किसी 'खास' की जानकारी भेजें। डोंगरीपारा में जनसहभागिता

छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के आदिवासी विकासखंड नगरी में डोंगरीपारा धमतरी से तकरीबन 15 किमी दूर एक आदिवासी बहुल गाँव है। करीब 80-85 घरों के इस गाँव में तकरीबन 70 घर आदिवासी हैं जिनमें 4-5 कमार परिवार को छोड़ बाकी सब गोंड़ आदिवासी हैं। गाँव के कच्चे मिट्टी के पारम्‍परिक घरों के बीच-बीच में पक्के मकान भी हैं। गाँव के आखिरी छोर पर प्राथमिक शाला है।

इस स्कूल की हरियाली एक अलग तरह का अहसास दिलाती है। यहाँ फूल के पौधे तो हैं ही साथ ही पीपल और बरगद जैसे पेड़ भी हैं। इसके अलावा बहुत सुन्‍दर सब्जी की बागवानी भी है। जिसमें भाजी से लेकर बरबटी के पौधे नजर आते हैं।  इस सब्जी उपयोग स्कूल के मध्यान्ह भोजन में होता है।

शाला सहभागिता समिति के उपाध्यक्ष, भीखमराम मरकाम का कहते हैं,“ हमारा स्कूल आसपास के बाकी स्कूलों से अलग है। यहाँ जो है दूसरे स्कूलों में ऐसा नहीं है, जैसे यहाँ पर स्कूल का अहाता है, बोरवेल है, बागवानी है और पढ़ाई भी अच्छी होती है। और यह सब हमारे सर लोगों का (शिक्षकों का) प्रभाव है।” 

प्रधान पाठक सहदेवराम ध्रुव ने भी कहा कि, ,“इसमें ग्रामीणों की जनसहभागिता का बड़ा योगदान है। गाँव वालों से जनसहभागिता प्राप्‍त करने श्रेय हमारे शिक्षक होरीलाल निषाद को जाता है।”

होरीलाल निषाद, सहायक शिक्षक (पंचायत), 2008 से यहाँ पदस्थ हैं, वे कहते हैं,“ मैं जब यहाँ तब आया शाला भवन के अलावा खाई और मैदान था। सामने गाय का गोबर डालने के लिए गड्ढा था। मैं यहाँ ज्‍वाइन करने से पहले देखने आया और पाया कि यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं। उस दौरान डाइट, नगरी की ओर से अभियान चला था ‘गाँव हमारा, बच्चे हमारे और स्कूल हमारे’। डाइट के लोगों ने भी यहाँ मीटिंग की थी।

हम गाँव के लोगों से लगातार सम्‍पर्क और बैठक करते रहे और उन्हें कुछ अच्छे स्कूल देखने के लिए प्रेरित भी किया। उन्हें शैक्षणिक भ्रमण पर मैनपुर और गहनासियार ले गए थे। इसमें डोंगरीपारा और बरबांधा के ग्रामीण शामिल थे। यही नहीं गाँव वाले एक यात्रा से संतुष्ट नहीं हुए तो और एक बार और यात्रा की जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ शामिल हुईं।

यह सब शाला देखकर के गाँव वाले काफी प्रभावित हुए और अपनी शाला के विकास के लिए उत्साहित नजर आए। स्कूल के पास बड़े-बड़े पत्थर थे। गाँव वालों ने मिलकर उन्‍हें तोड़ा और श्रमदान करते हुए यह अहाते का निर्माण किया। इसमें आवश्यक धन का भी सहयोग मिला। पैसे जुटाने के लिए छेरछेरा नाच का आयोजन किया, उससे जो पैसे इकठ्ठे हुए वे सारे पैसे भी इसमें लगा दिए। मोटर पम्प लगाया गया जिसमें करीब 23 हजार रुपए खर्च आया। गाँव वालों ने करीब 25 हजार रुपए खर्च करके प्रिंटर समेत एक कम्प्युटर खरीदकर दिया। इस का उपयोग ऑफिस काम के साथ-साथ बच्चे भी करते हैं।

गाँव वाले आज भी स्कूल के नाम पर अन्नघट योजना चला रहे हैं। जिसके अन्‍तर्गत वे एक घड़े में रोज एक मुट्ठी चावल डालते हैं। इस तरह से महीने में कम से कम एक किलो चावल और 10 रुपये एक परिवार से आता है। हर महीने 30-35 किलो चावल और दो ढाईसौ रुपए जमा हो जाते हैं। स्कूल में जो छोटे-मोटे काम होते हैं वह इस पैसे से कर लेते हैं, जैसे बागवानी के लिए पाइप खरीदना था वह इससे खरीद लिया। इस तरह से गाँव वालों का यह सहयोग और भागीदारी बनी हुई है। स्कूल की बागवानी और सब्जी उगाने में भी गाँव वाले सहयोग कर रहे हैं। जब स्कूल में छुट्टी होती है तो वही इसकी जिम्मेदारी लेते हैं और लगातार पौधों में पानी देते हैं। गाँव के एक बुजुर्ग सुकराम मरकाम वह सुबह-शाम रोज आते थे और बागवानी से लेकर किचन गार्डेन तक की देखभाल करते थे। उनके पैर में फ्रेक्चर होने से उनका आना बन्‍द है। हालाँकि अभी सफाई कर्मचारी हैं, वह इनका खयाल रखते हैं।”

यह स्कूल, आसपास के इलाके में इस बात के लिए भी चर्चा में है कि यहाँ पिछले 6 सालों 6 छात्र-छात्राओं नवोदय विद्यालय में चयन हो चुका है। और सबसे सुखद बात यह है की ये सभी आदिवासी बच्चे हैं इन 6 में से 4 लड़कियाँ हैं और 2 लड़के हैं। वहीं उन 4 लड़कियों में से एक कमार आदिवासी लड़की भी है। यह निश्चत तौर पर एक अलग तरह की उपलब्धि है।

वह सभी नवोदय स्कूल के प्रवेश परीक्षा के लिए तैयारी भी कर रहे हैं। जिन बच्‍चों का नवोदय में प्रवेश हो गया है वे दिवाली की छुट्टी में गाँव आते हैं, तो दूसरे बच्‍चों की तैयारी में मदद करते हैं।

होरीलाल जी की एक कक्षा में बच्‍चे माप पढ़ने के लिए लीटर आदि के माप से करके देख रहे थे। इस प्राथमिक शाला में अभी 27 विद्यार्थी हैं,जिनमें 13 छात्र और 14 छात्राएँ हैं।


पुरुषोत्‍तम सिंह ठाकुर, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, धमतरी, छत्‍तीसगढ़ द्वारा भेजे गए आलेख पर आधारित।

टिप्पणियाँ

ramkishor का छायाचित्र

very nice

pramodkumar का छायाचित्र

प्रेरक प्रयास

pramodkumar का छायाचित्र

अन्नघट योजना समाज द्वारा स्कूल के सहयोग करने का अपने तरह का अभिनव प्रयास है। प्रतिदिन थोडा थोडा संग्रह करते रहने से माह में एक बडी राशि तैयार हो जाती हे। सच में‚ अद्भुत है। गांव का स्कूल के प्रति अपनापन स्तुत्य है।सभीको बधाई

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