किसी 'खास' की जानकारी भेजें। देवकीनन्दन गौत्तम : संवाद और समन्‍वय से आता है बेहतर नेतृत्‍व

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय छोटी बरथल, निवाई ब्लॉक की ग्राम पंचायत पहाड़ी के राजस्व ग्राम बरथल में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 12 पर निवाई से टोंक की तरफ चलने पर दीक्षा पेट्रोल पम्प के ठीक सामने पश्चिम दिशा में 700 मीटर अन्दर स्थित है।

इस विद्यालय में 1 प्रधानाध्यापक, 5 अध्यापक, 2 कुक कम हेल्पर व 93 बच्चे हैं। 2008 में यह विद्यालय प्राथमिक से उच्च प्राथमिक विद्यालय में क्रमोन्नत हुआ। पूर्व के 3 शिक्षक, शिक्षिकाओं के साथ ही यहाँ 5 शिक्षक-शिक्षिकाओं का पदस्थापन्न कर कुल 8 शिक्षक,  काम करने लगे। पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक का पद रिक्त होने के कारण सबसे वरिष्ठ शिक्षक ही प्रधानाध्यापक के दायित्वों का भी वहन कर रहे थे। उनका प्रशासन बड़ा सख्त था। समय पर न आने वाले शिक्षक, शिक्षिकाओं की साप्ताहिक समय की गणना कर छुट्टी काटी जाती थी। शिक्षक कक्षा में समयबद्ध शिक्षण तो करवाते थे, परन्तु शिक्षण प्रभावी नहीं था। लक्ष्य पूर्ण रूप से नहीं मिल रहे थे।

5 अक्टूबर 2009 को मेरा पदस्थापन इस विद्यालय में द्वितीय श्रेणी (प्रधानाध्यापक) के रूप में हुआ। मैंने प्रत्येक कक्षा कक्ष, शिक्षक, शिक्षिकाओं के व्यवहार व संवाद के बारे में जानकारी प्राप्त कर गहनता से अवलोकन किया।

मैं निम्न निष्कर्ष पर पहुँचा-

  • शिक्षक समय पर आते हैं व कक्षा में भी समय पर जाते हैं, परन्तु शिक्षण प्रभावी नहीं है। वे बोझ समझ कर पढ़ाते हैं व शिक्षक दैनन्दिनी भी औपचारिक रूप से भरते हैं।
  • बालकों का गृहकार्य बोझ लगता है। वे कालांश के बाद उसको तुरत-फुरत निपटाने में लगे रहते हैं। गृहकार्य की जाँच भी औपचारिक रूप से ही हो रही है।
  • शिक्षक, शिक्षिकाएँ एक साथ नहीं बैठते हैं। उनमें संवादहीनता है। वे ग्रुपों में बँटे हुए हैं। कार्य की इतिश्री करना ही उनका उद्देश्य है।

मैंने इस स्थिति में बदलाव के लिए निम्न प्रयास किए-

  • जो शिक्षक यदि कुछ समय आने में देर कर देते थे। उनसे आगमन का समय तो सही ही डलवाया जाता था। परन्तु एक अलग डायरी में देरी का कारण व आगमन का समय दिनांक वार अंकित करवाया जाता था। इससे शिक्षक/शिक्षिकाओं में आत्म अनुशासन जागृत हुआ। कारण लिखवाने के रिकार्ड के भय से सभी ठीक समय पर आने लगे।
  • मैंने विद्यालय में टी क्लब का गठन करवाया और एक स्टाफ सेक्रेटरी बना दिया। रोजाना चाय पीने के दौरान सभी एक जगह बैठते थे। इस मौके पर शिक्षकों से उनकी व्यक्तिगत समस्याओं का चिन्हीकरण कर उनका निराकरण करवाने का प्रयास भी किया जाने लगा।
  • बच्चे विद्यालय के किसी कार्य में रुचि नहीं लेते थे। परन्तु मैंने सभी के साथ मिलकर शिक्षक व बालकों के मध्य तारतम्य की योजना बनवाई। प्रार्थना सभा व मिड डे मील में व्यवहारगत जिम्मेदारी कक्षावार, कक्षाध्यापकों के निर्देशन मे बालकों को सौंपी गई। इसका परिणाम यह आया, कि किसी बच्चे को किसी काम के लिए नहीं कहा जाता है, बच्चे स्वयं जिम्मेदारी समझकर अपना कार्य करते हैं जैसे दरी पट्टी बिछवाना-उठाना, तस्वीर लगाना, छोटे बच्चों के बर्तन व हाथ धुलवाना। राष्ट्रीय पर्वों के संचालन व कार्यक्रम की रूपरेखा कक्षाध्यापकों  के निर्देशन में बच्चे स्वयं निर्धारित करने लगे हैं।
  • पूर्व में एसएमसी की बैठकों में लोग औपचारिक रूप से ही भाग लेते थे। परन्तु उनको विधिवत रूप से बुलवाकर विद्यालय की प्लानिंग व सभी कार्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी जाने लगीं तो उनमें आत्मविश्वास जागृत हुआ। परिणामतः अब वे रचनात्मक कार्यों में विद्यालय का पूर्ण सहयोग करते हैं ।

नेतृत्व व विद्यालय प्रबन्धन में उपरोक्त सुधार करने के बाद मैं समय समय पर आत्मचिन्तन कर स्वअनुशासन कायम रखने व उसका प्रतिबिम्ब स्टाफ में देखने की कोशिश करने लगा।

इसके फलस्वरूप शिक्षण कार्य में भी सुधार देखने को मिला-

  • शिक्षकों से उनकी रुचि के विषय पूछकर उनके न्यूनतम अधिगम स्तर के लक्ष्य निर्धारित कर उनको शिक्षण के लिए स्वतंत्रता दी।
  • दैनिक पाठ योजना में वे ही उद्देश्य व प्रक्रिया लिखने का आग्रह किया, जो वास्तविक रूप से कक्षा कक्ष में पढ़़ाई जाएँ।
  • सभी शिक्षक, शिक्षिकाओं से टी.एल.एम. की जरूरत की लिस्ट बनवाई गई व उनके सुझाव अनुसार ही सम्पूर्ण राशि की सामूहिक टी.एल.एम. खरीदा गया। शिक्षक अपनी जरूरत अनुसार टी.एल.एम. का प्रयोग करते व वापस सुरक्षित रख देते हैं।
  • आर्ट व क्राफ्ट का भी भरपूर कार्य करवाया जाने लगा। जिसके कारण बच्चे विषय की नीरसता भूल जाते हैं। शिक्षक भी व्यस्त रहने लगे हैं।
  • बच्चों में कल्पना शक्ति, चुनौती की भावना का विकास होने लगा, जिससे उनका बुद्धि लब्धि स्तर विकसित होने लगा। कुछ गतिविधियों पर भी चर्चा हुई।
  • शिक्षक प्रत्येक विषय की स्वयं ही साप्ताहिक व दैनिक योजना बनाने लगे हैं। उन पर पाठ्यक्रम पूरा करवाने का कोई दबाव नहीं होता है।
  • शिक्षक-शिक्षिकाएँ एक दूसरे की मदद लेने लगे हैं। टी.एल.एम. निर्माण या अन्य व्यक्तिगत समस्याओं में भी आपस में सहयोग करने लगे हैं।
  • बच्चों में रचनात्मक प्रवृत्ति विकसित हुई।
  • समुदाय के लोग जहाँ पहले बात-बात पर स्टाफ को धमकाने आ जाते थे। अब बच्चों के प्रभावी शिक्षण व विद्यालय के क्रिया-कलापों से संतुष्ट हैं।

उपरोक्त तथ्यों के समेकन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, कि यदि बेहतर संवाद, आपसी समन्वय व सहयोग, शिक्षकों व बालकों की रुचि व नेतृत्व से लक्ष्य निर्धारित कर स्व अनुशासन के द्वारा कार्य करवाया जाता है, तो संस्था को बेहतर परिणाम मिलते हैं।

 

देवकीनन्दन गौत्तम

प्रधानाध्यापक,राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, छोटी बरथल, ब्लॉक-निवाई,टोंक


वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009-10 तथा 2010-11 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। देवकीनन्‍दन गौत्तम वर्ष 2010-11 में  ‘ शाला नेतृत्‍व एवं प्रबन्‍धन’  के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने देवकीनन्‍दन गौत्तम से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इसी बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम देवकीनन्‍दन गौत्तम, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

ratanchoudhary का छायाचित्र

गौतम जी को प्रयासों के लिये साधुवाद

Anil Gupta का छायाचित्र

निश्चित रूपसे गौतमजी ने शिक्षा मैं अपना बखूबी योगदान दिया है आपके प्रयास अन्य शिक्षको के लिए भी कारगर है

khem shanker का छायाचित्र

आपके बेहतर प्रयास आपकी बेहतर सोच का ही परिणाम हैं ....
आपकी बेहतर सोच के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को और आपको बधाईयाँ ...

Devendra Singh का छायाचित्र

सराहनीय कदम| वर्तमान दौर में, जब शिक्षक वर्ग राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका के प्रति उदासीन होता जा रहा है, ऐसे कुछ क्रांतिकारी सुधारों की नितांत आवश्यकता है| गौतम जी द्वारा इस दिशा में जो कार्य किये जा रहे हैं, उनके लिए वह बधाई के पात्र हैं| आशा है, यह क्रम अनवरत चलता रहेगा|

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