किसी 'खास' की जानकारी भेजें। बच्‍चों की मुस्‍कान ही शिक्षक का रिपोर्ट कार्ड है

उत्तराखण्ड के चमोली जिले में एक स्कूल है राजकीय प्राथमिक विद्यालय खगेली। यह विद्यालय गौचर से करीब आधा घण्‍टे की दूरी पर है। बेहद खूबसूरत लेकिन मुश्किल रास्तों का हाथ थामे हम खगेली की तरफ बढ़ते हैं। सारे रास्ते पिंडर नदी हाथ थामे चलती जाती है। शान्‍त पहाड़ी रास्तों में उस खूबसूरत नैसर्गिक नदी का साफ पानी और कल...कल...कल...कल... की आवाज किसी ख्‍याब में बुनती हुई धुन -सी मालूम होती है। नदी की कल कल किसी पुकार-सी मालूम होती है जिसे हमारे साथ जा रही रजनी नेगी जी भाँप जाती हैं।

‘आपको नदियों से बहुत प्यार है ना?’

मैं चौंककर उनकी तरफ मुड़ती हूँ। ‘हाँ, लेकिन मैंने ऐसा कहा तो नहीं।’ मैंने पूछा।

वो सिर्फ मुस्कुराईं। सुनने के लिए सब कुछ कहना कहाँ जरूरी होता है....मुझे अपनी ही बात याद आई। मैंने रजनी जी से कहा, नदियों में अजीब सा आकर्षण होता है। मैंने इतनी खूबसूरत नदी नहीं देखी। इतना साफ पानी.. वो बोलीं लौटते वक्त हम नदी के किनारे जरूर बैठेंगे। उनका यह कहना मुझे राहत देता है।

कठिन से कठिन सफर भी मनचाहे हमसफर के साथ खुशनुमा हो उठता है फिर मैं तो एक बेहद खूबसूरत सफर पर थी बेहद ऊर्जावान शिक्षिका रजनी नेगी के साथ। रास्ते भर हमारी बात होती रही। घर, परिवार, स्कूल, रास्ते जीवन सब। खगेली पहुँचते-पहुँचते मैं उस स्कूल को काफी हद तक जान चुकी थी। उस समुदाय को भी। उस तक पहुँचने वाले रास्तों को भी। वो रास्ते जो पर्यटकों के लिए लुभावने और रहने वालों के लिए चुनौती भरे हैं। बरसात में इन खूबसूरत सपीर्ली राहों का हाल और भी दुश्वार हो जाता है। कई बार स्कूल तक पहुँचना ही मुश्किल हो जाता है क्योंकि रास्ते बन्‍द हो जाते हैं।

खुलता है आश्चर्य का दरवाजा

आधे घण्‍टे का सफर तय तरने के बाद हम प्राथमिक विद्यालय खगेली पहुँचते हैं। रजनी जी की आवाज कान में पड़ती है इधर से आइये मैडम, इधर से...वो एक पतली सी सर्पीली पहाड़ी पगडण्‍डी से पुकार रही थीं। वो हाथ बढ़ाती हैं, मैं उनका हाथ थामकर चल पड़ती हूँ। पूरा रास्ता कुदरत का अलौकिक मंजर। मुझे इस बात का बिल्कुल भी अन्‍दाजा नहीं था कि जितना भी अब तक देखा-सुना महसूस किया है उससे भी सुन्‍दर नजारा अभी सामने आना बाकी था। फूलों और फलों वाले पेड़ों के झुरमुट के बीच से प्राथमिक विद्यालय खगेली का बोर्ड मुस्कुराता हुआ दिखता है। उस गेट के अन्‍दर पहला पाँव पड़ते ही एक साथ ‘वेलकम टू अवर स्कूल’ का स्वर गूँजता है। ढेर सारे बच्चे कोई वेलकम साँग गाते हैं। उनकी अँग्रेजी बोलने की धारा प्रवाहमयता चौंका देती है।

थोड़ी दूर से चीजें साफ नजर आती हैं

तमाम प्रक्रियाओं के बैकग्राउण्ड में रहते हुए एक पूरा दिन स्कूल में बिताना स्कूल को समझ पाने में ज्यादा मददगार होता है। रजनी जी बच्चों के साथ व्यस्त हो जाती हैं। बच्चे पूरे स्कूल में घूमते हुए बिखरे हुए कचरे को जमा करके कचरे के डिब्बे में डालते हैं। सफाई करने के बाद सब बच्चे साबुन से हाथ धोते हैं और तौलिये से पोछते हैं। तभी टन टन टन...स्कूल की घण्टी बजती है। गर्दन घुमाती हूँ तो नन्हा ऋतिक पूरी ताकत से घण्‍टी बजा रहा था। यह असेम्‍बली लगने का संकेत था।

मॉर्निंग असेम्‍बली

दो लाइनें लगती हैं। बच्चे खुद-ब-खुद अनुशासित ढंग से लाइन में लगते हैं। कुछ बच्चे सामने आते हैं। प्रेयर होती है। इसके बाद अखबार पढ़ा जाता है। इसके बाद एक-एक करके सारे बच्चे सामने आते हैं और कविता, कहानी, अखबार की खबर, कबीर या रहीम के दोहे आदि सुनाते हैं। बच्चों की अभिव्यक्ति इतनी सहज और आत्मविश्वास से भरी हुई थी कि हैरत भी हो रही थी और खुशी भी। उनकी हिन्‍दी और अँग्रेजी दोनों पर मजबूत पकड़ और आवाज का खुलापन मानो सामने फैले नीले आसमान को चुनौती देते हुए कह रहा हो कि जब मैं उडूँगा तो तुम छोटे पड़ जाओगे बच्चू। पूरी असेम्‍बली तकरीबन 40 से 50 मिनट चलती है लेकिन इसमें रजनी सिर्फ दर्शक की भूमिका में ही नजर आती हैं। प्रार्थना सभा व्यवस्थित ढंग से बच्चे स्वयं संचालित करते हैं। प्रार्थना सभा में सभी बच्चों की भागीदारी होती है। सब सामने आते हैं और कुछ न कुछ सुनाते हैं। हर दिन अलग बच्चे की जिम्मेदारी होती है। स्कूल की घण्‍टी बजाने की, प्रार्थना सभा के संचालन की, भोजन की, खेलकूद की। ये जिम्मेदारियाँ रोज बदलती रहती हैं। यानी सभी बच्चों को परफॉर्म करने का मौका मिलता है। खुद से आगे बढ़कर गतिविधियों को हाथ में लेने का मौका मिलता है। कोई बच्ची ऊँचे स्वर से अभिनय के साथ गाती है-

अभी खबर दिल्ली से आई

मक्खी रानी उसको लाई

ट्ड्डिे ने हाथी को मारा

हाथी क्या करता बेचारा

घुस बैठा मटके के अन्‍दर

मटके में थे ढाई बन्‍दर....

स्कूल बिल्डिंग

इस स्कूल की नई-नई बनी बिल्डिंग की दीवारों पर नयापन पूरा तरह से काबिज था। रास्ते में रजनी जी ने बताया था कि वे 14 सालों से इस स्कूल में हैं। स्कूल की पुरानी इमारत एकदम जर्जर हो चुकी थी। उन्होंने महज साढ़े चार महीनों में स्कूल की यह बिल्डिंग बनवाई। जाहिर है यह सब आसान तो नहीं रहा होगा। वो कहती हैं, पुरानी स्कूल की बिल्डिंग बहुत खस्ताहाल थी। ज्यादा ध्यान बिल्डिंग पर रहता था और चिन्‍ता रहती थी कि कहीं कोई हादसा न हो जाए। काफी दौड़-भाग के बाद स्कूल की बिल्डिंग का बजट पास हुआ। समुदाय के लोगों को तमाम प्रक्रियाओं से अवगत कराया गया। लेकिन स्कूल की बिल्डिंग बनने की प्रक्रिया में रजनी जी को काफी मशक्कत करनी पड़ी। पारदर्शी सरकारी प्रक्रिया में वक्त तो लगता ही है लेकिन रजनी जी ने तय किया था कि स्कूल के काम में कोई व्यवधान नहीं आने देंगी। वो बताती हैं कि, ‘पहाड़ों पर बिल्डिंग बनाने का काम आसान नहीं होता। मैंने बाहर से कारीगर बुलवाए काम के लिए। सरकार से पैसा रिलीज नहीं होता था और यहाँ  मजदूर रोज शाम पैसा माँगते थे। काम रोकने का अर्थ था महीनों का विलम्ब। बारिश आने के पहले मुझे काम खत्म करना ही था। काम न रुके इसलिए आखिर मैंने अपना फिक्सड डिपॉजिट तोड़ दिया। अच्छी बात यह हुई कि मेरे इस काम में मेरे परिवार खासकर पति ने काफी साथ दिया। लेकिन खराब बात यह हुई कि मुझे इस तरह जुनून के साथ बिल्डिंग बनवाते देख कुछ लोगों को कुछ अखर भी रहा था। लोगों के मन में शक पनपने लगा कि जरूर इससे मैं कुछ घपला कर रही हूँ। समुदाय के लोग जो अब तक मेरे साथ थे, कुछ लोगों के मन में शक के बीज बो दिए गए। मन में मैं कहीं कमजोर जरूर हुई लेकिन इरादों में नहीं। सरकार में मेरे खिलाफ शिकायतें की गईं। जाँच हुई लेकिन मैंने काम बन्‍द नहीं होने दिया। लोग अपना काम करते रहे, मैं अपना काम करती रही। लोगों को, मेरे खिलाफ होने वाली जाँचों को भी मेरे खिलाफ कुछ न मिल सका लेकिन मेरे बच्चों के पास एक सुन्‍दर सुरक्षित स्कूल की बिल्डिंग जरूर है। मुझ पर शक करने वाले आखिर खामोश हो गए। अब समुदाय, शिक्षा विभाग सबका भरोसा मेरे साथ है कि सच उन्होंने जान लिया है।’

थोड़ी ही देर में एक बूढ़ी दादी हाथ में हँसिया और लोटे में चाय लेकर वहाँ आती हैं। वो शारदा देवी हैं। उनकी पोती इसी स्कूल में पढ़ती है। दादी की बनी चाय हम पीते हैं। वो एक पेड़ की डाल पर जानवरों के लिए नरम पत्ते तोड़ने को चढ़ जाती हैं। मैडम क्लास में पढ़ाने चली जाती हैं और शारदा देवी मैडम के बारे में बताना शुरू करती हैं, ‘हमारी मैडम बहुत अच्छी हैं। बच्चों को बहुत प्यार करती हैं। बच्चों के जुएँ भी निकाल देती हैं और नाक भी साफ कर देती हैं। हमारे बच्चे टाई पहनकर स्कूल आते हैं और अँग्रेजी में बात करते हैं तो हमको बहुत अच्छा लगता है। यहाँ इतनी अच्छी पढ़ाई होती है कि सारे बच्चे यहीं आते हैं इसलिए आसपास के प्राईवेट स्कूल बन्‍द हो गए। कोई वहाँ भेजता ही नहीं बच्चों को। आप खुद ही देख लो मैडम ने अपने घर से पैसा लगाकर स्कूल की बिल्डिंग बनवाई है। कोई ऐसा करता है भला। बहुत अच्छी हैं हमारी मैडम।’

कक्षा-कक्ष प्रक्रिया

वैसे तो स्कूल में दो शिक्षक हैं। एक रजनी नेगी खुद और दूसरे चन्द्रमोहन सिंह। एक की अनुपस्थिति में दूसरा शिक्षक सभी बच्चों को अकेले कैसे संभाले यह वे  सीख चुके हैं। सारे बच्चों को एक साथ किसी न किसी काम या गतिविधि में लगाकर रखना चुनौती तो है लेकिन असम्‍भव नहीं। वो एक ही कक्ष में अलग-अलग क्लास के बच्चों को अलग-अलग समूहों में बिठाती हैं। एक क्लास को भाषा का पाठ पढ़ाकर  बीच में छोड़ देती हैं जिसे बच्चे आगे खुद से पढ़ते हैं। दूसरी क्लास को गणित के सवाल बताती हैं इसी बीच नन्हे बच्चों को गीत करवाने के लिए उनमें से एक बच्चे को बोलती हैं। वो अपने को थोड़ा-थोड़ा सबके हिस्से में बाँटती हैं। बच्चों का उत्साह, उनके प्रश्न पूछने के ढंग बच्चों का बेझिझक होना बता रहा था कि बच्चे शिक्षिका के साथ कितने सहज हैं।

ऐसा भी होता है मिड डे मील

मंजूदेवी और बिलदई देवी भोजन माताएँ हैं। उन्होंने इस बीच गर्मागर्म खाना तैयार कर लिया। दाल चावल, सब्जी, पापड़, अचार। अचार समुदाय के लोगों ने बनाकर दिया। समुदाय से सब्जियाँ वगैरह भी आती हैं जो बच्चों की थाली में जाती है। भोजन का समय होते ही बड़े से बरामदे में छोटी-छोटी मेज व कुर्सियाँ लग जाती हैं। बच्चे लाइन लगाकर हाथ धोने जाते हैं। जहाँ भोजनमाता उन्हें हाथ पोंछने को तौलिया देती हैं। बच्चे एक-दूसरे की मदद से एप्रेन पहनते हैं। वो कुर्सियों पर बैठते हैं। मेज पर चमचमाती हुई थालियाँ लगाई जाती हैं। भोजन माताएँ भी एप्रेन पहने हैं। वो प्यार व सम्मान के साथ बच्चों को खाना परोसती हैं। बच्चे खाने से पहले प्रार्थना करते हैं। रजनी कहती हैं कि लाइन लगाकर खाना दिया जाना और अपनी बारी का इंतजार करना उन्हें पसन्‍द नहीं। अच्छा, स्वादिष्ट खाना सम्मान के साथ मिलना उनका हक है। ये एप्रेन, ये मेज कुर्सी, ये चमचमाती हुई थालियाँ, खाने से उठती स्वाद की खुशबू इस सबका कोई अलग बजट नहीं। यह सब उसी सामान्य बजट में होता है जो अन्य स्कूलों को मिलता है। कैसे होता है यह सब...पूछने पर रजनी मुस्कुराती हैं...सब आराम से हो जाता है। खाना खाने के बाद बच्चे अपनी थालियाँ नल के पास ले जाते हैं लेकिन धोते नहीं। भोजन माताएँ मुस्कुराकर कहती हैं, हमारे बच्चे ही तो हैं ये सब। हमको अच्छा लगता है इनके बर्तन धोना। बात खुद काम करने की आदत की जहाँ तक है तो वो तो ये बच्चे खूब कर लेते हैं। बच्चे इंटरवल में अलग-अलग खेल खेलने लगते हैं।

खिली-खिली-सी आँगनबाड़ी

पास में ही आँगनबाड़ी है। वहाँ शाकम्भरी देवी और उनकी सहायिका मुन्नी देवी से मुलाकात होती है। नन्हे-नन्हे बच्चे मैडम के साथ सर्दियों की धूप सेंकते नजर आए। एक नन्हे मियाँ मैडम की गोद से उतरने को तैयार नहीं थे। नन्हे बच्चों को खेल-खेल में दस तक गिनती, गोले बनाना, कविता सिखाने की कोशिश यहाँ होती है। शाकम्भरी देवी बताती हैं कि ‘रजनी मैडम बीच-बीच में आकर हमें बताती रहती हैं कि कैसे बच्चों के साथ खेलते हुए उन्हें सिखाया जा सकता है।’

सांई इतना दीजिए

सप्ताह में एक दिन स्कूल में बाल सभा लगती है। यह पूरी तरह से बच्चों की सभा है। व्यवस्था से लेकर गतिविधि तक। भोजन माताएँ व शिक्षक इसमें दर्शक होते हैं। सभी बच्चे अभिनय व बुलंद आवाज के साथ कबीर, रहीम, सूर, तुलसी, मीरा के दोहों में अंताक्षरी खेलते हैं, सुरीली अंताक्षरी। फिर गोल-गोल घेरे में बँटकर अँग्रेजी और हिन्दी की कविताओं पर सामूहिक अभिनय होता है। इसके बाद हर बच्चा कुछ न कुछ बाल सभा के सामने बोलता है।

किया ही क्या है जिसका जिक्र करें

रजनी जी को अपने कामों का जिक्र किया जाना पसन्‍द नहीं। वो कहती हैं कि उन्हें नहीं लगता कि उन्होंने ऐसा कुछ किया है जिसका जिक्र किया जाए। जो भी वो करती हैं वो करना उनकी ड्यूटी है और उससे मिलने वाला सुख उनका बोनस। स्कूल में उनकी आत्मा बसती है। उनके बच्चों की जब कोई प्रशंसा करता है तो उनकी आँखों में सुख की कोई बदली जरूर आ बैठती है। उनके स्कूल के बच्चे अंताक्षरी, समूहगान, सुलेख आदि की राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में विजेता हो चुके हैं। उनके स्कूल में पढ़े बच्चे आगे की पढ़ाई कर रहे हैं कुछ नौकरियों में भी लग चुके हैं और गाँव आने पर स्कूल जरूर आते हैं। वो बताती हैं कि शिक्षक के तौर पर हमको अपनी सोच को विस्तार देने की बहुत जरूरत है ताकि शिक्षक के पेशे की गरिमा को सम्‍भालते हुए अपने हिस्से की जिम्मेदारियों को ठीक से पूरा किया जा सके। कितने ही प्रशिक्षण हों, डाक्यूमेंट पढ़ा दिए जाएँ एक शिक्षक जब तक अपने मन से अपने काम से नहीं जुड़ेगा तब तक कुछ नहीं हो सकता। बच्चों को स्पेस देना, उन्हें गलतियाँ करते देने की छूट देना, उन्हें बीच में न टोकना उनके विकास का हिस्सा है। कोई बच्चा जब आपसे बहस करे, सवाल करे तो यह बहुत सुन्‍दर अनुभव होता है।


रजनी नेगी से प्रतिभा कटियार की बातचीत पर आधारित । अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित 'उम्‍मीद जगाते शिक्षक-2' से साभार।

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