किसी 'खास' की जानकारी भेजें। जमीलउद्दीन शेख : भयमुक्त वातावरण में आनन्ददायी शिक्षण

राजकीय प्राथमिक विद्यालय शोप विद्यालय तहसील मुख्यालय से 13 कि0मी0 दूर ग्राम के बाहरी हिस्से में सड़क के बिल्कुल नजदीक ग्राम पंचायत से सटा हुआ है।यह गाँव सभी समुदायों का मिला जुला एक बाग है। यह गाँव गंगा जमनी संस्‍कृति का उदाहरण प्रस्तुत करता है। गाँव में एक अति प्राचीन मठ हिन्दू सभ्यता संस्कृति का परिचय देता है। वहीं गाँव के मध्य स्थित मस्जिद मुस्लिम संस्कृति से रूबरू कराती है। गाँव में अधिकतर कृषक एवं मजदूर तथा कुछ राजकीय सेवा में सेवारत लोग रहते हैं। यह लगभग 6000 की आबादी वाला गाँव है। इस विद्यालय के अलावा इसके सामने ही इसी से अलग हुआ राजकीय उच्च प्राथमिक बालिका विद्यालय है। एक उच्च माध्यमिक विद्यालय है। साथ ही दो माध्यमिक तथा एक उच्च प्राथमिक निजी विद्यालय हैं।

विद्यालय एक नजर में

शाला में 5 कक्षा-कक्ष हैं। रसोई घर, स्टोर कक्ष, प्रधानाध्यापक कक्ष संकुल सन्दर्भ कक्ष बना हुआ है। रेम्प, फिसलन पट्टी सभी उपलब्ध हैं। शाला के मध्य प्रांगण में  सीमेंट एवं गिट्टी से बना हुआ फर्श इस विद्यालय की सफाई में चार चाँद लगा देता है। पुस्तकालय में विभिन्न पुस्तकें हैं।

विद्यालय के कक्षा-कक्षों में शिक्षण सामग्री भरपूर मात्रा में बच्चों का ध्यान आकर्षित करने हेतु लगी हुई है। यह सफाई एवं साज सज्जा भी बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ाने एवं शाला में आने के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है।

शाला के प्रांगण में महिला सहकारी समिति द्वारा पोषाहार बनाया जाता है। यहीं से पंचायत के समस्त राजकीय विद्यालयों में पोषाहार वितरित किया जाता है। इस व्यवस्था से शिक्षकों का समय तो बचता ही है, कई सारे रिकोर्ड रखने एवं बनाने से का समय भी बचता है। शाला में जल व्यवस्था हेतु ग्राम पंचायत ने निशुल्क नल लगाया हुआ है। हेण्ड पम्प भी बच्चों की प्यास बुझाने एवं पोषाहार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

विद्यालय में मेरी भूमिका

मैं इस विद्यालय में मार्च 1999 में स्थानान्तरित होकर आया था। उस समय यहाँ पर 10 अध्यापक कार्यरत थे। अभी यहाँ पर 9 अध्यापक एवं अध्यापिकाएँ कार्यरत हैं। यह विद्यालय अपनी स्थापना के समय से ही वेतन केन्द्र रहा है। अभी भी यह विद्यालय नोडल विद्यालय है। मैं जब यहाँ आया उस समय मेरी भूमिका एक अध्यापक की थी। साथ ही मुझे परीक्षा का प्रभार सौंपा गया था। मैंने दोनों जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। धीरे-धीरे मुझसे वरिष्ठ लोग यहाँ से स्थानान्तरित होकर चले गए। केन्द्राध्यक्ष एवं नोडल का प्रभार मेरे कंधों पर आ गया। मैंने अपने शैक्षणिक दायित्वों के साथ नोडल का दायित्व भी निभाया एवं निभा रहा हूँ।

मेरी भूमिका शाला में एक परिवार के मुखिया की तरह है जिसे अपने परिवार के समस्त सदस्यों को साथ लेकर चलना होता है। उनकी आवश्यकताओं को समझने एवं पूरी करने का भी जिम्मा मुखिया का ही होता है। कार्यालय से चाही जाने वाली समस्त सूचनाओं को बनाना तथा पहुँचाने की जिम्मेदारी मैंने ले रखी है। अन्य अध्यापकों को बेहतर शिक्षण के लिए दायित्व मुक्त कर रखा है। परीक्षा प्रभारी की जिम्मेदारी मैं ही निभा रहा हूँ।

प्रयास के पहले की शैक्षणिक स्थिति

विद्यालय में पर्याप्त भवन एवं मानवीय संसाधन उपलब्ध होने से इस विद्यालय का शैक्षणिक स्तर संतोषजनक रहा है। फिर भी निजी विद्यालयों के खुलने से विद्यार्थी यहाँ से पलायन करने लगे। शिक्षण व्यवस्था ठीक होने पर भी अभिभावकों का झुकाव निजी विद्यालयों की तरफ होना एक चिन्ता का विषय था। साथ ही इस विद्यालय में अध्यनरत बालिकाओं के लिए अलग से बालिका प्राथमिक विद्यालय खुल गया। अधिकतर बालिकाएँ भी उस विद्यालय में चली गईं। धीरे-धीरे इस विद्यालय का नामांकन कम हो गया ।

मैंने व मेरे साथियों ने यह समझने का प्रयास किया कि हमारे विद्यालय में अधिक से अधिक बच्‍चों का नामांकन कैसे हो ? हमने अभिभावकों से सम्पर्क कर विद्यालय में बच्चों को भर्ती कराने का आग्रह किया। इस आग्रह के पीछे हमारे पास बहुत ठोस कारण थे-

  • शाला में बैठने हेतु खुले कक्षा-कक्ष
  • प्रशिक्षण प्राप्त दक्ष शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता
  • पाठ्यपुस्तकों का निशुल्‍क वितरण
  • मध्याह्न भोजन
  • निशुल्क बालिका शिक्षा
  • कक्षा 1 से 3 तक छात्र-छात्राओं का निशुल्क अध्ययन
  • कक्षा 4 व 5 में केवल छात्रों से नाममात्र का छात्र शुल्क
  • शाला की उत्कृष्ठ सफाई
  • पेयजल व्यवस्था व सुविधाओं का उपलब्ध होना
  • खेल संसाधनों की उपलब्धता

कई अभिभावकों ने कहा कि यह सब तो ठीक है, लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी नहीं होती। कईओं ने कहा कि आपको तो हर महिने मोटी पगार मिल जाती है बच्चे पढे़ं तो ठीक नही पढे़ं तो ठीक। ऐसी बातों को सुनकर बहुत तकलीफ होती थी।

हमने हार नहीं मानी और सम्पर्क जारी रखा तथा उनको यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि आप एक बार अपने बच्चों को हमारे स्कूल में भेजकर देखें। यदि बच्चा निरन्तर शाला में आएगा और नहीं सीखेगा तो फिर यह हमारी जिम्मेदारी होगी। हमारे इस आश्‍वासन से कई बच्‍चा शाला से जुडे़। इसी सत्र में लगभग 65 छात्रों का नामांकन बढ़ा है। हमें अपने स्कूल के अस्तित्व को बचाने तथा निजी शालाओं से प्रतिस्पर्धा होने से बहुत कुछ करने का अवसर मिला।

हमने शिक्षण व्यवस्था को और बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा। सर्वप्रथम तय किया कि शाला हर हाल में समय से पूर्व खुले एवं समय पश्चात बन्द हो। आज हमारा स्कूल गाँव ही नहीं, आसपास के क्षेत्र में समय पर खुलने एवं बन्द होने के लिए जाना जाता है।          

नामांकन के पश्चात बच्चों का शाला में ठहराव और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण हमारे अगले प्रयास थे। जो बच्चे किसी कारण वश शाला नहीं आते, उनके बारे में उनके पड़ोस में रहने वाले बच्‍चों से पूछते हैं। यदि बच्‍चा 2-3 दिन नहीं आता तो मैं स्वयं उनके घर जाकर उनको लाने का प्रयास करता हूँ। सभी बच्‍चों के अभिभावकों से मेरा सीधा सम्पर्क रहता है। यदि बच्चा स्कूल आने में आनाकानी करता है तो घर वाले यह कहते हैं कि स्कूल जाओ वरना अभी जमील जी बुलाने आ जाएँगे।

बच्‍चों के ठहराव के पश्चात ही हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की बात कर सकते हैं। जो बच्‍चे निरन्तर स्कूल आते हैं उनमें अपेक्षित सुधार देखने को मिलता है। कुछ बच्‍चे  जो स्लो लर्नर होते हैं उनमें वो अपेक्षित सुधार नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में  कामकाजी दिनों में भी उपस्थिति पर काफी प्रभाव पड़ता है। बच्चों को पशु चराने, रखवाली करने या फिर छोटे भाई-बहनों की देखरेख हेतु घर पर रोक लिया जाता है। बच्चे का एक बार स्कूल से जुड़ाव खत्म होने पर दुबारा उसी मन स्थिति से जुड़ना मुश्किल हो जाता है। यहीं से सीखने की क्रिया बाधित होती है। फिर भी हमारी यही कोशिश रहती है कि जो छात्र निरन्तर आ रहे हैं उन्हें शाला से रोजाना कुछ नया सीखने को मिले।

विद्यालय का वातावरण

शाला सफाई हेतु हमने एक महिला को मासिक शुल्क पर लगा रखा है। यह शुल्क हम छात्रों के अभिभावकों से छात्र शुल्क के अतिरिक्त 10 रू0 प्रति छात्र लेते हैं। यह प्रस्ताव हमने हमारी शाला प्रबन्धन समिति के द्वारा लिया हुआ है। जिसका पूरी तरह से हिसाब रखा जाता है। साफ सुथरे स्कूल में आते ही बच्चों का मन प्रसन्न हो जाता है। वह अपना बस्ता अपनी कक्षा में रखते हैं और कक्षा-कक्ष में लगी शिक्षण सामग्री को देखने व पढ़ने लगते हैं या फिर खेल में व्यस्त हो जाते हैं।

इसके पश्चात प्रार्थना सत्र में भी सहज भाव से सीखना सिखाना होता है। प्रतिज्ञा ,राष्ट्रगान आदि के पश्चात बच्चों से गिनती-पहाडे़ बुलवाए जाते हैं। अखबार की सुर्खियाँ पढ़कर सुनाई जाती हैं। बच्चों से दोहा वाचन करवाया जाता है। अर्थ व भावार्थ भी बच्चों से बताने के लिए कहा जाता है। बच्चों के नहीं बताने पर अध्यापकों में से कोई भी अर्थ और भावार्थ बता देता है। प्रार्थना सत्र में सामान्य ज्ञान से जुडे़ हुए प्रश्न भी पूछे जाते हैं। साथ ही अनुपस्थित बच्‍चों के बारे में  जानकारी ली जाती है। उन्हें बुलवाने के लिए पड़ोस के बच्चों को भेजा जाता है या मैं स्‍वयं जाकर उन्हें लाने का प्रयास करता हूँ। (उनके कुछ ऐसे यादगार प्रयासों के बारे में स्‍कूल चले संग लिंक पर पढ़ा जा सकता है।)

बालकों का सफाई से ड्रेस पहनकर आना, बरामदे के बाहर जूतों का पंक्तिबद्ध खोलना, कचरे पात्र का प्रयोग करना, शौच के बाद व खाने से पहले साबुन से हाथ धोना इत्यादि व्यवहारगत परिवर्तन साफ दिखाई देते हैं।

मध्यान्ह अवकाश में पोषाहार के समय अपने आप बर्तनों का धोना। खाते समय बिना किसी भेदभाव के किसी भी समुदाय के बच्‍चे का किसी भी बच्‍चे के साथ बैठकर खाना, मन को काफी तसल्ली देता है। कक्षा-कक्ष में बिना लिंग भेद के छात्र-छात्राओं का मिलकर बैठना भी अच्छा संकेत है।

शौचालय एवं मूत्रालयों का विद्यार्थियों द्वारा साफ करना भी शाला के प्रति उनका लगाव के भाव को दर्शाता है। लेकिन यह स्थिति अचानक नहीं बन गई है। शुरू में  तो बच्‍चों से मूत्रालय साफ करने के लिए कहते हुए भी डर लगता था कि यह बात घर जाकर अपने माता पिता को बताएँगे और उनमें से कुछ तो लड़ने ही आ जाएँगे। इसलिए प्रारम्भ में मैंने उनसे कहने की बजाय महिनों तक यह कार्य मैं खुद करता रहा। बाद में मेरे साथी भी मेरा सहयोग करने लगे। अन्तत छात्र-छात्राएँ  भी स्वत: ही इस कार्य में मेरा हाथ बँटाने लगे। आज स्थिति यह है कि बच्‍चे इसका इस्तेमाल भी करते हैं और सफाई का ध्यान भी खुद ही रखते हैं।

शैक्षणिक प्रयास

गणित विषय में रुचि अधिक होने के कारण कई वर्षों से मैं कक्षा 4 व 5 में  गणित विषय पढ़ा रहा हूँ। कक्षा शिक्षण के दौरान बच्चे जहाँ सीखने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं मैंने उन्हें चिह्नित किया और उस पर कार्य करने का प्रयास किया। यह जानना और जाँचना जरूरी है कि किन बच्चों के समझ में आ रहा है व किन्‍हें समझ में नहीं आ रहा है और क्‍यों।

मेरा मानना है कि बच्‍चों को अधिक से अधिक बोलने का अवसर प्रदान करें। प्रताड़ित करना, झिड़कना, मारने-पीटने का प्रयास नहीं करें। हतोत्साहित करने के बजाए उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का प्रयास करें। शिक्षक के लिए यह भी जरूरी है कि वह अपने द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषय में बच्चों की रुचि पैदा करे। खासतौर पर गणित विषय जिसमें बच्‍चे रुचि नहीं लेते, भय खाते हैं। जबकि गणित विषय हमारे जीवन के सबसे नजदीक है। जागने से लेकर सोने तक यह हमारे काम आता है। हम अपने दैनिक जीवन से सम्बन्धित प्रश्न पूछकर बच्‍चों को इस विषय से जोड़ सकते हैं। आप कितने बजे उठते हैं ? कितने बजे खाना खाते हैं ? शाला कब जाते हैं? क्या आज आप कोई घर का सामान खरीद कर लाए ? कितने रुपए लेकर गए थे ? कितने रुपए वापस लाए ? यह छोटे-छोटे प्रश्न पूछकर हम बच्‍चों को गणित का महत्व समझाकर उनमें रुचि पैदा कर सकते हैं। इस विषय को खेल के माध्यम से भी और रूचिकर बना सकते है। मैंने इसका प्रयास किया है और इसमें मुझे सफलता मिली है।

(जमील जी द्वारा गणित में रुचि पैदा करने के लिए खिलाए जाने वाले खेलों का विवरण खेल खेल में गणित लिंक पर पढ़ा जा सकता है।)   

मेरा तरीका है कि मैं पढ़ाते समय बच्‍चों को श्यामपट्ट का प्रयोग करने का पूरा अवसर प्रदान करता हूँ। जब मैं यहाँ आया और बच्‍चों को श्यामपट्ट पर आकर प्रश्न हल करने के लिए बुलाता था तो वह झिझकते थे एवं डरते थे। लेकिन धीरे-धीरे बालकों का भय दूर हो गया। आज स्थिति यह है कि बच्‍चे बिना झिझक के श्यामपट्ट का प्रयोग करते हैं। प्रश्‍नों का उत्तर देते हैं।       

गृहकार्य का बोझ लादना भी बच्‍चों के लिए उचित नही है। हम इतना गृहकार्य ही दें जितना बच्‍चा आसानी से कर ले और हम जाँच भी सकें। यदि हमने गृहकार्य अधिक दे दिया तो बच्‍चे को करने में कठिनाई होगी दूसरा हमें भी जाँचने में  परेशानी होगी। अधिक गृहकार्य भी शाला से पलायन का कारण बनता है। मैं कक्षा कार्य पर अधिक बल देता हूँ, ताकि अवलोकन कर सकूँ कि कौन सा बच्‍चा सीख रहा है, किसे कहाँ परेशानी आ रही है। उसका समाधान करना भी सरल होता है।

मेरा प्राथमिकस्तर पर यह प्रयास रहता है कि बच्‍चा गणित की मूलभूत संक्रियाओं में दक्ष हो जाए। अगर वह दक्षता प्राप्त नहीं कर सका तो उच्च कक्षा में गणित में पिछड़ जाएगा। और हो सकता है कि वह पढ़ाई छोड़ दे। मजबूत नींव मजबूत ईमारत की तामीर के लिए जरूरी है। कच्ची नींव पर हम महल बनाने के सपने नही सजों सकते । कई वर्षों के प्रयास के बाद छात्रों के अधिगम स्तर में काफी सुधार हुआ है। गणित विषय में उनकी रूचि जागृत हुई है। गणित का भय उनमें से निकल गया है। बच्‍चों में स्‍वस्‍थ प्रतिस्पर्धा का भाव जागृत हुआ है।

समुदाय से सम्‍पर्क

व्यापक अभिभावक सम्पर्क का भी हमें लाभ मिल रहा है। सम्पर्क से हमें अभिभावकों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति का ज्ञान हो रहा है। वहीं बालकों के बारे में भी अभिभावकों से काफी जानकारी प्राप्त हो रही है। अभिभावकों की सोच में भी परिवर्तन हमने पाया है। जब हम अभिभावकों को यह कहते हुए सुनते हैं कि आपकी शाला में निजी विद्यालयों से भी अच्छी पढा़ई हो रही है तो हमारी खुशी का ठिकाना नही रहता।

हमारे कार्य को देखकर हमारी एसडीएमसी के सदस्य हमारा काफी उत्साह वर्धन करते हैं। उनका हमें भरपूर सहयोग मिलता है। सेवा निवृत अध्यापक श्री रघुवीर सिंह जी हाडा, बदरीलाल धाकड़ सेवा निवृत प्रधानाध्यापक, अभिभावक सदस्य श्री घांसी खां का हमें पूरा सहयोग मिलता है जो समय समय पर हमारे कार्यो की निगरानी करते हैं। साथ ही हमारे कक्षा शिक्षण को भी देखते हैं।

विभाग द्वारा दिया जाने वाला रूपया पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा से शिक्षण सामग्री बनाने व खरीदने रखरखाव, मरम्मत व निर्माण कार्यो में एसडीएससी की निगरानी में खर्च किया जाता है।

हमारे प्रयास कहते हैं कि-

  • शिक्षक द्वारा किए जाने वाले प्रयास का प्रतिफल तब मिलेगा जब वह शिक्षक उस शाला में कम से कम 4-5 वर्ष रहेगा। वह बच्‍चों के स्वभाव, अभिभावकों  समुदाय को समझेगा फिर उसके अनुसार कार्य करेगा। जल्दी-जल्दी स्थानान्तरण प्रक्रिया से किसी भी अध्यापक के रचनात्मक कौशल को उजागर नही किया जा सकता है। मुझे इस शाला में लगभग 11 वर्ष हो गए हैं। मैं आज बच्चों व अभिभावकों को अच्छी तरह समझ पा रहा हूँ।
  • अध्यापक का अभिभावकों से सतत् सम्पर्क होते रहना चाहिए। इसके काफी अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं , हो रहे हैं।
  • शाला का वातावरण साफ सुथरा एवं भय मुक्त होना अति आवश्यक है। शाला में बच्चा बेझिझक आए और कुछ सीख सके।
  • पहले से तय परीक्षाओं के अलावा हम प्रतिमाह हमारे शिक्षण का मूल्यांकन करें जो खेल-खेल में, मौखिक या लिखित किसी भी प्रकार का हो सकता है। फिर हम उसी के अनुरूप सुधारात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था कर सकते है।
  • प्रतिमाह जो कुछ हमने सिखाया है उसका दोहरान कर लें जिसमें हमें पूर्व ज्ञान के मूल्यांकन का भी अवसर मिलेगा। बच्‍चे भी सजग रहेंगे।
  • बालकों के अच्छे प्रयासों की सराहना करें। उन्हें उत्साहित करें।       

मेरा कहना है

जागरूक शिक्षक के लिए आवश्यक है कि अपनी परिस्थितियों को समझकर उनके अनुकूल कार्य करने का प्रयास करे। यदि कोई शिक्षक बेहतर प्रयास कर रहा है तो उसके रचनात्मक कार्यों की सराहना की जानी चाहिए। उसका उत्साह वर्धन किया जाना चाहिए और उसके प्रयासों से दूसरों को भी लाभान्वित किया जाना चाहिए। मेरा सूत्र है जीवन मूल्यों पर आधारित भयमुक्त वातावरण में आनन्ददायी शिक्षण कराना। बच्‍चों के मनोविज्ञान को समझकर उनके साथ रचनात्मक कार्य करना।

जमीलउद्दीन शेख

  • हायर सैकण्डरी, एसटीसी
  • उक्‍त विवरण काल में अध्‍यापक, राजकीय प्राथमिक विद्यालय शोप, पंचायत समिति उनियारा,टोंक,राजस्‍थान ।
  • वर्तमान में राजकीय प्राथमिक विद्यालय, औंकारपुरा की ढानी , पंचायत समिति उनियारा, टोंक, राजस्‍थान में अध्‍यापक हैं।
  • प्रथम नियुक्ति तिथि 31 जुलाई 1985
  • अवकाश लेना या करना अच्छा नही लगता। कहने की अपेक्षा करने में अधिक विश्वास करता हूँ।
  • इस शाला से पूर्व प्राथमिक विद्यालय गलवानियाँ एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय पाटोली में सेवाएँ दे चुका हूँ। 
  • लगभग 25 वर्षों से ही मैं शायरी भी कर रहा हूँ । टोंक, सवाई माधोपुर में कई मुशायरों में शिरकत कर चुका हूँ। अच्छी शायरी पढना अच्छा लगता है। अखबार वाचन अनिवार्य रूप से करता हूँ।
  • बच्चों के साथ कार्य करना पसन्द है।
  • मो0 - 9950063940

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। जमीलउद्दीन शेख वर्ष 2009-10 में शाला में बेहतर शैक्षणिक प्रयासों के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने जमीलउद्दीन शेख से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इसी बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम जमीलउद्दीन शेख ,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

यह बात ठीक है कि किसी विद्यालय में शिक्षक को कम से कम 5या 6 वर्ष रखा जाना चाहिए ताकि वह बच्‍चों और समुदाय से भलीभांति परिचित होकर बेहतर काम कर सके ।

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