किसी 'खास' की जानकारी भेजें। बदलाव के वाहक हंसराज

“बदलाव अथवा परिवर्तन एक बहुत बड़ी स्थिति है, जीवन के हर क्षेत्र में समय के साथ वैचारिक एवं व्यवहारिक बदलाव आते रहते हैं। इन बदलावों का प्रभाव हमारी कार्य शैली मे स्पष्ट दिखाई देता है।’’ ऐसा मानना है राजस्‍थान के टोंक जिले के उनियारा ब्लॉक में पद स्थापित शिक्षक हंसराज जी का। हंसराज जी वर्तमान में 25 दिसम्बर 2010 से उच्च प्राथमिक विद्यालय कीरों की ढाणी में पदस्थापित हैं इससे पूर्व वे दो विद्यालयों-प्राथमिक विद्यालय, धारोला में 1993-1997 तक एवं प्राथमिक विद्यालय, रुंझा में 1997-2007 तक अपनी सेवाएँ दे चुके हैं।

वर्तमान समय में शिक्षा तथा शिक्षण प्रक्रिया कैसी हो? प्रश्न पर वे अपने अनुभवों को शामिल करते हुए बताते हैं कि, “शिक्षा ‘गुणवत्ता पूर्ण’ होनी चाहिए परन्तु इस गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के क्या मायने है? वर्तमान समय में हमें सरकारी विद्यालयों के बारे में आए दिन नकारात्मक टीका-टिप्पणी सुनने को मिलती है, परन्तु कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि क्या होना चाहिए और यह कैसे सम्‍भव हो पाएगा? मेरे विचार से शिक्षक का जीवन समाज में महत्वपूर्ण भूमिका वाला होता है, अतः किसी के भरोसे बैठने की बजाय शिक्षक को स्वयं ही इन प्रश्नों का जवाब खोजना होगा और ये जवाब कक्षा-कक्ष में बच्चों के साथ शिक्षण कार्य करने पर ही मिल सकता है।’’

यहाँ प्रश्न उठता है कि कक्षा-कक्ष में बच्चों के साथ किस प्रकार से शिक्षण कार्य करवाया जाए? हंसराज जी का मानना है कि बच्चों को शिक्षण करवाने से पूर्व एक शिक्षक को सर्वप्रथम बच्चों की दुनिया में जाकर उसे समझना होता है, उनमें घुल -मिल कर उनकी समस्याओं तकलीफों को समझते हुए समाधान की पहल करनी पड़ती है, क्योंकि कई बार बच्चे किसी ऐसी समस्या से जूझ रहे होते हैं जो उनके सीखने में बाधक होती है। और हम धारणा बना लेते हैं कि हमारे प्रयास के बाद भी अमुक बच्चा नहीं सीख सकता।

यहाँ उन्होंने एक बालिका का उदाहरण देते हुए बताया कि,  ‘‘सत्र 1997-98 की बात है जब मैं पीएस रूंझा में कार्यरत था। उस विद्यालय में कक्षा-2 में तुलसा नाम की बालिका पढ़ती थी। तुलसा अधिकांशत: उदास-सी चुप–चुप ही रहती। मैं उसे पढ़ाने की कोशिश करता पर वह कुछ भी नहीं सीख पा रही थी। मुझे कई बार लगा कि ऐसा क्या करूँ जिससे तुलसा सीख पाए। एक दिन विचार आया कि क्यूँ ना तुलसा से बात की जाए। मैंने तुलसा से बड़े सहज होकर पूछा कि तुम्हारे परिवार में कोई समस्या है। जो तुम इतना उदास रहती हो। उसने एक बार तो कोई जवाब नहीं दिया लेकिन कुछ देर बाद में बताया कि गुरुजी मैं मेरे घर में अकेली लड़की हूँ, बाकी भाई है। माँ–पापा मुझ से ही सारा काम कराते हैं भाइयों से नहीं, इतना सारा काम करके मैं थक जाती हूँ।

तुलसा की समस्या को जानने के बाद मैं उसके घर गया और उसके माता–पिता से मिला तो तुलसा की बताई बात सच निकली। उनका मानना था कि लड़कियाँ तो घर का कामकाज करती ठीक लगती हैं। ज्यादा पढ़ाना-लिखना ठीक नहीं। मैंने उनको समझाया कि आप अपने बच्चों में इस तरह का भेद करते हो यह ठीक नहीं है। तुलसा की उम्र पढने, लिखने, खेलने-कूदने की है। इस उम्र में इससे इतना काम करवाना इसके शरीर पर गलत प्रभाव डालेगा। इस पर उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए उसको नियमित विद्यालय भेजने और घर पर पढ़ने का समय देने का वादा किया। उसके बाद तुलसा नियमित रूप से विद्यालय आने लगी और पढ़ने के साथ-साथ साथियों के साथ खेलने में रूचि लेने लगी और आज तुलसा राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल है।

यहाँ विचारणीय बिन्‍दु यह है कि तुलसा जैसे अनेक बच्चे इस प्रकार की समस्याओं से घिरे हुए अकेले जद्दोजहद करते कहीं गुम हो जाते हैं। इस जद्दोजहद में शिक्षक एक ऐसा सहारा बन सकता है जो उसके जीवन में एक नयी दिशा/ आशा का संचार कर पाए।

बच्चों के साथ कक्षा-कक्ष में काम करने के कुछ अनुभव साझा करते हुए हंसराज जी बताते हैं कि शैक्षिक सत्र के शुरुआती माह जुलाई में बच्चे अपने घर से विद्यालय आते हैं। उस दौरान आरम्भिक कक्षा-कक्षीय गतिविधियों के अन्‍तर्गत अवकाश के दिनों में रहे बच्चों के अनुभवों को उनकी मातृभाषा (Mothertung) में सुनने के साथ ही उनके अनुभवों पर चर्चा का आयोजन करता हूँ। ऐसा करने से बच्चों को मौखिक अभिव्यक्ति के अवसर तो मिलते ही हैं साथ ही उनका मेरे एवं विद्यालय के प्रति जुड़ाव भी पैदा होता है। इसके बाद आरम्भ होता है मौखिक के साथ चित्र पठन एवं उनके परिवेशीय शब्दों पर काम इस प्रक्रिया में बच्चों द्वारा बोले गए शब्दों को श्यामपट्ट पर लिखकर मेरे साथ बच्चों को शब्दों का उच्चारण करवाता हूँ। यहाँ यह ध्यान रखने का प्रयास किया जाता है की बच्चे अन्‍दाजा लगाकर पढ़ने की प्रक्रिया में आ पाएँ। इसके बाद बच्चों एवं श्यामपट्ट की दूरी को कम हो इस हेतु प्रत्येक बच्चे को अँगुली रखकर लिखे गए शब्द उच्चारित करवाने, अपने तथा अपने साथी द्वारा बोले गए शब्दों को पहचानने का काम करवाता हूँ। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि अभी उनको अक्षर व मात्रा का ज्ञान नहीं है, सिर्फ शब्दाकृति की पहचान है। शब्दाकृति की पहचान होने पर शब्द से वर्ण व वर्णों को आगे–पीछे करके नए शब्द बनवाने का काम करता हूँ और इस तरह बच्चे बड़े ही आसानी से किताब पढ़ना सीख जाते हैं। साथ ही बच्चों के साथ लेखन का भी सतत् अभ्यास करवाता हूँ।

बच्चे घर के स्वतंत्र माहौल से निकलकर विद्यालय के नए वातवरण में आते हैं। विद्यालय में उनको एक बॅंधा हुआ-सा माहौल मिलने से उनको सामंजस्य बैठाने में बहुत दिक्कत होती है अतः कुछ कक्षा-कक्ष से बाहर कि गतिविधियाँ करवाने के साथ ही शब्द खेल भी खिलाता हूँ। जैसे कि –

1. अन्तिम अक्षर की समान ध्वनि वाले शब्द बुलवाना : ताली,माली,जाली,खाली इत्यादि।

2. शब्दों की लड़ी : अन्तिम अक्षर की समान ध्वनि से आरम्भ होने वाले शब्द बुलवाना – कमल,लड़का,कागज,जग,गमला,लाली इत्यादि।

3. नए शब्द निर्माण :  कमल  कल,कम,मल इत्यादि।

इसी तरह बच्चों में अभिव्यक्ति कौशल विकसित करने हेतु विद्यालय में सभा के दौरान निम्न कार्य करवाने का प्रयास किया है -

  • गाँव का अखबार : बच्चों से रोज अपने गाँव,आसपास के गाँव,ढाणी आदि की खबरें सभा में पढ़ी जाती हैं।
  • बच्चे अपनी उपस्थिति स्वयं भरते हैं, स्वयं करके सीखने के उद्देश्य से।
  • तुकबंदी करवाना, जैसे घर में बैठा चोर,ऊपर से आ गया मोर।
  • समस्या का हल बच्चों को स्वयं करने हेतु प्रेरित करना इस हेतु – बच्चे अपने मित्रों, बड़ी कक्षा के बच्चों, अपने परिवार के सदस्यों, अपनी पाठ्य पुस्तकों की मदद ले पाएँ, इस हेतु बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता है।
  • बच्चों को गलतियाँ करने पर झिड़कने की बजाय उनके साथ संवाद करते हुए, हल निकालने का प्रयास करना।

कक्षा-कक्षीय अनुभव

एक दिन हंसराज जी द्वारा कक्षा 3,4 ,5  के बच्चों के समूह के साथ पर्यावरण अध्ययन विषय के अन्‍तर्गत ‘रिश्तों’ पर कार्य किया जा रहा था। उनके द्वारा रिश्तों पर बच्चों की समझ व पूर्व ज्ञान जानने हेतु बच्चो से प्रश्नों के माध्यम से चर्चा की जा रही थी। इस दौरान उन्होंने बच्चों से प्रश्न किया कि किसी बच्चे को गोद लेना भी एक रिश्ता है, इसके बारे मे आप क्या सोचते हो? कक्षा 4 के बच्चे धनराज ने बताया कि सर मैने भी बच्चे को गोद लिया है, यहाँ उनके आश्चर्य की सीमा न रही। उन्होंने ने धनराज से पूछा कि किस बच्चे को गोद लिया है? धनराज ने जवाब दिया कि बहन के बच्चे को गोद लिया था। हंसराज जी ने गौर किया कि धनराज ने रिश्तों मे गोद लेना (उत्तराधिकारी) प्रक्रिया की जगह किसी को गोद में उठाने से अर्थ लगा लिया है। उक्त पर उन्होंने एकदम से प्रतिरोध नहीं करके धनराज को शाबाशी देते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाया कि क्या आपके गाँव में कोई ऐसा परिवार है जिसके खुद के बालक–बालिका नहीं है। और वे अपने किसी रिश्तेदार के बालक को अपने घर रखते हैं? इस पर दो परिवारों के नाम बच्चों की तरफ से आए। इस तरह से हंसराज जी ने परिवेश के उदाहरण द्वारा सहजता के साथ अपनी बात को स्पष्ट किया गया।

ऐसा ही एक और अनुभव हिन्‍दी विषय का शिक्षण करवाते हुए घटित हुआ। कक्षा 3 में हिन्‍दी विषय पर शिक्षण करवाया जा रहा था। पाठ्यपुस्तक में “कब्जा’’ शब्द अतिक्रमण के लिए प्रयुक्त हुआ था। हंसराज जी प्रयास कर रहे थे कि बच्चे स्वयं इस शब्द के अर्थ तक पहुँच पाएँ। इस हेतु उन्होंने चर्चा की। तो एक बच्चे दिनेश प्रधान ने कमरे मे लगे किवाड़ों को हाथ से छूकर उनमें लगे कब्जों के बारे में कहा कि गुरुजी इनको कब्जा बोलते हैं। इसी प्रकार हरिकेश ने कहा की मेरी बड़ी बहिन कब्जा पहनती है। मैंने अनुभव किया कि लगभग सारे बच्चे अलग–अलग तरह से अर्थ लगाने का प्रयास कर रहे थे। बच्चों के सामने “कब्जा’’ शब्द अब एक समस्या के रूप में था। यहाँ हंसराज जी द्वारा मुझे बताया कि इसे भाषा का दोहरापन कहते हैं और बच्चों को कुछ हिंट देने का प्रयास किया गया। उनके द्वारा अन्य उदाहरण - कनक (सोना, गेहूँ, नींद में सोना) का अर्थ व वाक्यों में प्रयोग करते हुए समझाने का प्रयास किया। जैसे आज मुझे बहुत गहरी नींद आई, मुझे सोना है, मेरे घर सोना है। इसी प्रकार “कब्जा’’ का अर्थ अतिक्रमण के रूप में स्थापित किया गया।

हंसराज जी के साथ रहे कक्षा–कक्षीय शिक्षण अनुभवों पर चर्चा उन्होंने बताया कि  इस प्रकार के प्रयासों में मैं स्वयं बच्चो से लगातार कक्षा में सीखता रहता हूँ साथ ही मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि शिक्षक के बारे में सारी दुनिया सोचती है कि वह सिखाने वाला है जबकि वह सिखाने वाला कम और सीखने वाला ज्यादा है।

हंसराज जी, अजीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के स्वैच्छिक शिक्षक मंच, बनेठा से जुड़े होने के साथ ही हिन्‍दी विषय के डेमो कोर्स से भी जुड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त राजकीय दक्ष प्रशिक्षक के रूप मे कई कार्यशालाओं में अपना सहयोग रहे हैं।


प्रस्‍तुति : मनीषदत्‍त शर्मा, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक, राजस्‍थान

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

हंसराज के विद्यालयीय अनुभव ऊर्जा का संचार करते हैं। मैं उनकी इस बात से पूर्णतया सहमत हूं कि शिक्षक को पढाने से पहले बच्चों की दुनियां में प्रवेश कर बालमैत्री पूर्ण परिवेश बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
हंसराज जैसे शिक्षक उम्मीद जगाते हैं। बहुत बहुत बधाई।
प्रमोद दीक्षित 'मलय'
सह-समन्वयक (हिंदीभाषा),
बीआरसी नरैनी, जिला - बांदा
उत्तर प्रदेश

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