किसी 'खास' की जानकारी भेजें। निवाई के एक स्‍कूल में कुछ तो बदला है

राजस्थान का एक जिला टोंक। टोंक जिले का एक ब्लॉक निवाई। ब्लॉक निवाई के बस स्टैण्ड से (टोंक की ओर जाने वाले रास्ते) मात्र दो किलोमीटर दूर, मुख्य रोड के पूर्वी छोर पर सिंघीवाल समुदाय की बस्ती और पश्चिमी छोर पर मदारी समुदाय की बस्ती। दोनों ही बस्तियों में तकरीबन 60-60 घर। सिंघीवाल समुदाय के लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत है मजदूरी। वहीं मदारी समुदाय के लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत जगह-जगह जाकर मदारी का खेल दिखाना है। दोनों ही समुदाय के अधिकतर पुरुष शराब के आदी हैं। उनका शिक्षा से दूर-दूर का भी वास्ता नहीं है। सिंघीवाल समुदाय को हिन्दुओं का करीबी माना जाता है और मदारी समुदाय के लोग मुस्लिम समाज के निकट हैं।

मदारी समुदाय के लोग अन्य कस्बों राज्यों आदि में खेल दिखाने के लिए जाते रहते हैं। ऐसे में यह अपने साथ महिलाओं और बच्चों को भी ले जाते हैं। परिवार को साथ में ले जाने का कारण भी स्पष्ट है, क्योंकि मदारी के खेल में महिलाओं और बच्चों की भी भूमिकाएँ होती हैं। इनके रीति-रिवाज भी अलग होते हैं। किसी के भी घर में कोई मौत होने पर वहाँ तीन दिन तक ढ़ोल-नगाडे़ बजाए जाते हैं। इसके पीछे इनका मानना है कि ऐसा करने से मरने वाले की आत्मा घर से निकल जाती है। इनके कुल देवता का स्थान मध्यप्रदेश में बाबा का टेकरी, जवारा में है। इस समुदाय में शादी के रिश्‍ते और किसी भी प्रकार की बीमारी के लिए कुलदेवता के यहाँ जाना जरूरी माना जाता है। आपसी झगडे, तलाक, लेन-देन आदि के निपटारें समुदाय की पंचायत ही तय करती है।

साल 2005 में सरकार द्वारा बस्ती में राजकीय प्राथमिक विद्यालय, जनता कालोनी की स्थापना की गई। इसके तहत सड़क के किनारे वाली जमीन पर तीन कमरों का निर्माण करवाया गया। हालांकि रसोईघर की व्यवस्था आज तक नहीं हुई है। इस कारण बच्चों के लिए बनने वाला भोजन निर्माण के पास पड़ी खाली जगह के कोने में मिट्टी के चूल्हे पर बनाया जा रहा है। प्रारम्भ में दोनों ही समुदाय के बच्चों को स्कूल से जोड़ने के प्रयास किए गए।

साल 2008 में एक शिक्षिका नज़्म कुरेशी की नियुक्ति इस विद्यालय में हुई। इस समय विद्यालय में केवल 15 बच्चे ही नामांकित थे। सर्वप्रथम उन्होंने दोनों ही समुदायों की परिस्थितियों को समझने में समय बिताया। घर-घर जाकर स्कूल/शिक्षा के सन्‍दर्भ में विषेष रूप से महिलाओं से बातचीत की। प्रारम्भ में अधिकतर अभिभावकों का जबाव यही था कि अगर हम बच्चों को पढाई के लिए यहाँ छोड़ देंगे, तो कमाई कैसे होगी और परिवार का गुजारा कैसे चलेगा।

इस स्थिति को बेहतर करने, अभिभावकों का पढ़ाई के प्रति मानस बदलने के लिए शिक्षिका द्वारा कुछ तरीके भी अजमाए गए। जैसे - अगर स्कूल में बच्चों को पढ़ने नहीं भेजा गया तो उनका नाम राशन कार्ड से कट जाएगा।      

कुछ ही समय में शिक्षिका द्वारा समुदाय के लोगों से किया गया सतत सम्‍पर्क और आजमाए गए तरीकों का असर नजर आने लगा। दोनों ही समुदाय से कुछ बच्चों ने स्कूल में दाखिला लिया। इन बच्चों को स्कूल आता देख कुछ और अभिभावकों ने भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजना प्रारम्भ किया। आज की स्थिति में सत्र 2013-14 में विद्यालय में 69 बच्चे नामांकित है और इनमें 28 बालिकाएँ हैं। सितम्बर 2013 से एक और शिक्षिका कविता पंचौली की नियुक्ति इस स्कूल में हुई है।

समस्त प्रयासों और सामूहिक भागीदारी के बाद स्कूल की परिवर्तित स्थिति को निम्न बिन्‍दुओं के माध्यम से अवलोकित किया जा सकता है –

  • विद्यालय के बारे में अभिभावकों का सोच बदला है। शिक्षिकाओं द्वारा अब जब भी स्कूल के सन्‍दर्भ में मीटिंग बुलावाई जाती है, वह उसमें भाग लेते हैं। विशेषकर महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है। इसमें बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ आदि मुददों पर बातचीत होती है।
  • अब दोनों ही समुदाय के बच्चों में पढ़ने की ललक दिखाई देने लगी है। वह छुटटी के दिन भी विद्यालय आने के लिए तैयार रहते हैं।
  • दोनों ही समुदायों के बच्चों में सीखने की गति काफी तीव्र है।
  • बच्चों में एक-दूसरे के प्रति मदद करने की भावना बढ़ी है।
  • मदारी समुदाय की एक लडकी मेंहदी ने इस स्कूल से कक्षा 5 पास कर, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश लिया है। वह नियमित विद्यालय जा रही है। यह बस्ती की पहली बालिका है, जो आगे पढ़ रही है।
  • विद्यालय में सामग्रियों को व्यवस्थित रखने व साफ-सफाई में सभी बच्चों की भागीदारी रहती है।

अनिल गुप्ता,अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, निवाई, टोंक,राजस्‍थान

टिप्पणियाँ

adnanbuland203 का छायाचित्र

बहुत अच्छा लेख था अनिल गुप्ता  जी | मैं नज्म कुरैशी से ज़रूर मिलुंगा |और मैं सभी सरकारी शिक्षको से बोलना चाहता हूँ की  नज्म कुरैशी की तरकीबे प्रियोग करें |RgdsAdnan Buland Khan -ABK

pramodkumar का छायाचित्र

good job

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