किसी 'खास' की जानकारी भेजें। नानकमता का एक स्कूल: कुछ अलग-कुछ खास

दीपा रानी

आम तौर पर सरकारी स्कूलों के बारे में मन में यही दृश्य उभरता है कि होगी कोई ऐसी बिल्डिंग जो बिना रंगाई-पुताई की होगी।  बाउण्‍ड्री वाल नहीं होगी, चारों तरफ गन्‍दगी फैली होगी।  बच्चे इधर-उधर घूम रहे होंगे। स्कूल में एक अध्यापक होगा। किसी तरह बच्चों को घेरे होंगे। प्रशासन को भेजने के लिए जानकारी बना रहे होंगे। मिड डे मील के लिए गन्‍दी-सी रसोई होगी आदि-आदि।

लेकिन गत दिनों उत्तराखण्ड के ऊधमसिंह नगर जिले के सितारगंज ब्लॉक में एक ऐसे सरकारी प्राथमिक विद्यालय में जाने का मौका मिला जो इस छवि के बिलकुल उलट, कुछ अलग है-कुछ खास है।

हम बात कर रहे हैं नानकमता के एक प्राथमिक विद्यालय की। नानकमता के प्रसिद्ध गुरुद्वारा से आधा किमी दूर नानक सागर डैम से सटी हुई एक पिछड़ी बस्ती है बंगाली कालोनी। नानकमता ग्राम सभा के एक वार्ड के रूप में बसी इस कालोनी की आबादी 1835 है। यहाँ अधिकांश विस्थापित बंगाली परिवार हैं। ये परिवार भूमिहीन हैं। ये राजमिस्त्री और मजदूरी का काम करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। बस्ती के अधिकांश परिवार बीपीएल श्रेणी के हैं। वे अभाव और सरकारी सुविधाओं के बिना जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे में वे अपने बच्चों को प्राईवेट स्कूल में भर्ती करा पाएँ यह सम्भव नहीं। उनके इन कष्टों को देखकर तत्कालीन ग्राम प्रधान दलजीत सिंह ने भूमि की व्यवस्था कर यहाँ 2003 में  एक प्राथमिक विद्यालय खुलवाया।

आरम्‍भ से ही यहाँ के.एन. अटवाल प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। विद्यालय के पास थोड़ी ही जगह थी।  स्कूल असमतल जगह में था। सरकार ने भवन तो बनवा दिया लेकिन मिट्टी भराव के लिए कोई राशि नहीं दी। ऐसे में प्रधानाध्‍यापक  ने प्रधान जी से सहायता लेकर तथा अपने व्यक्तिगत संसाधनों से पूरे विद्यालय परिसर में मिट्टी का भराव कराया। इसके बाद चला उनका सौंदर्यीकरण अभियान।

आज विद्यालय परिसर में चारों ओर हरियाली है। स्कूल में तरह-तरह के फूल वाले पौधे लगे हैं। फूल और पौधों की रंगत और खुशबू मन को खुश कर देती है। विद्यालय की वाउण्‍ड्री वाल है।  गेट है।  साफ-सुथरे शौचालय हैं। बच्चों के खेलने के लिए कई तरह के झूले हैं। सभी तरफ साफ-सफाई है। रसोई घर में मोटर पम्प लगा है। पानी के लिए वाटर प्यूरीफायर है। कार्यालय को बढ़िया करके सजाया गया है। दीवारों पर महापुरुषों के चित्र लगे हैं।

विद्यालय को चलते हुए 9 साल हो गए। विद्यालय का प्रभाव समुदाय पर भी पड़ता दिख रहा है। बस्ती में 6-14 साल की उम्र के 350 बच्चे हैं और सभी बच्चे किसी न किसी कक्षा में किसी स्कूल में पढ़ते हैं। इस विद्यालय में कक्षा 5 तक के 123 बच्चे पंजीकृत हैं और 95 प्रतिशत उपस्थिति रहती है। अनुपस्थित रहने पर शिक्षक अभिभावकों से सम्पर्क करके कारण जानने का प्रयास करते हैं। चूँकि अधिकांश परिवार मजदूरी करके गुजारा करते हैं इसलिए वे अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। ऐसे में स्कूल का यह प्रयास रहता है कि बच्चे स्कूल आ जाएँ। होमवर्क बगैरह वे स्कूल में ही करा देते है।

सरकारी विद्यालयों की एक बड़ी समस्या है अध्यापकों की कमी। इस विद्यालय में एक हेड और एक सहायक अध्यापिका तैनात हैं। कक्षाएँ 5 हैं, ऐसे में सरकारी काम और व्यक्तिगत अवकाश के कारण शिक्षण कार्य बहुत प्रभावित होता है। अटवाल जी ने इस समस्या के निराकरण के लिए एक विशेष व्यवस्था की है। उन्होंने व्यक्तिगत प्रयासों से दो स्थानीय शिक्षकों की व्यवस्था कर रखी है। इनके होने से शिक्षण कार्य में बाधा नहीं आती और सारे बच्चे व्यस्त रहते हैं। बच्चों में पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार भी विकसित हों इसके लिए विशेष प्रयास रहता है। मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए दो भोजन माताएँ नियुक्त हैं जो साफ-सफाई से रसोई बनाती हैं और बच्चों को परोसती हैं।

सरकारी विद्यालयों में साधनों का अभाव है, शिक्षक पूरे नहीं हैं, ऐसे में पढ़ाई कैसे हो?  यह प्रश्न हम चारों ओर उठता हुआ देखते हैं। यह बात ठीक भी है। लेकिन नानकमता विद्यालय की कहानी से यह सिद्ध होता है कि अगर हम मन से प्रयास करें तो जो व्यवस्था है उसके अन्‍दर ही कुछ खास-कुछ अलग किया जा सकता है।


दीपारानी, स्रोत व्‍यक्ति, अज़ीम प्रेमजी जिला संस्‍थान, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ

khem shanker का छायाचित्र

दीपारानी जी को बहुत धन्यवाद , आपने सरकारी विद्यालयों की दूसरी छवि को हमारे सामने रखा , पढकर काफी अच्छा लगा |
........शुभकामनाएं

pramodkumar का छायाचित्र

बहुत अच्‍छा लगा ।मन से करें प्रयास तो सब कुछ सम्‍भव है ।

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