किसी 'खास' की जानकारी भेजें। बेहतर स्‍कूल यानी तीरथ नम्‍बर 3

सोचिए आप बतौर शिक्षक ऐसी जगह काम कर रहे हैं जहाँ सिर्फ कच्ची सड़क से ही पहुँचा जा सकता है, जिसकी स्थिति बारिश में और भी बदतर हो जाती है। समुदाय में रहने वाले अधिकांश लोग प्रवासी मजदूर हैं, जिनको अपने बच्चों को पढ़ाने में जिनकी कोई रुचि नहीं है। वे लोग जो  थोड़े पढ़े-लिखे हैं वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं। आइए पढ़ते हैं ऐसे स्कूल के बेहतर स्कूल बनने की कहानी।

उधमसिंह नगर जिले के जसपुर ब्‍लाक में मुख्य मार्ग से करीब 20 मिनट की लम्‍बी कच्ची सड़क पर ड्राइव के बाद हम प्राथमिक शाला तीरथ नम्बर 3 पहुँचते हैं। स्कूल में सबसे पहले जो बात हमारा ध्यान खींचती है, वह है पेड़ों के साथ लगी नाम पट्टी, जिस पर उन पौधों के नाम लिखे हुए हैं। नीम, अमरूद, आम, जामुन आदि। प्रधान अध्यापक अवनीश कुमार चौहान हमें लेने बाहर तक आते हैं। इसी दौरान मेरा ध्यान एक कक्षा की ओर जाता है, जहाँ शिक्षक उपस्थित नहीं है, बच्चे छोटे-छोटे समूहों में बैठे हुए हैं, उनके बीच एक गत्ते का टुकड़ा रखा हुआ है जिसमें उनके समूह का नाम और सदस्यों का नाम लिखा हुआ है। जब हम वहाँ से गुजरते हैं तब कुछ बच्चे हमें देखने लगते है।

अस्तित्व के लिए संघर्ष

चौहान साहब के कमरे में हमारी चर्चा शुरू होती है जिसके केन्‍द्र में तो स्कूल और उससे जुड़े उनके सपने हैं पर आसपास बहुत से विषय आते-जाते रहते हैं। जैसे समुदाय, बच्चे, उनका अपना जीवन और परिवार आदि। वह बताते हैं कि कुछ साल पहले यहाँ पास के एक निजी स्कूल में सरकारी स्कूल से बच्चे भेजे जाते थे। इस स्कूल में ज्वॉइन करने के दूसरे दिन ही निजी स्कूल की प्रधानाध्यापिका नें उन्हे बच्चों को निजी स्कूल में भेजने का प्रस्ताव दिया, पर उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि वह उस स्कूल के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए प्रयत्न करेंगे। इस समय 185 छात्र संख्या वाला वह निजी स्कूल बन्‍द हो चुका है और उसी स्कूल के 140 बच्चों का नामांकन तीरथ नम्बर-3 के स्कूल में हो चुका है। (इस स्कूल विजिट के दिन इसमें से 125 बच्चे उपस्थित थे), सरकार की ओर से चार शिक्षकों की नियुक्ति है, दो शिक्षक शाला प्रबन्‍धन समिति द्वारा नियुक्त किए गए हैं। स्कूल में 4 कक्षाएँ, एक स्टाफ कक्ष, एक रसोई और स्टोर है, एक कक्षा अभी निर्माणाधीन है।

स्कूल की बाउण्‍ड्री वॉल एक तरफ ही है बाकी तीनों तरफ गन्ने के खेत ही बाउण्‍ड्री का काम करते हैं। गन्ने की खेती ही यहाँ के किसानों का जीविकोपार्जन का साधन हैं, गन्ने की खेती करके वह उसे आसपास की शक्कर मिलों में बेच देते हैं। मैंने उनसे पूछा कि खेतों की यह बाउण्‍ड्रीवाल क्या स्कूल को असुरक्षित नहीं बनाती है। इन उजड़े हुए खेतों को देखकर क्या ऐसा नहीं लगता कि जैसे शाला भवन को तहस-नहस किया गया हो या कोई किचन गार्डन उजाड़ा गया हो? जबकि स्कूल भवन को तो सुन्‍दर दिखना चाहिए। एक गुलाब की तरफ इशारा करते हुए अवनीश चौहान कहते हैं यह गुलाब यहीं खिला है और यह यहीं मुरझा जाएगा। इसी तरह गाँव के लोग यहाँ के पेड़-पौधों को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं और न ही वह कभी इन खेतों की सीमा को लाँघते हैं। पर जब मैं यहाँ आया था तब ऐसा नहीं था। तब यह स्कूल एक वीराने की तरह था। बड़ी मुश्किल से कुछ बच्चे स्कूल आते थे, यहाँ के अधिकांश बच्चे पहली पीढ़ी के बच्चे हैं जो पढ़ने की दुनिया से जुड़े है और बेहद गरीब परिवारों से आते हैं। शराब और गरीबी गाँवों में अभी भी एक गंभीर समस्या है।

यह बदलाव कैसे आया?

इस सवाल पर अवनीश चौहान बारह साल के इतिहास के बारे में सोचने लगे। फिर धीरे से उन्होंने अपनी कहानी शुरू की।

हजारों मील जैसी लम्बी यात्रा... जब मैं यहाँ पहली बार आया, किसी भी गाँव  वाले ने न तो मुझसे बात की और न ही शाला विकास समिति की बैठक में हिस्सेदारी की। मैंने सोचा कि इनके इस तरह के व्यवहार के दो ही कारण हो सकते हैं। पहला कि गाँव वालों ने तय कर रखा है कि वह किसी भी पढ़े-लिखे व्यक्ति से बात नहीं करेंगे, दूसरा जो बहुत महत्वपूर्ण भी था कि कोई भी शिक्षक इस इलाके में नियमित बैठक नहीं कर पाता है, तो मैं इस बात पर इतना जोर क्यों दे रहा हूँ?

मैंने यह निर्णय लिया कि मैं इस सोच को बदल दूँगा और स्कूल और समुदाय के बीच की इस दूरी को खत्म करूँगा। मैंने सोचा कि समुदाय के लोगों को स्कूल में आने देना शायद इस गतिरोध को तोड़ेगा और स्कूल से उनका जुड़ाव बनाएगा।

हर दिन घर लौटते समय मैं किसी न किसी गाँव वाले से जरूर बात करता जो भी मुझे रास्ते में मिल जाता था। मैं उनसे उनके परिवार, स्कूल, खेती और दिन भर के काम और शिक्षा के महत्व और बच्चों के जीवन में शिक्षा के योगदान और कैसे गाँव का स्कूल उनका अपना स्कूल है इस बारे में बात करता था। धीरे-धीरे लोग मुझसे बात करने में सहज होने लगे। मैंने उन्हें बताया कि उनके घर और खेत अतिक्रमण भूमि पर हैं। आने वाले समय में सरकार पानी, बिजली आदि सुविधाओं को लेकर बहुत सहयोगात्मक रवैय्या नहीं रखने वाली हैं। मैंने उनके वजूद पर सवाल खड़ा किया और उनसे कहा “ आपके यहाँ पर कोई ग्रामसभा भी नहीं है इसलिए आप का गाँव देश और प्रदेश के नक्शे में कहीं दर्ज नहीं है। बाहर की दुनिया में आपको केवल एक अपराधी और शराबी की तरह देखा जाता है। स्कूल के जरिए ही आप अपनी पहचान वापस पा सकते हैं। “इस गुमनामी भरी जिन्‍दगी से बाहर निकलो।”

शिक्षा और अर्थशास्त्र

गाँव वालों के साथ बातचीत के दौरान, मैंने उन्हें अपना उदाहरण दिया कि शिक्षित होने के कारण मेरे पास एक आर्थिक ताकत है। यदि मैं बैंक से कोई ऋण चाहता हूँ तो बैंक व्यापार करने के लिए मुझे तुरन्‍त ही ऋण दे देगी। मैंने उन्हें प्रेरित करने के लिए उनके धर्म गुरुओं, गुरु गोविन्‍दसिंह और गुरु नानक के बारे में कई धार्मिक कहानियाँ भी सुनाईं। इन सब सूत्रों ने स्कूल में छात्रों का पंजीयन और छात्र संख्या बढ़ाने में काफी मदद की।

यहाँ के अधिकांश अभिभावक राय सिक्ख समुदाय के हैं। उनके पास कोई स्थायी काम नहीं है और ज्‍यादातर लोग मौसमी प्रवासी खेतिहर मजदूर हैं। कपास पकने के मौसम में सारा गाँव पंजाब जाकर वहाँ खेतों में अपने बच्चों के साथ काम करता था। इस मौसम में शाला मे बच्चों की उपस्थिति लगभग नगण्य हो जाती थी। इस समस्या का समाधान करने की पहल मैंने समुदाय के साथ की, कि पंजाब जाते समय वह बच्चों के लिए जरूरी इन्‍तजाम कर उन्हें यहीं छोड़ जाएँ, बच्चों के भोजन और अन्य व्यवस्थाओं की जवाबदारी स्कूल और समुदाय के वह लोग जो पंजाब नहीं जा रहे होंगे वह उठाएँगे।

इतना सब करने के बाद भी कुछ अभिभावक बच्चों को अपने साथ ले गए, जब वह वापस आए तो मैंने उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने अपने समुदाय के साथ बैठक में इस बात पर सहमति जताई थी कि यदि बच्चे काम करने पंजाब जाते हैं और स्कूल नहीं आते हैं यह उनके लिए अच्छा नहीं है। फिर मैंने कहा कि स्कूल पर भरोसा रखें और अगली बार अपने बच्चों को छोड़कर काम पर जाएँ। साथ ही जो बच्चे स्कूल की व्यवस्था में रुके थे उन्होंने हमारी व्यवस्थाओं की बहुत तारीफ की। इन सब बातों का असर आप आज स्कूल में देख सकते हैं- अब जब अभिभावक पंजाब या कहीं और मजदूरी के लिए जाते हैं अपने बच्चों को गाँव में ही छोड़कर जाते हैं।

बच्चों को स्कूल में रोक लेना ही पर्याप्त नहीं था। बच्चों के अधिगम में सुधार एक बड़ी चुनौती थी। बच्चे घर जाकर किताबों को हाथ तक नहीं लगाते थे क्योंकि उन्हें घर के और भी बहुत से काम करने होते थे। मैंने माता-पिता को सलाह दी कि जब बच्चे जानवरों को चराने जंगल जाएँ तो उन्हें साथ में किताबें भी दें ताकि वह उसके साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी कर सकें। मैं चाहता था कि मेरे कक्षा में न रहने की स्थिति में भी बच्चों की पढ़ाई चलती रहे। इसके लिए मैंने कक्षा को छोटे-छोटे समूहों में बाँट दिया और हर समूह का एक नेता बना दिया। उसे एक जवाबदारी दे दी जैसे नोटबुक चेक करना, स्कूल की कुछ गतिविधियों का प्रबन्‍धन जैसे सुबह की प्रार्थना आदि। इससे मुझे पढ़ाई में कमजोर बच्चों के लिए अधिक समय देने का समय मिलने लगा। मैंने पढ़ाने में नए प्रयोग और अपना समान्य ज्ञान बेहतर बनाने के लिए कंप्यूटर की मदद ली और बच्चों की अधिगम में हिस्सेदारी बढ़ाई। मैंने बच्चों को अपना फोन नम्‍बर दिया और उन्हें कहा कि कोई भी परेशानी होने पर मुझे मिस कॉल करें।

2005 में मैंने ठण्‍ड की छुट्टियों में भी सहायता कक्षाएँ लगाईं। इन कक्षाओं में मैंने उन पाठों को पढ़ाया जो पहले की नियमित कक्षाओं में भी पढ़ाए जा चुके थे। मैंने महसूस किया कि इसका बहुत सकारात्मक परिणाम हुआ, इससे अन्य शिक्षक भी बच्चों की मदद करने के लिए प्रेरित हुए।

मुझे लगता है कि बदलाव का सबसे उल्लेखनीय बिन्दु हमारे 34 विद्यार्थियों का  लर्निग गारण्‍टी प्रोग्राम क्राइटेरिया में सफलता पाना था। इन बच्चों को जिला स्तर पर पुरस्कृत किया गया, तब तीरथ नंबर-3 स्कूल का नाम समाचार पत्र में भी छपा था। हमने वह सब आर्टिकल काटकर फ्रेम करवाए और अपने ऑफिस में टांगे थे। इसके तुरन्‍त बाद अन्य क्षेत्रों के 25 बच्चे हमारे स्कूल में एडमिशन के लिए आए।

स्कूल के प्रति अपनापन और जवाबदारी बढ़ाने के लिए मैंने स्कूल के बगीचे में उन्हें कुछ ऐसे पौधे लगाने के लिए कहा जिन्हें वह चाहते हैं कि वह स्कूल में लगे होने चाहिए। हमने फल और सब्जियों के पौधे बगीचे में लगाए जिसका उपयोग मध्यान्ह भोजन में बच्चों के लिए होता है। पिछले साल हमें खेती से 75 किलो प्याज मिली थी। मैं कुछ गाँव वालों को क्लस्टर और ब्लॉक संसाधन केंद्र के बैठकों में भी ले गया। इस तरह से मैंने गाँव वालों का प्रक्रियाओं और स्कूल संचालन के सम्‍बन्‍ध में क्षमतावर्धन किया और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके स्कूल की प्रक्रियाएँ और व्यवस्थाएँ पारदर्शी हैं। मैंने समुदाय को स्कूल की प्रक्रिया के सभी पक्षों से अवगत करवाया और इस सम्‍बन्‍ध में उनका क्षमतावर्धन किया। जैसे कि मैं रोज सुबह 9.15 पर स्कूल पहुँच जाता हूँ। मैंने उन्हें अपने आने के समय पर नजर रखने को कहा और उन्हें बताया कि यह उनका अधिकार है कि यदि मैं देर से आता हूँ तो वह इस सम्‍बन्‍ध में मुझसे सवाल पूछ सकते हैं ।

अब दीवाली के दिन गाँव वाले खुद स्कूल को दीयों से सजाते हैं। कुछ समय पहले ही हमने स्कूल में अपना पहला बाल शोध मेला आयोजित किया था, जिसमें बच्चों ने पिछले साल में जो कुछ बनाया, प्रदर्शित किया था। यह पूरा कार्यक्रम स्कूल और समुदाय ने साथ मिलकर आयोजित किया था, जिसमें 1300 लोगों के भोजन की व्यवस्था भी शामिल थी।

स्कूल का प्रबन्‍धन बनाम स्व-प्रबन्‍धन

जब मैंने शिक्षा में अपना करियर बनाने के बारे में सोचा तब से ही मैं इसमें अपनी एक पहचान बनाना चाहता था। मैं हर उस आदमी को प्रभावित करना चाहता था जिससे मैं मिलता था। मेरी कक्षा के बच्चे, उनके माता-पिता मेरे साथी शिक्षक आदि। अगर मैं विषम परिस्थिति का रोना रोता रहूँगा तो काम कब करूँगा?

कोई भी आदमी सभी उपलब्ध संसाधनों में अच्छे से काम कर सकता है, मेरी क्षमताओं की सही परीक्षा तो तब है जब कम से कम संसाधनों में बेहतर काम कर दिखा सकूँ - मेरे लिए स्कूल चलाने के लिए बेहतर संसाधनों में जरूरी चीजें हैं चॉक, ब्लैकबोर्ड, मेरा जज्‍बा और समर्पण। मैं इसे अपने पद की गरिमा के प्रति अपना समर्पण मानता हूँ और यह किसी पर कोई एहसान नहीं है क्योंकि यह काम करने का मुझे वेतन मिलता है। वास्तव में तो मैं समाज को वही लौटा रहा हूँ जो मुझे समाज से मिला है।


अवनीश चौहान से ज्‍योति सोमानी की बातचीत पर आधारित। अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक’ से साभार।

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