किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मूँगाराम माली : एक ईमानदार कोशिश

राजस्थान की अरावली पर्वतमाला की सुरम्‍य गोद में सिरोही जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दक्षिण में, सिरोही-मण्डार हाईवे से पूर्व दिशा में और तहसील मुख्यालय से 15 किमी. पूर्व में यह ग्राम बसा हुआ है। इसमें सर्वाधिक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियॉं निवास करती हैं। विद्यालय की स्थापना सितम्बर 1959 में हुई थी। यह 2002-03 में क्रमोन्नत हुआ। गाँव में यही एक उच्च प्राथमिक स्तर का विद्यालय है। विद्यालय में दस कक्षा कक्ष, एक प्रधानाध्यापक कक्ष, एक स्टाफ रूम, एक रसोई घर बना हुआ  है। विद्यालय के चारों ओर विस्तृत चारदिवारी है। इस चारदिवारी के अन्दर 250 से 300 पेड़-पौधे लहलहा रहे हैं। पेयजल हेतु हेण्डपम्प की भी सुविधा है।

समस्याएँ जो मैंने पहचानी

मेरी नियुक्ति के समय विद्यालय की स्थिति बेहद दयनीय थी। यहाँ मुझे निम्नलिखित समस्याओं एवं चुनौतियों से रूबरू होना पड़ा-  

1.     कक्षा 6 व 7 के छात्रों को अँग्रेजी की वर्णमाला का ज्ञान नहीं था।

2.    सत्र् 2004-05 में कक्षा 8 का बोर्ड परीक्षा परिणाम 20 प्रतिशत रहा था।

3.    नामांकन एवं ठहराव में अन्तर था।

4.    मेरे सहित मात्र चार शिक्षकों का स्टॉफ था। मेरे पास प्रधानाध्यापक एवं नोडल प्रधानाध्यापक का कार्यभार भी था।

5.    ग्रामीण समुदाय का विद्यालय के प्रति असहयोग भरा रवैया था।

6.    विद्यालय का रिकार्ड अस्त-व्यस्त था।

7.    एसडीएमसी की स्थिति अच्‍छी नहीं थी।

उक्त चुनौतियों से निपटने के लिए मैंने अपने हिसाब से खाका तैयार किया। साथी शिक्षकों का सहयोग प्राप्त कर समस्याएँ सुलझाने के प्रयास किए। इन प्रयासों के सार्थक परिणाम सामने आए।  मैंने नोडल एवं प्रधानाध्यापक पद का निर्वहन करते हुए इनका समाधान करने के प्रयास शुरू किए। इस हेतु मैंने सभी शिक्षकों की बैठक का आयोजन कर सभी समस्याओं पर विस्तार से बात की। हम सभी ने मिलकर इसकी कार्ययोजना बनाई।

शिक्षा की गुणवत्‍ता के लिए प्रयास

मैंने सर्वप्रथम अभिभावकों का सहयोग प्राप्त करने के लिए विद्यालय की शैक्षिक गुणवता के सुधार पर बल दिया। मैंने स्वंय नोडल एवं विद्यालय के कार्यालय के कार्यों को करने के साथ-साथ  समय सारणी के अनुसार प्रति कक्षा एक कालांश अँग्रेजी विषय का लेकर पढ़ाई करवानी शुरू की। साथ ही पूरे स्टॉफ को भी शिक्षण कार्य में लगा दिया। मैं समय-समय पर साथी शिक्षकों  की कक्षाओं का अवलोकन कर उन्हें बाल केन्द्रित शिक्षा विधियों के अनुसार शिक्षण करवाने हेतु प्रेरित भी करता रहा। इस शिक्षण की गति और अधिक करने के लिए मैंने विद्यालय समय से पूर्व एवं पश्चात एक-एक घन्टा अतिरिक्त कालांश लगवाना प्रारम्भ किया। स्वयं के निरीक्षण में विषयाध्यापकों से अध्यापन करवाया।

यहाँ तक कि पल्स-पोलियो कार्यक्रम में चारों शिक्षकों के लगने के बावजूद भी आपसी समझ से एक या दो कक्षाओं को विद्यालय में बुलाकर दो-दो कालांश अध्यापन का कार्य करवाया। हमारे इन प्रयासों की वजह से सत्र 2005-06 की कक्षा आठ का बोर्ड परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रहा। क्वालिटी एश्‍योंरेंस परीक्षा का परिणाम ग्रेड E से बढकर B व C तक पहुँच गया। कक्षा आठ बोर्ड का सत्र 2005-06 का परिणाम 100 प्रतिशत , 2006-07 का 67 प्रतिशत , 2007-08 में 87.50 प्रतिशत एवं 2008-09 का 73.68 प्रतिशत रहा। आदिवासी बालिकाओं ने भी इनमें प्रथम व द्वितीय श्रेणी में कक्षा उत्‍तीर्ण की।

हमने टीएलएम का भी भरपूर प्रयोग करने का प्रयास किया। सभी शिक्षकों से इसमें सहयोग लिया। सभी कक्षाओं में चार्ट इत्यादि लगवाए गए। एक हॉल (कक्ष) को विशेष रूप से चित्रों, मॉडल आदि से सजाया गया। विद्यार्थी रिक्त कालांश में इस हॉल का अवलोकन करते हैं एवं देखकर सीखते हैं।

मैंने प्रार्थनासभा एवं बालसभा को भी सरस बनाने का प्रयास किया। मैंने सभा में हमेशा विविध प्रार्थनाएँ, लोककथाएँ, प्रेरक प्रसंग, शिक्षा के प्रति जागरुकता, कैरियर की समस्या, कहानियाँ, सामान्य ज्ञान प्रश्‍नात्‍तरी, समाचार वाचन, स्कूल ठहराव तथा शिक्षा के लाभ आदि विषयों पर सरसतापूर्ण चर्चा कर बच्चों को जागरूक किया। आज इस विद्यालय के विद्यार्थी किसी भी निजी विद्यालय के छात्रों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं।

उपर्युक्त प्रयासों से नामांकन एवं ठहराव में काफी सुधार आया है। जब मेरी नियुक्ति इस विद्यालय में हुई थी, तब विद्यालय में करीब 40 से 50 नाम ऐसे बच्चों के थे, जो विद्यालय में आते ही नहीं थे। मैंने शिक्षक साथियों की टोलियाँ बनाई। घर-घर सम्‍पर्क किया। भौतिक सत्यापन करवाया। वास्तविक सर्वे का कार्य कर सी.टी.एस. एवं प्रवेशोत्सव कार्यक्रमों का संचालन किया। इससे विद्यालय में बच्चों का ठहराव लगभग 90 प्रतिशत तक बढ़ गया। सत्र 2005-2006 में नामांकन 185 था, वही 2009-2010 तक आते-आते यह 230 हो गया।

विद्यालय परिसर में

मेरी नियुक्ति के समय विद्यालय में केवल 50-60 पौधे लगे हुए थे। मैंने साथी शिक्षकों से मिलकर इस पर चर्चा की। हमने विद्यालय में प्रतिवर्ष 150 पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया। इसमें छात्रों का सहयोग भी लिया गया। इस हेतु सभी शिक्षकों तथा बड़ी कक्षाओं के छात्रों को लक्ष्य आवंटित किए गए। वर्तमान में विद्यालय में लगभग 300 जीवित पौधे हैं जो पेड़ों का रूप ले रहे हैं एवं विद्यालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। हम सभी ने मिलकर यह लक्ष्य प्राप्त किया।

जब मेरी नियुक्ति विद्यालय में हुई थी तब डी.पी.ई.पी. द्वारा यहाँ एक भवन स्वीकृत हुआ था। लेकिन अपरिहार्य कारणों से वह निरस्त हो गया था। किन्तु हमारे कार्य को देखते हुए डी.पी.ई.पी. ने पुनः भवन स्वीकृत किया। हमने इस भवन का निर्माण इतने अच्‍छे तरीके से करवाया कि निवर्तमान तहसीलदार साहब ने मुक्तकण्ठ से इस कार्य की प्रशंसा की।

मध्याह्न भोजन
 
मध्याह्न भोजन कार्यक्रम में मैंने व्यक्तिगत रुचि ली। समय-समय पर पोषाहार पकाने वाली महिला से चर्चा करता रहा, समझाता रहा। मैंने अपनी देखरेख में नियमित मीनू अनुसार पूर्ण गुणवत्‍ता युक्त पोषाहार बनवाना सुनिश्‍चित किया। मैंने स्वयं गुणवत्‍ता पूर्ण तेल, मसाले आदि वस्तुएँ क्रय कर लाना तथा नियमित फलों की आपूर्ति(प्रति सोमवार) करना प्रारम्भ किया। इससे बच्‍चों की पोषाहार खाने में रुचि बढ़ गई। इस प्रयास से भी बच्चों के ठहराव पर सकारात्मक प्रभाव पडा।

 

खेलकूद गतिविधियाँ

खेलकूद के क्षेत्र में विद्यालय पिछड़ा हुआ था। विद्यालय में शारीरिक शिक्षक का पद भी खाली था। मैंने स्टॉफ के सहयोग से बच्चों को खेल खिलवाना प्रारम्भ किया। इसका परिणाम यह रहा कि विद्यालय का दल खो-खो प्रतियोगिता में सत्र 2008-09 में राज्य स्तर तक खेलने गया।

अभिभावक समुदाय का विश्‍वास

जब मेरी नियुक्ति इस विद्यालय में हुई तब यहाँ स्थिति बेहद चितंनीय थी। कोई ग्रामीण या अभिभावक विद्यालय के किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लेता था।

ग्रामीण किसी बैठक की कार्यवाही पर हस्ताक्षर तक नहीं करते थे। राष्ट्रीय पर्वों पर मिठाई हेतु विद्यार्थी एवं शिक्षक स्‍वयं पैसा इकट्ठा करते थे। परन्तु मैंने इस परम्परा को तोड़ा। मैंने लगातार गांव के मुखियाओं से सम्पर्क किया। व्यक्तिगत सम्पर्क के साथ साथ एसडीएमसी एवं पीटीआई  की बैठकों का अयोजन किया। अभिभावकों को हमारी उपलब्धियाँ बताईं। समस्‍याएँ बताईं।

उनको ड्रापआउट, नामांकन, ठहराव, बालिका शिक्षा आदि के बारे में भी समझाया गया। इन सब प्रयासों के बाद वे विद्यालय के लिए उत्‍सवों के अवसर पर मिठाई, दरियाँ, पंखे इत्यादि भेंट देने लगे हैं।

अगर सभी शिक्षक ईमानदारी से अपनी सर्वस्व योग्यता को विद्यालय हित में लगाएँ तो ऐसा कोई कारण नहीं होगा जो हमारे ग्रामीण बच्‍चों को एक सुसभ्य नागरिक बनने से रोक पाए।

मूँगाराम माली

  • अध्यापक
  • एम.ए. अँग्रेजी साहित्‍य एवं राजनीतिविज्ञान, बीएड
  • राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, थल, मण्डार (सिरोही),राजस्‍थान
  • 21.03.2005 से शिक्षक
  • रुचियाँ- समाचार पत्र पढ़ना, मंच संचालन।

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए शिक्षकों के उत्कृष्ट शिक्षण-अधिगम प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। मूँगाराम माली वर्ष 2009 में ' विद्यालय प्रबन्‍धन एवं नेतृत्‍व' श्रेणी में चुने गए हैं। यह लेख पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने मूँगाराम जी से उनके काम तथा शिक्षा से संबंधित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो  बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं।

हम मूँगाराम माली,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, सिरोही के आभारी हैं।


 

 

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