किसी 'खास' की जानकारी भेजें। पुरानी मान्यताओं का टूटना जरूरी : कैलाश गुसांई

शिक्षक-शिक्षा में पिछले कई वर्षों से काम करते समय यह सवाल हमेशा हमारे समक्ष एक बड़ी चुनौती पेश करता रहा है, कि लोग बदलते कैसे हैं? शायद यह पता चल जाए कि लोग बदलते कैसे हैं तो एक वह काम करके हम बदलाव को एक निश्चित समय सीमा में प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु मानवीय सभ्यता के इतिहास में ऐसे बदलावों पर काफी शोध हुए हैं और जारी भी हैं, लेकिन अभी चुनौतियाँ खत्म नहीं हुई हैं।

इन सबके बीच ग्रीष्मकालीन सामाजिक विज्ञान कार्यशाला के दौरान मेरी मुलाकात इस कहानी के नायक कैलाश गुंसाई जी से हुई। एक दिन हम शाम को भीमताल डायट प्रांगण के एक कोने में बैठकर झील की लहरों को देख रहे थे, झील का पानी ठण्डी़ हवाओं के झोंके से सतत रूप से बढ़ती हुई एक शृंखला बना रहा था। आगे एक लहर खत्म होती और दूसरी पीछे से उसकी भरपाई करती और यह अनवरत चल रहा था। उस समय हम दो ही थे, हम दोनों शान्‍त एकचित्त होकर लहरों के इस खेल को एकटक देख रहे थे। फिर मैंने एकाग्रता को तोड़ा और कैलाश जी से कहा ‘कैसा लग रहा है यहाँ आकर,’ कैलाश जी ने कहा, ‘आज मुझे लगा कि मैंने अच्छा किया यहाँ आकर।’ अब मैंने उनके बारे में कुछ जानना चाहा। उन्होंने कहा कि मैं एक बहुत ही अनुशासनिक और परम्परात्मक माहौल में पला बढ़ा और पढ़ा लिखा भी। उस सबका मेरी पूरी जिन्दगी पर बड़ा प्रभाव पड़ा, शिक्षक की नौकरी मिली। हाथ में अनुशासन की कमान आई तो हमने भी स्कूल में अनुशासन के लिए पूरी ताकत लगा दी। यह समझ थी ही कि बच्चे पढ़ना-लिखना अपने आप शुरू कर देते हैं, यदि उन्हें अनुशासन में रहना सिखा दिया जाए। इसी मान्यता के साथ मैं अपने विद्यालय के बच्चों के साथ काम करने लगा और धीरे-धीरे बच्चों के बीच एक बेहद कड़क अनुशासन प्रिय शिक्षक के रूप में मेरी पहचान बनने लगी। कक्षा में मेरी उपस्थिति होते ही सभी बच्चे शान्‍त और अनुशासित हो जाते थे, इसके लिए चाहे उन्हें अपने स्वभाव में कितनी ही कठोरता से काम करना पड़ता हो।

इस बात का अहसास आज कर पाता हूँ। कमोबेश यही प्रक्रिया मेरे अपने घर पर भी थी, मेरे आते ही मेरा पाँच साल का बेटा भी शान्‍त और अनुशासित हो जाया करता था। यह बात लर्निंग गारण्टी कार्यक्रम के शुरू होने तक चलती रही। जैसे कि इस कार्यक्रम का हिस्सा कई स्कूल बने उसी प्रकार हमारे पास भी प्रस्ताव आया और हम भी उस कार्यक्रम का हिस्सा बन गए। हमारे विद्यालयों में बाल मैत्रीपूर्ण आकलन की प्रक्रिया प्रारम्‍भ हुई और पहली बार बच्चों और अनुशासन को लेकर हमारी पूर्व मान्यताएँ तथा धारणाएँ हिलती नजर आईं।

पहले तो विचार आया कि बच्चों को स्वतंत्रता देकर हम अनुशासनहीनता को तो नहीं बढ़ा रहे, पर कुछ ही समय बाद हमें अकादमिक सन्‍दर्भ समूह में सदस्य के रूप में बैठकों में प्रतिभाग करने और कई जगहों के भ्रमण का अवसर मिला। कई बातें बच्चों और वर्तमान शिक्षा के बारे में जानने को मिली। जैसे यह भी धारणा हमारे बीच है कि नौकरी के बाद क्या पढ़ना? तो मैंने भी नौकरी पाने के बाद पढ़ना लगभग बन्‍द ही कर दिया था। तो इस भ्रमण ने दो महत्वपूर्ण सीखें दी, एक तो बच्चों को देखने के प्रति नजरिया, दूसरा पढ़ने की इच्छा होना।

इसके बाद हमारे विद्यालय में एक घटना घटी, जिससे बच्चों के बारे में अपने पूर्व के नजरिए पर सवाल जैसे खडा़ हुआ। बात यह थी कि ठण्‍ड के दिन थे, और उस दिन तो हाड़ कंपाने वाली ठण्‍ड थी। हम सब दो-दो जैकेट पहनकर स्कूल आए हुए थे और आग भी जलवा रखी थी। कक्षा चल रही थी। तभी मेरी कक्षा का एक बच्चा कक्षा में दाखिल हुआ। उसके शरीर पर दो फटी हुई शर्ट थी और हाफ पैण्ट, जिससे वह अपनी ठिठुरन को दबाने की असफल कोशिश कर रहा था। मैंने बच्चों को कुछ काम दे रखा था और बच्चे कर रहे थे। काम देकर मान लिया जाता है कि बच्चे सीख रहे हैं और हमने सिखा दिया। अनुशासन का मतलब है कक्षा में बच्चों का शान्‍त रहना।

बच्चा आया और बोला सर जी मुझे भी काम दे दीजिए, मैंने काम दिया। वह भी अन्य बच्चों के बीच जाकर बैठ गया और काम करने लगा। अपने साथ लाए हुए बोरे को ठण्ड से पैरों को बचाने के लिए ढक लिया। बोरा जिसे वह बैठने के लिए लाया था। उसी से पैरों को ढक लिया और कांपते हुए मेरे दिए हुए काम को करने लगा। अचानक मेरी नजर उस पर गई और उसकी जिजीविषा को देखकर मेरे मन में एक साथ कई विचार कौंधे, खासकर अनुशासन और बच्चों के बारे में बनी-बनाई मान्यताओं को लेकर। फिर मेरे मन में आया कि कहीं मैं कुछ ठीक नहीं कर रहा हूँ, उस दिन उस बच्चे ने जो बात मुझे महसूस कराई उसकी हिम्मत, उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति उसकी सीखने की चाहत ने मेरे कई पूर्वाग्रहों को तोड़ दिया। सच कहूँ तो बच्चों के बारे में मेरी सारी धारणाएँ उस एक बच्चे ने एक ही झटके में तोड़ कर रख दीं। मेरी हिम्मत नहीं हुई उससे यह कहने की, कि तुम आज देर से क्यों आए? मैने महसूस किया कि अगर मैं लर्निंग गारण्टी कार्यक्रम से नहीं जुड़ता तो शायद पूरी जिन्दगी बच्चों के बारे में परम्परागत दृष्टिकोण और विचारों को ढो रहा होता। मुझे नहीं पता कि अब मैं इन नए विचारों के साथ कितना कुछ कर पाऊँगा, पर इतना तो तय ही कर लिया है कि बच्चों को अब नए नजरिए और पूरी क्षमताओं के साथ देखना है, इन्हें सीखने के लिए प्रोत्साहित करना है।

घर आया और रोज की तरह शान्‍त बैठे अपने बच्चे से कहा चलो आज खेल खेलते हैं, बच्चे और उसकी माँ ने मेरी तरफ काफी आश्चर्य से देखा। अचानक आए मेरे स्वभाव में इस परिवर्तन को मेरे परिवार के लोग ही विश्वास नहीं कर पा रहे थे। उस दिन से बच्चे के विचारों को सुनने और उन्हें प्रोत्साहित करने का काम शुरू हुआ और इसका फर्क भी महसूस किया। मेरा बच्चा अब ज्यादा आत्मविश्वास के साथ मुझसे बातें करने लगा है, और सवाल ढूँढकर रखता है। उन सवालों को करते हुए मुझे अहसास हुआ कि मुझे फिर से पढ़ना चाहिए। उसके बहुत सारे सवालों के जवाब मेरे पास भी नहीं होते हैं। इन्ही दिनों अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के साथियों द्वारा आग्रह किया गया कि आप सामाजिक विज्ञान विषय के सन्‍दर्भ शिक्षक के तौर पर जुड़ें, यह मेरे लिए सीखने का एक बेहतरीन मौका था। उस दिन के बाद से मेरे विद्यालय के बच्चे मेरी राह देख रहे होते हैं। जिस दिन विद्यालय नहीं पहुँचता बच्चे न आने का कारण पूछते हैं। बच्चों के इन सवालों में उनके मन में मेरे लिए छिपे इस प्रेम का अहसास ही काफी है। सच कहूँ तो बतौर एक शिक्षक का सबसे बड़ा ईनाम भी है। बच्चों के सीखने की गति देखकर, उनकी उपस्थिति देखकर अब विश्वास हो चला है कि चुनौतियों में काम करने का भी मजा है। 


कैलाश गुसांई से रामनरेश गौतम की बातचीत। रामनरेश गौतम अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,जिला संस्‍थान, उधमसिंह नगर, उत्‍तराखण्‍ड में स्रोत व्‍यक्ति के रूप में कार्यरत हैं।

यह विवरण अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित 'उम्‍मीद जगाते शिक्षक' से साभार।

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