किसी 'खास' की जानकारी भेजें। महावीर प्रसाद जोशी : खुदी को कर बुलन्‍द इतना कि...

(कृपया ध्‍यान रखें वीडियो में उपयोग की गई क्लिीपिंग टोंक जिले के विभिन्‍न स्‍थानों की हैं। इनका बीजवाड़ विद्यालय से कोई सम्‍बन्‍ध नहीं है।)

बीजवाड़ विद्यालय : एक परिचय

राजकीय प्राथमिक विद्यालय, बीजवाड़ तहसील मुख्यालय देवली से 70 किलोमीटर दूर पश्चिम  दिशा में बीसलपुर बाँध के डूब क्षेत्र में अजमेर जिले की सीमा से सटा हुआ है। यह नियमित बस सेवा से जुड़ा हुआ ग्राम नहीं हैं। गाँव जाने के लिए देवली से केकड़ी जाना पड़ता है। केकड़ी से रामथला चौराहा से 7 किलोमीटर अन्दर पक्की डामर रोड से जुड़ा हुआ है। पहले यह स्कूल सैकण्डरी स्कूल में था। इसे 1999 में अलग स्कूल का दर्जा दिया गया। आरम्भ में सैकण्डरी स्कूल के  शिक्षक ही इसमें पढ़ाने आते थे। यह कक्षा पाँच तक का स्कूल है। प्रारम्भ में यहाँ दो कमरे तथा एक बरामदा था। आज यहाँ पाँच कमरे, एक स्टोर, एक प्रधान अध्यापक कक्ष, एक रसोई, तीन शौचालय छात्राओं के व चार शौचालय छात्रों के लिए हैं। स्कूल में एक हैण्डपम्प, आठ फीट ऊँची बाउण्ड्री वाल है।

जब मैं आया.....

मार्च 2000 में मैं इस शाला में आया। कुछ समय बाद तीन और शिक्षक यहाँ आए। शुरू में शैक्षणिक स्थिति सामान्य थी। मार्च में ही प्राथमिक शाला को माध्यमिक से अलग कर दिया गया। उस समय जो भवन एवं स्थान हमें दिया गया वहां मात्र दो कमरे एवं बरामदा बना हुआ था। सामने मैदान में रेवड़ियों के गहरे गढ्ढे बने हुए थे। चारदीवारी अपूर्ण थी व पीने के पानी की कोई भी व्यवस्था नहीं थी। शाला में शौचालय, मूत्रालय भी नहीं बने हुए थे। चारदीवारी न होने के कारण एवं लोगों की रेवड़ियाँ हटा दिए जाने के कारण लोग जानबूझकर यहाँ पर शौच कर जाते थे। रात में असामाजिक तत्व शाला में आकर शराब पीते थे और बोतल बरामदे में छोड़ जाते थे। पालतू जानवरों को ईर्ष्यावश शाला प्रांगण में धकेल दिया जाता था जिससे शाला में बैठना व पढ़ाना दूभर हो जाता था।

खुदी को कर बुलन्‍द इतना कि...

इन सब समस्याओं को दूर करने के लिए अभिभावक, गणमान्य व्यक्तियों एवं जनप्रतिनिधियों से सम्पर्क किया गया। कुछ गतिविधियों का आयोजन किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम, 15 अगस्त, 26 जनवरी तथा खेलकूद आदि के अवसरों पर उन्हें बुलाया गया। यहाँ सामूहिक रूप से स्कूल की स्थिति को सभी के सामने रखा गया।

हमने सरपंच श्री शंकर लाल कुड़ी का सहयोग भी लिया। उनके सहयोग से समुदाय की मीटिंग का आयोजन रखा गया। पहली मीटिंग में 8-10 व्यक्ति ही आए। हमने शाला में पीने के पानी की समस्या के बारे में बताया। एक व्यक्ति ने कहा कि हमारे पीने के लिए ही पानी नहीं है। हम स्कूल के बच्चों के लिए यह व्यवस्था कहाँ से करें। यह कार्य स्कूल अपने स्तर पर ही करे। मैंने सभी से निवेदन किया। तब वे आपस में उलझने लगे। तभी सरपंच जी ने लोगों को समझाया कि सभी बच्चे अपने ही हैं। इनके लिए पानी की व्यवस्था करना भी अपना ही फर्ज है। शाला अभी नई-नई खुली है। उनकी बात को लोगों ने सुना व माना। हरलाल जी मीणा ने शाला को सीमेन्ट की टंकी पानी हेतु भेंट की। उसको नियमित भरने हेतु जगदीश जी जाट द्वारा जिम्मेदारी ली गई। उन्होंने अपने ट्रेक्टर पर ड्रम बांधकर शाला को एक वर्ष तक पानी उपलब्ध करवाया।

बाकी के लोगों ने चारदीवारी व अन्य कार्य के लिए पैसा देने की बात कही। इसका रजिस्टर बनाया गया। उसमें सभी कार्यवाही दर्ज है। हर बैठक में पुराने निर्णय पढ़े जाते हैं। क्या हुआ, नहीं हुआ देखा जाता है और आगे क्या करना है यह निर्णय लिया जाता है। इन सभी का फालोअप मैं और अध्यापक साथी दोनों मिलकर करते हैं। स्कूल में पैसे की  मदद करने वालों को भामाशाह नाम दिया। हर विद्यार्थी से रुपए 100 विकास शुल्क लेना तय किया गया। जो देने की स्थिति में नहीं थे, उन्हें इससे छूट दी गई। इस तरह बीस हजार रुपए जमा हुए। इस राशि से स्कूल की चार फीट ऊँची चारदिवारी बनवाई गई। बाद में इसे और चार फीट ऊँचा किया गया।

समिति और समुदाय का सहयोग...

डी.पी.ई.पी. के तहत सी.आर.सी. गाँव में से एसएमएल सदस्यों को मीटिंग में बुलाते थे। उन्हें जानकारी देते थे। वह बताते थे कि यह योजना है इसके तहत इस स्कूल में इतना पैसा आ रहा है। जब गाँव वालों को लगता है कि यह कार्य आवश्यक है और इसके लिए अभी किसी योजना में पैसा नहीं है तब साथ मिलकर यह योजना बनाई जाती है कि इसके लिए पैसा कहाँ से आएगा।

एस.डी.एम.सी. में 12 सदस्य हैं। इनमें तीन महिलाओं को भी जोड़ा गया। इनमें एक  आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, एक ए.एन.एम. तथा एक अभिभावक महिला को रखा गया। इसके गठन के लिए सभी अभिभावक व गणमान्य लोगों को बुलवाया गया (साधारण सभा)। उसमें सभी की सहमति से प्रस्ताव व अनुमोदन के जरिए लोगों को चुना गया।

शुरू-शुरू में लोग एस.डी.एम.सी की बैठक में आने से कतराते थे। हम स्वयं जाकर बैठक में आने का आग्रह करते थे। शिकायत थी कि कुछ लोगों की ही बात सुनी जाती है। हमारी कोई नहीं सुनता। जबकि कारण यह था कि कुछ लोग, कुछ अन्य लोगों के सामने  बोलने से घबराते थे। हमने उन्हें विश्वास दिलाया कि यहाँ किसी का व्यक्तिगत मामला नहीं है यह स्कूल का मामला है। इसमें आप सभी लोगों की भागीदारी आवश्यक है। हमने अध्यक्ष सहित सभी से बात की। इनका पक्ष सभी के सामने रखा। सभी ने स्वीकार किया कि बैठक में हर किसी की जायज बात को माना जाएगा। बैठक में उनके विचार सुने जाने लगे। उनसे साप्ताहिक सम्पर्क किया जाता था। धीरे-धीरे उनकी सोच में सकारात्मक परिणाम आने लगा। फिर भी एक वर्ष तक शाला में कोई कार्य शुरू नहीं हो पाया। उसके बाद दूसरे वर्ष समुदाय का सहयोग मिला। डी.पी.ई.पी.से शाला में कमरा स्वीकृत हुआ। जिसका निर्माण एस.डी.एम.सी. की मीटिंग बुलाकर उनकी देख-रेख एवं सहयोग लेकर कार्य शुरू किया गया।

समुदाय का सहयोग लेकर शाला में जो गढ्ढे थे उनको ट्रेक्टर से मिट्टी मंगवाकर भरवाया गया। डी.पी.ई.पी. के द्वारा शाला में हैण्डपम्प लगवाया गया। डी.पी.ई.पी. के सौजन्य से ही इस शाला में शौचालय का निर्माण करवाया गया। यह सब कार्य में एस.डी.एम.सी. व जनप्रतिनिधियों की सहभागिता व सहयोग रहा। उसके बाद एस.एस.ए. से शाला को एक कमरा और स्वीकृत हुआ और जिला परिषद भू-जल संग्रहण विभाग टोंक द्वारा बीजवाड़ ग्राम में एन्ट्री पोईन्ट के तहत एक कमरा स्वीकृत हुआ।

बदला-बदला सा बीजवाड विद्यालय नजर आता है...

शाला में वर्तमान में 5 कमरे हैं। सभी कमरों में बैठने हेतु दरी, पट्टियाँ हैं। शाला भवन में विद्युत कनेक्‍शन भी जनसहयोग से राशि एकत्रित कर करवाया गया। सभी कमरों में पंखे लगे हुए हैं। वर्तमान में 25-30 पेड़-पौधे लगे हुए हैं। हर वर्ष मिलने वाली विद्यालय सुविधा राशि से शाला में फर्नीचर खरीदा गया। अलमारी व रेक खरीदी गई। ढालू बेंच खरीदी गई। जिस पर पुस्तक रख कर आराम से पढ़ व लिख सकें।

एस.एस.ए. से प्राप्त माईक सेट का प्रार्थना सभा में उपयोग करते हैं। सोमवार से शनिवार के बीच अलग-अलग प्रार्थनाएँ बुलवाई जाती हैं। मिड-डे मील हेतु शाला में गैस कनेक्‍शन है। बाटीओवन व 22 लीटर का कुकर है, जिसमें सब्जी व दाल बनाई जाती हैं। बच्चों को मीनू के हिसाब से एस.डी.एम.सी. की देख-रेख में दोपहर-भोजन दिया जाता है। प्रति सोमवार को प्रत्येक बच्चे को उस मौसम में उपलब्ध एक-एक फल दिया जाता है।

पहले भोजन तो बनता था पर उसमें वैरायटी नहीं थी। रोज वही चावल, दाल, रोटी आदि दी जाती थी। सभी बच्चे मन मारकर खाते थे। मैंने उसमें बदलाव किया। समिति की बैठक में यह बात रखी। उनको बताया गया कि इसे और अच्छा कैसे बना सकते हैं। सदस्यों को क्रमवार भोजन के समय उपस्थित होने के लिए निवेदन किया गया। इसके लिए उन्हें दायित्व भी दिए गए। स्कूल में तब से लेकर आज तक बच्चों को फल इनके द्वारा ही वितरित किए जाते हैं। आज भी एक महीने में लगभग 10 से 15 दिन भोजन के समय सदस्यों की उपस्थिति रहती है।

इन सब प्रयासों की वजह से समुदाय का लगाव शाला के प्रति बढ़ने लगा। शाला द्वारा  सहयोग माँगने पर एस.डी.एम.सी. सदस्यों द्वारा धनराशि एकत्रित कर किसी काम को पूर्ण करने की भावना का विकास हुआ। आज शाला भौतिक संसाधनों से परिपूर्ण है। समुदाय  का शाला से जुड़ाव व सहयोगात्मक रवैया बना है। वे बच्चों को नियमित शाला भेजने लगे हैं। शाला द्वारा आयोजित बैठकों में समय-समय पर भाग लेकर अपने सुझाव व सहयोग देने लगे हैं।'

महावीर प्रसाद जोशी ,बी.ए.,बी.एड.

  • प्रधानाध्यापक
  • राजकीय प्राथमिक विद्यालय बीजवाड़ ,पंचायत समिति देवली जिला-टोंक (राजस्थान)

 

 

 


वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। महावीर प्रसाद जोशी वर्ष 2009 में 'शाला नेतृत्‍व एवं प्रबन्‍धन' के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने महावीर जोशी से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इसी बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम महावीर प्रसाद जोशी, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

महावीर जोशी जी ने वि़द्यालय विकास का एक महत्‍त्‍वपूर्ण सूत्र समझ लिया है और वह है विद्यालय के प्रति समुदाय का अपनापन विकसित करना ।जब समाज यह अच्‍छे से समझ लेता है कि आप उसके हितैषी हैं तो वह भी प्राणपण से शिक्षक के साथ हो लेते है । इसके लिए शिक्षक को कसौटी पर खरा उतरना पडेगा । जोशी जी साधुवाद ।

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