किसी 'खास' की जानकारी भेजें। झाबुआ के पेटलावाद की 'बुनियादी शाला'

सिद्धार्थ कुमार जैन 

रायपुरिया के नजदीक एक गाँव बसा है- सम्पर्क ग्राम। इस ग्राम में सन् 1987 में सम्पर्क संस्था की वैचारिक नींव रखी गई। शुरुआत में संस्था के व्यक्तियों ने झाबुआ में सायकल पर घूमकर ग्रामीणों की दिक्कतों को समझा। यहाँ पीने के पानी से लेकर खेती के तक के लिए पानी की समस्या थी। वाटरशेड प्रोजेक्ट के तहत गाँवों में स्टॉपडेम, नदी तथा पानी संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर प्रबन्‍धन किए। निलेश देसाई को लगा कि पानी के माध्यम से गाँववालों के साथ मिलकर काम करना सम्‍भव हो सकता है। उनके साथ काम करना शुरू किया। फिर गाँव स्तर पर समितियाँ और समूहों का गठन की प्रक्रिया से धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। चर्चाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दे उभर कर सामने आने लगे।

गाँधी जी ने कभी भी अक्षर ज्ञान को शिक्षा नहीं माना। वे हमेशा कहते थे कि शिक्षा वह प्रक्रिया है, जो मनुष्य के जीवन में सतत चलती रहती है। जीवन की कठिन परिस्थितियों में उत्पादक काम मनुष्य का सबसे बड़ा शिक्षक होता है, जिससे न केवल ज्ञानार्जन होता है, बल्कि मनुष्य की क्षमता और मूल्यों का विकास भी होता है। झाबुआ जिले के पेटलावद तहसील में सम्पर्क संस्था ,द्वारा चलाई जा रही बुनियादी शाला में गाँधी प्रणीत शिक्षा-दर्शन की बानगी देखने को मिलती है। यहाँ  वास्तविक शिक्षा के मायने क्या हैं और शिक्षा का दैनंदिन जीवन में क्या उपयोग है, जैसे विचारों को स्कूल-शिक्षण की प्रक्रियाओं से जोड़कर मूर्त रूप दिया जा रहा है। इस अनूठे प्रयोग को संचालित कर रहे हैं- झाबुआ जिले की पेटलावाद तहसील में सामाजिक कार्य कर रहे निलेश देसाई और उनकी पत्नी प्रक्षाली देसाई।

प्रक्षाली बताती हैं कि मैं अपने दादा-दादी और नाना-नानी की प्रेरणा से समाजसेवा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित हुई। उन्हें गाँधी-विनोबा-जयप्रकाश के विचारों से सम्पन्न परिवार के सान्निध्य में रहने का सौभाग्य मिला और उसके आधार पर शिक्षा के जरिये गाँधी विचारों को मूर्तरूप देने की कोशिश कर रही हैं। सन् 1988 में हम लोगों की शादी हुई। मैंने निलेश के साथ महिला स्वास्थ्य के मुद्दे पर महिलाओं के बीच काम करना आरम्‍भ किया। सूरत में एम.एस.सी., बी.एड. करके मैं झाबुआ पहुँची थी। मेरा रहन-सहन और कपड़े पहनने का तरीका आदिवासी समाज की महिलाओं से भिन्न था। मैं उस वक्त जींस पेंट-शर्ट पहनती थी। उनकी भाषा को भी नहीं जानती थी। शुरूआत में कुछ समस्याएँ हुई, लेकिन डटी रही तथा अपने स्तर पर रहन-सहन, बोलचाल में बदलाव लाया तथा धीरे-धीरे बारेली भाषा/बोली को बोलने-समझने लगी। फिर नुक्कड़ नाटक और कठपुतली शो के माध्यम से कई जागरूकता कार्यक्रम किए। सन् 1990 में संस्था ने सोलर लैम्प के असेम्बलिंग का काम शुरू किया। एक आदिवासी कार्यकर्त्ता मन्नुसिंह, जो पाँचवीं पास था, को तिलोनिया (राजस्थान) भेजा, वहाँ उसने टार्च, मोटरवाइडिंग के साथ सोलर उपकरणों को सुधारने का काम सीखा।

शिक्षा के क्षेत्र में काम करते-करते थोड़ी समझ बनने लगी थी। इसी अनुभवों के आधार पर कुछ गाँवों में रात्रिकालीन स्कूल आरम्‍भ किए। गाँव स्तर पर पढ़ाने वाले व्यक्तियों का अभाव था। पाँचवीं पास भी बहुत मुश्किल से मिल पाते थे। थोड़े बहुत लिखे-पढ़े लोगों को ढूँढा और उनको 20 दिन का प्रशिक्षण दिया। इस रात्रिकालीन स्कूल में वे बच्चे पढ़ने आते थे, जो दिन में ढोर चराने जाते थे। प्रशिक्षण मॉडयूल तैयार करते-करते हमारी समझ भी पुख्ता होती गई। इन स्कूलों में कक्षा पहली से पाँचवीं तक गणित और भाषा के कौशलों पर काम किया। फिर इन्हें मुख्यधारा के स्कूलों से जोड़ा गया। इसे लगभग चार साल तक चलाया। इसके बाद सन् 1994 से 96 तक सर्व शिक्षा अभियान में नामांकन अभियान के दौरान सहभागिता रही तथा सैंकड़ों बच्चों को नामांकन कराने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

रात्रिकालीन स्कूलों की अब क्या स्थिति है? सवाल के उत्तर में प्रक्षाली कहती हैं कि अब ये स्कूल कोचिंग सेंटर में तब्दील हो गए हैं। यहाँ बच्चे आते हैं और उनके लिखने-पढ़ने के कौशल पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। वे दुःखी मन से कहती है कि पिछले 60 वर्षां में शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से दी जानी चाहिए थी, इसकी वकालत सबने की है, लेकिन इसका फालोअप नहीं हुआ। आदिवासी बच्चों की समस्या है कि वे भाषा ही नहीं पहचान पाते हैं, उनके लिए हिन्‍दी आज भी चुनौती है।

वे बताती है कि संस्था के कार्यों का विस्तार 320 गाँवों में हो चुका था। इन गाँवों में स्कूली शिक्षा की स्थिति का जायजा लिया और सबसे कमजोर स्कूलों को चिन्हित किया गया। इसमें से 50 शालाओं का चयन किया, जो कक्षा 1 से 5 वीं के स्तर की थीं। इन स्कूलों में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से ‘शाला मित्र’ रखे गए। यहाँ पर गणित और भाषा के सन्‍दर्भ में लिखने-पढ़ने की शिक्षण प्रक्रियाओं को बेहतर करने का अभिक्रम चलाया। स्कूल के पहले दो घण्‍टे उन्हें अलग से शिक्षण कार्य कराया जाता था। प्रार्थना सत्र को भी मजबूत किया। राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत के अलावा भाषा में कविता/कहानी कहने की कला पर ध्यान दिया। दादा-दादी, नाना-नानी जिस प्रकार कहानी सुनाते थे, वैसा ही कहानी सुनाने के लिए शिक्षकों को तैयार किया। शुरूआती दौर में शिक्षण साधनों का अभाव था, इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर उपलब्ध साधनों का उपयोग किया। हमने बच्चों के शिक्षण के लिए कभी मिट्टी पर तो कभी भैंसों पर लिखकर भी अध्यापन का प्रयास किया।

वे बताती हैं कि हमने इस क्षेत्र के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का भी प्रयास किया था, पेटलावद की 5 शालाओं का सर्वे किया तथा यहाँ भाषा, गिनने की प्रक्रियाओं आदि को समृद्ध करने की कोशिश की। गणित का पाठ्यक्रम तैयार किया, जिसमें परम्परागत खेलों के जरिये- अष्ट चंग पे, पासे आदि बनाकर- घटाव-जोड़-गुणा-भाग की अवधारणाओं आदि को समझाने की कोशिशें की। इसी प्रकार विज्ञान शिक्षण केन्‍द्र को भी विकसित किया। ग्रामीण इलाके में बच्चों को विज्ञान की अवधारणाओं के मॉडल्स और प्रयोगों के माध्यम से समझ विकसित करने का एक बेहतरीन प्रयास लगा। शासकीय स्कूल में इस प्रकार की प्रयोगशाला न होने से अन्य स्कूल के बच्चे यहाँ आते और विज्ञान को समझने की कोशिश करते। संस्था व्दारा ब्रिज कोर्स का भी संचालन किया, जिसमें 6 से 14 साल के स्कूल ड्रापआउट बच्चों का पंजीयन कराया।

वे बताती है कि पिछले कुछ साल शिक्षा के क्षेत्र में सतत जुड़ाव के कारण गांववालों की ओर से माँग की गई कि एक स्कूल शुरू किया जाना चाहिए। हमें भी महसूस हुआ कि शिक्षण की प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से संचालित करने के लिए एक स्कूल चलाया जाना चाहिए तथा अन्य स्कूलों की शिक्षण प्रक्रियाओं से भिन्न हो। गाँधी जी द्वारा प्रणीत बुनियादी शिक्षा के सिद्धान्‍त से अभिप्रेरित होकर आदिवासी समुदाय के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। सम्पर्क ग्राम में संचालित इस विद्यालय का नाम भी कार्य के अनुरूप रखा- ‘बुनियादी शाला’। बुनियादी शाला की शुरुआत 2004 में हुई ।

इस विद्यालय में बच्चों को पाठ्य पुस्तकों से निकालकर बाहरी दुनिया की व्यावहारिक समझ पैदा करने की कोशिश की जा रही है। कार्य केन्द्रित शिक्षा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायक होती है और समाज के लिए एक उपयोगी व्यक्तित्व का निर्माण करती है। प्रक्षाली देसाई बताती हैं कि शाला में सिर्फ झाबुआ के ही आदिवासी बच्चे नहीं आते बल्कि आस-पड़ोस के जिलों के बच्चे भी आते हैं। फिलहाल स्कूल में लगभग 200 बच्चे अध्ययन करते है। बुनियादी शाला आवासीय विद्यालय है, यहाँ बच्चों के पढ़ने से लेकर रहने और खाने की व्यवस्था भी विद्यालय प्रशासन ही सम्‍भालता है।

8 वीं पास करके निकले बच्‍चों की शासकीय स्कूलों में पढ़ाई जारी हैं। अधिकांश बच्चे नवोदय विद्यालय में अध्ययनरत हैं, जहाँ उन्हें आसानी से प्रवेश मिल पाता है। बच्चे अनुशासन, ईमानदारी, परिश्रम, सफाई, आत्मनिर्भरता के मामले में अलग होने से उन्होंने क्षेत्र में हलचल पैदा की है।

तोड़ी मान्यता और दिया आर्थिक संबल

बच्चे यहाँ पढ़ाई के अलावा दैनिक जीवन से जुड़ी हर जरूरत की चीजों को सीखते हैं ताकि शहरी सुविधाओं की चकाचौंध से दूर आदिवासी गाँवों में रहने वाले इन बच्चों को किसी तरह की कोई कमी न खले। बुनियादी शाला में बच्चों को बिजली के उपकरणों की मरम्मत, कताई-बुनाई, पेंटिंग इत्यादि जैसी रचनात्मक चीजें सिखाई जाती हैं।

बच्चे अपनी रुचि अनुसार अलग-अलग प्रकार के कौशल सीख सकें, इसकी व्यवस्था यहाँ की गई है। रोजाना बच्चों को आकर्षक मोमबत्ती बनाने, मिट्टी की मूर्तियाँ बनाने, गुड़िया बनाने, जैविक कीटनाशक, मंजन बनाने आदि जैसे कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है। उल्लेखनीय बात यह है कि यहाँ बच्चों को बाल काटने की कला में भी निपुण किया है। कौशलों के द्वारा शिक्षण प्रक्रियाओं को मजबूती देने का काम भी साथ-साथ किया जा रहा है। प्रक्षाली के मुताबिक उनकी शाला के बच्चे एक-दूसरे के बाल स्वयं काटते हैं। वे बताती हैं कि इस काम की शुरुआत रोचक तरीके से हुई। दरअसल इलाके के नाई इन आदिवासी बच्चों के बाल नहीं काटते थे। इसके पीछे नाईयों का तर्क गंदगी का रहता था। जब यह बात हमारी जानकारी में आई तो हमने इसका बीड़ा उठा लिया और बच्चों को अब नाईयों पर आश्रित नहीं रहना पड़ रहा है। उनका यह प्रयास रूढ़िवादी सोच को भी तोड़ता है। ऐसा माना जाता है कि शनिवार के दिन बाल नहीं काटने चाहिए पर बुनियादी शाला में बाल काटने के लिए शनिवार का दिन ही निश्चित है और बच्चे बड़ी मस्ती से शनिवार के दिन बाल कटाते और कटवाते हैं।

प्रक्षाली बताती हैं कि वे बुनियादी शिक्षा को चरखे से बाहर निकलकर अब कम्प्यूटर, आर्गेनिक खेती, खेत से रसोई तक के परम्परागत व्यंजन, भाजी को वापस लाने का प्रयास कर रही हैं। वे आगे कहती हैं कि समय और व्यवस्था के आधार पर कुछ नए-नए पाठ्यक्रमों को भी जोड़ने की पहल होती रही है। इसमें इलेक्ट्रिक सुधार का पाठ्यक्रम, साफ सफाई-स्वच्छता पाठ्यक्रम भी तैयार किए हैं। वे बताती हैं कि कक्षा 1 से 3 री के बच्चों को मिट्टी से अक्षर, खिलौने बनाने की प्रक्रिया से जोड़ा है साथ ही ओरोगामी से विविध प्रकार की आकृतियों से परिचित कराया जाता है। कक्षा 6-7-8 वीं के बच्चे वाटर हार्वेस्टिंग, कचरा प्रबन्‍धन, बायो गैस आदि की प्रक्रियाएँ कैसे संचालित होती है तथा इनका रखरखाव किस प्रकार किया जाता है, इसका जिम्मा  सम्‍भालते है। बुनियादी शाला कचरा शून्य संस्थान है, जहाँ हर प्रकार का कचरा चाहे वह खेती का कचरा हो, प्लास्टिक वेस्ट हो-नाडेप कम्पोस्ट और रिसायकल कर इसका उपयोग किया जाता है।

हर साल 2 से 8 अक्टूबर तक गाँधी हाट का आयोजन किया जाता है, जहाँ बच्चों द्वारा तैयार की गई सामग्री को बिक्री के लिए रखा जाता है। बच्चे इस हाट की व्यवस्था को देखते हैं तथा वे व्यवसाय, विपणन-प्रबन्‍धन की प्रक्रियाओं को गहराई से समझने का प्रयास करते है। गाँधी हाट के दौरान भीली में ’’गाँधी कथा’’ का भी आयोजन किया जाता है।

बच्चों की है अपनी संसद और स्वास्थ्य विभाग

राजनीति विज्ञान की प्रक्रियाओं को किताबों से बाहर निकालकर बच्चों को व्यावहारिक तरीके से नागरिक शास्त्र, इतिहास, भूगोल जैसे विषयों को जोड़ा जा रहा है। बच्चे इन विषयों को मजे के साथ लिख-पढ़कर अपनी समझ को पुख्ता कर रहे हैं। यह साफ है कि समझ बनाने के लिए कामों को करके देखने की आवश्‍यकता होती है। बुनियादी शाला में बच्चों की अपनी एक संसद है। इस संसद में कई विभाग होते हैं। सभी विभाग बाकायदा अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। यदि कोई विभाग अपना काम ठीक से नहीं करता तो संसद में उस पर बहस होती है और आगामी कार्रवाई के लिए उसकी रिपोर्ट शाला की प्रधानाध्यापिका को भेजी जाती है। शाला के छात्र-छात्राएँ अपने स्वास्थ्य की प्राथमिक जिम्मेदारी स्वयं संभालते हैं। वे मरहम-पट्टी के साथ-साथ छोटी-मोटी बीमारियों की दवाईयाँ भी स्वयं ही देते हैं।

साइंस सेन्‍टर है बेमिसाल

शाला में एक बहुत ही उम्दा साइंस सेन्‍टर स्थापित किया गया है, जहाँ ‘आओ करके सीखें’ की तर्ज पर विज्ञान विषय की बारीकियों से रू-ब-रू कराने के लिए मॉडल रखे गए हैं। जिनके सहयोग से बच्चों को उसकी कार्य प्रणाली समझाई जाती है। साइंस सेन्‍टर में बच्चों को अपने शरीर के अवयवों की भी पूरी जानकारी दी जाती है। वैज्ञानिकों के चित्रों और जानकारी से भरापूरा, सजा-संवारा साइंस सेन्‍टर वाकई अद्भुत है।

स्कूल के एक बड़े हॉल में विविध प्रकार के विज्ञान शिक्षण के मॉडलों का प्रदर्शन बच्चे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में मददगार हो रहा है। प्राथमिक स्तर पर इन कौशलों को विकसित करने के लिये कक्षागत प्रक्रियाओं में जगह दी गई है, जिससे बच्चों को अवलोकन, खोजबीन, रिपोर्टिंग, विश्‍लेषण करना, समस्या के कारण समझ पाना, प्रयोग कर पाना, निष्कर्ष निकालना, प्रस्तुतिकरण, सवाल करने आदि जैसे कई कौशलों सीखने में मदद मिलती है।

कला-संस्कृति से परिचय

पिछले एक दशक में स्कूली शिक्षा को लेकर अनेक प्रयोग किए हैं। कालिदास अकादमी, उज्जैन के सहयोग से भीली में बच्चों का नाटक तैयार करने में मदद मिली। स्कूल परिसर में कालिदास नाट्य परिसर बनाया गया है, जहाँ बच्चे मिलकर सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन करते हैं। दूसरा प्रयोग ’पढ़ाई के गीत’ भीली भाषा में तैयार किए हैं, जिन्हें संस्थान से जुड़े साथियों ने आवाज देकर एक कैसेट का रूप दिया है। प्रक्षाली हिन्‍दी और गुजराती में लिखती रहती हैं और वे अच्छी पेटिंग्स भी करती हैं। उन्होंने तीसरा प्रयोग- भीली कहावतों का संकलन का किया है तथा इसे हिन्‍दी में अनुवाद कर एक पुस्तिका ’बा नी बात’  तैयार की है। बच्चे इस पुस्तक को पढ़कर भीली और हिन्‍दी के बीच के भेद को समझ पाते हैं तथा उनकी पढ़ने की गति तेज हुई है।

शुरुआती दौर था चुनौती भरा

शुरूआती दौर में बच्चे कम थे और जब संस्‍था के साथी लोगों से अपने बच्चों को शाला में भेजने के लिए कहते तो वे बोलते थे कि बच्चे आपके यहाँ पढ़ाई करेंगे तो पिछड़ जाएँगे। लेकिन समय के साथ लोगों की धारणा बदली और आज प्रवेश के समय यहाँ लाइन लग जाती है। स्कूल से निकलने के बाद बच्चे स्वाभाविक रूप से माता-पिता के साथ घरेलू कामों में सहयोग करते हैं, चाहे कार्य कृषि से सम्‍बन्धित हो या अन्य बाहर के काम। अधिकांश युवा झाबुआ से कोटा या सूरत काम करने के लिए जाते है, जहाँ भवन निर्माण के काम में जुटकर अपनी आजीविका का निर्वाह करते है। इनमें अधिकांश के पास कृषि योग्य भूमि भी है।

आधुनिकता और विकास के इस दौर का असर जनजातीय समाज पर भी बहुत हुआ है। ऐसे में आदिवासी समुदाय में किस प्रकार के बदलाव देखने को मिलते है? प्रश्‍न  के जवाब में वे प्रक्षाली कहती हैं कि भील समाज में अब आपसी सहयोग-समन्वय का भाव समाप्त होता जा रहा है, उनकी कुछ ऐसी परम्पराएँ और रीति-रिवाज गायब होते जा रहे हैं, जो साझा जीवन प्रणाली और आपसी सहयोग के आधार स्तम्‍भ थे। हम उनको पुनर्स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत हैं।

वे बताती है कि यहाँ आदिवासी समाज में कुछ ऐसे रिवाज प्रचलित थे, जो एक- दूसरे की मदद करने पर आधारित थे। इस रिवाज को ’’अड़जी-पड़जी’’ के नाम से जाना जाता है। यानी काम के बदले काम, मेहनत के बदले मेहनत, विशेषकर खेती से सम्‍बन्धित कार्यों में एक-दूसरे को निःशुल्क मदद करना। एक-दूसरे को सहयोग करते हुए अपने सभी काम जैसे- फसल की बुवाई, फसल कटाई, निंदाई-गुड़ाई, खेतों की जुताई, मेड़बंदी, घास कटाई, कुआँ खोदना, घर बनाना तथा कई तरह के कार्यों में श्रम के स्तर पर सहयोग किया जाता था।

समय के परिवर्तन के साथ जब जनजातीय समाज ने अपनी पुरातन परम्परा को छोड़कर आधुनिक जीवन शैली को अपनाया तो इसकी वजह से आपसी सहयोगी रिश्ते भी खत्म होने लगे। लोगों में स्वार्थ बढ़ा, सहयोग की भावना खत्म हुई, मुद्रा का जोर बढ़ा और पिछले कुछ दशकों में अड़जी-पड़जी परम्परा टूट गई। इसके कारण अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक स्थिति के लोग खेती तथा अन्य काम मजदूर बुलवाकर कर लिया करते हैं, जबकि गरीब लोग पिछड़ने लगे हैं। पेटलावद के लगभग 95 गाँवों में संस्था के प्रयास से हालात बदल रहे हैं। इन गाँवों में अड़जी-पड़जी की प्रथा को फिर से जिन्‍दा किया है। 

वे कहती है कि गाँवों में ’उबंटू’ की भावना अभी भी जिंदा है। वे एक किस्सा बताती है कि हम लोग वार्षिक उत्सव में खेल की स्पर्धा भी कराते हैं। मुझे कक्षा 3 री के बच्चों का एक वाकया याद आता है। 3 री के बच्चों को दौड़ स्पर्धा के लिए खड़ा किया गया और 100 मीटर की दौड़ शुरू की। सब बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर साथ-साथ दौड़े। बच्चों में किसी प्रकार का स्पर्धा का भाव नहीं था। ये बच्चों की समानता के भाव को दर्षाता है।

पूरी पृथ्वी में परिवेश के कारण परिवर्तन आ रहा है। गाँधी विचार को देखा-समझा जा रहा है। हम लोग गाँधी के समाज की रचना की बातें करते है तो क्या गाँधी जी  की नई तालीम के बारे में सोचना जरूरी नहीं होगा? दूसरी ओर हम लोग गाँवों में काम करना चाहते है, लेकिन गाँव वाले चाहते क्या हैं? तब हम कहाँ टिक पाएँगे?

वे कहती हैं कि गाँधी विचार को शिक्षा के जरिये बच्चों तक ले जाने का प्रयास है-उनके ही तरीके से। गाँधी विचार की पूँछ पकड़ी है तो भी मन में संतोष है। मेरे पास विद्वतापूर्ण सोच नहीं है, लेकिन जिन्‍दगी मिली है, पुरखों से कुछ विरासत में मिला है, तो प्रयास होगा कि नए-नए प्रयोगों से उसको फैलाया जाए। चुनौतियाँ कई है।


सिद्धार्थ कुमार जैन, अजी़म प्रेमजी फाउण्‍डेशन, भोपाल,मध्‍यप्रदेश में कार्यरत हैं।

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