किसी 'खास' की जानकारी भेजें। गीता वर्मा के सपनों की मंजिल

‘हमारी इच्छाओं में शामिल हमारी कल्पनाएँ हमें कुछ नया कर गुजरने के लिए हमेशा प्रेरित करती हैं, इस नया कर गुजरने के भाव में स्वप्रेरणा का बड़ा महत्व है जो हमें स्वयं अनुभव कर कुछ नया सृजित करने में मददगार होती है और हम अपने उद्देश्य की ओर योजनाबद्ध तरीके से बढ़ पाते हैं। इस प्रकार प्रयास करते रहने से धीरे-धीरे मनचाही मंजिलें मिल ही जाती हैं।’ अपने मन के भावों को कुछ यूँ बयाँ करती हैं गीता वर्मा, जो राजकीय प्राथमिक विद्यालय कफलांग में प्रधानाध्यापिका की भूमिका में अपनी सेवाएँ विगत 22 वर्षों से निरन्तर दे रही हैं।

1990 के दौरान गीता जी का स्थानान्तरण राजकीय प्राथमिक विद्यालय मझेड़ा से राजकीय प्राथमिक विद्यालय कफलांग में हुआ था। प्राथमिक विद्यालय कफलांग चम्पावत शहर से दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित क्रान्तेश्वर नामक खूबसूरत चोटी पर बसा है। यह विद्यालय शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसमें मुख्य सड़क से लगभग 1 किलोमीटर का पैदल मार्ग भी शामिल है। कफलांग विद्यालय के चारों ओर तीन छोटे-छोटे गाँव कफलांग, राकड़ व दुधपोखरा आदि हैं जहाँ के 50 बच्चे आज इस विद्यालय को एक सार्थक पहचान दे रहे हैं। विद्यालय में 2 अध्यापिकाएँ है, स्वयं प्रधानाध्यापिका गीता वर्मा एवं सहायक अध्यापिका रेखा बोहरा जी। 

नए स्कूल से जुड़ने के भावों को गीता जी कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं कि विद्यालय में रसियारा जी और ईश्वरी भट्ट मैडम का साथ मिला जिन्‍होंने मेरा समय-समय पर काफी सहयोग किया। एक ओर विद्यालय की सुन्दर भौगोलिक छटा, खुली जगह और उसमे बच्चों की खिलखिलाती हँसी मन को मोहती थी तो दूसरी तरफ विद्यालय का पुराना भवन, बच्चों के लिए बैठने को अपर्याप्त जगह, पानी व शौचालय का अभाव, सुरक्षा दीवार के न होने से बरामदे में गोबर या मल का मिलना, विद्यालय का बारात घर के रूप में उपयोग जिससे विद्यालय में गंदगी तथा दीवारों का पान व गुटखे के थूक से सना होना आदि बातें भी चुनौती के रूप में हमारे सामने थीं। समुदाय का विद्यालय व बच्चों के प्रति उदासीन होना जिसका असर बच्चों में भी दिखता था, यहाँ देखा जा सकता था। बच्चों की निरन्तर अनुपस्थिति, गृह कार्य न करना, शिक्षण सामग्री का अभाव आदि बातें बच्चों के सीखने में अवरोध के रूप मे हमारे सामने थीं। इन सब समस्याओं का हल निकालना हमारे सामने एक प्रश्न चिह्न था, जिसका हल बिना समुदाय की मदद से सम्‍भव नही था तो समुदाय को अपने साथ कैसे लाया जाए? इस बात का हल तो हमारे पास नहीं था लेकिन एक बात मन में आई कि क्यों न इस बारे मे गाँव वालों से बातचीत की जाए।

विद्यालय की ओर गाँव

विद्यालय की स्थिति-परिस्थितियों से गाँव वालों को अवगत कराने के लिए घर-घर जाकर जनसम्पर्क कर उन्हें एकजुट करने का उनका प्रयास रंग लाया और अभिभावकों की मदद से बिना पैसे के विद्यालय के चारों ओर घेर-बाड़ की गई। विद्यालय में पेड़ लगाने व फुलवाड़ी बनाने में भी गाँव के लोगों ने मदद की और इस बात का भी लोगों ने भरोसा दिलाया कि अब विद्यालय का उपयोग बारात घर के रूप में नहीं किया जाएगा। किशन सिंह अधिकारी, नाथ सिंह रावत जी तथा गाँव के लोगों के सहयोग से विद्यालय में पानी की व्यवस्था व ऊबड़-खाबड़ मैदान को समतल किया गया, जिसमें व्यक्तिगत तौर पर गीता जी ने भी मदद की। सर्व शिक्षा अभियान से धन सहयोग मिलने पर विद्यालय में पक्की सुरक्षा दीवार, शौचालय, किचन व भवन का निर्माण करवाया गया। इस प्रकार समुदाय, विद्यालय व विभाग के आपसी समन्वयन से विद्यालय की कुछ व्यवस्थागत चुनौतियों तो कम हुई परन्तु अभी बच्चों के सीखने मे आ रही चुनौतियों से हम जूझ रहे थे। बच्चों को सिखाने में अभिभावकों का सहयोग काफी अहम है। बच्चे विद्यालय में क्या सीख रहे हैं, कैसे सीख रहे हैं, क्यों नही सीख पा रहे हैं उन्हें सीखने में क्या दिक्कतें आ रही हैं सीखने के दौरान उनकी जरूरतें क्या हैं तथा सीखने के लिए लगातार विद्यालय जाना जरूरी है आदि महत्वपूर्ण बातों की ओर अभिभावकों का ध्यान हो इसके लिए हमने अपने विद्यालय में मातृ-समूह का गठन किया जिसमें हमारे विद्यालय के लगभग प्रत्येक बच्चे की माताएँ जुड़ी हैं और प्रत्येक सदस्य 50 रुपये प्रतिमाह की मासिक अल्पबचत करता है। प्रत्येक माह की अल्पबचत को लॉटरी के माध्यम से जिस सदस्य के नाम की पर्ची निकली उसे दे दिया जाता है। इस प्रकार महिलाएँ  छोटी सी अल्पबचत के माध्यम से एक-दूसरे की मदद तो करती ही हैं पर इस बहाने वे महीने में एक बार विद्यालय में आ जाती हैं और हम उनसे बच्चों के सीखने सम्बन्धी बातों पर चर्चा कर पाते हैं साथ ही बच्चों, अभिभावकों व हमारा एक जगह पर संवाद हो पाता है। इसका असर हमें बच्चों में देखने को मिला। बच्चों की निरन्तर उपस्थिति, स्वच्छता का स्तर, गृहकार्य का नियमित होना व बच्चों के पास शिक्षण सामग्री की उपलब्धता आदि में हमें मदद मिल रही है। वैसे तो अब बच्चे अनुपस्थित नहीं रहते पर यदि कभी कोई बच्चा दो या तीन दिन से ज्यादा अनुपस्थित रहा तो मैं सीधे उसके घर सम्पर्क पर चली जाती हूँ। ऐसा करते रहने पर अब बच्चे समझ गए हैं कि यदि हम स्कूल नहीं गए तो मैडम घर आ जाएँगी इसके बजाय रोज विद्यालय जाना ही ठीक है।

गाँव में मजदूरी करने आए एक परिवार के बारे मे जिक्र करते हुए गीता जी बताती हैं कि जब उन्हें पता चला कि विगत छह माह से एक परिवार यहाँ आकर बसा है और उनके छह बच्चे (तीन लड़के और तीन लड़कियाँ) हैं जो विद्यालय नहीं जाते हैं तो हम उस परिवार से मिले। बातचीत करने पर पता चला कि उनमें से तीन बच्चे तो अभी छोटे हैं पर बड़े तीनों बच्चे (दो लड़के और एक लड़की) तो स्कूल आ ही सकते थे। उनकी माँ से उन्हें कल से स्कूल भेजने की बात की तो वह बोली ठीक है बहन जी इसके पिताजी से कहूँगी, अभी वे घर पर नहीं हैं। दूसरे दिन पिताजी दोनों बेटों को लेकर स्कूल आ गए। लेकिन सरिता को नहीं लाए, पूछने पर बोले कि घर जंगल में है और छोटे बच्चों को देखने वाला भी चाहिए, इसलिए हम लड़की का नाम नहीं लिखवा सकते। मैंने उन्हें समझाया कि आज लड़का-लड़की समान है तो आपका ऐसा अन्तर करना ठीक नहीं है। बहिन जी बेटी हमारी है हमें उसकी चिन्ता है हम पढ़ाएँ या न पढ़ाएँ हमारी मर्जी, तुम्हें इन बच्चों का नाम लिखना है तो लिखो नहीं तो मैं दूसरे स्कूल में लिखवा देता हूँ। फिर मैंने बातचीत करना उचित नहीं समझा और बच्चों का नामांकन कर दिया लेकित मन अशान्‍त था कि यदि सरिता स्कूल नहीं आई तो यह उसके साथ अन्याय होगा।

दूसरे दिन एक बच्चे की तबियत खराब थी और वह स्कूल नहीं आया था तो मैं उनके घर चली गई। सरिता का घर रास्ते में ही था तो सोचा एक बार फिर सरिता के लिए कोशिश की जाए। उस दिन सरिता के माता-पिता दोनों घर पर ही थे। सरिता को स्कूल भेजने की बात करते हुए मुझे थोड़ा झिझक तो हो रही थी पर फिर भी मैंने अपनी बात उनके सामने रखी। पर उनसे घर व खर्चे की समस्या का उत्तर मिला तो मैंने कहा कि उसके कॉपी पेन्सिल का खर्च मैं दे दूँगी आप इस बात की चिन्‍ता मत करो बस मेरा यह सुझाव मान लो। बहुत समझाने पर दोनों राजी हो गए और सरिता का दाखिला विद्यालय में हो गया। सरिता विद्यालय आई तो पढ़ने लगी और वह कभी स्कूल आती तो कभी नहीं आती पर पढ़ने में उसका मन था। इस तरह उसने कक्षा तीन उत्तीर्ण की और कक्षा चार में आ गई। यहाँ सरिता अक्सर अनुपस्थित रहने लगी उसके भाइयों से पता चला कि उसकी बहिन की तबीयत खराब होने के कारण वह स्कूल नहीं आ रही है। एक बार पुनः उनके घर गई तब पता चला कि उसकी छोटी बहिन रेणु के इलाज में लापरवाही की वजह से उसकी दोनों आँखें खराब हो गई हैं और अब इसकी देखरेख के लिए उसे घर में रहना पड़ता है। उनकी माता से बात की कि अब रेणु और पूजा भी 5 वर्ष की हो गई हैं। तुम दोनों का नाम स्कूल में लिखवा दो यहाँ उन्हें देखभाल के साथ खाना भी मिलेगा और वे दोनों पढ़ भी सकेंगी और साथ ही सरिता कक्षा 5 की पढ़ाई कर सकेंगी। वे  मान गईं। इस प्रकार सरिता व उसकी बहनें रोज स्कूल आने लगीं। सरिता ने खेलकूद, सांस्कृतिक व सुलेख प्रतियोगिता में जनपद व राज्य स्तर पर प्रतिभाग कर स्थान प्राप्त किया। जब सरिता ने कक्षा 5 उत्तीर्ण किया तो आगे उसका दाखिला कक्षा 6 में नहीं किया गया। उसके माता-पिता से इस बारे में बात की तो वे वही खर्चे व घर की समस्या बताने लगे। सरिता एक साल घर पर रह गई इस बीच वह अपनी दोनों बहनों को स्कूल लाती थी हमने उसकी पढ़ाई का अभ्यास विद्यालय में जारी रखा। इस बीच मैं राज्य स्तर की टी.एल.एम. प्रतियोगिता हेतु देहरादून गई। इस दौरान हमने एक शाम कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय टनकपुर में विश्राम किया। मुझे यहाँ की प्रधानाध्यापिका से यहाँ की प्रवेश प्रक्रिया के सन्‍दर्भ में पता चला तभी मैंने सोच लिया था कि सरिता को इस विद्यालय में प्रवेश दिलवाऊँगी। प्रवेश शुरू होने पर सरिता के घर वालों से बात की तो पहले वे तैयार नहीं हुए पर फिर समझाने पर मान गए। सरिता कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, टनकपुर में पढ़ने लगी जहाँ  से उसने हाईस्कूल किया और अब वह राजकीय बालिका इंटर कॉलेज चम्पावत में पढ़ रही है।

सरिता की छोटी बहिन रेणु के बारे में बताती हुए वह बोलती हैं कि रेणु बिल्कुल आँख से देख नहीं पाती थी लेकिन वो अन्‍दाज से विद्यालय के कमरों, शौचालय व मध्ह्यान भोजन की जगह पर चली जाती थी और उसके गाने की आवाज भी अच्छी थी। लेकिन हमारे लिए समस्या यह थी कि उसे पढ़ाया कैसे जाए। उसके लिए हमने मिट्टी की गोलियाँ गिनने के लिए व थर्मोकोल पर उभरे अक्षर बनाए जिससे वह उसे गिनती व अक्षर ज्ञान हो सके। लेकिन हम मात्र दो ही शिक्षक थे जिससे हम उसे ज्यादा समय नहीं दे सके और हमें इसमें विशेष सफलता नहीं मिली। रेणु का उत्साह व रुचि देखकर लगता था कि यह बच्ची काफी होनहार हैं। हम उसे विद्यालय की प्रत्येक गतिविधि में प्रतिभाग करवाते थे जिससे वह अपने आप को अलग न समझे। विशेष आवश्यकता वाले बच्चे की कला व कविता प्रतियोगिता में रेणु ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। उसे अब विद्यालय में बहुत अच्छा लगता था। वह बारिश के दिन भी अपनी माँ से स्कूल आने की जिद करती थी। यहाँ मैं अपने शिक्षा विभाग और विशेषकर अपने सी.आर.सी. महोदय श्री मुकेश वर्मा जी को विशेष धन्यवाद देना चाहूँगी जिनके प्रयासों से रेणु अब देहरादून में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के स्कूल में पढ़ रही है।

विद्यालय में सीखना-सिखाना

बच्चों के सन्दर्भ में गीता जी का मानना है कि बच्चे कभी गलत नहीं होते। उन्हें  हम जैसा माहौल देंगे वे वैसा ढल जाते हैं बशर्ते हमारे प्रयास सही हों। वे कहती हैं कि विद्यालय में बच्चों का निरन्तर ठहराव करवाने में अभिभावकों का सहयोग सराहनीय है तो अब बच्चों को सीखने में आनन्द आए उन्हें अपना विद्यालय अच्छा लगे और वे सीखने के प्रति उन्मुख हो सके आदि बातों का सम्बन्ध तो विद्यालय के माहौल व शिक्षण गतिविधियों पर निर्भर करता है। इस कार्य की धुरी हम शिक्षक ही हैं। बच्चों को मैत्रीपूर्ण वातावरण में ही मजा आ सकता है जहाँ उन्हें कोई डर न हो और वे अपनी बात को बोल सकें। हमने इस बात का पूरा ध्यान रखा और हमें खुशी है कि इस बारे में हमने अपने बच्चों का विश्वास जीता है। हमने बच्चों से लगातार संवाद कर विद्यालयी गतिविधियों में उनकी प्रतिभागिता को बढ़ावा दिया, उनसे दोस्ताना सम्बन्ध बनाने की कोशिश की और आज हम देखते हैं कि हमारे बच्चे निडर हैं, वे अपनी बात को बेझिझक दूसरों के सामने रख पाते हैं और उन्हें अपने विद्यालय रोज आना पसन्‍द है।

विश्वास के सन्दर्भ में अपने भावों को बताते हुए वह बोलती हैं कि एक शिक्षक का एकमात्र कार्य शिक्षण ही नहीं है अपितु बच्चों का विश्वास उनका प्यार-प्रेम पाना भी एक शिक्षक के लिए बड़ी गौरवपूर्ण बात है। हमारा अपना भी व्यक्तिगत जीवन होता है और बहुत सारे विभागीय कार्य भी होते हैं जिनके लिए हमें विद्यालय से बाहर जाना होता है जैसे आज स्कूल आए और हो सकता है कि दोपहर बाद बी.एल.ओ. या बैंक के कार्य से या किसी अन्य आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ सकता है तो ऐसी स्थिति में, मैं हमेशा बच्चों को बताकर जाती हूँ। मैंने यह बात महसूस की कि जब मैं उन्हें बिना बताए स्कूल से चली जाती तो उन्हें यह अच्छा नहीं लगता था। वे भी मुझसे अपनी बातें छिपाते थे जो मुझे कभी दूसरों से पता चलती थीं तब मैंने समझा कि बच्चों का विश्वास जीतना एकतरफा बात नहीं है और मैंने बच्चों से अपने बारे मे जरूरी अनुभव उनसे साझा किए तो मैंने उन्हें अपने काफी नजदीक पाया और इसका फायदा मुझे शिक्षण में भी मिला।

बच्चे आजादी पंसद करते हैं और हम बड़े भी तो आजाद रहना चाहते हैं। वह बताती हैं कि मैंने महसूस किया कि अपनी तो मन के मुताबिक और बच्चों पर अंकुश हम बड़ों की फितरत है। बच्चों के लिए ऐसा न करो, यहाँ आओ वहाँ जाओ, इसे यहाँ रखो, विद्यालय समय पर आओ आदि-आदि। पर क्या हम बच्चों को भी ऐसी आजादी दे सकते हैं कि यही प्रश्न वे हमसे भी पूछ सकें। बच्चों से देरी में आने का कारण तो मैं पूछ लेती थी पर यदा कदा जब मैं देर से विद्यालय आती हूँ तो क्या बच्चों को आजादी है कि वे मेरे देरी से आने का कारण जान सकें? और मैंने शुरुआत की उन्हें बताने की और आज उन्हें मुझे पूछने की आजादी है। ऐसा करके मैंने देखा और पाया कि यह आजादी बच्चों को निडर बनाने में और उन्हें स्व-अनुशासन में रहने के लिए प्रेरित जरूर करती है। बस हमें थोड़ा धैर्य रखना होता है। 

बच्चों का लगातार स्कूल न आना, किताब-कॉपी पेन्सिल आदि का न होना, गृहकार्य न करना, हम शिक्षक कम थे तो कॉमन क्लासरूम होना तथा बच्चों का पढ़ने-लिखने में गलती करना आदि बहुत सारी समस्याएँ हमारे बच्चों में भी थी और हैं भी परन्तु कुछ प्रयासों से ये अब कम हो गई है। अभिभावकों ने ध्यान दिया तो बच्चे अब रोज स्कूल आ रहे हैं। अब उनके पास शिक्षण सामग्री भी होती है। जो स्कूल में आज पढ़ाया वही हम गृहकार्य देते हैं और लगभग सभी बच्चे अपना गृहकार्य करके लाने लगे हैं जो करके नहीं लाते उन्हें हम विद्यालय में करवाते हैं, ऐसा करने से अब बच्चे समझने लगे हैं कि अगर गृहकार्य करके नहीं ले गए तो स्कूल में तो करना ही पड़ेगा। पढ़ने-लिखने में गलती करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है इसे अभ्यास से सुधारा जा सकता है और इसके लिए हम बच्चों को पढ़ने-लिखने के खूब अवसर किताब, कॉपी व श्यामपट्ट पर देते हैं। जिससे बच्चे एक दूसरे के द्वारा किए गए सही-गलत से ज्यादा समझते हैं और उन्हें सही-गलत का अन्तर ठीक से समझ में आ जाता है। हम बच्चों से अपने अनुभव लिखने को कहते हैं जिसे वे बड़े चाव से लिखते हैं व एक-दूसरे को सही भी करते हैं।

हमारी कक्षाओं में कॉमन क्लासरूम बैठक व्यवस्था है। बहुत बार हमें एक कक्षा के बच्चों को किसी अवधारणा पर समझ बनाने हेतु अलग कक्षा कक्ष अभ्यास की आवश्यकता महसूस होती है तो इसके लिए हमने विद्यालय में एक आउटडोर एक्टीविटी कॉर्नर बना रखा है। यह कार्नर एक शौचालय की दीवार का उपयोग करके उस पर एक चबूतरा व बच्चों के लिए बैठने हेतु कंक्रीट के मोड़े बनाए गए हैं। यहाँ हम सैपरेट क्लास एक्टीविटी द्वारा बच्चों को सिखाने का प्रयास करते हैं।

टी.एल.एम. के बारे में गीता जी कहती हैं कि टी.एल.एम. के बिना मैं शिक्षण को अधूरा मानती हूँ। टी.एल.एम. से बच्चे ज्यादा समझते हैं और विभिन्न अवधारणाओं को गहराई से महसूस करते हैं। इस बात को वह एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करती हैं जैसे हमारे पहाड़ के बच्चों के लिए रेलगाड़ी एक नई अवधारणा है जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा है। इसे दो तरीकों से बच्चों को समझाया जा सकता है एक तो रेलगाड़ी का चित्र दिखाकर उसके बारे में बच्चों को बताना और दूसरा हम एक प्रयोग करके रेलगाड़ी जैसा कुछ बनाने का प्रयास बच्चों की मदद से कर सकते हैं। जैसे खाली माचिस के बहुत सारे बॉक्स लें और उन्हें धागे या पिन की सहायता से रेल के डिब्बों की भाँति जोड़ लें। और पहले वाले बॉक्स को इंजन बनाने के लिए उसमें धूप जलाकर रखें और धागे की सहायता से धीरे-धीरे रेल के इंजन की आवाज निकालते हुए खींचे। यह बच्चों को अपने द्वारा बनाई हुई रेलगाड़ी लगेगी और वे रेलगाड़ी के बारे में वे सार्थक चर्चा कर सकेंगे। उनका ध्यान शिक्षण में लगेगा और उन्हें इसमें मजा भी आएगा। हमने इसी तरह के बहुत सारे टी.एल.एम.बच्चों के सीखने के लिए बना रखे हैं। जिसमें टाट-पट्टी पर ऊन से भारत का नक्शा, ज्ञान वृक्ष, रेलगाड़ी, पानी छानने की विधि, मानव शरीर के अंग, मानव कंकाल, व्याकरण एलबम, स्टोरी कार्ड, शब्द कार्ड-विलोम, पर्यायवाची व समानार्थी, शब्द अंताक्षरी, शतरंज से जोड़ गुणा, घटाना व भाग आदि। हमारे साथ शिक्षक प्रेरक त्रिलोक जी व आँगनवाड़ी सेविका श्रीमती गोबिन्दी जोशी का सहयोग काफी सराहनीय है वे बच्चों को सिखाने में अपना सहयोग हमें निरन्तर देते रहते हैं। यहाँ वे एक मजेदार बात बताती हैं कि त्रिलोक जी व सहायक अध्यापिका रेखा जी इसी विद्यालय से पढ़़े हैं और उनके शिष्य रहे हैं। इन दोनों का सहयोग विद्यालय के लिए सराहनीय है रेखा जी की हैंडराइंटिंग की तारीफ करते हुए बताती हैं कि उनका हस्तलेख काफी अच्छा है और वह इसको लेकर बच्चों के साथ काफी अभ्यास करती हैं जिसका फायदा बच्चों को मिल रहा है। दोनों भोजनमाताओं का विद्यालय के प्रति समर्पण स्वागतयोग्य है। ये दोनों विद्यालय की फुलवाड़ी का रख-रखाव, किचन गार्डन में सब्जियों व दालों के उत्पादन में तथा भोजन व्यवस्था कुशलता से करती हैं।

गीता वर्मा जी को उनके प्रयासों के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है।


गीता वर्मा जी से विजय आनन्द नौटियाल की बातचीत पर आधारित । अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित 'उम्‍मीद जगाते शिक्षक-2' से साभार

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