किसी 'खास' की जानकारी भेजें। जादू वाले सर..

बल क्या है ?  प्रश्न पर एक बालक का उसके अध्यापक ने इस तरह से मजाक बनाया कि एक पल के लिए उसे विज्ञान विषय से नफरत होने लगी। आखिर वो क्या करता, उसे विज्ञान की परिभाषाएँ, शब्दावली और सिद्धान्‍त याद नहीं होते थे। वो तो बस अपने चारों ओर होने वाली घटनाओं में ही मन लगाता था। जब उन्हीं से सम्बन्धित प्रश्न अपने अध्यापक से पूछता कि ऐसा क्यों होता है, तो उसे कक्षा के सामने मूर्ख घोषित कर दिया जाता। एक बार को विज्ञान कहीं छूट ही जाता पर ’विज्ञान जैसा विषय मूर्खों के लिए नहीं होता है’ जैसे कथन ने उस बालक को आत्मबल दिया और उसने विज्ञान अध्यापक बनने का निश्चय किया।

आज वह बालक धीरेन्द्र खडायत अपने क्षेत्र में न सिर्फ विज्ञान का शिक्षक है बल्कि अपने क्षेत्र के बच्चो में “जादूगर सर” के नाम से भी प्रसिद्ध है। उसके पास खुद की बनाई ऐसी विज्ञान किट है जिससे वो बच्चों को जादू में छिपे विज्ञान को समझाता है और विज्ञान को एक मजेदार विषय बनाने में कार्यरत है। आसपास के अध्यापक ही नहीं बल्कि दूर-दराज के अध्यापक भी उससे टीएलएम बनाने की जानकारी, और अनुप्रयोग पर खुलकर बातें तो करते ही हैं साथ-साथ उसके द्वारा छेड़े गए अभियान, कि “हर विद्यालय के पास कबाड़ से जुगाड़ पर आधारित स्वनिर्मित प्रयोगशाला हो जो विज्ञान को एक मजेदार विषय बना सके” में भी सहयोग कर रहे हैं।

जी हाँ, वह बालक मैं ही हूँ। जिसे बच्चे आज जादूगर सर के नाम से बुलाते हैं। मेरी प्रारम्भिक शिक्षा उड़ामा गाँव में हुई, स्नातक विज्ञान में पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज से करने के बाद परास्नातक डी.एस.बी. कैम्‍पस, नैनीताल से किया और घर-परिवार के दबाव में आई.ए.एस. की कोचिंग में लग गया। लेकिन मेरा मन वहाँ नहीं लगा और तैयारी बीच में छोड़कर वर्ष 2012 में बी.टी.सी. की।

मैं विज्ञान के सिद्धान्‍तों और प्रयोगों को कैसे आसानी से समझा जाए पर बचपन से कार्य कर रहा था और इस प्रकार की सामग्री चाहे जहाँ मिल जाती उसे एकत्रित कर लेता। मुझे याद है कि विज्ञान के प्रयोगों के लिए इन्टरनेट या अन्य स्रोतों से प्राप्त सामान को जुटाना मेरे लिए बड़ा ही मुश्किल होता था। इसके लिए मुझे दिल्ली, हल्दवानी, देहरादून न जाने कहाँ-कहाँ जाना पड़ा। घरवालों के लिए ये बेकार का काम था और गाँव के लोगों के लिए मजाक का साधन। ऐसे में जब कोई मुझे साइंटिस्ट कहता तो मैं जानता था कि वो मेरा मजाक बना रहा है पर मैं कुछ न कह पाता था क्योंकि एक तो बेरोजगारी चरम पर थी, वहीं घरवाले भी खर्च देने में गुरेज करने लगे थे। फिर भी मैं आसपास के बच्चों के साथ विज्ञान के सरलतम प्रयोग करके उनके पीछे छिपी अवधारणाओं को समझाता रहा और बच्चे मजे से मेरा साथ देते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरे पास आसपास के विद्यालयों से ’विज्ञान मेला’ लगाने के आमंत्रण आने लगे। चूँकि अब तक मेरे पास 60 से ज्यादा वर्किंग मॉडल तैयार हो चुके थे तो इसमें मुझे कोई समस्या नहीं थी और यहाँ से एक मुहिम चल पड़ी। इन सब से क्षेत्र में मेरी एक सकारात्मक छवि बनने लगी थी।

मुझे याद है कि सर्वप्रथम मैंने विज्ञान मेला ‘वेदा पब्लिक स्कूल डीडीहाट (पिथोरागढ़)’ में लगाया। जहाँ बहुत से प्रयोगों जैसे जादुई बरसात, पिंजड़े में तोता, हाथ में छेद, खुले मुँह का गुब्बारा, मैग्नेटिक ट्रेन, ढक्कन से चिपकी गेंद, विद्युत चुम्बक, श्वसन तंत्र आदि, को देखकर बच्चे आश्चर्यचकित हो गए और जादू-जादू कह तालियाँ बजाने लगे, पर जब इनके पीछे छिपे विज्ञान पर चर्चा हुई तो सब कह उठे ये कितना आसान है। इसके बाद वहाँ के अध्यापकों के साथ इनको बनाने पर चर्चा की। वास्तव में वहाँ के प्रधानाचार्य श्री रविन्द्र जेठी जी के शब्द कि, “इतनी छोटी  उम्र और इतना बड़ा कार्य, धीरज विज्ञान ऐसे भी पढ़ाया जा सकता है, तुमने मेरी सोच बदल दी, आज भी मुझे प्रेरणा देते हैं।’ वहाँ से चला ये सफर कई स्कूल और अध्यापकों तक पहुँच चुका है अब तो बच्चे देखते ही ’जादू वाले सर’ के नाम से चिल्लाने लगते हैं।

2012 में बी.टी.सी. करने के पश्चात मैंने खूब विज्ञान मेले आयोजित किए। इसी बीच मुझे राजकीय प्राथमिक विद्यालय तोलिख्वा कोट, ब्लॉक कनालीछीना में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली और बच्चों के साथ, उनके परिवेश से जुड़ने का मौका मिला। इसी दौरान एक दिन मुझे डायट डीडीहाट से श्रीमती सुनीता पाण्डेय का फोन आया कि आपको मुख्य सन्दर्भदाता के प्रशिक्षण हेतु देहरादून जाना है। मैंने कहा, “मैडम मेरी उम्र तो बहुत कम है और इस क्षेत्र में अनुभव न के बराबर है, मैं कैसे कर पाऊँगा।” उनका जवाब सुन मैं भौंचक्का रह गया। वे बोलीं, “तुम्हारी पहचान उम्र से नहीं तुम्हारे काम से है। तुम्हारी इस कला को जिले के शिक्षकों के बीच पहुँचाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा, तैयार हो जाओ।”

देहरादून की ट्रेनिंग में विज्ञान के क्रियाकलाप के दौरान अपनी विज्ञान किट से बहुत से प्रयोग प्रदर्शित किए। मैं सभी से मिले पुनर्बलन से अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहा था कि तभी SCERT के साइंस को-ऑर्डिनेटर श्री एस.के.गौड़ मेरे पास आए और मेरे कन्धे पर हाथ रखकर बोले, “धीरज आज मैं आपका प्रशंसक हो गया हूँ।”

डायट डीडीहाट में मास्टर टेनर्स की ट्रेनिंग के दौरान मैंने यही प्रयोग दोहराए और इनको कैसे बनाएँ, कैसे प्रयोग करें व किस अध्याय के किस टॉपिक के साथ इनको जोड़कर उस टॉपिक को मजे से सिखाया जा सकता है, पर खुलकर चर्चा की। इससे प्रभावित होकर एक शिक्षक साथी श्री खोलिया जी बोले कि मैं अपनी चौदह साल की सर्विस में पहली बार एक जीवंत ट्रेनिंग करके जा रहा हूँ।

एक और घटना मुझे याद आती है कि एक दिन राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय आणाचौरा के प्रधानाचार्य श्री एल.डी.शर्मा जी ने फोन करके कहा कि हम अपने विद्यालय में कबाड़ से जुगाड़ पर आधरित स्वनिर्मित प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं इसके लिए आपके साथ की जरूरत है। इसके बाद हमने मिलकर इस विद्यालय में बहुत ही सुन्‍दर स्वनिर्मित, मितव्ययी प्रयोगशाला स्थापित की।

यहाँ से विद्यालयों में इस प्रकार की प्रयोगशालाएँ स्थापित कर अपने अध्यापक साथियों को प्रेरित करने का विचार आया और इस पर कार्य शुरू कर दिया और साथियों को विज्ञान में बच्चों की रुचि कैसे बने को लेकर चर्चाएँ शुरू कर दीं।

हमारे बच्चों का शरदोत्सव (डीडीहाट) में विज्ञान की कबाड़ से जुगाड़ प्रतियोगिता में प्रथम स्थान तथा सपनों की उड़ान कार्यक्रम में CRC (Cluster Resource Center) स्तर पर सात व BRC (Block Resource Center) स्तर पर तीन पुरुस्कार प्राप्त करने से लगता है कि हमारा प्रयास फलीभूत हो रहा है।

विद्यालय पहुँचने के लिए लगभग 3 किलोमीटर के जंगली और पैदल रास्ते को पार करते हुए एक दिन मेरा ध्यान बुरांश के बेकार पड़े फूलों पर गया। उस दिन मैंने सोचा कि क्यों न इससे अपने क्षेत्र के बेरोजगार युवाओं के लिए कुछ रोजगार तलाशा जाए। हमने स्कूल के प्रधानाध्यापक के साथ विचार-विमर्श के बाद इन युवाओं को बुरांश के फूलों से जूस बनाने और उसकी मार्केटिंग करने का प्रशिक्षण देने हेतु कार्यशाला का आयोजन किया। अब यह कार्यशाला हम अपने विद्यालय में प्रत्येक वर्ष आयोजित करते हैं जिसमें विद्यालय प्रधानाध्यापक श्री प्रकाश चंद्र उपाध्याय का सहयोग सराहनीय है।

आज भी मेरा ध्यान इस बात पर रहता है कि खेल-खेल में विज्ञान कैसे बेहतर पढ़ाया जा सकता है। इसके लिए कौन सी विधि आसान है। कैसे बच्चा अपने परिवेश में बिखरे ज्ञान को किताबी दुनिया के साथ जोड़कर बेहतर विकास की ओर बढ़ता है।

बातें तो यहीं खत्म हो जाती हैं मगर सीखने-सिखाने का यह क्रम कुछ नए प्रयोगों, नए बच्चों व नए विद्यालयों में स्वनिर्मित प्रयोगशालाएँ बनाने के साथ चलता रहेगा।

(डायट डीडीहाट में एमटी ट्रेनिंग के दौरान मेरी मुलाकात अजीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन पिथौरागढ़ के साथी श्रवण कुमार से हुई। उन्होंने उत्तराखण्ड के शिक्षक साथियों के प्रयासों का दस्तावेज ‘उम्मीद जगाते शिक्षक’ देते हुए मुझे अपने अनुभवों को लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। यह लेख उसी का नतीजा है।)


धीरज खडायत,सहायक अध्‍यापक, राजकीय प्राथमिक विद्यालय,तोलिखवा कोट,ब्‍लाक कनालीछिना, पिथौरागढ़ 

(अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, उत्‍तराखण्‍ड द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक -2  से साभार।)

 

टिप्पणियाँ

Navyabunker का छायाचित्र

सर
नमस्कार
आपके प्रयास विशेषकर ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले विद्यालयों जहाँ पर संसाधनों का आभाव है , बहुत ही उपयोगी है | इससे बालक विज्ञान को आसानी से आत्मसात कर सकता है |मैं भी विज्ञान का शिक्षक हूँ व राजस्थान के बाड़मेर जिले के ग्रामीण विद्यालय में कार्यरत हूँ | मैं भी अपने विद्यालय में कबाड़ से प्रयोगशाला बनाना चाहता हूँ | इसमें आपका मार्गदर्शन व सहयोग की अपेक्षा रखता हूँ| यदि आपके पास इससे सम्बंधित कोई वीडियो क्लिप हो तो कृपया शेयर करने का कष्ट करें |
धन्यवाद |

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