किसी 'खास' की जानकारी भेजें। चिमनियों के साये तले

ईंट भट्ठों की ऊँची-ऊँची चिमनियों से उठता हुआ धुआँ बता रहा है कि नीचे आग जल रही है। नीचे सचमुच आग जल रही है। वहाँ दो किस्म की आग हैं। एक, जिसका धुआँ हम देख पा रहे हैं, लेकिन एक और किस्म की आग है जो पिछले कई बरस से धधक रही है। जिसका धुआँ दूर से नजर नहीं आता है। उसे देखने के लिए पास जाना पड़ता है। बियाबान में चल रहे इन ईंट भट्ठों में हजारों हजार जिन्‍दगियाँ बसर कर रही हैं। हर एक भट्ठे की चिमनी के साये तले एक भरा-पूरा, छोटा-सा गाँव मिल जाएगा आपको। आज की अपनी बातों का ताना बाना इन्हीं जिन्दगियों के इर्दगिर्द है, जो एक बदलाव की दास्तान कहता है।  

सन् 1959 की बात है। देश में ‘विकास का नेहरू माडल’ चरम पर था। कानपुर में भी आई.आई.टी यानी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के निर्माण की योजना आकार ले रही थी। मुख्य शहर से 16 किलोमीटर दूर स्थित कुछ गाँवों नानकारी, लोधर,बारासिरोही और नारामऊ के बीच पड़ने वाली तकरीबन 1055 एकड़ उपजाऊ जमीन को अधिगृहित किया जा रहा था। जिसका विरोध करते हुए इन गाँवों के किसानों ने एक चिट्ठी लिखी थी, जिसे उन्होंने तत्कालीन नेता ‘मनीराम जी’ के हाथों प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी तक पहुँचाया था। तब, नेहरू जी का जवाब था ‘ क्या आप लोग नहीं चाहते हो कि कानपुर भी खुशहाल बने ?’

खैर, खुशहाली लाने का नेहरू जी का सपना सच हुआ। आई.आई.टी. कानपुर बना और तकनीकी विकास में योगदान देने के लिए देश-विदेश में इसका खूब नाम हुआ। बीस बरस बाद, यानी सन् 1980 में जब यह संस्थान अपने स्थापना की 20वीं वर्षगाँठ मना रहा था तब एक समारोह में ‘मनीराम जी’ के पुत्र विष्णु शर्मा जी ने एक सवाल पूछा। उनका सवाल था कि इतने वर्षों में आई.आई.टी. ने अपने आसपास बसे गाँवों के लिए क्या किया है?

औपचारिक रूप से संस्थान ने अपने आसपास के इलाकों के विकास के लिए क्या किया है इस पर सचमुच प्रश्‍नचिन्ह हैं, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि संस्थान के कई शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों ने अपने जीवन का बहुमूल्य समय इन इलाकों में बदलाव लाने के लिए समर्पित कर दिया है।

आई.आई.टी बनने की प्रक्रिया जब से शुरू हुई, तभी से बहुत सारी बिल्डिंगें बनाने का काम भी बदस्तूर जारी है। कभी भी जाइए, आपको यहाँ निर्माण कार्य चरम पर मिलेगा। बड़े भवन, कक्षाएँ, प्रयोगशाला,हास्टल, स्वीमिंग पूल, खेल का मैदान, पार्क, हवाई अड्डा....और न जाने क्या क्या, हमेशा कुछ न कुछ बनता मिलेगा। इस काम मे लगे प्रवासी मजदूरों की झोपड़पट्टी भी बरसों बरस लगी रहती हैं। इनके अलावा घरों और बगीचों मे काम करने वाले, रिक्‍शा खींचने वाले और ठेले पर फल-सब्जी बेचने वाले लोगों की भी अच्छी खासी संख्या है। कुल मिलाकर दो तरह की जिन्दगियाँ इस छोटे से कैम्पस में आप हमेशा देख सकते हैं। एक जिनके पास ‘सब कुछ’ है और दूसरे जो ‘कुछ’ की तलाश में यहाँ अपना पसीना बहा रहे हैं। 

सरकारी कर्मचारियों और संस्थान के बच्चों की शिक्षा के लिए दो स्कूल हैं। एक केन्‍द्रीय विद्यालय तथा दूसरा कैम्‍पस स्कूल। कुछ साल पहले तक सभी कर्मचारियों के बच्चे इन्ही दोनों स्कूलों में जाया करते थे। वे पाँचवीं तक की पढाई कैम्‍पस  स्कूल में करते थे और 6वीं से 12वीं तक पढ़ने के लिए केन्द्रीय विद्यालय में जाते थे। आज ऐसा नहीं हैं। उच्च आय वर्ग के लोग अब अपने बच्चे यहाँ नहीं भेजते हैं। रोज सुबह बड़ी-बड़ी बसें आती हैं और उनमें बैठकर बहुत सारे बच्चे शहर के नामी गिरामी स्कूलों में जाते हैं। अब इन स्कूलों में आपको अधिकांशतः निम्न तथा मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों के बच्चे ही मिलेंगे।

जैसा कि मैने ऊपर कहा, कि कैम्‍पस में ‘कुछ’ की तलाश में आई हुई तमाम जिन्दगियाँ  बसर करती हैं। घरों में काम करने वाले नौकर, रिक्‍शा चलाने वाले, माली का काम करने वाले, ठेले पर सामान बेचने वाले, छोटे दुकानदार और निर्माण कार्य में काम कर रहे हजारों प्रवासी मजदूर। ये भी इसी कैम्‍पस का हिस्सा हैं, लेकिन इनके बच्चों के पढ़ने का कोई इंतजाम नहीं था। कुछ संवेदनशील लोगों के प्रयासों से इन तबकों के बच्चों के लिए भी एक ‘अलग किस्म’ के स्कूल की शुरुआत हुई। नाम रखा गया ‘अपारच्यूनिटी स्कूल’। इस स्कूल का खर्चा दान से चलता था, शायद आज भी दान से ही चलता है। 

विजया रामचन्द्रन जी......आज हम सब प्यार से उनको विजया दीदी कहते हैं। इनके पति यहाँ संस्थान में कार्यरत थे। दीदी और उनके जैसे अन्य कुछ संवेदनशील लोगों शिरीष यादव, अमित नियोगी, ए.पी.शुक्ला आदि ने मिलकर न सिर्फ इन गरीब बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए पहल की बल्कि तमाम दिहाड़ी मजदूरों के अधिकारों के लिए भी अपनी आवाज बुलन्द की। कुछ पुराने लोग बताते हैं कि विजया दीदी खुद अपने घर से अंकुरित चने और दाल लाकर बच्चों को खिलाया करती थीं, ताकि पढ़ने  के साथ ही उनकी पोषण सम्‍बन्‍धी जरूरत भी पूरी हो सकें।

बिहार,बंगाल,छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के प्रवासी मजदूरों के अलावा बड़ी संख्या में आसपास के गाँव के लोग भी यहाँ मजदूरी करने आते हैं। आई.आई.टी. कैम्‍पस  को घेरने वाली ऊँची चारदिवारी के उस पार ही इन लोगों के गाँव हैं। यूँ लगता हैं जैसे ये चारदिवारी ‘विकास’ रूपी सीता मैया’ को बाहर न जाने देने के लिए खीचीं गई लक्ष्मण रेखा हो। जमीन-आसमान का फर्क है। दो अलग दुनिया बसती हैं- एक इस पार और दूसरी उस पार। यहाँ जगमग रोशनी है,अच्छी सड़क है,बगीचे हैं,स्कूल हैं, अस्पताल हैं,सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं जबकि चारदिवारी के उस पार है-घुप्प अंधेरा।

बदलाव का दीपक जलाने वाले साथियों के कदम आई.आई.टी. कैम्‍पस की चारदीवारी के बाहर बसे इन सभी गाँवों की ओर भी चल पड़े, जिनके खेत आज इन बड़ी-बड़ी  इमारतों और प्रयोगशालाओं के नीचे दब चुके हैं। लोधर नाम के गाँव की झोपड़ी में लालटेन टिमटिमाई और कुछ बड़े-बुजर्गों को पढ़ना-लिखना सिखाने का काम शुरू हुआ। इसी झोपड़ी में दिन के समय बच्चों को भी पढ़ाने का काम शुरू हुआ। आठवीं तक पढ़ी हुई गाँव की एक लड़की आगे आई और वह रोज नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाने लगी। अगले कुछ वर्षों के दौरान आई.आई.टी कानपुर के कुछ शिक्षक  तथा छात्रों ने इस स्कूल के विकास में बहुत ही सक्रिय योगदान दिया। कई पूर्णकालिक कर्मठ शिक्षकों की नियुक्ति हुई। आज यह स्कूल अपनी अच्छी शिक्षा के लिए जाना जाता है।

इधर कैम्‍पस के भीतर, अपारच्यूनिटी स्कूल में पढ़ रहे बच्चे अपनी बहुत ही चुनौतीपूर्ण जिन्दगियों और माहौल के साथ आ रहे थे। उनके अभिभावक मजदूर थे और अपने बच्चों को पढ़ने-पढ़ाने में वे बहुत मदद नहीं कर सकते थे। ऐसे में उन्हें स्कूल के समय के अलावा भी और मदद की जरूरत थी। आई.आई.टी के ही कुछ छात्र-छात्राएँ आगे आए। उन्होंने रोज शाम को दो घण्टा इन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। बी.टेक, एम.टेक व पीएच.डी. करने वाले ये छात्र-छात्राएँ तीन से पॉच साल ही यहाँ होते हैं। लेकिन अब सिलसिला बन चुका है, अतः नए-नए लोग जुड़ते जाते हैं। रोज शाम को स्टूडेन्टस एक्टिविटि सेंटर के हॉल तथा कम्प्‍यूटर कक्ष में आपको यही बच्चे गीत गाते तथा पढ़ते-लिखते मिलेंगे। प्रत्येक चार-पाँच बच्चों के समूह के बीच में एक छात्र या छात्रा बैठकर उनकी मदद कर रहा होता है।

एक मशाल जल जाने के बाद और मशालें जला पाना आसान होता है। ऐसा ही हुआ। आसपास के कुछ गाँवों में भी इन प्रयासों का असर हुआ। विजया दीदी,उनके साथियों और गाँव वालों के कदम आसपास मौजूद ईंट भट्ठों की तरफ भी़ बढ़ चले। जैसा मैंने कहा है, भट्ठों की चिमनियों के साये में एक पूरा गाँव बसा होता है। अनेक राज्यों से आए कई प्रवासी मजदूर अपने बाल-बच्चों समेत यहाँ बसे होते हैं। पति-पत्नी दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करते हैं। बहुत छोटा बच्चा दिन भर पेड़ की डाल से बँधे कपड़े के झूले में पड़ा रोता रहता है। माँ बीच-बीच में अपना काम रोककर उसे दूध पिला आती है। उसका अपने बच्चे के पास ज्यादा देर रूकना सम्‍भव नहीं। ईंट कम बनी तो दिन की मजदूरी भी कम मिलेगी। बच्चे, जो थोड़ा बड़े हो चुके हैं वे अपने माँ-  बाप के कामों में हाथ बँटाते हैं। गधों की पीठ पर मिट्टी या ईंट लादकर इधर से उधर पहुँचाते हुए बच्चे प्रायः आपको हर ईंट भट्ठे पर दिख जाएगें। भट्ठा मालिक और उसके गुर्गों की इजाजत के बिना आप इन लोगों से मिलना तो क्या भट्ठे की सीमा में भी नहीं घुस सकते हैं।

विजया दीदी और उनके साथियों ने ईंट भट्ठों पर पल रहे बच्चों की शिक्षा के लिए पिछले कई वर्षों से लगातार संघर्ष किया है। उन्होंने भट्ठा मालिकों के साथ तमाम मिटिंग की। उन्हें उनके भट्ठों पर दिन-रात काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के स्वास्थ्य तथा शिक्षा के बारे में सोचने को प्रेरित किया गया। कहीं मान-मनौवल और कहीं सख्ती दिखाकर भट्ठों के भीतर बसी बस्ती में किसी तरह प्रवेश सम्‍भव हुआ। मजदूरों से सम्‍पर्क हुआ और उन्हें बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की जरूरत समझाई गई। कुछ भट्ठों पर पेड़ों की छाँव में ही बच्चों की पाठशाला शुरू हुई। पास के गाँव से ही वालंटियर तलाशे गए और थोड़े से प्रशिक्षण के बाद उनके सहयोग से यह काम शुरू  हुआ। आपसी सहयोग तथा चंदे से खर्चे जुटाने का प्रयास भी जारी रहा। लोगों की लगन देख और लोक-लाज के चलते भट्ठा मालिकों ने भी अपनी तरफ से कुछ मदद शुरू  की। किसी ने टीन की छत डालकर बच्चों के बैठने का कमरा तैयार किया और किसी ने बच्चों को कापी-कलम देने का खर्च उठाया।

दीदी खुद दिनभर इस भट्ठे से उस भट्ठे घूमती रहतीं। एक-एक बच्चे और उनके माता- पिता से मिलतीं। उन्हें पढाई-लिखाई की अहमियत समझातीं। कई बार कानपुर के भट्ठा मालिकों के एसोसिएशन के साथ मीटिंग की तथा उन्हें इस तरफ भी ध्यान देने का आग्रह किया। कुछ भट्ठों के मालिक तो इस कदर नाराज हुए कि दीदी और उनके साथियों के प्रवेश पर ही रोक-टोक करने लगे। कुछ ऐसे भी थे जिन्‍होंने ‘ ऊँट के मुँह में जीरा’ बराबर मदद करके अपने हाथ पीछे खींच लिए। मुहिम में जुटे साथी भी कम जीवट नहीं थे। वे लगातार संघर्षरत रहे। कई-कई बार जिला कलेक्टर को चिट्ठी लिखी गई। कलेक्टर की उपस्थिति में भट्ठा मालिक एसोसिएशन के सदस्यों के साथ मीटिंग हुई। उन्हें तमाम श्रमिक कानूनों तथा बाल अधिकारों का हवाला देकर कुछ बुनियादी साधन उपलब्ध कराने के लिए राजी किया गया। इस तरह कुछ सकारात्मक माहौल बन पाया।

आज इतने बरसों के प्रयास से कानपुर और आसपास के इलाकों में तकरीबन 50 से अधिक भट्ठों पर अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र चल रहे हैं। कानपुर में, लोधर गाँव में एक झोपड़ी में शुरू हुआ ‘स्वामी विवेकानन्द विद्यालय’ आज गाँव तथा आसपास के 300 से अधिक बच्चों को आठवीं तक की अच्छी शिक्षा दे रहा है। यहाँ से कुछ किलोमीटर दूर ही ‘धामीखेडा’ नाम का पुराना गाँव है। कानपुर आवास विकास परिषद की आवास योजना के तहत यहाँ बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चलता रहता है। विशेष रूप से निर्माण कार्य में लगे परिवारों के बच्चों के लिए इसी ‘धामीखेड़ा’ नाम के गाँव में एक विद्यालय संचालित किया जा चुका है।

प्रवासी मजदूरों के बच्चों की 12 वीं तक की शिक्षा सम्‍भव हो सके इसके लिए एक आवासीय होस्टल भी अब बनकर तैयार हो चुका है। बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के दूरदराज गाँवों के कई बच्चे यहाँ रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। ये बच्चे आपस में मिलकर गीत गाते हैं, नाचते हैं, नाटक करते हैं और एक-दूसरे को सहयोग करते हुए पढ़ाई करते हैं। पिछले कई सालों से दिन-रात इन बच्चों के साथ रह रहे महेश भाई अपनी पहली खेप को तैयार होता देखकर बहुत खुश होते हैं। वे इन बच्चों के साथ तब से हैं जब ये बच्चे बहुत छोटे थे तथा प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ते थे। आज बच्चे बड़े हो गए हैं। 10वीं तथा 12वीं में पढ़ाई कर रहे हैं। बच्चे ही अपने होस्टल की सभी व्यवस्थाओं का संचालन करते हैं। खर्चों का लेखा-जोखा रखने से लेकर छोटे बच्चों को होमवर्क कराने और उनका ख्याल रखने तक का काम ये लोग आपस में मिलकर ही करते हैं। शिक्षा ने इन्हें अपनी परिस्थितियों और अपने समाज के लोगों के प्रति और भी अधिक संवेदनशील बना दिया है। वे पढ़-लिखकर अपने लोगों की बेहतरी के लिए काम करना चाहते हैं। अपने जीवन में जो बदलाव महसूस किया है उसकी तपिश अब वे दूसरे बच्चों तक भी पहुँचाना चाहते हैं।

विकास के रास्तों पर तेज रफ्तार दौड़ रही इस दुनिया में ईंट-गारे और मजदूरों की जरूरत शायद कभी खत्म नहीं होने वाली है। इसके मायने यह हुए कि ये चिमनियाँ और इनकी जद में बसी जिन्दगियाँ हमें आगे भी बरसों-बरस तक देखने को मिलती रहने वाली हैं। ऐसे में इनके और इनके बच्चों की बेहतरी के लिए सिर्फ विजया दीदी सरीखे लोगों द्वारा किए जा रहे प्रयास महत्वपूर्ण होते हुए भी नाकाफी हैं। आज जब यह कहा जा रहा है कि अच्छी शिक्षा प्राप्त करना हर बच्चे का अधिकार है, तो हम आप इस तरफ आँखें मूँदकर नहीं बैठ सकते। इस तरह के काम व्यापक पैमाने पर किए जाने की बहुत जरूरत है। सरकार और समाज दोनों को आगे आना होगा।


मोहम्मद उमर,अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, राजसमन्द, राजस्थान

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

बहुत भावपूर्ण वर्णन। हम शिक्षा दीप हर झोपड़ी में जला पायें, ऐसा संदेश देता लेख प्रेरक है।। बधाई

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