किसी 'खास' की जानकारी भेजें। नासिर हुसैन : बच्चों का विश्वास जीतना जरूरी है...

विद्यालय की पृष्ठभूमि

राजकीय प्राथमिक विद्यालय शोप सन् 1986 में राज्य सरकार द्वारा स्थापित किया गया। विद्यालय भवन ग्राम पंचायत शोप के पास पश्चिम दिशा में स्थित है। विद्यालय ब्लॉक प्रारम्भिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय उनियारा मुख्यालय अलीगढ़ से 13 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। जिला मुख्यालय की दूरी 58 किलोमीटर है।

विद्यालय में 5 कक्षा-कक्षों सहित 9 कमरे ठीक स्थिति में हैं। विद्यालय में पानी के लिए नल एवं हेडपम्प चालू स्थिति में है। पानी भरने के लिए काफी बड़ी टंकी है। विद्यालय में दो मूत्रालय और दो शौचालय हैं। यहाँ छोटा मैदान भी है जिसमें सीमेन्ट कंक्रीट बिछा हुआ है।

मेरी भूमिका

मैं लगभग छह वर्षों से कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों को अँग्रेजी सिखाने का प्रयास कर रहा हूँ। इससे पूर्व राजकीय विद्यालयों में अँग्रेजी विषय पाठ्यक्रम में  सम्मिलित नहीं था। बच्चे अन्य विषयों में भी साधारण थे एवं उनकी सामान्य जानकारी बहुत कमजोर थी। भौगोलिक स्थिति, राजनैतिक पदनामों एवं अन्य मूलभूत क्रियाओं के बारे में नहीं समझते थे। बच्चे विद्यालय नियमित नहीं आते थे। सभी बच्चे विद्यालय पोशाक में नहीं आते थे। कक्षा एक से पाँच तक के बच्चे अँग्रेजी विषय से अनभिज्ञ थे। मेरे विचार से बच्चों के शैक्षिक स्तर को सुधारने की आवश्यकता थी। यह विद्यालय की वास्तविक स्थिति थी जिसे देखकर मन में कई प्रश्‍न उठते थे।          

मैंने पाया कि बच्चों का विश्वास प्राप्त कर उनके नजदीक जाया जाए ताकि वे सीखने के लिए सहज हो सकें। मैने उनके अनुभवों को सुना और अपने अनुभवों को भी सुनाया इससे उनमें अपनत्व की भावना पैदा हुई बच्चों के साथ बैठना, खेलना, कार्य करना विद्यालय सफाई करना, चार्ट इत्यादि बनाना, रैली निकालना, सांस्‍कृतिक कार्यक्रम रखना, समय-समय पर पारितोषिक देना इन सभी कार्यो से बच्चों की झिझक दूर हुई और वे मुझे अपना साथी समझने लगे। इससे मुझे प्रत्येक बच्चे के बारे में और उसकी रूचि के बारे में ज्यादा जानकारी मिली। समय-समय पर बच्चों के घर पर भी जाना पड़ा और उनके माता-पिता से भी और जानकारी मिली।

प्रयास का विवरण

मैंने अपने स्टॉफ साथियों के साथ मिलकर शै‍क्षणिक प्रयास प्रारम्भ किए। उस समय विद्यालय में 10 का स्टॉफ था उनमें से कुछ साथी सकारात्मक सोच रखते थे। धीरे-धीरे स्थिति में सुधार आने लगा विद्यालय में कुछ-कुछ साफ-सफाई दिखाई देने लगी। स्थिति को ओर बेहतर बनाने के लिए मध्यान्ह समय में बैठकर हम बातचीत करते और बच्चों की शैक्षिक स्थिति सुधारने के प्रयासों पर चर्चा करते। प्रार्थना सत्र में सभी बच्चे एक साथ होते हैं। हमने इस का भरपूर लाभ उठाया। बच्चों को अच्छी बातें बताना, कहानियाँ सुनाना, स्वास्थ्य सम्बन्धी अच्छी आदतों की जानकारी देना तथा उनके स्वास्थ्य की नियमित जाँच करना, सामान्य ज्ञान की जानकारी देना आदि क्रियाओं द्वारा बच्चों में सुधार का निरन्तर प्रयास किया।

शैक्षिक प्रयास

बच्चों का विश्वास जीतने के बाद और उनके काफी नजदीक आने के बाद सिखाने की योग्यता मैंने प्राप्त कर ली थी। बच्चों को अँग्रेजी सिखाने के नए आयाम, प्रयोग, विधियों को भी जोड़ना आवश्यक समझा। बच्चा सरल विधि एवं आनन्द के साथ कैसे अँग्रेजी सीखे मेरा पूरा ध्यान इस पर था। मैंने खेल-खेल में, चित्रों के माध्यम से, व्यवहारगत परिवर्तन के आधार पर बच्चों को सिखाने का प्रयास प्रारम्भ किया।

जैसे कक्षा 3 मैंने एक काल्पनिक चरित्र तैयार किया है जिसका नाम है अंकल सेम। प्रारम्भ में बच्चे अंकल सेम का चित्र देखकर हँसते थे और कहते थे, ‘‘ माडसाब के दोस्त हैं, भायले हैं। ‘‘ क्योंकि मैंने अंकल सेम को विभिन्न क्रियाएँ करते हुए बताया था।

मुझे Ball के बारे में बताना था। मैंने ब्लैक बोर्ड पर बॉल का चित्र बनाया। बडे़-बड़े लेटर में Ball की स्पेलिंग लिखी। बच्चों को बॉल का उच्चारण बताया, बच्चों ने उसे दोहराया। इसके बाद मैंने पूछा कि जिन बच्चों के पास बॉल है अपना हाथ खड़ा करें कुछ ही बच्चों ने हाथ खड़ा किया। फिर मैने पूछा किस-किस को बॉल से खेलना अच्छा लगता है?  सभी बच्चों ने हाथ खड़े किए। हम बॉल से कौन-कौन से खेल खेलते हैं ? बच्चों ने कुछ खेल के नाम बताए मैंने उनकी मदद की। इसके बाद बच्चों को ब्लैक बोर्ड पर Ball लिखने के लिए कहा गया। प्रत्येक बच्चे ने  Ball की स्पेलिंग लिखी और गृह कार्य भी दिया गया। आज गेंद बॉल हो गई थी। हमेशा-हमेशा के लिए। धीरे-धीरे बच्चे Ball की स्पेलिंग बोलने लगे ।

 

 

पहली कक्षा में मेरी कोशिश थी कि बच्चों को अँग्रेजी वर्णमाला की जानकारी दूँ। मैंने पहले उन्हें पाँच वर्ण A B C D E के बारे में ही बताया। मोटे-मोटे अक्षरों मे श्याम पट्ट पर पाँचों वर्ण लिखे। चित्र भी बनाया। जैसे पाँचों दोस्त पहाड़ पर चढे़ सबसे पहले A फिर उसके पीछे B इस प्रकार उनकी पहचान करवाई।

मिनिंग्स के अनुसार चित्र बनाकर समझाना आसान होता है। मिनिंग्स लिखकर उनके सामने चित्र भी बनाया जाता है और उनसे सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं।

कभी-कभी कमजोर बच्चों से बोलकर ब्लैक बोर्ड पर लिखवाया जाता है। अगले दिन बच्चे याद कर लाते है उनसे पूछा जाता है तथा फिर गृहकार्य दिया जाता है। इस प्रक्रिया में कुछ बच्चे पिछड़ जाते है तो उनको अलग से कार्य दिया जाता है।

समय -समय पर बच्चों से निम्न अभ्यास कार्य भी करवाए जाते हैं:

  • खाली स्थान भरो  
  • मिलान करो                                            
  • छाँटकर लिखो
  • ब्लैक बोर्ड पर दस-बारह अँग्रेजी वर्ण लिखे जाते हैं तथा उनसे मिनिंग्स बनवाई जाती है।  
  • अँग्रेजी और हिन्दी शब्‍दार्थों की जोड़ी बनाना                    

ऐसे तमाम प्रयासों से बच्चे अधिगम से जुड़ जाते हैं। आवयकता पड़ने पर अलग से समझाया जाता है अगले दिवस गृह कार्य जाँचा जाता है तथा नया पाठ सिखाने से पूर्व पढ़ाया सिखाया गया ज्ञान का एक बार अवश्य दोहरान करवाया जाता है। मेरा हमेशा प्रयास रहता है कि सिखाया गया ज्ञान बच्चे व्यवहार में प्रयोग करें । समय-समय पर बच्चों को टोकता रहता हूँ। उन्हे अँग्रेजी शब्दों का उच्चारण ज्यादा से ज्यादा करने को कहता हूँ।

प्रयास के फलस्वरूप परिवर्तन आया

आज विद्यालय के बच्चे अँग्रेजी से डरते नहीं, बल्कि अँग्रेजी का अपने दैनिक जीवन मे प्रयोग करते हैं। सहज होने के बाद बच्चों ने अँग्रेजी को समझा और बच्चे अँग्रेजी शब्द का और छोटे-छोटे अँग्रेजी वाक्यों का प्रयोग करते है। विद्यालय में बच्चों की हाजिरी अँग्रेजी गिनती से की जाती है। उठना, बैठना, आना, जाना आदि के लिए अँग्रेजी शब्दों का उपयोग किया जाता है। आज कई बच्चों के अँग्रेजी शब्द कोष में 500 से 700 तक की मिनिंग्स हैं। जिनका प्रयोग बच्चे अपने दैनिक जीवन मे आसानी से करते हैं। बच्चे विद्यालय गतिविधियों को अँग्रेजी भाषा में प्रयोग करने का प्रयास भी करते है। समस्या आने पर समझने का प्रयास भी करते है। इन प्रयासों मे विद्यालय के छोटे बच्चे भी शामिल होते हैं और एक-दूसरे से सीखने का प्रयास करते हैं।                   

विद्यालय में अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों को पूरा करने का आनन्द सुखद अनुभूति देता है। सीखने-सिखाने के अलावा बच्चों को नैतिक आदर्शो के बारे में मय उदाहरण बताया जाता है। ताकि वे अपनी दिनचर्या में नैतिक आदर्शो का स्वयं पालन कर सकें और छोटी-छोटी समस्याओं और विवादों से बच सकें

जैसे हमें हमारे सहपाठी का ध्‍यान रखना चाहिए। मैंने बच्चों को मेरे साथ घटित घटना को आधार बनाकर बताया और समझाया। हमें साथी को बैठने की जगह देना चाहिए। एक दूसरे से विनम्र व्यवहार रखना चाहिए इत्यादि।

उदाहरण जो प्रेरित करता है

प्रवेश का समय था एक अभिभावक अपने बच्चे को लेकर आए और कहा कि ‘ माडसाब यह मेरा बच्चा है यह इस गाँव के सभी स्कूलों में एक-एक साल पढ़ चुका है और बहुत शरारती है।’ बच्चे के दुर्गुणों को गिनाने लगे तथा बोले, ‘मैं इससे थक चुका हूँ अब आप इसे संभालें।’  

मैंने बच्चे से बातचीत की, उसे विश्वास में लिया। वह बच्चा कक्षा 3 में प्रवेश योग्य पाया गया। पिता से नियमितता का ध्यान रखने की बात की। बच्चा कक्षा में बैठा और दस पन्द्रह मिनट बाद ही कुछ बच्चे शिकायत लेकर आए कि उसने मारा ! बच्चे को समझाया गया और पाया कि बच्चे को फाईटिंग करना अच्छा लगता है।

कार्य योजना अनुसार उस बच्चे पर विशेष ध्यान दिया गया। बच्चे से प्रतिदिन छोटे-छोटे और उससे सम्बन्धित प्रश्न पूछने लगा! अन्य बच्चों से भी उसके सामने चर्चा कर अच्छे काम के लिए ‘अच्छा’ शाबास गुड व वेरी गुड कहा जाता था।

धीरे-धीरे बच्चा नजदीक आने लगा उसे पूर्व ज्ञान के आधार पर प्रश्न देने लगे। उन्हें व आसानी से करता एवं खुश होता इस प्रकार बच्चे के व्यवहार में परिवर्तन आता चला गया। आज वह कक्षा 5 का होनहार बालक है। हमारे साथ-साथ उसके पिता को भी इस पर गर्व है। एक दिन उसके पिताजी विद्यालय आए और प्रधानाध्यापक जी से कहा कि इस बच्चे ने मेरी बीड़ी पीना छुड़वा दी है तो उन्हें आश्चर्य हुआ। लेकिन मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था क्योंकि पर्यावरण विषय में  नशे से सम्बन्धित पाठ मैंने पढ़ाकर बच्चों को शपथ दिलवाई थी न तो कभी जीवन में नशा करेंगें न करने देगें। परिणाम आश्चर्यजनक था बच्चे ने पिता को बीड़ी पीने नहीं दी। मेरा सिखाना सार्थक हो गया था।

ऐसे प्रयासों में हमें समय समय पर एसडीएमसी सदस्यों का सहयोग भी मिलता रहता है। उनके सुझाव हमारे लिए आवश्यक प्रयासों में मददगार होते है। विद्यालय के कई बच्चों की मार्च माह तक की उपस्थिति 90 प्रतिशत से ऊपर है। इसके लिए प्रधानाध्यापक जी और मैं समय-समय पर गाँव भ्रमण करते हैं। बच्चों के घर जाते हैं अभिभावकों से मिलते हैं, उन्हें समझाते हैं, बच्चे के बारे मे चर्चा करते हैं। यह प्रयास एक सतत प्रक्रिया है।

प्राथमिक स्तर पर एक अध्यापक का 4 या 5 साल ठहराव आवश्यक है

प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापक का ठहराव कम से कम चार या पाँच वर्ष आवश्यक है ताकि वे अर्जित लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकें किसी भी विद्यालय में अपेक्षित स्थिति प्राप्त करने में समय लगता है। बच्चों को सहज बनाने के लिए अनवरत प्रयास की आवश्यकता होती है। इसलिए राज्य सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। बच्चा कक्षा एक में प्रवेश लेकर सीखने की प्रक्रिया से जुड़ता है और चार-पाँच साल तक उस विद्यालय में ही सीखने की प्रक्रिया से गुजरता रहता है। एक सक्रिय अध्यापक का अन्तिम लक्ष्य चार-पाँच साल में जाकर ही पूरा हो पाता है क्योंकि बच्चा कक्षा 5 के बाद अन्य विद्यालय में चला जाता है।     

नासिर हुसैन

  • अध्यापक
  • राजकीय प्राथमिक विद्यालय शोप तहसील उनियारा, जिला टोंक, राजस्थान
  • रूचि: छोटे बच्चों को सिखाना (पढ़ाना), पेन्टिंग करना

 


वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। नासिर हुसैन वर्ष 2009-10 में बेहतर शैक्षणिक प्रयास के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने नासिर हुसैन से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम नासिर हुसैन, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

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टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

नासिर हुसैन जी को उनकी शैक्षिक साधना और बच्‍चों से जुडाव के लिए बधाई ा

निश्चितरूप से छोटे- छोटे प्रयासों से सफलता प्राप्‍त की जा सकती है ;जरूरत है तो केवल लगन और समर्पण की ा

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