किसी 'खास' की जानकारी भेजें। बेडि़यापुरा, खरगोन के रामरतन 'सर' का स्कूल

जिला प्रशिक्षण संस्थान में गतिविधि आधारित शिक्षण में प्रयुक्त सामग्री व गतिविधियों पर शिक्षकों की बेहतर समझ बनाने हेतु प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं। इस प्रशिक्षण में सत्रों के दौरान खरगोन के ही एक स्कूल शिक्षक के विडियो क्लिपिंग का प्रयोग किया जा रहा था। इन क्लिपिंग में शिक्षक बच्चों के बीच बैठकर गतिविधि आधारित शिक्षण स्कूलों को दी हुई सामग्री का उपयोग करते हुए समूह में कार्य करता है और बच्चे एवं शिक्षक मिलकर सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में सहज रुप से भागीदारी करते दिखाई देते हैं।

इस प्रशिक्षण के दौरान हमारा भी डाइट जाना हुआ। उस विडियो क्लिपिंग को हमने  भी देखा। प्रशिक्षण में सत्र ले रहे राजेश कानूनगो से हमने पूछा कि यह शिक्षक  कौन है। उन्होंने बताया कि यह शिक्षक रामरतन पाटीदार हैं जो प्राथमिक विद्यालय बेडियापुरा,खरगोन में पदस्थ हैं। साथ ही उन्‍होंने उनके द्धारा स्कूल में किए जा रहे प्रयासों के बारे में बताया। तभी से उनके स्कूल जाकर मिलने और उनके कामों के बारे में जानने समझने का मन था।

शिक्षक रामरतन पाटीदार 1997 से ही प्राथमिक विद्यालय बेडि़यापुरा में पदस्थ हैं। इस स्कूल की शुरुआत शिक्षा गारण्टी शाला के रूप में हुई थी। जब शुरुआत हुई थी, तब स्कूल का कोई भवन नहीं था। किराए के कमरे में यह स्कूल आरम्‍भ हुआ। इसके बाद रामरतन ने अपने खुद के मकान में भी स्कूल चलाया। रामरतन ने नियमित कक्षा 12 वीं तक की पढ़ाई नियमित विद्यार्थी के रूप में की है इसके बाद प्राइवेट बी.ए. किया है व शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया है। 

वर्तमान में इस स्कूल में 2 नियमित शिक्षक हैं। स्कूल भवन में 5 बड़े कमरे हैं। कुल 96 बच्चे स्कूल में दर्ज हैं। बच्चों की संख्या अनुसार 2 अतिथि शिक्षक भी हैं। स्कूल प्रांगण बहुत साथ-सुथरा है। स्कूल में एक हैंडपम्प लगा हुआ है। स्कूल में आने वाले ज्यादातर बच्चे आदिवासी समुदाय के हैं।

जब हम रामरतन पाटीदार की कक्षा में पहुँचे तो वे कक्षा 5 में पन्नाधाय वाले पाठ का मंचन बालसभा में करने की योजना पर बच्चों से बातचीत कर रहे थे। हम भी चुपचाप बैठकर उनकी बातें सुनने लगे। बच्चे भी उस चर्चा में पूरी भागीदारी कर रहे थे। जब कक्षा का समय पूरा हो गया तो उन्होंने हमारे साथ बातचीत की।

रामरतन बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाते हैं। सारे बच्चे अपने जूते-चप्पल बाहर निकालते हैं और शिक्षक खुद भी अपने जूते कक्षा से बाहर निकालते हैं। रामरतन बताते हैं कि स्कूल वह जगह है जहाँ बच्चे को मजा आना चाहिए और अगर उसे मजा या आनन्द नहीं आएगा तो वह स्कूल मन से नहीं आएगा। बच्चे को आनन्द आए इसके लिए उन्होंने सोचा कि टी.एल.एम. से पढ़ाया जाना चाहिए। जब उनके पास संसाधन नहीं थे, तो उन्होंने शुरुआत में राखी रखने के पुष्‍टों का उपयोग कर अंक कार्ड, स्थानीय मान कार्ड,  मात्रा कार्ड, अँग्रेजी के शब्द कार्ड आदि बनाए, कैमरा बनाया और उसमें अंकों और वर्णों की रील बनाकर लगाई ताकि वह बच्चों के लिए मजेदार बन सके। बच्चों के पढ़ाने के दौरान इस सामग्री का भरपूर प्रयोग किया।

इस सब सामग्री का उपयोग वह बच्चों के साथ समूह में कार्य में करने लगे जिससे बच्चों ने भी खुद से उन्हें जमा-जमाकर सीखना शुरू किया। वे एक समूह के बच्चों को कार्ड बाँट देते हैं फिर दूसरे समूह में जाकर बच्चों को काम देते हैं। इस प्रकार की सामग्री का उपयोग करने से उन्हें भी काम में आसानी हुई और बच्चों को भी खुद से इन कार्डो का उपयोग करने की आदत हो गई। वे एक-दूसरे के सहयोग से आसानी से सीखने लगे।

रामरतन बताते हैं कि यहाँ के कक्षा 2 के बच्चे किताब पढ़ लेते हैं और यह इसलिए की हम उन्हें उनके बीच बैठकर सिखाते हैं। हर समस्या का हल निकाल लेते हैं। हमने पहले स्कूल समय पर आना शुरू किया तो बच्चे खुद ब खुद समय पर आने लग गए। मैं इन बच्चों के पालकों से नियमित सम्‍पर्क करता हूँ। हम व्यवहार जैसा करते हैं वैसे ही हमारे बच्चे हमें देखकर सीखते हैं। स्कूल में हम शिक्षक आकर ऑफिस की सफाई खुद नियमित रुप से करते हैं। जो शिक्षक पहले आता है, वह उसकी सफाई करता है।

बच्चों को हमने उपदेश नहीं दिया है। उन्हें करके सिखाया है। हमने बच्चों में साफ-सफाई से रहने की आदतों का विकास किया है। कोई भी वस्तु अगर कहीं बाहर पड़ी मिलती है तो बच्चे उसे लाकर ऑफिस की टेबल पर रख देते हैं। इसमें किसी को कहने की जरूरत नहीं है। बच्चे हैडपम्प पर पानी पीते हैं, हमेशा लाइन में लगकर व्यवस्थित तरीके से। हम अगर अपना काम जिम्मेदारी से करेंगे तो बच्चे भी उतनी जिम्मेदारी से खुद का काम करते हैं। 

रामरतन बताते हैं कि वे कक्षाओं में बच्चों के साथ खूब बात करते हैं। पुस्तक के पाठों पर बच्चों से चर्चा करते हैं। बच्चों को अपने दादा-दादी या अन्‍य बुजुर्गों से उनके अनुभवों को जानने के लिए कहते हैं। किताब में दी हुई कहानियों का मंचन कक्षा में कराते हैं। बालसभा का आयोजन करते हैं। जब भी स्कूल में लम्‍बा अवकाश आता है पुस्तकालय की किताबें बच्चों को घर के लिए भी जारी कर देते हैं।

शिक्षिका संध्या कुमरावत भी रामरतन के साथ मिलकर कार्य करती हैं। वे कहती हैं कि जैसे सर कार्य करते हैं उनको देखकर मैं भी सीख गई और बच्चों के साथ उनके बीच बैठकर घुल-मिलकर कार्य करती हूँ। जहाँ कहीं जरूरत होती है सर हमें मदद कर देते हैं। इस तरह शिक्षकों के बीच अच्छा समन्वय दिखाई देता है। इसी तरह अतिथि शिक्षक भी उनके साथ मिलकर कार्य करते हैं। इस तरह रामरतन ने अपने सहयोगी शिक्षकों को भी इस तरह से काम करने के लिए तैयार कर दिया है।

रामरतन से हमने जब इस तरह लगन पूर्वक कार्य करने के कारणों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मैं डाइट में पहली बार 1997 में प्रशिक्षण लेने गया था। वह मेरा  शिक्षक  के रुप में पहला प्रशिक्षण था। तो जो वहाँ मैंने देखा और सीखा उसको स्कूल में आकर करना शुरू कर दिया। मैंने अपने बच्चों के लिए शिक्षण सामग्री बना ली तो वह प्रशिक्षण मेरे लिए एक बड़ी प्रेरणा रहा। मेरा भाई मुकेश 5वीं की परीक्षा में 5 बार फैल हो गया। यह बात मुझे बहुत बुरी लगी। मैंने ठाना कि जो मेरे भाई के साथ हुआ, वह मैं इन बच्चों के साथ नहीं होने दूँगा। इन्हीं यादों और घटनाओं के चलते मैं अपने स्कूल के बच्चों के साथ खूब मेहनत करता हूँ।

पहले जब बोर्ड की परीक्षा होती थी, तब भी मेरे स्कूल में हमेशा 100 प्रतिशत परिणाम रहा। हमारे स्कूल का एक बच्चा आई.आई.टी में चयनित हुआ है। 1 एन.आइ.टी. में और 2 बच्चियाँ संभाग स्तरीय स्कूल में प्रवेश के लिए हुई परीक्षा में चयनित हुई हैं और वर्तमान में इन्‍दौर में कक्षा 6 में अध्ययनरत हैं। कई अन्‍य पूर्व विद्या‍र्थी आसपास के स्कूलों में अतिथि शिक्षकों के रुप में कार्य कर रहे हैं और इसी तरह से पढ़ाने का प्रयास करते हैं।

आज गतिविधि आधारित शिक्षण संचालित स्‍कूल होने के कारण हमारे पास बहुत सारी शिक्षण सामग्री है। इसका हम भरपूर उपयोग करते हैं। मैं बी.एल.ओ. भी हूँ,लेकिन इस काम को स्कूल समय के बाद करता हूँ। इस काम के लिए भी सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया हूँ। स्कूल में बच्चों के साथ काम करना अच्छा लगता है तो कई गैर जरूरी बैठकों में भी नहीं जाता हूँ। जो जानकारी वह माँगते हैं, उसे स्कूल समय के बाद जाकर दे देता हूँ।

रामरतन एक शिकायत भी करते हैं। अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि कुछ शिक्षक साथी मुझ जैसे शिक्षकों पर व्यंग्य करते हैं। मेरा काम उनके लिए समस्या बन जाता है, क्योंकि वह समस्याएँ गिनाते हैं और हम जैसे शिक्षक  समस्याओं के उलट काम करके दिखा देते हैं। गाँव के लोग और अन्य अधिकारी मेरे इस तरह के प्रयासों की काफी सरहाना करते हैं। कई बड़े अधिकारी मेरा स्कूल देखने भी आए हैं। वह प्रशिक्षणों में हमारे काम व स्कूलों का उदाहरण देते हैं तो शिक्षकों के लिए यह समस्या बन जाता है। मैं अपना काम जिम्मेदारी से करता हूँ तो गाँव वाले भी आज मेरा पूरा सहयोग करते हैं।


प्रस्‍तुति : राकेश कारपेण्‍टर,अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, खरगोन

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

Ramratan has done a great work. he is a good teacher. congratulations

ramkishor का छायाचित्र

ramratan's innovation is very good.

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