किसी 'खास' की जानकारी भेजें। चहक : बच्‍चों को चहकाने की एक कोशिश

‘चहक : पुस्तकालय तथा गतिविधि केन्द्र’ के नाम से हम मित्रों का समूह पिछले 3 - 4 वर्षों से हरदा (मप्र) शहर की बस्तियों में रहने वाले बच्चों के लिए रविवारीय पुस्तकालय चला रहा है। अवसर और संसाधन जुटने पर हम खेल और क्राफ्ट की गतिविधियाँ भी आयोजित करते हैं। हर रविवार बच्चे पिछली किताबें बदलकर नई किताब लेते हैं, कुछ खेलकूद व बातचीत भी हो जाती है। सारा कार्यक्रम खुले आसमान के नीचे होने से अधिकांश लायब्रेरी बारिश के 3 महीने बन्द रहती हैं। इस दौरान जहाँ हम बच्चों को मिस करते हैं वे भी ऐसा ही महसूस करते हैं।

पुस्तकालय के लिए हमने ऐसी बस्तियों का चयन किया है जहाँ मुख्यतः निर्धन परिवार निवास करते हैं। यहाँ माता-पिता के साथ बच्चे भी भरण-पोषण की समस्याओं से जूझते रहते हैं। थोड़े बड़े होते ही लड़के कमाने और लड़कियाँ घर की देखभाल के साथ ही बाहर के कार्यों में व्यस्त हो जाती हैं। बहुत छोटे बच्चे धमा-चौकड़ी में मस्त व व्यस्त। इन सबका सीधा असर बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के साथ उनके स्वास्थ्य और व्यवहार पर भी पड़ता है। बच्चों की स्कूली पढ़ाई पर घर में ध्यान न दे सकने के कारण पढ़ाई में पिछड़ने के कारण स्कूल से अरुचि, अनुपस्थिति, ड्रॉप आउट का सिलसिला चल पड़ता है। समाज में भी इन बच्चों को उपेक्षा की दृष्टि से ही देखा जाता है। यूँ तो बच्चे अपने ही ढंग से खुश रहने के तरीके खोज लेते हैं पर कई बार ये तरीके उचित  नहीं होते हैं।

बच्चों में पढ़ने-लिखने के प्रति रुचि जगाने, खेलकूद का अवसर देने, क्रिएटिविटी को उभारने, सकारात्मक कार्यों और खुशनुमा माहौल में समय बिताने का अवसर देकर उनमें आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जगाने और उनकी दक्षताओं को विकसित करने की दिशा में हमने यह केन्‍द्र चलाने की कोशिश की है।

हमने जो लक्ष्य रखे हैं वो थोड़े अदृश्य और मुश्किल जान पड़ते हैं, पर जो लोग बच्चों के साथ काम करते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि निश्छल प्यार, अपनेपन और विश्वास से कुछ भी मुश्किल नहीं है। हमारी कोशिशों के दौरान हुए अनुभवों को पढ़ते समय आप इसकी सत्यता को महसूस भी करेंगे। फिलहाल इस कोशिश के इतिहास में झाँकिए।

पृष्ठभूमि

अपने घर-परिवार के साथ अपने समाज के प्रति भी इंसान के फर्ज होते हैं, इसलिए हमें समाज की बेहतरी के लिए भी कुछ न कुछ करना चाहिए। इसी भावना से प्रेरित हम लोग अलग-अलग क्षेत्रों में अपने कार्यों के साथ व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से समाज हित के कार्यों में लगे रहे हैं। कोई गर्मियों में पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए गाँव और शहरों में पानी के पात्र बाँटते हुए लोगों को प्रेरित कर रहा था। कोई पुराने खिलौनों को एकत्र करके और उनकी टूट-फूट की मरम्मत करके दूरदराज के आदिवासी अँचल की आँगनबाड़ियों में पहुँचाकर बच्चों के मुख पर मुस्कान लाने की कोशिश में रहता। कभी किताब-कॉपियाँ बाँटते, तो कभी स्कूलों में विज्ञान की गतिविधियों को प्रोत्साहित करते। किसी ने शहर के विस्तार से उपजी बसाहट के बच्चों के लिए उनके पास ही स्कूल खोलने के लिए प्रयास किए और सफल भी हुए। अवसर मिलने पर अपने रुतबे और साधनों को गरीब बच्चों के बेहतर विकास के लिए उपयोग किया। कोई बच्चों और महिलाओं के हित के लिए विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर काम करते। अपने मित्रों के साथ कभी दूरदराज के गाँवों में तो कभी शहर की बस्तियों के बच्चों के लिए शैक्षिक सहयोग के साथ ही पुस्तकालय, खेल व क्रियात्मक गतिविधियों के संचालन की व्यवस्था जुटाते और अन्यान्य लोगों को भी इस कार्य से जोड़ते। इस दौरान हमारा मिलना-जुलना भी होता रहा।

हममें कुछ बातें कॉमन थीं। जिसमें सबसे मुख्‍य बात यह कि हम शिक्षा को सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण जरिया मानते हैं। शिक्षा वो जो सोचने-समझने और अभिव्यक्त करने का कौशल विकसित करे। जो रटे रटाए प्रश्न-उत्तरों से हटकर हो, जो ज्ञान को अपने आसपास की दुनिया से जोड़कर देखने की समझ विकसित करे। इसके लिए जरूरी है बच्चों से संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। इसके लिए जरूरी है बच्चों को अहमियत दी जाए, उनसे संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। हमारा यह भी मत है कि वर्तमान स्कूली तंत्र में इसकी गुंजाईश कम है। बच्चों के व्यक्तित्व और शैक्षणिक विकास में खेलों और कलाओं के महत्व को भी हम समझते हैं, साथ ही यह भी जानते हैं कि निर्धन परिवार के बच्चों को स्कूल की किताबों के अलावा अन्य किताबें देखने-पढ़ने को नहीं मिलती हैं। पालकों की गरीबी के अलावा इन मुद्दों पर उनकी अनभिज्ञता भी बच्चों को छोटी-छोटी चीजें जैसे कागज, पेन्सिल, कलर आदि से वंचित रखती है।

ऐसे में हमने सोचा कि  हम लोग मिलकर शहर के कुछ बच्चों को तो ये अवसर और साधन उपलब्ध करा ही सकते हैं। इस तरह ‘चहक’ की नींव पड़ी।

योजना

हमारा अपना अनुभव ये कहता था कि अगर आप कोई भी अच्छा काम ईमानदारी से करें तो संसाधनों की कभी कमी नहीं पड़ती। तो बस इसी विश्वास के आधार पर हमने काम शुरू किया और आप आगे देखेंगे कि हमारा विश्वास सत्य ही सिद्ध हुआ।

किताबों के लिए सबसे पहले याद आई ‘एकलव्य’ संस्था की जिसके साथ काम का हमारा अपना अनुभव था। भोपाल मुख्यालय में अपनी योजना बताई तो पचास किताबों का सैट तुरन्त मिल गया, आगे भी सहायता आश्वासन के साथ। कुछ किताबें हमने खरीदी भी।  किताबों पर लगाने के लिए ‘चहक’ की सील बनवाई गई, बच्चों के बैठने के लिए दरी खरीदी गई। सील-ठप्पे लगाकर किताबें तैयार की गई, वितरण के लिए रजिस्टर लाया गया।

इसी बीच पुस्तकालय की शुरुआत करने के लिए बस्ती का चयन चलता रहा। शहर की 8-10 बस्तियाँ ऐसी थीं जहाँ काम करने की जरूरत थी। पर अपनी सीमाओं के चलते सिर्फ इमलीपुरा से शुरू करने का योजना बनी। इस बस्ती में 2- 3 साल पहले बच्चों के लिए चित्रकला की कार्यशाला आयोजित कर चुके थे। यहाँ घूम-घूमकर लोगों से बात कर बताया कि अब हम यहाँ पुस्तकालय खोल रहे हैं आप अपने बच्चों को भेजें, काफी  लोग तैयार हो गए। पुस्तकालय संचालित करने के लिए बस्ती में एक खुले सार्वजनिक स्थान को हमने अपना अड्डा बनाया। पूरी तैयारी के बाद 3 फरवरी 2013 को हमने अपने ‘चहक’  पुस्तकालय का शुभारम्भ कर ही दिया।

हम

चलिए लगे हाथ आपका परिचय भी 'हम' से करवा ही दूँ। पहले मित्र हेमन्त टाले सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। शिक्षा और बच्चों के लिए कार्य में विशेष रूचि रखते हैं। दूसरी हैं श्रीमती सुनीता जैन जो एक निजी विद्यालय में पढ़ाने के साथ ही मानव अधिकारों के लिए काम करती हैं, चित्रकारी में दखल रखती हैं। तीसरे हैं मनोज जैन जो हरदा डाइट में व्याख्याता हैं।  शिक्षा के साथ, कबाड़ से जुगाड़ और पर्यावरण की बेहतरी में विशेष रुचि रखते हैं। और मैं शोभा बाजपेई हरदा के पास एक गाँव ऊँड़ा में सरकारी मिडिल स्कूल में पढ़ाती हूँ। महिलाओं और बच्चों के साथ काम करना पसन्द करती हूँ। ‘एकलव्य’ संस्था के साथ शैक्षिक नवाचार के कार्यों से जुड़ाव रख कुछ न कुछ सीखती रहती हूँ।

शुरुआत

पहले ही दिन हमारे यहाँ किताबें लेने वाले बच्चों की भीड़ लग गई। साथ ही शुरू हो गई धक्का-मुक्की और लड़ाई। बस्ती के कुछ बड़े खड़े होकर तमाशा देख रहे थे। वहीं कुछ महिलाओं की टिप्पणी थी कि, ‘क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हो, हमारे मोहल्ले के ये कभी नहीं सुधरेंगे।’ पर हम तो इस सबके लिए तैयार होकर ही आए थे। अपने अनुभवों से हमने कुछ बात कर व्यवस्था बनाई और पाँचवी से आठवीं तक के करीब 35 बच्चों को किताबें दीं। साथ में समझाइश भी कि अगले रविवार तक किताब पढ़ना है और संभालकर रखना है, मोड़ना, फाड़ना या गोदना नहीं। फिर अगले रविवार इस किताब को बदलकर दूसरी लेना है।

अगले एक-दो हफ्ते में सदस्यों की संख्या बढ़कर 85 हो गई। इनमें कुछ ऐसी लड़कियाँ भी थीं जिन्होंने पढ़ना छोड़ दिया था। 2-3 बच्चों की माँओं ने भी किताबें पढ़ने में रूचि दिखाई हालाँकि वे स्कूली पढ़ाई ज्‍यादा नहीं कर पाईं थीं। एक बार एक महिला, जो तीसरी तक ही पढ़ी थीं, से हमने पूछा कि आप ये किताब पढ़ पाईं तो पास खड़े उनके पति ने कहा, " जब ये अटकती है तो मैं मदद करता हूँ।" हम पढ़ाई के बारे में इसलिए पूछते थे ताकि उस स्तर की किताब उन्हें दे सकें।

कदम-कदम मंजिल की ओर

अब हमारी चलती-फिरती लायब्रेरी शुरू हो गई थी। इधर बाइक पर किताबों का झोला  लिए मैं निकलती तो उधर अपनी गाड़ी से हमारी मित्र मण्डली इमलीपुरा पहुँचती। कभी दरी पर बैठकर तो कभी आसपास से कुर्सी माँगकर तो कभी खड़े-खड़े बाइक से सहारा लेकर ही हम लोग किताबें बाँटते। खड़े रहने की स्थिति तब बनती जब उन घरों में कोई नहीं होता या कुछ खास कार्यक्रमों से गहमा-गहमी रहती। जैन सर ने स्थाई समाधान खोजा,  4 स्टूल लेकर अपनी वैन में रख लिए। अब हमारी व्यवस्था बढ़िया हो गई। बहुधा मैं और सुनीता बच्चों को व्यवस्थित कर किताबें बाँटते, हेमन्त भाई उनके साथ कुछ खेलकूद या गपशप करते और जैन सर किताबों पर बातचीत, फोटो वगैरह लेने आदि में व्यस्त रहते। 1-2 बार चित्रकला का आयोजन हुआ तो उसके बाद बच्चे हमसे कागज ले जाते और चित्र बनाकर लाते, इन चित्रों को जमा करना भी साथियों का एक काम हो गया।

पुस्‍तकालय में आने वाले बच्चों में से लगभग 60℅  बच्चे बड़े ही नियमित रहे। इनमें भी लड़कियों की संख्या ज्‍यादा रही। कई हमारे पहुँचने से पहले पहुँचकर लाइन में लगकर पहले किताबें पाने की जुगत में रहते तो कुछ आखिरी लम्हों में भागे-भागे आते तो कभी जाते-जाते रोककर किताबें बदलवाते। वजह पूछने पर जवाब मिलता, "पानी भर रही थी", "बर्तन माँज रही थी।" लकड़ी लाने, बकरी देखने, सीजन के दिनों में भंगार लाने, बेचने जैसी वजहों से इनकी देरी या अनुपस्थिति रहती। शादी-ब्याह या अन्य कारणों से बाहर जाने पर बकायदा बताकर किताबें जमा कराकर जाते।

15 से 20% बड़े ही अनियमित रहे कभी आए तो कभी नहीं। और शेष तो दुबारा आए  ही नहीँ। जहाँ तक मुझे कारण समझ आया है उसमें प्रमुख था पढ़ नहीँ पाना व किताब का खो जाना या फट जाना।

अब रविवार हमारे लिए और भी खास हो गया। सुबह ही फोन पर टीम की स्थिति देखना, मौसम के अनुसार समय में फेर-बदल, पढ़ने वालों के स्तर के अनुसार किताबें  जमाना, फ़टी किताबों की मरम्मत और शाम को लगभग डेढ़ से दो घण्टे का समय लायब्रेरी के लिए निकालना। घर के अलावा अन्य सामाजिक आयोजनों में तालमेल बिठाना चुनौती भरा था। टीम से एक की भी अनुपस्थिति सबको प्रभावित करती। हम चाहते थे कि कोई ऐसा कार्यकर्ता मिले जो किताबें देने का कार्य सम्भाल ले तो हम बच्चों के साथ अन्य गतिविधियाँ कर पाएँगे और किसी दूसरी बस्ती में भी पुस्तकालय खोल पाएँगे। 1-2 लोग आए भी पर स्कूल की तरह अनुशासित बच्चे न पाकर चले गए। इसी तरह चलते-बढ़ते जुलाई आ गई। बारिश में बैठने की जगह न होना, मौसम की अस्थिरता आदि के कारण हमने अगले 2-3  माह पुस्तकालय बन्द रखने का निर्णय लिया।

नई पारी

बारिश के दौरान यूँ लगता था कि बस जैसे ही बारिश रुकेगी झट से पुस्तकालय शुरू कर देंगे। परन्तु त्यौहार और निजी समस्‍याओं के चलते मामला खिसकते हुए दिसम्बर तक जा पहुँचा। दिसम्‍बर के मध्‍य में इमलीपुरा में फिर से हमारा काम शुरू हो गया।

कमोबेश पिछली बार की तरह सब चलने लगा। इस बार हमारी मित्र मण्डली में एक नए सदस्य की आमद हुई। ताहिर भाई, जो पेशे से वकील और उर्दू साहित्य में रूचि रखते हैं, ने हमसे कहा कि वो भी अपना कुछ समय देना चाहते हैं तो हम सभी ने उनका स्वागत किया। ताहिर भाई ने बच्चों को सलीके से आने के लिए प्रोत्साहित करने का काम लिया। सफाई से आने, चप्पल पहनने, कंघी करने की समझाइश देने के साथ बातचीत भी जारी रखते। नाम, उसके मानी और फिर लिखकर बताओ ये उनके प्रिय प्रश्न होते। चित्रों के लिए कागज बाँटना और  चित्र एकत्र करना अब उनका काम हो गया।

किताबें भी हमारे पास आती रहीं। कुछ हम लोगों ने खरीदीं तो कुछ दूरदराज बैठे हमारे परिचितों व मित्रों ने दीं। किसी ने चकमक का साल भर का चन्दा जमा करा दिया और कुछ किताबें ' एकलव्य' से भी फ्री मिल गईं। इस सिलसिले में दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूँगी। हरदा के उद्यमी व समाजसेवी श्री राजीव बाहेती जैन सर के मित्र होने के कारण यदाकदा हमारे बीच आते रहते थे। उन्होंने हमेशा बच्चों को नई, रंगीन, चित्रों वाली किताबों की फरमाइश करते हुए देखा था। तब उन्होंने अपने बेटे श्री विनोद बाहेती के माध्यम से विभिन्न स्तर की लगभग सौ बेहतरीन  किताबें कोई दिखावा किए बिना, मई 2014 में हमें उपलब्ध कराईं। विनोद भाई नेशनल बुक ट्रस्‍ट, चिल्‍ड्रन बुक ट्रस्‍ट को कागज सप्लाई करते हैं। दूसरी ये की जब इस खबर को मैने फेसबुक पर साझा किया तो हमारी एक फेसबुक फ़्रैंड नमिता द्विवेदी, जो कि हरदा की ही हैं, ने सम्पर्क कर जबलपुर से अपने भाई के द्वारा बच्चों के लिए बेहद उपयोगी दस Children's Encyclopedia और चौबीस I Wonder Why सीरीज की किताबें पहुँचाईं।

नए साल का जश्न, चित्रकारी, कागज से टोपियाँ आदि बनवाना, माताओं से बातचीत तथा खेल गतिविधियों भी चलती रहीं। गर्मियों की छुट्टी में विशेष कार्यशालाएँ आयोजित करने की योजना भी भीषण गर्मी में बच्चों के लिए समुचित प्रबन्ध नहीँ कर पाने की वजह से रह गई। जून तक लायब्रेरी चली, 3 जुलाई को अचानक भीषण बारिश और बाढ़ के कारण बस्ती में अधिकांश घरों पानी घुस गया और सामान के साथ किताबें भी बह गईं। हफ्ते दस दिन के बाद जाकर बची किताबें वापस लेकर बारिश तक छुट्टी घोषित कर दी।  इस बार भी नए केन्द्र की शुरुआत का सपना पूरा न हो सका।

नई शुरुआत और नया केन्द्र

बारिश और त्यौहारों की धूम के बाद 8 नवम्बर,14  को इमलीपुरा के केन्द्र को पुनः शुरू कर दिया। इसी बीच तैयारी कर 26  नवम्बर को शहर के दूध डेयरी क्षेत्र में एक नए केन्द्र की शुरुआत कर दी। अभी भी हमें कोई स्थाई कार्यकर्ता नहीँ मिला था तो हम लोग ही दोनों जगह किताबें बाँटने का कार्य सम्भालते रहे। वक्‍त थोड़ा ज्‍यादा देना पड़ता था। अब बाइक पर दो झोले लटकने लगे। पहले इमलीपुरा और फिर डेयरी हमारा लक्ष्य होता। हेमन्त भाई की बिटिया हर्षा और उसकी सहेली कीर्ति के रूप में दो मददगार हमसे जुड़े। परीक्षा के दिनों को छोड़ ये अक्सर आतीं। इससे हमारी गतिविधियाँ बढ़ गईं। किताबों पर बात, छोटे बच्चों को किताब पढ़कर सुनाना, खेल आदि अधिक होने लगे। खेल भी बिना सामग्री वाले जैसे कबड्डी, बोलो भाई कितने,मूर्ति बन आदि। कभी-कभार किसी का बैट बॉल हाथ लग जाए तो क्रिकेट भी।
इमलीपुरा के कई बच्चे उर्दू स्कूल या मदरसे में  उर्दू पढ़ना सीखते हैं इसलिए हमने इस बार कुछ किताबें उर्दू की खरीदी। पर भाषा शिक्षण में जो हाल हिन्दी का वही उर्दू का महसूस हुआ। कुछ ही बच्चे मजे से पढ़ पाए।

अभी तक पहली से तीसरी तक के बच्चों को हमने घर ले जाने के लिए किताबें नहीं दी थीं। इसके कारण थे पढ़ नहीँ पाना और किताब ठीक से न रखना, फाड़ना, खो देना आदि। इस बात का बुरा भी लगता था पर हमारी भी सीमाएँ थी। कई बार बच्चे अपने बड़ों को ले आते सिफारिश के लिए। अब तो हमें कुछ करना ही था। एकलव्य से कुछ नई तो कुछ सेकेंड्स वाली, प्रारम्भिक पढ़ना सिखाने वाली किताबें लीं, कुछ NCERT में काम करने के दौरान एकत्र की गई शिशु शिक्षा की सामग्री काम में ली। खासकर दूध डेयरी वाले केन्द्र में एक छोटी-सी डायरी में अलग से उनका नाम लिखा जाने लगा। इनमें भी कई बच्चे इतने नियमित और उत्साह से आते कि उनकी उपस्थिति से ही हमारा मन पुलकित हो जाता। किताबों की अदला-बदली के समय उनसे कथ्‍य पर, तो कभी चित्रों पर बात भी करते। आगे चलकर कुछ के नाम बड़े वाले रजिस्टर में दर्ज हो गए।

एक दिन एक किताब के टुकड़े लेकर एक बच्चा आया। कैसे फटी के जवाब में जनाब फरमाते हैं कि, "मैं पढ़ रहा था और इसमें चूहों के चित्र बने थे तो चूहे को गुस्सा आ गया और उसने रात में किताब फाड़ डाली।" अपनी हँसी रोकते हुए हमने पूछा कि चूहों ने तुम्हें तो नहीं काटा, तो बड़ी मासूमियत से कहा," नहीं।" हमारी किट से उस किताब का ऑपरेशन तो हो नहीँ सकता था। तभी एक विचार आया कि क्यों न इस किताब जैसी हस्तलिखित किताब बनाई जाए। फिर सोचा नकल के बजाय स्वयं लिखा जाए। कुछ छोटी कविताओं, सरल संस्मरण और कहानी लिखने का प्रयास किया। जैन मैडम, कीर्ति और हमारे स्कूल के विद्यार्थियों से चित्र बनवाकर अपनी किताबें भी तैयार कीं। हम चाहते थे कि बच्चों में इस तरह लिखने का  कौशल विकसित करें पर बात समयाभाव पर खत्म हो जाती।

वक्‍त का पहिया घूमता गया, बारिश की  छुट्टी, इसके बाद फिर शुरुआत, किताबों का बहना, गुमना, फटना, सिलना,जुटाना, लाना, खेलना-कूदना यथासम्‍भव चलता रहा। हमारी बच्चों से,  तो बच्चों की हमसे आशाएँ बढ़ रही थीं। कभी हम नाकाम होते तो कभी बच्चे।  मौसम, तीज-त्यौहार, परीक्षाओं के अलावा  समय-समय पर होने वाले चुनाव भी हमारे सामने एक बड़ी  बाधा की तरह आते रहे हैं। सरकारी कर्मचारी होने के नाते आचार संहिता तो क्या भंग करेंगे पर  अनावश्यक बातों में उलझकर ऊर्जा बर्बाद करने अच्छा चुप बैठना ज्‍यादा ठीक समझते हैं। इस कारण चुनाव के समय भी बच्चों को बताकर छुट्टी रखते हैं।

नई उड़ान

सितम्बर,16 में एक दिन दिल्ली से मित्र दीपक वर्मा का फोन आया। दीपक पहले एकलव्य में कार्यरत थे, अब स्वतन्त्र रूप से शैक्षिक फिल्म निर्माण कार्य करते हैं, यदा-कदा उनसे बात होती रहती थी। उनके पूछने पर मैंने बताया कि इस तरह की लायब्रेरी चला रहे हैं। तब उन्होंने कहा कि अपने काम का विवरण लिखकर भेजो। हो सकता है ‘सुरभि फाउण्‍डेशन’ से कुछ मदद मिल जाए। उन्होंने बताया कि यह संस्था व्यक्तिगत रूप से कार्य करने वाले लोगों की सामग्री देकर मदद करती है और वे भी इसके सदस्य हैं। हमें तो जैसे मुँह माँगी मुराद मिल गई। अभी तक ‘चहक’  के बारे में काफी लोग जानते थे पर हम लोगों ने कभी अखबार बाजी नहीं की, यहाँ तक कि उनके स्वयं विवरण चाहने पर भी टाल दिया। फोटो आदि हम लोग अपनी खुशी और खूबसूरत यादें संजोने  के लिए लेते रहते थे तो उसी आधार पर कार्यों का विवरण और अपनी जरूरतों की सूची ‘सुरभि फाउण्‍डेशन’ को भेज दी। पत्राचार हुआ और उन्होंने किताबें आदि खरीदने के लिए दस हजार रुपए दिसम्बर में भेज दिए। इनका उपयोग करते हुए हमने बच्चों, किशोरों और बड़ों के लिए हिन्दी, उर्दू, अँग्रेजी और द्विभाषी किताबें और क्राफ्ट के सामान, जिसमें मुख्यतः कागज, क्रेयॉन्स, ड्रॉइंग शीट आदि खरीद लिया। नई किताबों और क्राफ्ट सामग्री से ‘चहक’ की रौनक बढ़ गई। चित्रों के लिए बच्चों की खास फरमाइश होने से चित्रकारी का आयोजन ज्‍यादा होने लगा। पहले जब हम कोई कार्यशाला करते थे तो पुस्तकालय वाली गतिविधि उस दिन ठप्‍प  पड़ जाती थी, पर अब हम लोग और व्यवस्थित योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने लगे। हमारे स्कूल के 4-6 विद्यार्थी भी  ऐसे अवसर पर आकर मदद कर देते जिससे पुस्तक वितरण भी चलता रहता।

दूसरी किस्त

‘सुरभि फाउण्‍डेशन’ ने दिसम्बर अन्त में पुनः अपनी सहायता राशि दस हजार रुपये का चैक भेज दिया। उनकी सलाह थी कि हम इस राशि से दिल्ली में लगने वाले  ‘विश्व पुस्तक मेले’ से पुस्तकें खरीदें जिससे बच्चों को और बेहतरीन किताबें मिल सकें। उनकी सलाह पर अमल करते हुए दिल्ली जाने की योजना बनी। अन्य साथियों ने मुझे ही सारी जिम्मेदारी सौंपी। दो दिन की छुट्टी ली, हमारी आरामदायक यात्रा का खर्च उठाया हमारी लायब्रेरी में आर्थिक मदद देने वाले हमारे परिवार के बेटे प्रशान्त मिश्र ने। दो दिन के लिए रहने की सुविधा ‘एकलव्य’ के सौजन्य से हो गई। इस तरह किताबों और कुछ शैक्षिक खिलौनों की सौगात ‘चहक’ की झोली में आ गई।
दिल्ली जाते हुए अपनी यात्रा और उसके मकसद  ‘सुरभि फाउण्‍डेशन’ के सहयोग आदि को मैंने फेसबुक पर भी साझा किया था। पुस्तक मेले में राजेश उत्साही से, जो कि पहले एकलव्य में कार्यरत थे और वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के लिए बेंगलुरु में सेवाएँ दे रहे हैं, मुलाकात हो गई। उन्होंने मेरा स्टेट्स पढ़ा था और उन्हें भी यह काम पसन्द आया। उन्‍होंने भी अपनी तरफ से किताबें लेने के लिए पाँच सौ रुपये दिए। उन्हीं का आग्रह था कि मैं इसके बारे में लिखूँ ताकि और लोग न सिर्फ मदद करें बल्कि अपने यहाँ ऐसे पुस्तकालय चला सकें।

इस बार हमने अपने दोनों केन्द्रों के लिए किताबें रखने के लिए दो पेटियाँ, बच्चों के बैठने के लिए  दरियों के साथ ही  स्किपिंग के लिए रस्सियाँ, टेनिस वाले बैट आदि खेल सामग्री भी ली। अब किताबें लेने के साथ बच्चे खेलकूद भी करने लगे। खेल सामग्री लेना, मिलकर खेलना, व्यवस्थित रखना और गुमने पर खोजना सब बच्चों की सहायता से होने लगा।

एक और शाखा

नए केन्द्र खोलने की हमारी कोशिशें जारी थीं। शहर की नई बसाहट मदीना कालोनी में केन्द्र की शुरुआत करने के स्थान और उसमें मदद करने के लिए लोगों की तलाश करते समय  वहाँ चल रहे रिहाइशी मदरसे के बारे में जानकारी मिली। विभिन्न आयु वर्ग के 60 विद्यार्थी वहाँ दर्ज थे। हेमन्त भाई ने मौलवी साहब और अन्य सहयोग कर्ताओं से बात कर प्रस्ताव रखा कि क्यों न मदरसे में ही एक पुस्तकालय खोल दिया जाए, जिससे मदरसे के साथ ही आसपास के बच्चे भी किताबें पढ़ पाएँ। उनकी रजामन्दी मिलने पर हम सभी मदरसे गए। वहाँ मौलवियों और बच्चों से मिले। सबसे चर्चा कर मार्च,16 में पुस्तकालय की शुरुआत कर दी।

‘चहक’ का यह केन्द्र थोड़ा अलग है। किताबों के वितरण का कार्य यहाँ पढ़ाने वाले हाफ़िज़ जी करते हैं, अपनी सुविधा से इन्होंने गुरुवार का दिन चुना है। हम लोग 15-20 दिन में एक बार जाकर किताबों पर बातचीत, क्राफ्ट वर्क करवा देते हैं।
परीक्षा के बाद छुट्टियों में  मदरसे के बच्चे अपने घर चले जाते हैं इसलिए नए सत्र की शुरुआत तक यह भी बन्द रहती है।

सपने और सच्चाई

हमने अपने काम को शुरू करते समय सोचा था कि हम कुछ बच्चों को संसाधन और अवसर उपलब्ध कराकर उन्हें खुशियों दे सकते हैं। पर जैसे-जैसे हमारा काम बढ़ता गया, अनुभव मिलते गए कुछ और करने की सोच प्रबल होती गई। शहर के अलग-अलग इलाकों में सम्भावनाओं को टटोल रहे हैं। कभी लगता है बात बन गई तो कभी नहीं। पर जल्द ही एक-दो जगह काम शुरू हो जाएगा।

ख्वाब तो यह है कि आगे चलकर एक मोबाईल पुस्तकालय विकसित करेंगे जिससे उन तमाम बच्चों / बड़ों को  पुस्तकें पढ़ने को मिलगी जो खरीद नहीं सकते। हर शाम शहर की दो से तीन बस्तियों में जाने पर ऐसा हो पाएगा। हम शहर में अपने जैसे और लोगों को जोड़ेंगे जो इस सिलसिले को बढ़ा सकें। वैन में किताबों के साथ ही प्रोजेक्टर भी होगा जिससे शैक्षिक, मनोरंजक फिल्में दिखाकर, उन पर चर्चा कर पाएँ। खेलकूद, रंग-रोगन, हँसी-खुशी से बच्चों की दुनिया भर देना चाहते हैं। वैसे यहाँ यह बताना चाहूँगी कि फिल्म दिखाने का प्रयास हमने अभी भी किया था ये और बात है कि अलग-अलग कारणों से सफल नहीं हो सके। अपने काम के लिए हमें आर्थिक मददगार तो मिल ही जाएँगे, पर संचालन हेतु संवेदनशील, समर्पित साथियों की भी जरूरत होगी जिनकी तलाश जारी है।

हम जानते हैं कि हम जहाँ जा रहे हैं वहाँ के भी शत प्रतिशत बच्चे हमारे पास नहीं आ रहे हैं। पर फिर भी हम खुश हैं कि कुछ बच्चे समय से पहले पहुँचकर हमारा इंतजार करते हैं, अपने काम को छोड़कर, कभी अब्बू से छुपकर, तो कभी अब्बू-अम्मी के साथ बच्चियाँ हमारे पास आती हैं, बच्चे धींगा-मस्ती छोड़ लाईन से किताबें लेने खड़े हो जाते हैं। हमारे देर से जाने या गैप करने पर हमसे लड़ते हैं। अपनी खुशी या परेशानी बताते हैं। कुछ तो बदला है व्यवहार, खेल सामग्री का मिलकर, अदल-बदल कर उपयोग करना, रखरखाव करना आदि। पहले खाने-पीने की वस्तु पर झपट पड़ते थे पर अब अपनी बारी पर अपना हिस्सा लेना, किसी को कम पड़े तो साझा करना भले ही वह हमारे सामने ही हो हमारे लिए बड़ी बात है।

हमारे साथ जुड़ी कीर्ति उच्च अध्ययन के लिए इन्दौर गई हैं। उनसे संवाद होता रहता है। अब वहाँ मन लगा या नहीं पूछने पर कहती हैं अब अच्छा लग रहा है पर यहाँ भी कुछ वैसा ही सोशल वर्क मिले तो अच्छा लगेगा। यह भी हमारे लिए बोए बीज को अंकुरित होते देख पाने जैसा ही आनन्ददायक है।

तो ‘चहक’ की गूँज  बढ़ती रहे इस दिशा में हमारी कोशिशें जारी रहेंगी। इसके लिए आपके सहयोग और सुझावों का स्वागत है।


प्रस्‍तुति : शोभा बाजपेई, शिक्षिका, शासकीय माध्‍यमिक विद्यालय ऊँड़ा, हरदा, मध्‍यप्रदेश  । सभी फोटो शोभा बाजपेई की फेसबुक वॉल से साभार।

 

टिप्पणियाँ

22062407910 का छायाचित्र

very good

VIJAYKOTWAR का छायाचित्र

आपका प्रयास सार्थक, महत्वपूर्ण एवं सराहनीय है।

arunrathibtr का छायाचित्र

बहुत ही सराहनीय प्रयास... इस तरह के प्रयासों से वंचित वर्ग के बच्चों को भी बेहतर शिक्षा प्राप्त करने में सहूलियत होती है...

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