किसी 'खास' की जानकारी भेजें। बच्चे ही जिन्दगी हैं...

‘‘बच्चों के लिए ही काम करने में अच्छा लगता है....बच्चों को समझ आ गया तो बस समझ लो हम सफल हैं!”

ये विचार शिक्षिका दिलशाद बानो के हैं। जिला मुख्यालय से करीब 13 किलोमीटर की दूर भीलवाड़ा रोड पर राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय मालियों का वास स्थित है। इसी विद्यालय में यह शिक्षिका कार्यरत हैं। इनकी प्रथम नियुक्ति इस विद्यालय में सन् 2012 में विज्ञान शिक्षिका के रूप में हुई थी। अपने नाम के अनुरूप व्यक्तित्व, ऐसा कि देखते ही किसी के भी चेहरे पर मुस्कान आ जाए। स्वभाव से हँसमुख व चंचल प्रवृति की यह शिक्षिका अपने इसी अन्‍दाज के कारण बच्चों की सबसे चहेती शिक्षिका हैं। विद्यालय के बच्चे इन्हें अपनी कक्षा में लाने हेतु झगड़ पड़ते हैं। खाली कालांश में बच्चे इन्हें अपनी कक्षा में खींच-खींचकर ले जाते हैं। विद्यालय में मेरी पहली मुलाकात इनसे इसी तरह हुई थी। मैं प्रधानाचार्य के रूम से बाहर निकल रही थी तो देखा 4-5 बच्चे इन्हें हाथ पकड़कर अपनी-अपनी ओर खींच रहे थे। बात करने पर पता चला कि वे उन्‍हें अपनी-अपनी कक्षाओं में लेकर जाना चाहते हैं। यही एक कारण नहीं है, बल्कि इनके पढा़ने के तरीके ने भी इन्हें बच्चों का चहेता बना दिया है।

विद्यालय के बच्चों के साथ-साथ वे अभिभावकों की भी सबसे पसन्‍दीदा शिक्षिका हैं। इसका प्रमाण सन् 2014 की एक घटना है। इनका स्थानान्तरण राजकीय उच्च माध्यमिक बालिका विद्यालय देवगढ़ में कर दिया गया था। तब इन्हें पुनः विद्यालय में लाने हेतु अभिभावकों व बच्चों ने विद्यालय की तालाबन्‍दी कर दी थी और विद्यालय व गाँव की ओर जाने वाला रास्ता भी बन्‍द कर दिया था। बच्‍चों ने ‘जब तक सूरज चाँद रहेगा मेडम तुम्‍हारा नाम रहेगा’ के नारे लगा-लगाकर मालियों के वास को गुजाँ दिया था। इतना ही नहीं बच्चे रोते हुए विद्यालय के बाहर धरने पर बैठ गए थे। अन्ततः इन्हें 14 अगस्त 2014 को पुनः विद्यालय में लाया गया और तब से आज तक यह इसी विद्यालय में निरन्तर अपनी सेवाएँ दे रही हैं।

विद्यालय में इनके सहित 6 शिक्षक हैं।

दिलशाद कक्षा 6, 7 व 8 में अँग्रेजी, विज्ञान और गणित विषय पढ़ा रही हैं। इन्हें  कक्षा 1 व 2 पढ़ाने में भी मजा आता है क्योंकि वहाँ पर वे छोटे बच्चों के साथ नाचते गाते हुए पढ़ाती हैं। प्रत्येक विषय को वह बच्चों के परिवेश व दैनिक जीवन से जोड़कर पढा़ती हैं। कक्षा-कक्ष से बाहर निकालकर बच्चों को प्रकृति का अवलोकन कराते हुए भी पढ़ाती हैं। उन्‍होंने विद्यालय परिसर में बच्चों के साथ मिलकर अनेक  पेड़-पौधे लगाए हैं। विज्ञान के प्रत्येक अध्याय को जहाँ तक सम्‍भव हो प्रयोग के द्वारा समझाने का प्रयास करती हैं। वे कहती हैं कि, ‘विज्ञान केवल किताब से देखकर नहीं पढ़ाया जा सकता। उसे समझाने के लिए प्रयोग सबसे अच्छा माध्यम है, बिना प्रयोग के विज्ञान की कल्पना ही नहीं की जा सकती है।’  वे कक्षा में जाने से पूर्व व किसी भी पाठ को पढ़ाने से पूर्व उसकी पूर्व योजना के तहत विषयवस्तु के उद्देश्‍यों के आधार पर प्रश्‍नों का निर्माण करती हैं। प्रश्‍नों को ध्यान में रखकर बच्चों को अध्यापन कार्य करवाती हैं एवं पाठ पठन व प्रयोगों के पश्‍चात् उन प्रश्‍नों के हल बच्चों को स्वयं खोजने के लिए प्रेरित करती हैं। जब बच्चे उन प्रश्‍नों को हल करके  लाते हैं तो समझ लेती हैं कि उन्हें पढा़ई गई सभी बातें समझ आ गई हैं। यदि नहीं कर पाते हैं तो पुनः नए तरीकों से समझाने का प्रयास करती हैं।

दूसरी कक्षाओं के बच्चे दौड़-दौड़कर इनके प्रयोगों को देखने के लिए इनकी कक्षा में आते हैं। एक बार तो कक्षा 8 के बच्चों के साथ एक प्रयोग को करवाते देखकर कक्षा 5 के एक बच्चे ने कबाड़ से जुगाड़ कर एक छोटा पंखा बना डाला। विद्यालय के बच्चों को विज्ञान प्रदर्शनी में जिला स्तर पर सांत्‍वना पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। विद्यालय के प्रारम्भिक काल में बच्चों व विद्यालय की स्वच्छता का मुद्दा उभरकर आया। इस हेतु इन्होंने विद्यालय के शिक्षकों के साथ मिलकर बच्चों को साफ-सफाई से रहने व विद्यालय को भी साफ-सुथरा रखने हेतु समझाया। बच्चों  को स्कूल में ही हाथ-मुँह धुलाकर, बालों में कंघी इत्यादि कर स्वच्छ रहने के फायदे बताए। साथ ही बच्चों के फटे कपड़े पहनकर आने पर (खासतौर से बालिकाओं के) पास के घर से सिलाई मशीन लाकर उनके कपड़े विद्यालय में ही सिलकर उन्हें अपने प्रति जागरूक रहने इत्यादि से अवगत कराया।

उन्होंने कक्षा स्तर से नीचे के एक बच्चे कस्तूर को सभी विषयों में गतिविधियों आधारित शिक्षण करवाकर उसे कक्षा स्तर तक लाने का प्रयास किया। यह बच्‍चा आज इसी विद्यालय में कक्षा 6 में अध्ययनरत है। वह अब पढ़-लिख पाता है। पढा़ई के प्रति रूझान पैदा करके के लिए उन्होंने उसकी पढ़ाई को उसी से जोड़ा। भाषा सिखाने के लिए उसी के नाम का सहारा लिया, जैसे,  ‘कस्तूर अच्छा लड़का है,’  ‘ कस्तूर को खेलना पसंद है,’ ‘कस्तूर को गाने का शौक है,’ आदि। पहाड़े सिखाने के लिए पहाड़ा बनाने का चित्रात्मक तरीका बताया।  

मेरी इनसे पहली मुलाकात सन् 2015 में नवनियुक्त विज्ञान शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान हुई थी। तब से लगातार मैं इनके सम्पर्क में हूँ। जब भी विद्यालय में मेरा जाना होता है वे अपने द्वारा किए गए नवाचारों से मुझें अवश्‍य परिचित कराती हैं। सुझाव भी माँगती हैं। स्वैच्छिक शिक्षक मंच व फाउण्डेशन की कार्यशालाओं से निरन्तर जुड़ती रहती हैं। वहाँ प्राप्‍त अनुभवों को कक्षा कक्ष में करने का प्रयास भी करती हैं।

वे बच्चों के लिए सब कुछ करना चाहती हैं। कहती हैं कि बच्चों के लिए ही करने में खुशी मिलती है, बच्चे ही मेरी जिन्‍दगी हैं। नई-नई चीजों को सीखकर बच्चों को सिखाने में विश्‍वास रखती हैं। उन्‍हें इन सब कार्यों को करने में अपने प्रधानाध्यापक व स्टॉफ के सभी सदस्यों से भी मदद मिलती है।

प्रधानाध्यापक कहते हैं कि, ‘दिलशाद एक सकारात्मक विचारधारा की शिक्षिका हैं। वे किसी भी कार्य को करने के लिए तत्पर रहती हैं, कभी न नहीं करती हैं। विद्यालय में उनके आने के पश्‍चात विद्यालय के बच्चों की स्थिति में काफी बदलाव आया है।’ बस दिलशाद की इन्ही कुछ खूबियों ने उन्हें अच्छे शिक्षकों के समकक्ष ला खड़ा किया है।


प्रस्‍तुति : रितु मिश्रा, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देवगढ़ ब्‍लाक, जिला राजसमन्‍द, राजस्‍थान

 

टिप्पणियाँ

shuchi का छायाचित्र

अभी हाल ही हुए देवगढ़ ब्लॉक , जिला राजसमन्द के बाल मेले में दिलशाद मैडम से मिलने का अवसर मिला, एक्टिव और बच्चों की प्यारी टीचर से मिलकर एक पॉजिटिव एनर्जी मिली | उनके स्कूल के बच्चों के बनाये मॉडल और उनका समझाने का तरीका देखकर समझ आया कि वे बच्चों के साथ एक साथी के रूप में कॉन्सेप्ट्स पर डीप में कार्य करती है | अभी तक सिर्फ पड़ा था कि एक शिक्षक को सुगमकर्ता के रूप में बच्चों के साथ काम करना चाहिए पर मैडम के द्वारा किये गए कार्य को देखकर यह समझ भी आया की ये कैसे होता है |थैंक यूँ मेम एंड थैंक्स टू ऋतु जी दिलशाद मेम से मिलवाने के लिए |

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