किसी 'खास' की जानकारी भेजें। पोखर का पुस्तकालय

मध्यप्रदेश में खरगोन जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर इन्दौर मार्ग पर ही स्थित है मेनगाँव। रोड के बाएं तरफ पिपराटा स्कूल के सामने ही एक भवन बना हुआ दिखाई देता है। यह खरगोन ब्लॉक का मेनगाँव जनशिक्षा केन्द्र है। इस जनशिक्षा केन्द्र में संतोष कानपुरे जनशिक्षक के रूप में पदस्थ हैं।

कानपुरे जी की अकादमिक कार्यों में रुचि है। वे हर माह अपनी मासिक गोष्ठी में किसी न किसी अकादमिक विषय पर शिक्षकों से चर्चा करते हैं। उनसे हम अकादमिक कामों को लेकर चर्चा कर ही रहे थे, बातों-बातों में ही उन्होंने प्राथमिक स्कूल पोखर का जिक्र किया। वे वहां के शिक्षक के प्रयासों के बारे में हमें बता ही रहे थे कि स्कूल के प्रधान पाठक दिलीप जोशी कुछ कागजी काम को लेकर वहीं आ गए। उन्होंने हमारा परिचय उनसे करवाया ।

दिलीप जोशी ने कहा कि मेरा स्कूल यहाँ से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर है। आप आइए वहाँ। हमने कहा सर आप तो यहाँ आए हुए है तो आप अपना काम निपटा लीजिए, हम फिर कभी आएँगे। उन्होंने कहा कि मेरा काम तो निपट ही गया है। मैं दस मिनट में वापस स्कूल पहुँच जाऊँगा। हमारा काम ऐसा ही है। मैं तो स्कूल वापस जाऊँगा ही, आप आए हो इसलिए नहीं। हमारे मन में यही धारणा थी कि अब यह क्या स्कूल जाएँगे, क्योंकि वे तो डाक देने आए थे। अमूमन डाक देने के बाद लोग घर निकल जाते हैं। हमने कहा ठीक है हम स्कूल आते हैं।

फिर कुछ ऐसा हुआ कि हम उनसे पहले स्कूल पहुँच गए। स्कूल के चारों तरफ बाउण्ड्री वाल बनी है। स्कूल मैदान में हैण्डपम्प लगा हुआ है। साफ-सुथरे शौचालय बने हुए हैं। एक सुव्यवस्थित एवं साफ-सुथरा स्कूल भवन। पहले हम कक्षा पहली,दूसरी और तीसरी के बच्चों से मिले। बच्चे काफी मुखर हैं। बच्चों से कुछ गपशप की।

तब तक स्कूल की एक अन्य शिक्षिका जो शायद कक्षा चौथी-पांचवीं के बच्चों को पढ़ा रही होंगी, हमें देखकर वहाँ आ गई। उन्हें हमने अपना परिचय दिया और स्कूल के बारे में कुछ बातचीत की। शिक्षिका ने बताया कि प्राथमिक विद्यालय पोखर खरगोन ब्लॉक के मेनगाँव जनशिक्षा केन्द्र का एक स्कूल है। स्कूल में कुल 50 बच्चे अध्ययनरत हैं। गाँव की जनसंख्या लगभग 500 के आसपास है। वे इस स्कूल में दो सालों से हैं। यह उनकी पहली पदस्थापना है।

चर्चा चल ही रही थी, कि दिलीप जोशी आ गए। उन्होंने बताया वे इस स्कूल में 1995 से पदस्थ हैं। उन्होंने बताया कि कक्षा तीन के बच्चे भी हिन्दी की किताब पढ़ लेते हैं। 50 में से 40 बच्चे निश्चित रूप से नियमित स्कूल आते है। हमारे एक और साथी उनसे चर्चा करने लगे। 

मैं एक कक्षा में चला गया। वहाँ चौथी-पाँचवीं के बच्चे बैठे हुए थे। सभी स्कूल ड्रेस  में थे। बच्चों से बात करते हुए मेरी नजर बच्चों के पीछे रखी रैक पर पड़ी।

मैंने पूछा, इस रैक में क्या रखा है ? जवाब मिला कि पुस्तकें हैं। पूछा कि, पढ़ते हो क्या इन्हें ? बच्चों ने जवाब दिया, हाँ। मैंने पूछा कौन-कौन पढ़ता है तो सभी ने अपने हाथ खड़े कर दिए। मैंने पूछा कि, बताओ किसने कौन-सी किताब पढ़ी है ? तो एक ने बताया कि अमवा भैया-नीमवा भैया। दूसरे ने बताया कि, भारत के महान नेता। मैंने पूछा कि ये किताबें तुम गुरुजी के कहने से पढ़ते हो या खुद की मर्जी से? बच्चों ने बताया कि वैसे तो गुरुजी ने चार बजे के बाद पढ़ने का बोल रखा है। लेकिन यह तो खुली ही रहती है तो कभी भी निकालकर पढ़ लेते हैं।

पूछा, घर पर भी ले जाते हो क्या ? तो उन्होंने कहा कि घर ले जाने के लिए रजिस्टर में लिखवाना पड़ता है तो ज्यादातर यहीं पढ़ लेते हैं। पूछा कि यह किताबें खुली रखी रहती हैं तो गुम नहीं होती हैं ? उन्होंने कहा नहीं, यहीं पर पढ़ते हैं और यहीं पर रख देते हैं।

काफी दिनों बाद किसी स्कूल में इस तरह का खुला पुस्तकालय देखा जिसमें पुस्तकों तक बच्चों की पहुँच सचमुच में है और वे अपनी मनपसन्द किताबें जब चाहें तब पढ़ सकते हैं। पोखर स्कूल के पुस्तकालय को देखकर एकलव्य के पुस्तकालय कार्यक्रम की यादें ताजा हो रही थीं। सच में अगर एक स्कूल शिक्षक चाहे और बच्चों पर भरोसा करे तो बन्द अलमारी के बजाय, खुली रैक में भी स्कूल पुस्तकालय संचालित किया जा सकता है। शासकीय प्राथमिक विद्यालय, पोखर इसका जीता जागता उदाहरण है।


राकेश कारपेण्टर, स्रोत व्यक्ति, अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, खरगोन, मध्यप्रदेश

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

एक बढिया उदाहरण। बस जरूरत होती है समर्पण और मन से काम करने की। बहुत बहुत बधाई

arunrathibtr का छायाचित्र

ऐसा स्वतंत्र शैक्षिक वातावरण सभी शिक्षण संस्थानों में होना चाहिए।

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