किसी 'खास' की जानकारी भेजें। भोपाल का आनन्‍द निकेतन डेमोक्रेटिक स्‍कूल

मध्‍यप्रदेश में झीलों के शहर भोपाल में एक स्कूल है आनन्द निकेतन।

भोपाल की अपनी पहली ही यात्रा में मैं आनन्द निकेतन पहुँच गया। रात का  वक्‍त था। आनन्द निकेतन के संस्थापक और प्रभारी प्रमोद मैथिल अपने घर के बाहर मेरा इन्तजार कर रहे थे। मुझे स्कूल के ही एक बड़े कमरे में ठहराया गया। देखने में यह कमरा एक म्‍यूजिक स्टूडियो नजर आ रहा था। यहाँ हारमोनियम ,तबला, टेपरिकोर्डर,माइक और एक बड़ा टीवी मौजूद था। एक बैनर पर लिखा था ’समर कैम्प’। स्‍कूल में छुट्टियाँ चल रही हैं। छुट्टियों में ही यह कैम्‍प आयोजित किया गया है। दीवारों पर बने थे थर्मोकोल के मोर और खजूर के पेड़। एकलव्‍य द्वारा प्रकाशित कविता पोस्टर इस कमरे के वातावरण को स्कूल से ज्‍यादा मस्ती की पाठशाला बना रहे थे।

वास्‍तव में यह मस्ती की पाठशाला ही है। यह शहर के कोलाहल से दूर एक सुदूर कालोनी में स्थित है। इसका प्रांगण स्कूल के मिजाज को बयान करता है। बगीचे में बच्चों के लिए झूले किसी भी स्कूल के लिए सामान्य बात हो सकते हैं, लेकिन आनन्द निकेतन में ये झूले सामान्य झूले नहीं हैं। झूले ट्रक के टायर के हैं। बच्चों के लिए बनी रेल की पटरी के ऊपर चलने वाली गाड़ी भी टायर की है।

स्कूल का पूरा नाम है-आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल। मैंने प्रमोद मैथिल से पूछा, डेमोक्रटिक स्कूल का क्या मतलब है? उन्होंने बताया कि आनन्द निकेतन एक ऐसा स्कूल है जिसका सारा कार्यक्रम बच्चे मिलकर तय करते हैं। मैंने अगले ही दिन इसका उदाहरण भी देखा, जब समर कैम्प के बच्चों से पूछा गया, ‘दोपहर में क्या खाओगे, बच्चो?’ बच्चों ने आपस में सलाह की और कहा, ‘आम खाएँगे।‘ उनके लिए आम बुलवाए गए। अगले दिन खरबूज बच्चों की पसन्द बने। इस अनौपचारिक वातावरण को देखकर मुझे ए.एस.नील का समरहिल स्कूल याद आ गया।

आनन्द निकेतन में क्लास का रूप भी निराला है। यहाँ वर्ग नर्सरी, केजी ,एक, दो, तीन, चार में विभाजित नहीं हैं, बल्कि कला और साहित्य, संगीत, बाल वैज्ञानिक,  अंक और तर्क की कक्षाएं हैं और उनके अलग-अलग कमरे हैं। दरअसल उन्‍हें कक्षा भी नहीं कहना चाहिए। सभी कक्षाएँ बच्चों के खेलने का कमरा मालूम पड़ती हैं। हर कक्षा में विषय के अनुरूप सामग्री है। ‘कला और साहित्य’ के कमरे में किताबें हैं ,दीवार पर बच्‍चों की चित्रकला के अलावा ओरिगामी और मिट्टी से बनाई गई  विभिन्‍न कलाकृतियाँ हैं। ‘बाल वैज्ञानिक’ कमरा वास्‍तव में एक प्रयोगशाला है। यहाँ विभिन्न प्रकार के उपकरणों के साथ कम्‍प्‍यूटर (इन्टरनेट की सुविधा के साथ) , पोस्टर तथा बच्चों के द्वारा बनाए गए बहुत सारे वर्किंग मॉडल हैँ।

आनन्द  निकेतन मे बच्चे थकते नहीं हैं। उन्हें यहाँ से घर जाना भी अच्छा नहीं लगता।

इस स्कूल की कई और बातें भी अनूठी हैं। जैसे बच्चों को न तो अपने साथ  किताबें लाना हैं और न कॉपियाँ। हर बच्चे की स्कूल में अपनी एक छोटी अलमारी है। जिस पर उन्होंने अपना नाम लिख रखा है। वे उसी में अपनी कापियाँ और लिखने की सामग्री रखते हैं। किताबें स्‍कूल की ही होती हैं। बच्चे घर से अपने साथ सिर्फ खाना, पानी और स्कूल डायरी लाते हैं।

अब उनकी दिनचर्या की कहानी सुनिए। बच्चे सुबह नौ बजे स्कूल आते हैं। थोड़ी  बातचीत के बाद वे हल्के-फुल्के व्यायाम करते हैं। फिर सभी मिलकर अपने पसन्द के गीत गाते हैं। लय के साथ अलग-अलग भाषाओं के गीत, जो देश के विभिन्‍न अंचलों के गीत हैं। ये लोकगीत वे अपनी संगीत की कक्षा में सीखते हैं।

इसके बाद एक-एक करके सभी पोडिअम पर आते हैं और बीते दिन की घटनाओं का वर्णन करते हैं। अपने अनुभव सुनाते हैं। इसमें वे अपने पिछ्ले दिन की पूरी कहानी बयान करते हैं। विषय शिक्षक और अन्य शिक्षक बच्चों की हर बात लिखते जाते हैं।

अगर कोई बच्चा कहता है कि मुझे गणित पढ़ाए जाने का तरीका बिल्कुल पसन्द नहीं, तो टीचर उस बच्चे से विस्‍तार से बात करते हैं। अपने तरीके को बदलते हैं ताकि उसे गणित रोचक विषय लगे। पोडिअम पर रोजाना बोलने की कवायद बच्चों को स्वाभाविक रूप से अच्छा प्रस्तुतकर्ता और वक्ता बना रही है। जो बच्चे अपने शिक्षकों से स्वाभाविक ढंग से बात नहीं कर पाते थे वो पोडिअम पर धारा प्रवाह बोलते हुए देखे जाते हैं।

इसके बाद बच्‍चे तय करते हैं कि आज कब किस कक्षा में जाएँगे। वे इसे बोर्ड पर लिखते हैं। ये सारा कार्यक्रम उसी बड़े कमरे में होता है जो मुझे म्‍यूजिक स्टूडियो लगा था।

उसके बाद बच्चे अपनी चुनी हुई कक्षा में चले जाते हैं। उस कमरे का बोर्ड बच्चों के दिन भर के कार्यक्रम को उन्हीं की लेखनी में बयान कर रहा होता है।

मैंने प्रमोद मैथिल से पूछा कि बच्‍चों को इतनी आजादी है तो यह ए.एस.नील के स्कूल से कितना अलग है? प्रमोद जी ने बताया नील ने बच्चों को अपनी मर्ज़ी से पढ़ने और खेलने की आजादी दी थी। लेकिन हम उसके साथ-साथ रोचक पुस्तकों और पठन-पाठन की सामग्री से सीखने का वातावरण भी तैयार करते हैं। यहाँ बच्चे अपने को अलग-थलग महसूस नहीं करते। वे मिलकर पढ़ने की योजना बनाते हैं। पढ़ते हैं, खेलते हैं।

आनन्द निकेतन में बहुत सारी अन्‍य पुस्तकों के अलावा एन.सी.ई.आर.टी.की पुस्तकें भी इस्तेमाल की जाती हैं। इनकी मदद से वर्कशीट बनाई जाती हैं। अभिभावक के माँगने पर वर्कशीट बच्चे घर भी ले जाते हैं। छोटे बच्चों की छुट्टी पहले हो जाती है पर वे घर जाना नहीं चाहते। वे कभी झूले पर झूल रहे होते हैं या पटरी के ऊपर चलने वाली गाड़ी में मजे कर रहे होते हैं। कभी कहानी सुनते हैं। कभी पूरे स्कूल में घूमते-फिरते नजर आते हैं या फिर कार्टून फिल्म देख रहे होते हैं।

आप सोचते होंगे आखिर ऐसे स्कूल में कैसे शिक्षक कैसे पढ़ाते होंगे ? न रूटीन तय है, न ही लेसन प्लान। फिर भी हर दिन पूरी तैयारी के साथ आइए और बच्चों के हिसाब से पढ़ाइए। मैंने आनन्द निकेतन में शिक्षक नियुक्ति के लिए हाल ही में निकला विज्ञापन देखा। उससे पता चला कि यहाँ ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो बच्चों की क्षमता पर विश्वास करने वाले हों। ऊर्जावान और सतत प्रयोग करने के लिए तैयार रहने वाले हों। वैकल्पिक शिक्षा की चुनौतियों को समझने वाले हों। इन सबके साथ ही हिन्‍दी और अँग्रेजी में धाराप्रवाह बात करने की योग्यता रखते हों।

मैंने महसूस किया कि आनन्द निकेतन के सभी शिक्षक सहज हैं। बच्चों से प्यार करने वाले, उनसे बातें करने वाले, उनके साथ खेलने वाले ,गाने वाले, मिलकर काम करने वाले।

बच्चों की आजादी में विश्वास रखने, सोचने और ईमानदारी के साथ बोलने को तभी बरता जा सकता है जब शिक्षक प्रत्येक बच्चे के प्रति संवेदनशील हो। यहाँ मुझे यह दिखा। सचमुच यह प्रयास सराहनीय है। कितना सार्थक है ? इसका आंशिक जवाब मुझे तब मिला जब एक अभिभावक ने कहा कि उनका बच्चा जो बिल्कुल किसी से बातें नहीं करता था, किसी से घुलता-मिलता नहीं था, वह आज मंच पर बोलने में भी नहीं हिचकता है।

आनन्द निकेतन के बच्चे अपने नाटक के माध्यम से हमारी विरासत को सम्भालते हुए भी दिख रहे हैं। जब यह बच्चे पानी के संकट को लोकगीत के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं तो ऐसा लगता है कि ये बच्चे एक जिम्‍मेदार नागरिक बनने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

आनन्द निकेतन में अभी सिर्फ तीस बच्चे हैं और इन बच्चों की उम्र तीन से दस के बीच है। मैं ही नहीं, प्रमोद मैथिल भी यह जानना चाहते हैं कि अगर बच्चों की संख्या बढाई जाए तो क्या स्‍कूल के इस स्वरूप को बरकरार रखा जा सकता है?

(आनन्‍द निकेतन के बारे में अधिक जानने के लिए http://anbhopal.weebly.com/  पर क्लिक करें।)


 0आसिफ़ अख्तर, एम.ए.(शिक्षा) अन्तिम वर्ष, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय,बंगलौर                                               

टिप्पणियाँ

sanjayghati का छायाचित्र

बहुत ही सुन्दर अनुभव है मैं जब नौता स्कूल में पढाता था तब की यादें ताजा हो आयी. मेरा साधुवाद

pramodkumar का छायाचित्र

हर विद्यालय में ऐसा खुशनुमा माहौल हो तो बच्‍चे विद्यालय से दूर न भागें ा कठोर अनुशासन तले बच्‍चों की प्रतिभा दम तोड रही है ा बच्‍चों को स्‍वयं को प्रगट करने का अवसर मिलना चाहिए ा मेरी शुभकामनायें

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