किसी 'खास' की जानकारी भेजें। पुरुषोत्तम लाल गुप्ता : शिक्षक का लक्ष्‍य

जब मैं उच्‍च प्राथमिक विद्यालय,लक्ष्मीपुरा धाकड़ान,टोंक में नियुक्त हुआ, तब बच्‍चों एवं विद्यालय में कई सुधार की सम्भावनाएँ महसूस कीं जैसे :

  • विद्यालय वातावरण में अनुशासन की कमी।
  • स्वच्छता के प्रति जागृति नहीं होना।
  • विद्यालय के कई कार्य सूचीबद्ध एवं समयबद्ध नहीं।
  • पेयजल, मूत्रालय व शौचालय की कमी।
  • एसडीएमसी का योगदान नहीं होना। सहयोग का अभाव होना।
  • जाति भेदभाव ।
  • भौतिक सुविधाओं की अपर्याप्तता।
  • विद्यालय की सम्पति को नुकसान पहुँचाना।  
  • बच्चों का विद्यालय में ठहराव कम होना आदि।

लक्ष्य निर्धारण

उपरोक्त सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए मैंने अपना शिक्षण कार्य आरम्भ किया। किन्तु इन समस्याओं के कारण शिक्षण कार्य बाधित होता रहता था। बच्‍चे  अक्सर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते थे। मैंने इन समस्याओं के समाधान के लिए लक्ष्य निर्धारित कर एक-एक समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया। मैंने सोचा कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो तो सफलता असम्भव नहीं है।

स्वच्छता के प्रति जागृति

यदि बच्‍चे स्वयं ही स्वच्छ नहीं होंगे तो वह अपना ध्यान शिक्षा में नहीं लगा पाएँगे। कई बच्‍चे बिना शौच व बिना स्नान के ही विद्यालय में आ जाते हैं। कक्षा-कक्ष का वातावरण प्रदूषित रहने लगा। कई बार तो बच्‍चे ऐसे बच्‍चों के साथ  बैठना व बातचीत करना पसन्द नहीं करते थे। शिक्षा के लिए कक्षा में होने वाली अन्तःक्रियाएँ भी नहीं हो पाती थी। बच्‍चों में आलस्य नजर आता था, कई बच्‍चे  कक्षा में सो भी जाते थे। एक दिन सभी शिक्षकों की उपस्थिति में बैठक रखी गई। मैंने सभी के विचार इस विषय पर जानने की कोशिश की एवं अपने विचार भी सभी के सम्मुख रखे। किसी ने कहा कि व्यक्तिगत स्वच्छता के लिए तो प्रेरित कर सकते है लेकिन विद्यालय स्वच्छता में शिक्षा का नुकसान होगा। मैंने सभी के भाव स्वीकार करते हुए शुरू में व्यक्तिगत स्वच्छता की बात की इस हेतु योजना बनाई गई। अगले दिन विद्यार्थियों को स्वच्छता के लाभों के बारे में अवगत करवाया एवं उनकी भी राय जानने का प्रयास किया वे भी योजनानुसार स्वच्छ रहने को तैयार हो गए। कार्य में सभी को कड़ी मेहनत करनी पड़ी।

रोजाना उनकी स्वच्छता की जाँच करते थे। बहुत से बच्‍चे आँख चुराने लगे, कई बहाने बनाने लगे। कई के अभिभावकों के आक्रोश का सामना भी करना पड़ा। इस हेतु प्रयास प्रारम्भ किया, अभिभावकों से भी सम्पर्क किया। कई बातें सामने आई। अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क, एसडीएमसी बैठकों, 15 अगस्त, 26 जनवरी, माँ-बेटी सम्मेलनों आदि कई अवसरों पर स्वच्छता हेतु प्रेरित किया। आज बच्‍चे डंडीदार लोटे का प्रयोग, छानकर जल पीना, कपड़ों की स्वच्छता, घर-मकान की स्वच्‍छता, व्यक्तिगत स्वच्छता की समझ रखते हैं।

ग्रामवासी विद्यालय परिसर के आसपास गन्दगी कर देते थे। इसके लिए ग्राम के मन्दिर में संध्या आरती के पश्चात् घोषणा करवाई जिसके फलस्वरूप सुधार आया।  सरपंच महोदय से भी सम्पर्क किया गया। इस हेतु घरों में शौचालय बनाने हेतु प्रेरित किया गया।

विद्यालय में भी उपलब्ध रिकॉर्ड, सामान अव्यवस्थित था। सबसे पहले मैंने  कार्यालय को सुव्यवस्थित किया। तत्पश्चात् कक्षाओं को टीएलएम युक्त बनाने का प्रयास किया।

पेयजल, शौचालय, मूत्रालय की कमी

इस हेतु बीआरसी महोदय से सम्पर्क कर इन सुविधाओं का विकास करवाया। कई बार जलदाय विभाग से भी सम्पर्क किया। एसडीएमसी के लोगों में सहयोग का अभाव भी देखा गया। मैंने इसके लिए उनसे सम्पर्क किया। अब हम उन्हें दो दिन पूर्व ही सूचना भिजवा देते हैं। विद्यालय विकास हेतु सभी तत्पर रहते हैं। उनकी भावना के अनुसार एवं राजकीय नियमों की पालना सुनिश्चित करते हुए हम कार्य करते हैं। समस्त ग्राम वासी आज प्रसन्न है, विद्यालय की प्रशंसा करते हैं।

जाति भेदभाव

ग्राम में मुख्य रूप से धाकड़, बैरवा तथा रेगर समाज के लोगों का निवास है। मैंने विद्यालय में पाया कि जाति भेद बालकों में भी विद्यमान है। इस हेतु निरन्तर कई प्रयास किए सभी बच्‍चों को एक ही मटकी से पानी पीने हेतु प्रेरित किया। इस कार्य को करने पर ग्रामवासी नाराज हो गए। कई अभिभावकों ने मुझसे सम्पर्क किया कि आप ऐसा नहीं कर सकते हैं। स्टाफ साथियों की प्रेरणा व मेरा ध्येय सुदृढ़ होने के कारण इस ज्वलन्त समस्या पर काबू पाया और आज सब बच्‍चे  बिना जाति भेद, लिंग भेद, अमीर-गरीब का भाव रखते हुए प्रसन्नता से विद्यालय में रहते हैं।

विद्यालय में सुविधाएँ

पूर्व में विद्यालय में आज विद्यमान जितनी भौतिक सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी इस हेतु कई प्रकार की योजनाएँ शिक्षा के क्षेत्र में आई। विद्यालय को नोडल केन्द्र, मॉडल केन्द्र, NPGEL केन्द्र घोषित करवाकर उपलब्ध बजट का विद्यालय में उपयोग करवाया, जिससे भौतिक सुविधा की कमी दूर हो गई। कई बार देखने में आता कि ग्रामवासी या पूर्व व वर्तमान विद्यार्थी विद्यालय की सम्पत्ति को नुकसान पहुँचा देते थे। यह समस्या विकास के लिए बाधक भी थी। नुकसान के अन्तर्गत दरवाजों के तालों को पत्थर से मारकर, मेनगेट को नुकसान पहुँचाकर, शौचालय-मूत्रालय एवं बरामदों की टाईलें व कोटा स्टोन के पत्थर हटा देना आदि-आदि। इस हेतु पूर्व विद्यार्थियों की मीटिंग रखी गई, उनको समझाया गया कि यह राजकीय होने के साथ-साथ आपके गाँव की धरोहर भी है। क्या हम अपने घरों में भी इस प्रकार का नुकसान करते हैं। विभिन्न प्रकार के प्रयासों के उपरान्त सफलता मिल गई। हम सभी स्टाफ साथी खुश है।

विद्यालय में बच्‍चों का ठहराव

कई बार बच्‍चे मध्यान्ह के भोजन के पश्चात् नहीं आते थे। कई बार घर के छोटे-छोटे कार्य होने पर भी विद्यालय नहीं आ पाते थे। जैसे घर पर छोटे बच्चों को रखना है, पशुओं को दिन में पानी पिलाना है, आसपास के गाँव में जीमण है, पशुओं को चराना, घर की रखवाली करनी है, पड़ौसी छात्रा भी विद्यालय नहीं गई आदि कार्य से घर पर रुक जाना। इस हेतु मैं व्यक्तिगत रूप से प्रार्थना सत्र में जानकारी लेता हूँ नहीं आने का कारण जानने का प्रयास करता हूँ। यदि कोई बच्‍चा दो दिन से नहीं आ रहा है तो विद्यालय समय पश्चात् उसके अभिभावक से सम्पर्क करता हूँ। निरन्तर उपस्थिति ठीक बनी रहे इस हेतु कई प्रयास किए हैं। नहीं आने वाले छात्रों से सम्पर्क कर उनकी कठिनाइयों का तत्काल निराकरण हेतु प्रयास करता हूँ।

बच्‍चों में अनुशासन

यह एक दिन में दूर होने वाली समस्या नहीं थी। मैंने कार्य योजना बनाकर धैर्य रखते हुए कार्य प्रारम्भ किया। अधिक चंचल बच्‍चों को जिम्मेदारी देना शुरू किया। जैसे होमवर्क देखने का कार्य गणवेश प्रमुख, विद्यालय प्रमुख, कक्षानायक, कक्षा कक्ष की आवश्यक सामग्री चाक-दस्तर, निर्धारित स्थान पर रखना अर्थात ’’ स्व अनुशासन की ओर प्रेरित किया’’ और सफलता मिली है। अब छह कार्य जो बच्‍चों के दलों द्वारा किए जाते हैं:  

  • विद्यालय प्रांगण एवं कक्षा-कक्षों की सफाई,
  • व्यक्तिगत स्वच्छता की जाँच,
  • पेयजल व्यवस्था का रख-रखाव,
  • शौचालय और मुत्रालय की सफाई,
  • जल स्त्रोत से बेकार पानी के समुचित निपटान की व्यवस्था तथा
  • हाथ धोने की व्यवस्था तथा भोजन व्यवस्था आदि।

हरित राजस्थान

हरित राजस्थान नारे से प्रेरित होकर विद्यालय में हर वर्ष 100 पौधे लगाते थे, परन्तु बिना सुरक्षा एवं पानी की कमी के कारण नष्ट हो जाते। हम सारे परेशान रहने लगे गर्मी के अवकाश में सब नष्ट हो जाते। सभी ने गत दो वर्ष पूर्व फिर 50 पौधे लगाए। ग्रामवासियों से पौधे नहीं लगने के कारण को ढूँढा। अन्त में निर्णय किया कि गड्डों को गहरा कर अन्य मिट्टी डलवाई जाए। दो ट्रेक्टर उपजाऊ मिट्टी मँगवाई। दो विद्यार्थियों को एक पौधे की जिम्मेदारी दी गई। पौधे की डायरी का संधारण किया। पौधे जी गए। अब समस्या सुरक्षा की रही, इस हेतु प्रयास किया। वर्ल्ड विजन से सम्पर्क किया, उन्होंने 40 ट्री गार्ड उपलब्ध करवाए। आज सुरक्षित हैं। पानी की समस्या आज भी है। परन्तु दान दाताओं, सहायक सचिव, सरपंच महोदय से प्रार्थना कर हम पानी का टैंकर मँगवाते हैं, विद्यालय में निर्मित टैंक में डलवा देते हैं। आवश्यकतानुसार पौधों को पानी पिलाते हैं। अवकाश के दिनों में 4-5 दिनों में एक बार विद्यालय जाकर पानी पिलवाता हूँ।

सारांश रूप में मेरा यह मंतव्य है कि यदि शिक्षक चाहे तो विद्यार्थियों को बहुत ही योग्‍य बना सकता है। कहते हैं कि जिस शिक्षक का लक्ष्य स्पष्ट है उसको सफलता मिलना असम्भव नहीं है।

पुरुषोत्तम लाल गुप्ता

  • उच्‍च प्राथमिक विद्यालय,लक्ष्मीपुरा धाकड़ान,टोंक, राजस्‍थान
  • एम.ए.,बी.एड.
  • अगस्‍त 1997 से शिक्षक

 

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। पुरुषोत्तम लाल गुप्ता वर्ष 2010-11 में बेहतर शैक्षणिक प्रयास में विद्यालय प्रबन्‍धन एवं नेतृत्‍व के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने पुरुषोत्तम लाल गुप्ता से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम पुरुषोत्तम लाल गुप्ता, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

लक्ष्‍य बनाकर काम करने से काम सरलता से होने लगते हैं । हमारे पास पूरी योजना होती है उसके अनुसार हम धीरे -धीरे आगे बढते हैं ।साथ ही समीक्षा भी करते चलते हैं कि काम कितना कर लिया कितना अभी शेष है ,कहां कमी रह गई , कहां कितना कैसा प्रयास करना चाहिए ।

गुप्‍ता जी का प्रयास इस कारण सराहनीय बन जाता है कि उन्‍होने लक्ष्‍य पहचान और तय कर उस ओर आगे बढे तथा सफलता प्राप्‍त की । बहुत बहुत बधाई ।

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