किसी 'खास' की जानकारी भेजें। गुरु जी दाऊद खान रामायणी

दाऊद खान रामायणी, रामचरित मानस का पाठ करते हैं। उन्हें जानने वाले प्यार से गुरु जी कहकर पुकारते हैं। बच्चे उन्हें चॉकलेट वाले दादा जी के नाम से जानते हैं। क्योंकि वे उनके सामने गुजरने वाले हर बच्चे या बड़े को चॉकलेट जरूर देते हैं। आज वे 93 साल के हैं, मगर बिलकुल फिट। रोज सुबह प्रातः भ्रमण पर जरूर जाते हैं।

गुरु जी आज जितने लोकप्रिय हैं वह एक शिक्षक के बतौर अपने समय में भी उतने ही लोकप्रिय थे। और इसकी वजह भी हैं।

9 सितम्‍बर,2016 को दाऊद खान रामायणी जी का निधन हो गया। टीचर्स ऑफ इण्डिया की ओर से उन्‍हें विनम्र श्रद्धांजलि।

“इस स्कूल के गेट के दोनों ओर गेंदे के फूल के पौधे होते थे। ऐसा लगता था मानो आपको गार्ड ऑफ आनर दिया जा रहा हो। यहाँ बागवानी भरपूर थी, जिसमें भटा, मिर्च, धनिया, मेथी तो होती ही थी, उनके अलावा कई फलदार वृक्ष भी थे जिसमें काजू भी था। यह सब दाऊद खान गुरु जी का प्रयास था।” यह कहना है उनके साथ सहायक शिक्षक के रूप में काम कर चुके शिक्षक शिव प्रसाद सारवान का। सारवान अभी भी उसी लोहरसी माध्यमिक शाला में शिक्षक हैं जहाँ दाऊद जी वहाँ की प्राथमिक शाला में सन 63 से सन 83 तक रहे। दोनों स्कूल एक ही अहाते में हैं।

दाऊद जी से जब इस सम्‍बन्‍ध में बात हुई कि उन्होंने यह सब कैसे किया था? इस पर उनका जवाब था कि,“यह सबसे महत्वपूर्ण है कि लोगों के साथ सम्‍बन्‍ध कैसा था? सम्‍बन्‍ध खराब होगा तो बना बनाया बिगड़ जाएगा। सम्‍बन्‍ध अच्छा होगा तो बिगड़ा हुआ बन जाएगा। जब मैं यहाँ आया तो जो पाठशाला थी वह केवल इमारत थी। तो सबसे पहले मेरे मन में आया कि इसकी परकोटा होना चाहिए। यह दो/ढाई एकड़ का प्लाट था। उसमें परकोटा बनाना था, 5 फीट साढ़े 5 फीट ऊँचाईं की। इसके लिए हमने रामायण का कार्यक्रम रखा। सबको मालूम था कि दाऊद खान गुरु जी आ रहे हैं जो रामायण पढ़ते हैं। चार बार मैंने रामायण पाठ किया और कहा कि  केवल मेरे रामायण पढ़ने और आपके सुनने से कुछ नहीं होगा। बल्कि रामायण जो कहती है वैसा आचरण करने से होगा। आपका स्कूल देखो, दो एकड़ के प्लाट में बना हुआ है और रात में गाय-बैल वहाँ घुसे रहते हैं। सुबह गोबर फेंकना पड़ता है उठाकर। इसमें अगर परकोटा बन जाता तो बहुत अच्छी बात होती। भगवान राम ने जहाँ-जहाँ कुटिया बनाई, परकोटा बनाया। सीता, राम और लक्ष्मण ने तीनों मिलके परकोटा बनाए हैं रामायण में। खाली राजा बनकर वह नहीं गए थे, सेवक बनकर गए थे राम। मेरी बात का प्रभाव पड़ा। तो वहाँ मिस्त्री थे, ईंटा जोड़ने वाले, फ्री में जोड़ा। वहाँ ईंटा बनाने वाले थे, फ्री में ईंटा दिया। सीमेंट फ्री में मिला। बताओ दो एकड़ का 6 फीट दीवाल, अंदाज लगाओ कितनी ईंट लगी होगी ? हमारा एक पैसा खर्च नहीं हुआ। अगर पैसा खर्च हुआ होता तो उस जमाने में भी कम से कम बीस हज़ार रुपया होता। जो मुफ्त में हो गया। सहयोग की परिभाषा समझानी नहीं पड़ी। आपस में अगर आदमी का प्रेम हो जाए, तो कठिन से कठिन कार्य सरल हो जाता है। और जहाँ खींचतान हो वहाँ सरल कार्य भी कठिन हो जाता है। यह प्रक्टिकल करके लोग सीख गए।”

दाऊद खान उसके पहले खरेंगा प्राथमिक शाला में भी पदस्थ थे। वहाँ के अनुभव के बारे में उनका कहना है कि, “खरेंगा में सबसे बड़ा काम मैंने यह किया कि,महानदी का पानी धूपकाले में सुख जाता था। पानी के लिए वह गाँव तरसता था। तो मैंने एक ही दिन में 10 फीट ऊँचा बालू का एक चेक डैम बनवा दिया। उसके ऊपर एक फीट चौड़ा रास्ता था जिसमें लोग चल सकते थे। इस तरह से 10 फीट ऊँचे डैम में 9 फीट पानी भरा था। बस्ती वालों के सामने बहुत बड़ा काम हुआ। जैसे जलाशय आ गया। जो बूँद-बूँद के लिए तरसते थे। नदी को खोद के जिसे झरिया बोलते हैं न, उसका पानी डूम डूम के पीते थे, वहाँ इतना पानी, खरेंगा से अछोटा तक लबालब पानी। और यह सिर्फ एक दिन में तैयार हो गया। इसमें पूरी पब्लिक भिड़ गई न, सबका स्वार्थ था। मैंने उनसे कहा कि अगर आप दिन भर भिड़ गए तो नदी क्या समुद्र बन सकता है। नदी को बाँधकर प्रक्टिकल कर देखा उन्होंने। इस तरह से कोई भी चीज असम्‍भव नहीं है। मेरे पास 2 चीजें हैं, प्यार करता हूँ और लोगों को लोगों से जोड़ता हूँ।

इस तरह से इन कामों के कारण ही 1972 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला। वी.वी.गिरि उस समय राष्ट्रपति थे। उन्होंने फर्स्ट क्लास की टिकिट भेजी और पूरा इंतजाम किया। मैं राष्ट्रपति भवन में आठ दिन मेहमान रहा और राष्ट्रपति भवन में मेरा रामायण पाठ हुआ। राष्ट्रपति ने पूछा कि हम आपको पुरस्कार दे रहे हैं, आप क्या महसूस कर रहे हैं। मैंने कहा, दाऊद खान जगतपति से पुरस्कृत है और आज राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा है।”

हम लोहरसी में वह स्कूल गए थे, पर आज वहाँ न तो बागवानी है और न स्कूल में अहाता। पर उस अहाते के अवशेष आज भी कहीं-कहीं दिखाई दे रहे हैं। दाऊद गुरु जी ने उस दौरान स्कूल में कई पेड़ भी लगवाए थे जिनमें से कई पेड़ बड़े और बूढ़े हो चुके हैं और कई पेड़ अब नहीं हैं।

‘‘हरेक पेड़ में गाँव के सयानों का नाम चिपका दिए थे, इस पेड़ में इनका नाम था लिखा है उस पेड़ में उनका नाम है, उससे वो सब बहुत खुश थे। प्यार बहुत असर करता है। पर वह तो तब होगा जब व्यवहार में परिवर्तन लाओगे तभी उसका असर होगा।” दाऊद जी ने कहा।

वे केवल स्कूल को सजाने और संवारने में समय व्यतीत नहीं करते थे बल्कि शिक्षा पर भी ध्यान केन्द्रित करते थे। उनके सहयोगी शिव जी का कहना है,“ दाऊद गुरु जी स्कूल में बहुत ही व्यस्त रहते थे। अध्यापन, बागवानी और बुनियादी शिक्षा पर भी ध्यान रखते थे। इन सबके साथ वह प्रधान पाठक होते हुए भी हर दिन तीन क्लास लेते थे।”

उस समय के एक बुजुर्ग अमर सिंह साहू का कहना है,“ ओ गुरुजी के बारे में काला (कहाँ तक) बताओं,ओखर कस गुरुजी तो संसार में नई ये।”


प्रस्‍तुति : पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, धमतरी, छत्‍तीसगढ़  

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

very nice

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