किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मुकेश पुरोहित : नए तरीकों की खोज

शिक्षण की समस्याएँ हों, विद्यालय में संसाधनों की कमी हो या फिर समुदाय से जुड़ने की बात हो इन सबसे जूझने तथा हल करने के नए तरीके ढूँढना एक शिक्षक होने के नाते मुकेश पुरोहित का जुनून है।राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, मीठन की स्थापना 1971 में हुई थी। 2005 में इसे क्रमोन्नत कर उच्च प्राथमिक स्तर का किया गया। इसमें वर्तमान में सात कमरे तथा एक रसोई घर है। पाँच अध्यापक व एक विद्यार्थी मित्र कार्यरत है। विद्यालय में तीन कम्प्यूटर उपलब्ध हैं। कक्षा 1 व 2 में एक टीवी, डीवीडी प्लेयर व सीडीज का प्रयोग शिक्षण में किया जाता है।

समस्याएँ जो पहचानीं  

मैने विद्यालय में जुलाई 2008 को कार्यग्रहण किया। तब केवल दो अध्यापक थे। कक्षा 1 व 2 में बोर्ड पर अध्यापक जी हिन्दी वर्णमाला या गिनती लिख देते थे। विद्यार्थी स्लेट पर उन्हें उतारते रहते थे या फिर पट्टी पेन घिसते रहते थे। कक्षा का वातावरण नीरस था। शिक्षण आनन्ददायी रूप से नहीं हो पा रहा था। विद्यार्थियों की उपस्थिति कम रहती थी व निरन्तरता का अभाव था।

स्टाफ की कमी, पूर्व में कार्यरत शिक्षकों की अपडाउन प्रवृति आदि कारणों से समुदाय व शिक्षकों के मध्य संवादहीनता थी। मेरे मन में विचार आया कि ऐसा क्या उपाय किया जाए ताकि कक्षाओं में उपस्थिति बढ़े व विद्यार्थियों का ठहराव निश्चित हो सके।

हल के लिए किए गए प्रयास  

सर्वप्रथम कक्षा 1 व 2 की कक्षा के कक्ष को झण्डी, रिबन व चमकीले तार आदि लगाकर सुसज्जित व आकर्षक बनाया गया। गिनती, हिन्दी वर्णमाला,  A to Z  के हस्तनिर्मित कार्ड पूरे कक्ष की दीवारों पर लगाए गए। साथ ही मिक्की माउस, अंकल शेन, डक आदि के आदमकद चित्र थर्माकॉल शीट पर कक्ष में लगाए गए। विभिन्न कविताओं को चार्ट पर लिखकर चिपकाया गया।

दिन में कई बार इन चार्ट तथा कार्डों का वाचन व लेखन करवाना शुरु किया। ब्लेकबोर्ड पर चित्र व सुन्दर डिजाइन बनवाकर शिक्षण कार्य में रुचि उत्पन्न करने का प्रयास शुरू किया।

बालकों को खेल-खेल में सिखाने का प्रयास किया गया। जैसे बच्चों को गोल घेरा बनाकर सबके हाथ में एक-एक फ्लेश कार्ड दिया जाता है। फ्लेश कार्ड पर हिन्दी के वर्ण व शब्द लिखे गए। बच्चे कार्ड को पढ़कर जमीन पर लकड़ी की सहायता से लिखते हैं व उसे पढ़ते हैं। अध्यापक के घण्टी बजाते ही बच्चे अपने कार्ड को पास के दूसरे बच्‍चे को दे देते हैं। दूसरा बच्चा फिर से वही प्रक्रिया करता है। इस खेल के माध्यम से बच्चे अक्षर पहचानना सीखते हैं।

इसी तरह लकड़ी के टुकड़ों, चावल के दानों, माचिस की तीलियों से अक्षरों का निर्माण करते हैं। बाजार में उपलब्ध कुरकुरों की अँग्रेजी अल्‍फाबेट का उपयोग करके बच्चों को अँग्रेजी वर्णमाला से परिचित कराने का प्रयत्न किया जाता है। कक्षा 1 व 2 शिक्षण कार्य को आनन्ददायी बनाने के लिए टीवी, डीवीडी प्लेयर, सीडीज का भी शिक्षण कार्य में उपयोग किया जाता है। हिन्दी वर्णमाला, बारहखड़ी, शब्द निर्माण, अँग्रेजी वर्णमाला (लयबद्व) सप्ताह के नाम, फलों व जानवरों के नाम, हिन्दी की कविताएँ यथा - रेलगाड़ी, लकड़ी की काठी, चुन्नु-मुन्नु, रसगुल्ला आदि कविताएँ बच्चे अभिनयपूर्वक उच्चारण करते हैं।

रेडियो पर अँग्रेजी भाषा में जो परस्पर संवाद के शैक्षिक जो कार्यक्रम आते हैं उनका भी उपयोग किया गया।

बच्चे विद्यालय में जो कुछ सीखते हैं, अगर उसका दोहरान घर पर भी करें तो अच्छा होता है। अतः हमने विद्यालय के कक्षा 1 से 8 तक के सभी विद्यार्थियों को मिलाकर 8 ग्रुप बनाए। प्रत्येक ग्रुप का नेतृत्व कक्षा 8 के बालक को सौंपा गया। यह सभी दल गाँव के सार्वजनिक स्थान व मन्दिरों आदि में (अलग अलग स्थानों पर) रोज सांयकाल 5 से 6 बजे तक मिलते हैं तथा मिनिंग, वर्णमाला, श्लोक, गीत, बारहखड़ी, कविता आदि का दोहरान करते हैं। मैंने व प्रधानाध्यापक जी ने प्रतिदिन दो दलों का अवलोकन नियमित करना शुरू किया। इन स्थानों के निकट रहने वाले दो परिवारों से सम्पर्क करना शुरू किया। जिससे समुदाय से जुड़ाव होने लगा व बच्चों की गतिविधि की नियमित मॉनीटरिंग होने लगी। बच्चे भी इस समय का उपयोग स्वाध्याय व दोहरान में करने लगे।

प्रयासों के दौरान आई बाधाएँ

इस प्रयास के दौरान अभिभावकों की उदासीनता से रूबरू होना पड़ा। मैंने समुदाय से सम्पर्क करना शुरु किया। विद्यालय प्रबन्धन समिति की मासिक बैठक का नियमित आयोजन किया जाने लगा। एस.एम.सी. के माध्यम से अभिभावकों बच्चों को नियमित विद्यालय भेजने का निवेदन किया गया। गाँव में सुख-दुख के अवसरों पर उपस्थिति देने से समुदाय से जुड़ाव होने लगा। कक्षा 1 व 2 हेतु टीवी लगाने का विचार मेरे मन में आया, तो धन की समस्या सामने आई। प्रधानाध्यापक जी व मैंने सरपंच महोदय से आग्रह किया तो 26 जनवरी 2011 को उन्होंने विद्यालय के लिए टीवी सेट भेंट किया। इससे पूर्व इस हेतु प्रधानाध्यापक जी ने अपना टीवी उपलब्ध करवाया था।

प्रयासों से आए परिवर्तन

  • आनन्ददायी शिक्षण से बालकों की उपस्थिति व ठहराव बढ़ा (कक्षा 1 व 2 में पहले औसतन 30 प्रतिशत बच्चे उपस्थित रहते थे। यह प्रतिशत बढ़कर 75-80 प्रतिशत हो गया है।)
  • बच्चे कविता, गीत, श्लोक आदि सीखकर घर पर अच्छा प्रदर्शन करने लगे, जिससे परिवारजन भी प्रभावित हुए। विद्यार्थी संख्या 142 से बढकर 213 तक पहुँच गई।
  • कोई कभी अध्यापक अवकाश पर रहते तो कक्षा 1 व 2 के बच्चे टीवी द्वारा शिक्षापूर्ण सीडी देखकर स्वअध्ययन करते रहते हैं।
  • खेल विधि से बच्चों को आनन्द प्राप्त होने लगा।
  • समुदाय का विद्यालय से जुड़ाव होने लगा व विद्यालय के समक्ष आने वाली समस्याओं के निराकरण में समुदाय रुचि लेने लगा है।
  • मीठन गाँव के कई बच्चे जो रेवदर के प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे, अब इस विद्यालय में प्रवेश ले चुके हैं। ऐसे बच्चों की संख्या 20 के लगभग है।
  • यहाँ से 2 किमी दूर स्थित वांती व हजारिया खेड़ा गाँव में स्कूल होते हुए भी अभिभावक अपने बच्चों को इस विद्यालय में प्रवेश दिला रहे हैं।

 

मुकेश पुरोहित

  • एम.ए. (राजनीति विज्ञान),बी.एड.
  • 2004 से अध्‍यापक हैं
  • राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, मीठन , रेवदर, जिला सिरोही
  • रुचि - खेलकूद, अध्ययन

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। मुकेश पुरोहित वर्ष 2009 में 'शिक्षण अधिगम तथा कक्षा प्रबन्‍धन'  के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने मुकेश पुरोहित से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इसी बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम मुकेश पुरोहित ,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, सिरोही के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

arunrathibtr का छायाचित्र

आपका प्रयास वाकई काबिले तारीफ है। सभी शिक्षकों आप जैसे मेहनती और कर्मठ लोगों से प्रेरणा लेनी चाहिए। आपको मेरा सादर प्रणाम।

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