किसी 'खास' की जानकारी भेजें। भगवानपुरा, टोडाराय‍सिंह का प्राथमिक विद्यालय

ग्राम भगवानपुरा, टोड़ारायसिंह ब्लॉक मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित है। बीसलपुर बाँध से सटे होने के कारण भूजल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, इससे खेतों में पैदावार अच्छी होती है।

मुख्य सड़क से गाँव को जोड़ने वाला रास्ता कच्चा है, जो बरसात में दुर्गम रास्ते में तब्दील हो जाता है। 40 घरों और 450 लोगों की आबादी वाले इस गाँव में अधिकतर परिवार सम्पन्न हैं। वर्तमान् पीढ़ी के लोग (बहुसंख्यक पुरुष) कक्षा दस तक पढ़े हैं।

यहॉं के राजकीय प्राथमिक विद्यालय में वर्तमान में स्कूल में 42 बच्चों का नामांकन है और दो शिक्षक कार्यरत हैं। बच्चों व शिक्षकों के बीच सहज रिश्‍ता है। कक्षावार बच्चों का स्तर बेहतर है और सबसे खास बात यह है कि यहाँ के शिक्षकों की पिछले 10 से 15 साल की मेहनत से इस गाँव में बालिकाएँ कक्षा पाँच से आगे पढ़ने लगी हैं। शिक्षकों के अनुसार समुदाय के लोगों में बालिका-शिक्षा के प्रति नजरिए में सकारात्‍मक बदलाव सम्‍भव हो पाया है और अब ये लोग बालिकाओं को पढ़ाने में सहयोग करने लगे हैं।

विद्यालय में रोजमर्रा 

विद्यालय आरम्भ होने के बाद सबसे पहले शिक्षक व बच्चे मिलकर कक्षा-कक्षों व मैदान की सफाई करते हैं। इसके पश्चात प्रातःकालीन सभा होती है। लगभग 30 मिनट के इस कार्यक्रम में प्रार्थना, अखबार की खास खबरों पर बातचीत, कुछ अन्य मुद्दों पर चर्चा की जाती है। इसके बाद सभी बच्चे अपनी-अपनी जगह पर पहुँचकर पिछले दिन से आगे के काम को करने में लग जाते हैं। इस बीच दोनों शिक्षक  कार्यालय में दैनिक कागज-कार्यवाही को पूरा करते हैं।

इस सबके बाद दोनों शिक्षक सबसे पहले बड़ी कक्षाओं से (कक्षा पाँच, चार, तीन) अपने काम की शुरुआत करते हैं। चूँकि स्कूल में कक्षा एक से लेकर पाँच तक कक्षावार नामांकन अपेक्षाकृत कम है, अतः उनके पास प्रत्येक बच्चे के साथ पर्याप्त समय लगाने का अवसर भी होता है और वह ऐसा करते भी हैं। बच्चों के द्वारा किए गए काम को देखा जाता है। प्रत्येक बच्चे से सम्‍बन्धित बिन्दु पर विस्तार से विमर्श करने के बाद,  अगला काम दिया जाता है। शिक्षकों द्वारा यह प्रक्रिया सभी कक्षाओं के बच्चों के साथ की जाती है।

कक्षा-कक्षों में दीवारों पर टी.एल.एम. लगा है। शिक्षण के दौरान बच्चे भी इनका प्रयोग करते नजर आते हैं। जब बच्चे इनका प्रयोग करते हैं, तब यह आवश्‍यक नहीं होता है कि शिक्षक वहाँ पर हों। इसमें यह भी देखा गया कि जब बच्चे यह सब कर रहे होते हैं, तब शिक्षक बीच-बीच में आकर उनको देखते हैं, उनसे कुछ सवाल भी करते हैं, कई अवसरों पर बच्चे भी शिक्षकों को बुलाकर उनके समक्ष अपनी उलझन या प्रश्‍न रख रहे होते हैं।

शिक्षक गणित के अध्याय या प्रश्‍नावली करवाते समय टी.एल.एम. और परिवेश में उपलब्ध संसाधनों का भरपूर मात्रा में उपयोग करते हैं। अन्य विषयों में सम्‍बन्धित मुद्दे आने पर सम्‍बन्धित टी.एल.एम. का उपयोग किया जाता है। विभिन्न सन्‍दर्भों को स्थानीय परिवेश से जोड़ने के प्रयास भी किए जाते हैं। जैसे कक्षा पाँच की पर्यावरण की पाठ्यपुस्तक में अध्याय दो - पानी तब से अब तक में बावड़ियों के सन्‍दर्भ में टोड़ारायसिंह का उल्लेख भी है। इस बिन्दु पर शिक्षक बच्चों के साथ स्थानीय सन्‍दर्भों को लेते हुए विस्तार से चर्चा करते हैं। ठीक इसी तरह हिन्दी में एक अध्याय कठपुतली पर है। शिक्षक कभी अजमेर गए, उन्हें कठपुतली दिखाई दी और वह उसे खरीद लाए।

लगभग सभी कक्षा के बच्चों का स्तर ठीक-ठाक है। बच्चों में किसी भी प्रकार का भय आदि दिखाई नहीं देता, वे पूर्ण मनोयोग से अध्ययन में लगे रहते हैं। मध्‍यान्‍ह भोजन के दौरान सभी के खाने की व्यवस्था बच्चे स्वयं अच्छे से करते हैं। पीने के पानी के लिए शिक्षकों द्वारा स्वयं के पैसों से कैम्पर लाए हुए हैं। जिन्हें प्रतिदिन साफ करके भरा जाता है। खाना खाने के बाद सभी बच्चे मिलकर कैम्पस में ही खेलते हैं और समय होने पर अपने आप ही कक्षा में आ जाते हैं। इसके लिए शिक्षकों  को कोई निर्देश नहीं देना पडता है।

वर्ष 1985 में स्कूल की स्थापना हुई। 17 जुलाई 1999 को ओमप्रकाश स्वर्णकार का तबादला इस स्कूल में हुआ। इससे पहले वे शाहपुरा (जिला-भीलवाड़ा) के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते थे। जब वे यहाँ आए तब प्रधानाध्‍यापक और उन्‍हें मिलाकर स्कूल में दो का ही स्टॉफ व 30 बच्चों का नामांकन था। विद्यालय में कुल चार कमरे थे, जिनमें से एक कमरे में कार्यालय, एक में स्टोर और दो कमरे कक्षा कक्ष के रूप में काम आ रहे थे।

वर्तमान में भी विद्यालय में दो ही शिक्षक हैं ( दूसरे शिक्षक सत्यनारायण माली हैं) । अभी विद्यालय में 42 बच्चों का नामांकन है। अब स्कूल में कुल सात कमरे हैं।

सामान्य तौर पर दोनों ही स्थितियों को देखने पर स्कूल में कोई खास बदलाव होता दिखाई नहीं देता है, सिवाय इसके कि कमरों की संख्या में का इजाफा हो गया है। जबकि बच्चों की संख्या तो केवल 12 ही अधिक हो पाई है।

ओमप्रकाश जब इस स्कूल में आए, तब कुछ ही दिनों के अनुभवों में उन्होंने पाया कि अभिभावक बच्चों की ओर कोई खास ध्यान नहीं देते हैं। इसके साथ ही दो विशेष बातों पर भी उनका ध्यान गया। एक, गाँव के सभी लोग बाल विवाह पर एकमत हैं। दो, लड़कियों को पढ़ाने पर रुझान नहीं के बराबर है।

गाँव की अधिकतर लड़कियाँ कक्षा पाँच में भी नहीं पहुँच पाती हैं और जो पहुँच भी जाती हैं, वे भी कक्षा पाँच से आगे नहीं पढ़ पाती हैं। गाँव की लगभग 90 प्रतिशत आबादी धाकड़ और जाट समुदाय की है और बाकी 10 प्रतिशत में मंसूरी, भील, लुहार आते हैं। 

इन दोनों ही बातों के संदर्भ में आज की स्थिति पर नजर डालें तो आज गाँव में एक भी लड़की ऐसी नहीं है, जिसने कम से कम कक्षा आठ तक पढ़ाई न की हो। लगभग 30 बालिकाएँ ऐसी हैं जो गाँव से तीन किलोमीटर दूर स्थित बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय, बासू में अध्ययनरत हैं। कुछ बालिकाएँ ऐसी भी हैं जो दसवीं से आगे भी पढ़ रही हैं। बालविवाह के प्रति समुदाय के नजरिये में भी बदलाव आया है।

पिछले वर्षों में इस विद्यालय में पढ़े छात्रों में में से दो ने बी.एड. तथा चार ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है। 2001 में इस स्कूल की कक्षा पाँच के छात्र रहे एक युवक ने अभी हाल ही में आई.आई.टी.जोधपुर से गोल्‍ड मैडल के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की है।

इस बदलाव पर दोनों शिक्षकों का कहना है कि सबसे पहले उन्होंने समुदाय के लोगों से सम्‍पर्क किया और इसे नियमित रखा। उनसे इन विषयों पर चर्चा की जाती रही। समुदाय के लोगों को नियमित स्कूल के कार्यक्रमों से जोड़ा गया। इन्हें स्कूल के सभी हिसाब-किताब और प्रगति से नियमित अवगत कराया गया। एक बात का विषेष ध्यान रखा गया कि समुदाय के सभी लोगों से सम्‍बन्‍ध तो अच्छे बनाए जाएँ, किन्तु स्थानीय राजनीति से दूरी बनाकर रखी जाए।

स्कूल में बालिकाओं के शिक्षण पर विशेषरूप से सतत काम किया गया।  शिक्षक और बच्चे नियमित हों, इस पर फोकस किया गया। शिक्षण में नवाचारों का प्रयोग किया गया। जो अभी तक भी जारी है। स्वयं (शिक्षकों) के पैसों से भी बच्चों के लिए कॉपी, पेन्सिल आदि की व्यवस्थाएँ बनाए रखी गईं। इसके साथ-साथ जब भी इन शिक्षकों को कहीं पर अच्छा टी.एल.एम. दिखाई दिया, ये स्वयं उसे खरीदकर स्कूल के लिए लेकर आते रहे हैं। 

शिक्षक ओमप्रकाश की बेटी ने कक्षा 3 से 5 तक की शिक्षा यहीं प्राप्त की। दूसरे शिक्षक सत्यनारायण तथा उनके भाई के बच्चों ने भी इसी स्कूल से कक्षा पांच तक की पढ़ाई की। वर्तमान में उनकी भतीजी इस स्कूल की कक्षा चार में पढ़ रही है।   

एक भील परिवार जिनके बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते हैं, दो साल पहले तक गाँव में ही रहता था।  पिछले दो साल से यह परिवार गाँव के बाहर मुख्य सड़क के पार रहने लगा। परिवार चाहता था कि उनके बच्चे इसी स्कूल में पढ़ें। लेकिन डेढ़ किलोमीटर की दूरी और घर से स्कूल तक का कच्चा रास्ता (बरसात के समय अधिक दुर्गम होने वाला) इसमें बाधा बन रहा था। स्कूल शिक्षक पिछले दो साल से इन बच्चों को प्रतिदिन अपने साथ स्कूल ला रहे हैं। 

दोनों ही शिक्षक 2010 से ही स्वैच्छिक शिक्षक मंच, टोड़ारायसिंह के नियमित सदस्य हैं।

गाँव में केवल दो ही हैण्‍डपम्प हैं और स्कूल में एक । गाँव के हैण्‍डपम्पों के पानी में फ्लोराइड अधिक है। अतः गाँव के लोग स्कूल के हैण्‍डपम्प का भी प्रयोग करते है। शिक्षकों के द्वारा स्कूल में पानी की समुचित व्यवस्था के लिए बीसलपुर पाईंट से कनेक्‍शन लेने के प्रयास भी प्रारम्भ कर दिए हैं।

तो दोनों ही शिक्षक शिक्षण पर ध्‍यान देने के साथ-साथ समुदाय का सहयोग लेने और उन्‍हें संभव सहायता देने का लगातार प्रयत्‍न करते हैं।


प्रस्‍तुति : लोहित कुमार जोशी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, जिला संस्‍थान टोंक,राजस्‍थान

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

अच्छा है

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