किसी 'खास' की जानकारी भेजें। टोंक के गॉंव बरोनी बस्‍ती हरडा में कुछ तो बदला है..

लोहित कुमार जोशी

मैं पिछले तीन वर्षों से अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के जिला संस्थान टोंक में कार्य कर रहा हूँ। संस्थान टोंक जिले में पिछले दस वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण  विकास से जुड़े विभिन्न कार्यों को संचालित कर रहा है। इसी क्रम में मैंने टोंक ब्लॉक के गाँव बरोनी के राजकीय प्राथमिक विद्यालय, हरडा बस्ती स्कूल का दो बार अवलोकन किया है। यह स्कूल टोंक शहर से लगभग 23 किलोमीटर दूर है।इस स्कूल में हो रहे विशेष प्रयासों के परिणामों को देखने के बाद, उनको और गहराई से समझने के उद्देश्‍य से स्कूल के शिक्षक नरेन्द्र कुमार गौतम से बातचीत की ।

स्कूल में इस वर्ष (2013-14) में 44 बच्चे नामांकित हैं और दो शिक्षक कार्यरत हैं। स्कूल भवन की चारदिवारी है, गेट है, चार कमरे हैं, एक रसोई घर है, स्कूल में ही एक हैण्डपम्प है।

पूरे गाँव की स्थिति को देखा जाए तो कक्षा एक से आठ तक पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगभग 300 और कक्षा पाँच तक पढ़ने वाले बच्चे लगभग इसके आधे। गाँव में दो स्कूल सरकारी (एक प्राइमरी और सैकण्डरी स्कूल) दो प्राईवेट स्कूल कक्षा आठ तक ।

नरेन्द्र गौतम ने बताया कि वह बरोनी गाँव के रहने वाले हैं और इस स्कूल के दूसरे शिक्षक प्रकाश हरडा बस्ती के ही रहने वाले हैं। इस स्कूल की स्थापना वर्ष 2001 में राजीव गाँधी स्कूल के रूप में हुई। तीस बच्चों ने इस स्कूल में दाखिला लिया और शिक्षक (प्रबोधक/पैरा टीचर) के रूप में सर्व प्रथम प्रकाश जी ने इसकी जिम्मेदारी सम्‍भाली। मैं भी इस स्कूल से शिक्षक (प्रबोधक/पैरा टीचर) के रूप में वर्ष 2003 में जुड़ा। हम दोनों एक-दूसरे को बचपन से ही जानते हैं और एक अच्छे दोस्त हैं। मैंने कक्षा पाँच तक की पढ़ाई बरोनी के राजकीय प्राथमिक विद्यालय से ही की और कक्षा छह से आठ तक की पढ़ाई गाँव से कुछ किलोमीटर दूर के एक स्कूल से की। इसके बाद मैंने 9 से 14 तक की पढ़ाई जयपुर में की। 2003 में स्कूल में आने से पहले में गाँव की वाटरशेड कमेटी में सेकेट्ररी था।

नरेन्द्र से मैंने जानना चाहा कि इस स्कूल के बनने और अभी तक इसमें हुए काम और उससे भविष्य में बच्चों को होने वाले लाभ की क्या सम्‍भावनाएँ हैं ?

इस सवाल पर उन्होंने कहा कि यह बहुत ही भारी-भरकम सवाल है। बात, स्कूल की स्थापना की है ? शिक्षकों की जवाबदेही की है ? और सरकारी स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के भविष्य की है ? उन्होंने बताया कि बरोनी गाँव में कुल 300 घर और लगभग 2300 की जनसंख्या है। वर्ष 2000 तक यहाँ एक ही सरकारी स्कूल था और एक प्राईवेट स्कूल। सरकारी स्कूल में गाँव के बच्चों के अलावा आसपास की छोटी-छोटी ढ़ाणियों और बस्तियों के बच्चे भी आते थे। हरडा बस्ती, जो गाँव से लगभग 2 से 3 किलोमीटर दूर है, तब इस बस्ती में 35 घर और लगभग 300 की जनसंख्या थी। वर्ष 2000 में इस बस्ती के लोगों ने बच्चों को दूरी के कारण स्कूल में भेजना बन्द कर दिया।

2001 में इस बस्ती में इस स्कूल की स्थापना राजीव गाँधी स्कूल के रूप में हुई। प्रारम्भ में यह एक किराए के कमरे में चलाया गया। कमरे में स्कूल की सामग्रियों (जो नाम मात्र हुआ करती थीं) को रखा जाता था, और उसके बाहर के खेत (खाली स्थान) में पेड़ों के नीचे बच्चों को पढ़ाया जाता था। दूसरे साल आसपास की और छोटी ढ़ाणियों के बच्चों ने इस स्कूल में दाखिला लिया और बच्चों का नामांकन 84 तक पहुँच गया। आज बरोनी गाँव से भी लगभग 10 बच्चे आ रहे है। इस स्कूल की स्थापना से पहले और स्थापना के बाद भी मेरी प्रकाश चन्द जी से स्कूल को लेकर बातें हुआ करती थी। हम तब बातें किया करते थे कि बच्चों को पढ़ना आना चाहिए ? उनके साथ अच्छे से मेहनत की जानी चाहिए ? क्योंकि हम यह खूब जानते थे कि अभिभावक तो अशिक्षित हैं और मजदूरी के जुगाड़ के कारण बच्चों का सहयोग नहीं कर पाते हैं, लेकिन बड़ी विडम्बना यह है कि अधिकतर शिक्षक भी बच्चों के साथ उतनी मेहनत नहीं करते हैं, जितनी उन्हें करनी चाहिए।

वर्ष 2005 में पंचायत द्वारा बस्ती की दूसरी ओर सड़क के पार स्कूल के लिए जमीन दी गई और सर्व शिक्षा अभियान द्वारा स्कूल भवन का निर्माण करवाया गया।

हमने सबसे पहले राजीव गाँधी स्कूल के शिक्षकों को योजना के तहत दिए जाने वाले 45 दिन के प्रशिक्षणों में सीखी विविध गतिविधियों का प्रयोग बच्चों के साथ करने की योजना बनाई। कक्षा कक्ष में बच्चों के साथ विभिन्न विषयों का शिक्षण करवाते समय उनका प्रयोग किया जाने लगा। इसके अलावा हमने प्रार्थना सभा को बच्चों के साथ अच्छे से बात करने का माध्यम बनाया। इसमें हमने समय की कोई बाध्यता नहीं रखी। सभा में हमने प्रार्थना आदि के अलावा बच्चों से सभी तरह की बातें और संवाद करना प्रारम्‍भ किया, जो आज तक जारी है।

स्कूल में शैक्षणिक माहौल को बेहतर बनाए रखने के लिए प्रतिदिन की शैक्षिक योजना में बच्चों की भागीदारी को स्थान दिया गया। इसके तहत बच्चों से चर्चा करने पर लगता है कि वह आज (किसी भी खास दिन) पढ़ने के बजाए कुछ और करना चाहते हैं, तो उनके साथ कुछ अलग तरह की गतिविधियाँ की जाती हैं। जैसे कुछ उदाहरण - गीत, कविताएँ, नृत्य, मिट्टी के खिलौने व मॉडल बनाना, खेल-खेलना आदि।

उन्होंने इस चर्चा के अन्त में स्कूल के कुछ खास बिन्दु और चुनौतियों को भी बताया -

उपलब्धियाँ - 

  • कक्षा दो के बच्चे सहजता से सभी विषय की किताबें पढ़ लेते हैं। उन्हें 15 तक पहाड़े आते हैं। कक्षा पाँच के बच्चे 30 तक पहाड़े जानते है।
  • बच्चे सभी से खुलकर बात करते हैं। अपनी बातें बिना झिझके अध्यापक से कहते हैं।
  • बस्ती की लड़कियाँ सीनियर तक पढ़ने जाने लगी हैं। बस्ती की एक लड़की ममता साहू इस वर्ष जयपुर में ग्रेजुएशन कर रही है।
  • स्कूल की एस.एम.सी. ही स्कूल विकास के सारे काम करती है। इसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बेहद सक्रिय व्यक्ति हैं।
  • समुदाय से अध्यापकों द्वारा सतत सम्पर्क किया जाता है।

चुनौतियाँ -

  • लगभग प्रारम्भ से दो ही शिक्षक हैं।
  • एक शिक्षक को तो अधिकतर समय प्रशासनिक कामों में लगे रहना पड़ता है। चूँकि हम दोनों एक-दूसरे को अच्छे से जानते हैं, गाँव के ही रहने वाले हैं, स्कूल की सारी योजना मिलकर बनाते हैं, गाँव की स्थिति को भली-भाँति समझते हैं। वरना जो थोड़ी बहुत सफलता प्राप्त की है, उसमें और अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता।

शिक्षक अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार प्रयास कर रहे हैं...बदलाव आ रहा है भले ही धीरे-धीरे ही सही।


 

लोहित कुमार जोशी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,जिला संस्‍थान,टोंक, राजस्‍थान

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