किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मानसिंह जी का खेड़ा, चित्तौडगढ़, का छुट्टी में खुलने वाला स्‍कूल

विनय कुमार

चितौड़गढ़ शहर से करीब 15 किलोमीटर उत्तर में स्थित है मानसिंह जी का खेड़ा गाँव। यहाँ तक पहुँचने के लिए आपको संकरे, पानी, कीचड़ और धूल भरे रास्ते से जाना होगा। लेकिन वहाँ के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय को देखकर रास्ते की थकान और परेशानी खत्म हो जाती हैं। गाँव के आखिर में स्थित यह विद्यालय काफी अलग और खूबसूरत है। ऊँची चारदीवारी से घिरे इस विद्यालय में सामने एक ऊँचा प्रवेश द्वार है जिसके ऊपर चमचमाते अक्षरों में स्कूल का नाम लिखा है।

प्रवेश द्वार से अन्दर जाने पर सामने ऊँचा मंच बना हुआ है और दोनों तरफ विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे लगे हुए हैं जैसे नीम, आम, पपीते और कुछ जंगली पौधे। लेकिन मन को मोहता है चारदीवारी के किनारे-किनारे लगे हुए खूबसूरत गुलाब के फूल। बाईं तरफ के बगीचे के बीचोबीच खुले में शिक्षण के लिए कक्षा कक्ष बना हुआ है, जिसमें श्यामपट्ट लगा है। विद्यालय में कुल ८ कमरे हैं जिसमें एक प्रध्नाध्यापक कक्ष है जिसमें शिक्षकों के बैठने की भी उचित व्यवस्था है। एक कमरा कंप्यूटर एवं पुस्तकालय के लिए है। बाकी के छः कमरों में पहली से लेकर आठवीं तक की पढाई होती है। कमरों की समस्या को हल करने के लिए पहली दूसरी एवं तीसरी चौथी कक्षा को एक साथ बिठाना पढ़ता है। लेकिन मौसम अच्छा होने पर बगीचे में बने खुले कक्षा कक्ष का उपयोग किया जाता है। यहाँ 7 अध्यापक (3 महिला और 4 पुरुष) और एक प्रधानाध्यापक हैं। विद्यालय की दीवारों पर विभिन्न तरह की जानकारियाँ लिखी गई हैं। जैसे प्रतिज्ञा, राजस्थान का नक्शा, पढ़ाई से सम्बंधित बातें इत्यादि। एक जगह निर्धारित है जहाँ बच्चे अपनी पसन्‍द की बात लिखते हैं जैसे चुटकुले, समाचारपत्र के टुकड़े और सामान्य जानकारी की बातें।

कक्षा में बच्चों के बैठने की पर्याप्‍त व्यवस्था है। छोटे बच्चे जमीन पर बैठते हैं। विद्यालय में एक मन्दिर है जिसे स्कूल की ही एक शिक्षिका ने बनाया है। मंदिर में सरस्वती की बड़ी सी मूर्ति स्थापित है। बाईं ओर से पीछे की तरफ जाने के लिए लाल रंग के खुबसूरत टाइल्स से रास्ता बनाया हुआ है जिससे होकर शौचालय तक जाते हैं। लड़के और लड़किओं के लिए अलग-अलग सफेद टाइल्स लगा हुआ शौचालय है। पानी की पर्याप्‍त व्यवस्था और हाथ धोने के लिए बेसिन भी है। पास में ही एक कचरा पात्र है। पानी पीने के लिए नल लगे हुए हैं, पहले चांपाकल की व्यवस्था थी लेकिन अब टंकी लग गई है। खेल के मैदान में झूले और खो खो के खम्भे भी गड़े हैं।      

इस खूबसूरत विद्यालय के प्रधानाचार्य और संयोजक है श्री अरुण देव त्रिपाठी जी। मिलनसार स्वभाव के त्रिपाठी जी सन 2009 से इस विद्यालय में हैं। उनसे की गई बातचीत के कुछ खास अंश:

सवाल: अरुण जी अपने बारे में कुछ बताइए?

अरुण जी: मेरे पिताजी भी शिक्षा में थे। सरकारी शिक्षक बनने से पहले मेरा अपना विद्यालय था। इस स्‍कूल में आने से पहले मैं शिक्षक के रूप में दूसरे स्कूल में था।

सवाल: आप जब यहाँ आए थे तो यह स्कूल कैसा था?

अरुण जी: मैं जब यहाँ आया था तो इस स्कूल में कुछ खास नहीं था।

सवाल: आप स्कूल को यहाँ तक कैसे लेकर आए?

अरुण जी: देखिए सरकार हमें बहुत पैसे देती है तो हमें अपना काम भी करना चाहिए। मुझे स्कूल को खूबसूरत बनाना अच्छा लगता है ताकि बच्चे इसे पसन्‍द करें।

सवाल: आप बीच की कड़ी हैं, एक तरफ आपके उच्चाधिकारी और दूसरी तरफ समुदाय के लोग, कैसा सहयोग मिलता है सबका?

अरुण जी: यहाँ के उच्चाधिकारी बड़े सहयोगी हैं। उनके सहयोग से ही इतना कुछ हो पाया है। समुदाय के लोग पहले सहयोग नहीं करते थे लेकिन अब वो सब भी मदद करते हैं।

सवाल: यहाँ कितने गाँव के बच्चे पढ़ने आते हैं?

अरुण जी: आसपास के करीब 7-8 गाँव के बच्चे यहाँ पढ़ने आते हैं। यह स्कूल इतना अच्छा हो गया है कि यहाँ के निजी स्कूल के सारे बच्चे यहीं आ गए और वह निजी स्कूल बन्‍द हो गया।

सवाल: यहाँ से बच्चे निकलकर आगे क्या करते हैं?

अरुण जी: सामान्यतः बच्चे आगे पढ़ने के लिए चित्तौडगढ़ जाते हैं। यहाँ के बच्चे इतने तेज हैं कि उनका दाखिला अच्छे स्कूल में हो जाता है।

सवाल: आपको यह सब करने की प्रेरणा कैसे मिलती है?

अरुण जी: मेरे अन्दर से। मुझे लगता है की यह मेरा स्कूल है तो बाकी सभी स्कूल से अच्छा होना चाहिए।

सवाल: शिक्षा में नए सुधार और शिक्षक प्रशिक्षण के बारे में कुछ कहेंगे?

अरुण जी: पढ़ाने के लिए सहायक सामग्री मिलती रहती है। लेकिन शिक्षक प्रशिक्षण में कुछ खास नहीं होता है इसका दुःख है।

सवाल: कोई समस्या हो तो बताइए?

अरुण ही: एक कक्षा कक्ष की कमी है अगर वह मिल जाए तो हमारा काम बहुत ही आसान हो जाएगा। हम उसमें शिक्षण सहायक सामग्री और प्रयोगशाला बनाने की सोच रहे हैं।           

इसके पश्चात हम कक्षाओं की तरफ गए। यहाँ बच्चों की संख्या करीब 173 है। आज छुट्टी का दिन था लेकिन बच्चे स्कूल आए थे। मैंने एक बच्चे से पूछा कि छुट्टी के दिन स्कूल क्यों आए हो तो बोला कि घर में मन नहीं लगता है। कक्षा में बिना शिक्षक के बच्चे शान्ति पढ़ाई कर रहे थे। कक्षा 6 में जाकर जब बच्चों से पूछा की क्या पढ़ रहे हो तो बोले गृहकार्य कर रहे हैं। बच्चों से मैंने बात की तो देखा कि उनमें डर या भय जैसी कोई बात नहीं है और खुले मन से बातें कर रहे हैं। कक्षा 5 के बच्चों को जोड़, घटाव, गुणा, भाग आता है। सवाल श्यामपट्ट पर देने के बाद पूछने पर लगभग सभी का हाथ उठता है।

शिक्षकों के बच्चे भी इसी स्कूल में पढ़ते हैं। इसी दौरान गाँव से एक व्यक्ति आए, उनसे लोग मेहमान की तरह नहीं बल्कि एक परिचित सदस्य की तरह व्यवहार कर रहे थे। समुदाय और अधिकारियों के सहयोग एवं प्रधानाध्यापक और शिक्षकों की मेहनत से निखरता यह विद्यालय अपने आप में एक मिसाल है।         


विनय कुमार, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन जिला संस्‍थान, चित्‍तौड़गढ़,राजस्‍थान में कार्यरत हैं।

 

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