किसी 'खास' की जानकारी भेजें। ममता जाट : कोई कब बनता है शिक्षक

ममता जाट सितम्बर 1997 राजस्थान के टोंक जिले में टोंक से लगभग 7 किलोमीटर दूर सवाईमाधोपुर रोड पर स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय तारण में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। ममता अभी अनौपचारिक रूप से अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन जिला संस्थान से जुडी हैं। ममता जी का कहना है कि, ‘मैं बहुत सारी गतिविधियों से लगातार जुडी रही हूँ इसलिए मैं मुझमें एक बड़ा परिवर्तन महसूस करती हूँ।’ आईए, उनके ही शब्दों में हम उन्हें जानें कि एक शिक्षक कैसे अपने को एक शिक्षक बनता हुआ देखता है ।

कोई कब बनता है शिक्षक 

मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था कि मैं कभी शिक्षक बनूँगी और ऐसा भी नहीं था कि मेरा कुछ और उद्देश्य था। सच पूछो तो मैं सिर्फ इतना ही समझती थी कि बस मुझे पढ़ना है। पढ़ाई करके क्या करना है यह तय करने की मुझमें समझ नहीं थी। फिर  अनायास ही ऐसा कुछ क्रम बनता गया और मैं इस क्षेत्र में आ गई। मुझे 19 सितम्बर 97 को अध्यापक के तौर पर नौकरी मिल गई। मैंने स्कूल ज्वाइन कर लिया।

जब पहली बार शिक्षण कार्य करवाने का अवसर आया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सच बताऊँ मुझे काफी समय तक तो ये लगता रहा कि पढ़ाना बहुत आसान कार्य है और वह भी छोटे बच्चों को यानि प्राथमिक कक्षाओं को। लेकिन मेरे मन और बुद्धि पर पड़ा ये भ्रम का आवरण धीरे–धीरे हटने लगा। जब मैं बच्चों को पढ़ाने के बाद मूल्यांकन भी करने लगी और तब नतीजा सामने आया। मैं सोच रही थी कि बालकों को पढ़ाना तो बहुत आसान है या यूँ कहूँ कि पाठ्यपुस्तकों के ज्ञान को हस्तांतरित करना मात्र ही शिक्षण कार्य है, ये धारणा गलत साबित हुई। मुझे समझ आया कि जब तक बालकों को विषयवस्तु स्पष्ट नहीं हो और वह व्यावहारिक ज्ञान में परिवर्तित न हो तब तक वह शिक्षण प्रक्रिया नहीं हो सकती, वह केवल मात्र एक प्रक्रिया मात्र ही होगी। अब मुझे बच्चों को सीखने–सिखाने के नए–नए तरीके ढूँढ़ने थे। इसके लिए मैं प्रयास करने लगी।

कुछ समय बाद एक सरकारी योजना चली जिसका नाम था “जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम’’, इसके अन्‍तर्गत पहली बार मुझे किसी प्रशिक्षण में जाने का अवसर मिला। “नौ दिवसीय आमुखीकरण प्रशिक्षण”  के दौरान मुझे काफी सीखने को मिला। शिक्षा के क्षेत्र में आए नवाचारों की जानकारी मिली। हम किस प्रकार अपने शिक्षण कार्य को प्रभावी बना सकते हैं उसमें यह भी सीखने को मिला। मैं हमेशा सकारात्मक रही है इसलिए इस प्रशिक्षण को मैंने काफी महत्वपूर्ण माना। मैंने अपने अध्यापन कार्य में गुणवत्ता लाने हेतु प्रयास आरम्‍भ किए। फिर इसके बाद तो जैसे सिलसिला शुरू हो गया। एक के बाद एक प्रशिक्षण में जाने का अवसर मिलता रहा। कभी सीखने के उद्देश्य से तो कभी सिखाने के उद्देश्य से। इन प्रशिक्षणों व कार्यशालाओं से मेरी पढ़ाने की शैली और तरीकों में बदलाव आया। मैं हमेशा इस प्रयास में रही कि बच्चों को बेहतर से बेहतर पढ़ा सकूँ। विगत 17 सालों से मैं शिक्षण कार्य करवा रही हूँ। इस दौरान मेरे मन में हमेशा से ही लगातार कुछ न कुछ सीखते रहने की ललक रही है। क्योंकि मैं यह जानती हूँ कि एक शिक्षक ने यदि सीखना बन्‍द कर दिया तो उसके सिखाने के भी सारे रास्ते बन्‍द हो जाएँगे। सोच हमेशा सकारात्मक रहेगी तो परिणाम भी सकारात्मक होंगे। इस सफर में मैं कई कार्यक्रमों से जुड़ी रही जैसे डी.पी.ई.पी., एस.एस.ए., डाइट, यूनिसेफ,आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, पैराटीचर, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए आयोजित प्रशिक्षण, पंचायती राज संस्थाओं के प्रशिक्षण, लर्निंग गारण्‍टी कार्यक्रम और अब विगत तीन वर्षों से अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा आयोजित शिक्षण सम्बन्धी गतिविधियों से जुडी हूँ।

 

अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन में हमने एक स्वैच्छिक शिक्षक मंच बनाया है जिसमें 35 – 40 शिक्षक / शिक्षिकाओं का समूह है। इस समूह के सदस्यों की महीने में एक बार बैठक आयोजित होती है। जिसमें सदस्यों के लिए कोई टी.ए., डी.ए. नहीं है और न ही ई.एल. का कोई प्रावधान है। इसकी बैठक हम छुट्टी के दिन या छुट्टी के बाद रखते हैं। इसमें हम अकादमिक मुद्दों को लेकर बातचीत करते हैं, एक-दूसरे के अनुभवों को आपस में शेयर करते हैं, शिक्षण कार्य के दौरान आने वाली समस्याओं को एक-दूसरे के सामने रखते हैं तथा मिलकर उनका समाधान ढूँढ़ते हैं। नवाचारों पर बातचीत करते हैं तथा सीखने–सिखाने के नए–नए तरीके खोजने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार शिक्षण के दौरान कक्षा-कक्ष में सकारात्मक परिणाम व गुणवत्तापूर्ण शिक्षण हेतु प्रयास करते रहते हैं। सरकार ने समय–समय पर कई अच्छी या यूँ कहें कि बहुत अच्छी–अच्छी योजनाएँ लागू की हैं और उनसे हमें काफी फायदा भी मिला है।

इस सबमें अहम् बात मुझे जो लगी वह ये कि मेरी बच्चों के प्रति जो सोच थी कि बच्चे कच्ची मिट्टी के घड़े हैं, जिन्हें मनचाहा आकार दिया जा सकता है, में काफी बदलाव आया है। क्योंकि वास्तव में ऐसा नहीं है। बालक जब पहली बार विद्यालय आता है तब वह भाषा के लगभग 2000 शब्द अपने साथ लेकर आता है (जानकर कहते हैं बच्‍चा 5000 शब्‍द लेकर आता है ।– संपादक) वह परिवेश को समझता है, परिवार के रिश्तों को समझता है, वह खेलना–बातचीत करना जानता है। छोटे–बड़े का ज्ञान लेकर आता है, उसे बस आवश्यकता है उन बातों को उच्च स्तर तक ले जाने की।

बच्चों के साथ काम करते हुए मेरे व्यवहार में भी काफी बदलाव आया। अब मेरा बच्चों के साथ मित्रवत रिश्ता बना है। उन्हें अभिव्यक्ति के पूर्ण अवसर देने की सोच बनी है। दण्‍ड और सजा तो जैसे व्यवहार से ही चले गए हैं। वास्तव में देखा जाए तो एक शिक्षक की भूमिका भी यही होनी चाहिए। हम क्या करते हैं कि शिक्षण को एक काम समझते हैं और उसे एक मशीन की तरह करते चले जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए, हमें शिक्षक की सही भूमिका को पहचानकर अपने को इस कार्य हेतु समर्पित कर देना चाहिए। मैंने बहुत पहले कहीं दीवार पर लिखी एक बात पढ़ी थी कि “एक अच्छा शिक्षक वही है जो जीवन भर विद्यार्थी बनकर रहे”। यह बात मेरे मानस पटल पर गहरा असर कर गई। मैंने कभी किसी काम को बोझ समझकर नहीं किया और इसका परिणाम यह रहा कि परिणाम भी सकारात्मक रहे। हमें दशा नहीं दिशा बदलने की आवश्यकता है। अगर हमारी दिशा सही है तो दशा तो अपने आप बदलेगी। एक शिक्षक होने के नाते मैं तो यही कहना चाहूँगी कि जो बेहतर से बेहतर तरीका हो, जो बच्चों को बेहतर शिक्षा दे सके, वही बेहतर है। शिक्षकों और बच्चों के बीच की गहरी खाई को जो पार कर सके, वह तरीका बेहतर है। शिक्षक को बालक का मित्र बना दे, वह तरीका बेहतर है, बच्चे आपसे खुल कर बात कर सकें। उन्हें अभिव्यक्ति के अवसर देने चाहिए उनके साथ आवश्यकतानुसार गाना–नाचना बेहतर है, हँसना बेहतर है, खेलना बेहतर है।

अब तक जो मैंने अपने काम से जो सीखा है उसके आधार पर कह सकती हूँ कि –

  • बच्चे तब अधिक सीखते हैं जब वे शिक्षक के साथ अपने को सहज महसूस करते हैं।
  • बच्चों को मौखिक और लिखित रूप से विद्यालय में अभिव्यक्ति के अवसर मिलने चाहिए, बच्चों की बात को नकारने से उनमें कुंठा और हीनभावना पैदा होती है।
  • बच्चों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। धीरे–धीरे उनके लेखन और उच्चारण में आवश्यकतानुसार सुधार करवाते रहना चाहिए।
  • बच्चों के साथ काम करवाते समय अनेक प्रकार की समस्याएँ आती हैं, मसलन लिखना-पढ़ना सिखाने में। लेकिन जब शिक्षक अपने साथियों से लगातार इस प्रकार की परेशानियों पर बात करते हैं, स्वयं नए–नए तरीके काम में लेते हैं तो दिक्कतें कम हो जाती हैं।
  • किसी चीज को सिखाने के लिए एक ही गतिविधि पर्याप्त नहीं हैं विविध तरीके बच्चों के सीखने में मददगार होते हैं। जैसे मैंने कुछ वर्णों को लेकर नवीन शब्दों का निर्माण करना, वर्ग पहेलियों से एक समूह की वस्तुओं के नाम छाँटना, श्रुतलेख, अपने सहपाठियों के नाम लिखना, परिवेश में पाई जाने वाली वस्तुओं, जीव-जन्‍तुओं, पेड़–पौधों के नाम लिखना, बालगीत गवाना और लिखवाना तथा अधिक से अधिक लिखित सामग्री को लेकर काम करना आदि किया।
  • एक गतिविधि जो भाषा सीखने की प्रक्रिया में मदद करती है वह यह कि बच्चों के परिवेश में बोली जाने वाली शब्दावली का मेल भाषा शिक्षण की पाठयपुस्तक में आए नवीन शब्दों से करवाना जैसे कि घर को भवन, मकान, सदन आदि भी कहते हैं। दोस्त को मित्र, सखा, साथी भी कहते हैं। यानि उसके परिवेश में मौजूद हर वस्तु का अन्य कोई और भी नाम है तो उसे भी बातचीत में काम में लेना। इससे बच्चों को परिवेश की मदद से नए शब्द को समझने में मदद मिलती है साथ ही उसका शब्दकोष भी समृद्ध होता है।
  • बालकों में विषयवस्तु की समझ बनाने हेतु सन्दर्भ सामग्री पर अधिक से अधिक बात की जानी आवश्यक है। सरल व सहज भाषा का उपयोग करते हुए हम बच्चों से अपने आप जुड़ते चले जाएँ तो बालक शिक्षक के साथ सहज होता चला जाएगा और शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया में मदद मिलेगी।

दरअसल जब एक शिक्षक ये महसूस करता है कि बच्चों को सिखाने के लिए उसका लगातार सीखना जरूरी है तभी सही मायने में वो शिक्षक हो पाता है।


प्रस्‍तुति : अनुपमा तिवाड़ी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक, राजस्‍थान 

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