किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मुश्किलों से लड़ने का नाम इन्‍दु

कहते हैं गर इंसान अपने बलबूते पर कुछ बदलने की ठान ले तो फिर राह में कितनी ही मुश्किलें क्यूँ न आएँ वह उनसे डटकर मुकाबला करता है। छोटे-छोटे बदलाव किसी के जीवन को एक नई दिशा एक नई मंजिल पर कैसे पहुँचा सकते हैं इसकी एक बानगी मुझे देखने को मिली। यह बदलाव किया एक शिक्षिका ने अपनी हिम्मत और सकारत्मक सोच और सही निर्णय क्षमता से।

मैं आपको लिए चल रही हूँ वहाँ, जहाँ इस बदलाव को मैंने अपनी आँखों से देखा। मैंने बाड़मेर जिले के सिवाना ब्लाक के राजकीय प्राथमिक विद्यालय, कुंडल का अवलोकन किया। मेरा उद्देश्य विद्यालय स्तर पर टीचिंग प्रेक्टिस को समझने के साथ कक्षा में अध्यापकों को आने वाली विषयगत समस्याएँ, विद्यालय का परिवेश, बच्चों का स्कूल में पढ़ाई का स्तर, विद्यालय का नामांकन आदि कितना है ये सब समझना था। इस विद्यालय के बारे मैंने काफी सुना था।

प्रशिक्षण के दौरान गम्‍भीर रहने वाली इस विद्यालय की एक शिक्षिका के बारे में काफी दिलचस्प बातें सुनने को मिलीं। लेकिन उनसे पहली ही मुलाकात में मैंने यह तो जान लिया था कि इनमें कुछ खास तो है लेकिन उस वक्‍त अधिक बात हमारे बीच नहीं हो सकी। इनका नाम है इन्‍दु। वे पास ही के गाँव मोकलसर में रहती हैं। सुबह 9 बजे हम लोग बस से स्कूल के लिए रवाना हुए चूँकि आज मैं साथ थी अत: पास के एक अध्यापक ने हमको अपनी गाड़ी से विद्यालय की ओर जाने वाले मुख्य रास्ते तक छोड़ दिया। इन्‍दु कुंडल बस स्टैंड से रोज अकेले ही पैदल सफर तय करती हैं। मैं भी आज का सफर उनके साथ पैदल ही तय करना चाहती थी। इसीलिए हम पैदल ही विद्यालय की तरफ रवाना हुए। मैंने देखा कि पूरा रास्ता बिलकुल वीरान था। दूर-दूर तक मुझे खेतों के अलावा कुछ नजर नहीं आया। इसमें एक अकेली शिक्षिका रोज विद्यालय जाती है। क्या इतने सुनसान इलाके में बच्चे भी आते होंगे मुझे यह जानने की भी बड़ी जिज्ञासा हो रही थी ? मैं रास्ते भर यही सोचते हुए उनके साथ विद्यालय तक पहुँच गई।

जब हम स्कूल पहुँचे तो देखा कि बड़ी तरतीब से बच्चों के जूते-चप्पल जमे थे।  मैंने अपनी नजर चारों तरफ दौड़ाई, मुझे तो आपसपास कोई घर नजर नहीं आया हाँ कुछ लोग स्कूल के पास बने खेत में काम जरूर कर रहे थे। बड़े से मैदान में बना और चारदिवारी से घिरा स्कूल काफी साफ-सुथरा नजर आया। इसका मतलब यह था कि मेरे आने की सूचना पर यह सफाई नहीं की गई थी। क्‍योंकि मैंने तो उनको सुबह अचानक बताया ताकि मैं वास्तविक स्थिति से परिचित हो सकूँ। इसी उधेड़बुन में मुझे एक आवाज ने चौंका दिया। एक बालिका मेरे लिए पानी ले आई थी।

यहाँ पर कुल 4 बड़े कमरे हैं और साइड में एक छोटा रसोईघर बना है। शिक्षिका ने कक्षाओं का अवलोकन करवाया। हर एक कमरे में 2 कक्षाएँ व्यवस्थित रूप से बैठी थीं। इनमें 2 और अध्यापक पढ़ा रहे थे। मैंने बाकी अध्यापकों से भी परिचय किया। मैंने सबसे पहले कक्षा 4 और 5 से मिलने का निश्चय किया लेकिन यहाँ पर तो बच्चे गणित के सवालों में उलझे हुए थे। कोई आया है बजाय यह देखने के उनका ध्यान सवाल आपस में समझने का था। यह मैंने बाहर से ही देखा था। कुछ समय के बाद हम लोग कक्षा में पहुँचे तो बच्चे कुछ पढ़ रहे थे। सभी ने खड़े होकर अँग्रेजी में वेलकम मैडम कहकर हमारा अभिवादन किया। वे आपस में फुसफुसाते हुए शायद अनुमान लगा रहे थे कि आज एक नई मैडम आई हैं। चूँकि मैं राजस्थानी बोल सकती हूँ तो मैंने थोड़ी देर बाद उनसे पूछा,“ मने कुन कुन ओल्ल्खे ?” मतलब मुझे कौन-कौन जानता है? जरा सोचकर बताओ। मैंने कहा, मेरा नाम ट से शुरू होता है। सबने अनुमान लगाए और बोर्ड पर इन शब्दों शुरू होने वाले नाम लिख दिए। आखिर में मेरा नाम भी उनमें आ ही गया। उन्‍हें यह करना बहुत रोचक लग रहा था,शायद वे पहली बार ऐसा कर रहे थे। कक्षा में इस तरह से बच्चों के नाम आपस में पता किए जाएँ तो नाम भी जल्दी याद हो सकते हैं, साथ ही नए शब्दों से सन्‍दर्भ के साथ उनका परिचय भी बनता है। कक्षा में एक खेल के माध्यम से नए तरीके से बच्‍चों का परिचय किया। उसके बाद कुछ कविताएँ करवाईं। फिर मैंने पूछा कि मेरे दोस्त कौन बनेंगे? यह सुनकर सभी चुप हो गए। तभी एक ने कहा कि भला टीचर बच्चों के दोस्त कैसे हो सकते हैं? मैंने पूछा क्यूँ तो सभी चुप हो गए।

इसके बाद चूँकि इनकी गणित की कक्षा का समय था तो मैंने भी बच्चों से कुछ इबारती सवाल किए जिनके जबाव बहुत सलीके से मिले। यह देखकर अच्छा लगा की बच्चों को गणित की आरम्भिक अवधारणाओं पर कुछ समझ थी। अच्छी बात यह लगी कि बच्चे बोर्ड पर आकर सवाल कर रहे थे इससे यह तो पता चला कि शायद यहाँ पर कक्षा में बच्चों को भयमुक्त माहौल मिलता है। वे झिझकते नहीं हैं। हमने बाद में पढ़ाई से अलग हटकर भी बातें कीं, जैसे कि स्कूल में क्या अच्छा लगता हैं ? तुम्हारे गाँव में सबसे खास क्या है? इसी दौरान हम गणित से हिन्‍दी पर आए और बातों के दौरान ही गाँव के मेलों और सर्कस पर चर्चा चली। इसका उदेश्य आज कक्षा में पढ़ाए जाने वाले पाठ से जुड़ा था जिसकी तैयारी में घर से करके गई थी। कक्षा अध्यापिका ममता जी के साथ हमने कक्षा में ‘गुब्बारे पर चीता’पर चर्चा की। इसके बाद आपस में सवाल-जवाब किए। चर्चा के बाद बच्चों के साथ पाठ से जुडी वर्ग पहेली पर काम करवाया। इसमें बच्चों ने बारी-बारी शब्द ढूँढ़ने के साथ ही नए शब्द बनाने की तकनीक भी समझी। ये उनके लिए और उनकी टीचर दोनों के लिए नया अनुभव था।

इन्‍दु जी से उनके अब तक के स्कूली सफर के बारे में जानने का प्रयास किया। इस स्कूल की शुरुआत 2007 में हुई। गाँव में आसपास बसी ढाणी के बच्चों के लिए यहाँ कोई स्कूल नहीं था तो यहाँ के वर्तमान सरपंच महन्‍त नरोत्तम दास जी ने अपने खेत की जमीन दान की। इसके बाद यहाँ 2012 तक केवल एक शिक्षक आते थे। इन्‍दु ने जब यहाँ ज्वाइन किया तो उनका पहला दिन मुश्किल भरा रहा। इस उजाड़ जगह पर स्कूल देखकर परिवार के लोग बहुत परेशान हुए। घरवालों ने कहा कि नौकरी छोड़ो और वापस घर चलो। लेकिन इन्‍दु ने कहा कि नहीं जैसा भी है,स्‍कूल है। जरूरी नहीं है कि यहाँ मुझे सारी सुविधाएँ मिलें, लेकिन मुझे यहाँ के बच्चों के लिए कुछ करना है। उनको शिक्षित करना है क्योंकि उनके माता-पिता जब उनको इतनी दूर से पढ़ने के लिए भेज सकते हैं तो मैं इनको यहाँ आकर क्यों नहीं पढ़ा सकती। मुश्किलों का क्या है वो तो अच्छे काम में हर किसी के सामने आती रहती हैं। उनके घर वाले अंतत: उनके दृढ़ इरादे के आगे हार गए।

उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती स्‍कूल में बच्चों का नामांकन बढ़ाने की थी। जो कि उनके ज्‍वाइन के समय मात्र 12 ही था। इन्‍दु ने गाँव में समुदाय से सम्‍पर्क किया और बच्चों को मेहनत से पढ़ाने का वादा किया। दूसरी बड़ी समस्या बच्चों की भाषा बनी लेकिन इन्होंने स्थानीय भाषा को भी जल्दी से सीखा और बच्चों को नियमित तौर पर अभ्यास करवाने के साथ स्थानीय भाषा से हिन्‍दी की तरफ लाने के प्रयास जारी रखे जिसके परिणामस्वरूप आज बच्चे हिन्‍दी में बात कर पाते हैं। चूँकि वे प्रधानाध्यापिका भी हैं तो इसके अतिरिक्त इनके पास प्रशासनिक काम का दबाव रहने के बावजूद वे अपना पूरा समय बच्चों को कक्षा में देती हैं ताकि बच्चों की पढाई में कोई बाधा न पहुँचे। इससे बच्चों की पढ़ाई और नामांकन में सुधार हुआ। उनकी इस मेहनत का परिणाम यह रहा है कि अगले सत्र में बच्चों का नामांकन अप्रत्याशित तौर पर 87 पहुँच गया जो कुंडल की मुख्य सड़क के पास बनी प्राथमिक स्कूल से तीन गुना है।

इसके अलावा एक कमाल उन्होंने यहाँ के बच्चों को पहली बार जिला स्तर पर हुए खेलों में जीत दिलाकर किया है। इस स्कूल और गाँव से बच्चे पहली बार ही बाहर निकले खासकर लड़कियाँ। जब उन्होंने सरपंच जी से बच्चों को खेल प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए भेजने की इजाजत माँगी तो सब लोग चौंक गए। उनके इस कदम का आसपास के शिक्षक तथा अन्‍य लोगों ने बड़ा विरोध किया। लेकिन उन्होंने खुद अतिरिक्त समय देकर बच्चों को अभ्यास करवाया। वे खुद जिला स्तर पर कबड्डी की कप्तान और विजेता खिलाड़ी रही हैं। चौतरफा हो रहे विरोध के बीच इन्‍दु का हौसला बच्चों ने बढ़ाया और जीतकर ही वापस लौटे। तो इस तरह गाँव में पहली बार कुछ नया होने की मौन आहट सबने सुनी। इसके बाद जब बच्चों का नामांकन बढ़ा तो अतिरिक्त शिक्षक के लिए सभी के प्रयास से इस साल एक नई अध्यापिका आई हैं। साथ ही इनको विद्यार्थी मित्र का भी सहयोग मिल रहा है।

अब यहाँ अच्छी पढाई होने से बच्चों के स्तर में भी काफी सुधार देखने को मिला है। साथ ही उनके माता-पिता भी बहुत खुश हैं। इस बात से भी कि उनके बच्चे पढाई के साथ खेल में भी अव्वल आने लगे हैं। लोगों की नजर में भले ही ये बदलाव छोटा है मगर यहीं से बड़ी सोच के साथ सटीक लक्ष्य की शुरुआत भी होती है।

ये हमें भी प्रेरित करने वाली बात है क्योंकि हमारे लिए, हमारे काम के लिए भी ये एक नई शुरुआत है। शिक्षा की बेहतरी के लिए हमें बेहतर शिक्षकों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। तो इन्हीं जैसे लोगों के बारे मैं हमको जानना होगा और इनको साथ लेकर शिक्षा के लिए लगातार काम करते रहना होगा।


टीना पंवार,अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन सिवाना - बाड़मेर, राजस्‍थान में कार्यरत हैं।

टिप्पणियाँ

teena panwar का छायाचित्र

मेरे इस लेख को टीचर्स ऑफ़ इंडिया के पोर्टल पर स्थान मिला इसके लिए में पूरी टीम की आभारी हूँ | इंदु जी जैसी शिक्षिका जिन्होंने इतने मुश्किल हालातों में हिम्मत और ज़ज्बे से काम किया हमें निश्चित रूप से प्रेरणा देता है | 

pramodkumar का छायाचित्र

nice work

hemantkumarbinwal का छायाचित्र

bahut aacha.aise hi mehnati shikshko k karan hamari shiksha vayvstha aaj bhi jari hai.....

VINODMOHRI का छायाचित्र

बहुत बढिया जी। आज समाज में ऐसे ही शिक्षको की जरूरत है।

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