से जानते हैं कि वे अच्छे दोस्त कैसे बन सकते हैं। इसी तरह, अर्थव ने बताया कि उसे कुछ अभ्यास भी पसन्‍द हैं। जैसे, हमें घर में कैसे रहना चाहिए, या हमें दूसरों की मदद कैसे करनी चाहिए।

अर्थव के साथ थोड़ी देर बात करने के बाद हमने जान लिया कि मूल्यवर्धन की गतिविधियों में उसका मन क्यों लगने लगा, कैसे इन गतिविधियों की मदद से उसे अपनी गलतियों का अहसास होने लगा, कैसे उसने अपनी गलतियों से सबक लिया और उन्हें दूर किया। अर्थव के साथ पढ़ने वाले यश, रोशन, संजना और पूनम ने भी अर्थव के व्यवहार में आ रहे बदलाव को देखा है। इस बारे में हमने कुछ बच्चों के साथ अलग से बात की। उन्होंने बताया कि तब अर्थव को गुस्सा आने पर वह पढ़ने वाले बच्चों को मारता था, इसलिए, कोई उससे बात नहीं करता था। लेकिन, अब ऐसा नहीं है, अब सब उसे पसन्‍द करने लगे हैं, वह भी सबका दोस्त बन गया है।

बाकी बच्चों के साथ बात करके हमें यह भी लगा कि अर्थव तो एक उदाहरण है ही। लेकिन, ये बच्चों भी अर्थव जैसे बच्चों के व्यवहार को बदलने में उनकी मदद कर रहे हैं, जो एक अच्छा संकेत है।

इसके बाद, जब हम वापिस कार्यालय पहुँचे तो शमा शेख ने बताया कि मूल्यवर्धन के सत्रों से उन्हें बच्चों को सिखाने में काफी मदद मिल रही है। इसकी वजह है कि मूल्यवर्धन का पाठ्यक्रम बच्चों की उम्र को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इससे बच्चे समझ पा रहे हैं कि वे क्या हैं और उन्हें दूसरे के साथ किस तरह से बातचीत करनी चाहिए। वे कहती हैं, ''वैसे तो सभी बच्चों में बदलाव आया है, पर मैं यह सोचकर हैरान थी कि वह बच्चा भी बदलने लगा जिसके बदलने की मैं उम्मीद ही छोड़ चुकी थी। अर्थव में आया बदलाव असल में मेरे भीतर आया बदलाव है, क्योंकि मूल्यवर्धन ने मेरी सोच बदली, मुझे नई दिशा दी और मैंने देखा कि दो साल में मैंने एक ऐसे बच्चे का व्यवहार बदला दिया है, जो बहुत उग्र और हिंसक था।''

अर्थव में इतना गुस्सा कहाँ से आया था तो इस बारे में शमा ने कुछ नहीं बताया। लेकिन, प्रधानाध्यापिका नेहा कामत ने यह जरूर बताया कि अर्थव की माँ अक्सर स्कूल में आती थीं, वे शिकायत करती थीं कि अर्थव गालियाँ सीख रहा है। नेहा बताती हैं कि अर्थव के व्यवहार में बदलाव से अब उनके लिए भी पूरी कक्षा को पढ़ाना आसान हो गया है। अब अर्थव की माँ से बात होती है तो वे बताती हैं कि अर्थव उनके कामों में मदद भी करता है।

हमने अर्थव की माँ विजिता (परिवर्तित नाम) से भी बात की। उन्होंने हमें बताया कि अर्थव पहले इतना जिद्दी था कि छोटी-सी बात पर नाराज होने पर दिन भर खाना नहीं खाता था। वे कहती हैं, ''उम्र के साथ बच्चा समझदार तो होता ही है, मगर मुझे लगता है उसे शमा मेम ने बदल दिया।''

शमा कहती हैं कि अर्थव के पास अभी एक साल का समय और है, क्योंकि अगले सत्र में वह तीसरे से चौथी में जाएगा। इसलिए, अगले एक साल मूल्यवर्धन की गतिविधियों से उसमें और अधिक बदलाव आएँगे। शमा हमसे कहती हैं, ''यह बदलाव देखने अगले साल आप फिर आना।''

जब हम स्कूल से जाने के लिए हुए तो अर्थव के साथ कुछ और बच्चे हमसे मिलने हमारे पास आए। उन्होंने हमें गुलाब के फूल दिए। विदा होते समय उनमें से एक बच्चे ने फिर कहा, ''फिर आना!''

हमें लगा कि बदलाव के क्रम को जारी रखने के लिए इस स्कूल की शिक्षिका ही नहीं बच्चे भी पूरी तरह से तैयार हैं।


स्कूल का नाम  : जिला परिषद प्राथमिक शाला कुंभारवाड़ी, रत्नागिरी

भौगोलिक स्थिति : जिला-मुख्यालय रत्नागिरी से लगभग 40 किलोमीटर दूर, लांजा ब्लॉक का गांव

स्थापना वर्ष : सन् 1985 क्षेत्र : ग्रामीण माध्यम : मराठी

भवन : दो कमरे, एक कार्यालय, एक हॉल, खेल का मैदान, बगीचा और शौचालय। शिक्षिका : 02 विद्यार्थी : 17 बालक : 09 बालिकाएँ : 08

सामाजिक पृष्ठभूमि : ज्यादातर रहवासी कुंभारबाड़ी से दो किलोमीटर दूर लांजा नाम के कस्बे में मजदूरी करने जाते हैं। गाँव की आबादी करीब 600 है। यहाँ दो किलोमीटर के आसपास कई प्राइवेट स्कूल होने से सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम है।

 

17480 registered users
6669 resources