किसी 'खास' की जानकारी भेजें। गिरिराज सिंह चौहान : हर बच्‍चे में प्रतिभा है

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बाढ़ छौरिया, निवाई से 22 किलोमीटर एवं वनस्थली से 10 किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित है। इस विद्यालय से 3 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में देवधाम जोधपुरिया है। इसकी स्थापना सन् 1987 में प्राथमिक विद्यालय के रूप में हुई थी। सन् 2006 में यह उच्च प्राथमिक स्तर पर क्रमोन्नत हुआ।

विद्यालय में आठ कक्षा कक्ष, दो छोटे कक्ष (स्टोर), एक रसोई घर व चारों ओर पक्की चारदिवारी  है। विद्यालय में लगभग 60 छायादार वृक्ष लगे हुए हैं जिससे यहाँ का वातावरण हरा-भरा दिखाई देता है। विद्यालय में पहुँचने के लिए पक्का सड़क मार्ग है। विद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों में से लगभग 95 प्रतिशत संख्या मीणा समुदाय के बालक, बालिकाओं की है।

इस विद्यालय में मेरी नियुक्ति 8 अक्टूबर 1999 में हुई थी। इससे पूर्व मैंने वर्ष 1995 से 1998 तक निवाई के प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया था। मेरी यह कामना थी कि निजी विद्यालयों में विद्यमान विशेषताओं को यहाँ उपयोग करके इस विद्यालय को निजी विद्यालयों के समकक्ष खड़ा कर सकूँ। मेरी नियुक्ति से पूर्व यहाँ एक अध्यापक नियुक्त थे अतः मैंने सह अध्यापक के रूप में अपना कार्य प्रारम्भ किया। सरकारी विद्यालय में अध्यापन का मुझे अनुभव नहीं था। अतः प्रारम्भ के तीन माह अक्टूबर से दिसम्बर तक मैंने विद्यालय वातावरण, समुदाय, साथी अध्यापक की कार्य शैली एवं व्यवहार, बच्चों का शैक्षणिक स्तर समझने में लगाया। जनवरी 2000 से मैंने विद्यालय में नवीन प्रयास प्रारम्भ किए।

जो समस्‍याएँ मैंने पहचानी  

विद्यालय में 70 बालक-बालिकाएँ नामांकित थे। उनमें से औसत उपस्थिति लगभग 40-50 की रहती थी। जब मैंने उपस्थिति बढ़ाने के लिए प्रयास प्रारम्भ किए तो साथी अध्यापक ने टिप्पणी की कि ये बालक अनुसूचित जनजाति के हैं, इनके लिए ये प्रयास करना निरर्थक है। ये सुधरने वाले नहीं हैं। उस समय मैंने उनकी इस टिप्पणी का कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन मन में यह निश्चय किया कि एक दिन मैं इनकी इस धारणा को बदल दूँगा। उस समय जब मैं किसी बालक या बालिका से कोई प्रश्न पूछता या उनसे उनका नाम आदि पूछता तो वे किसी भी प्रश्न का ठीक प्रकार से उत्तर नहीं दे पाते थे। वे बेहद डरे हुए रहते थे। उनमें आत्म विश्वास का अभाव था। जब मैंने इस समस्या के मूल में जाने का प्रयास किया तो ज्ञात हुआ कि साथी अध्यापक बच्चों के प्रति बहुत कठोर थे। वे बच्चों को बहुत अधिक शारीरिक दण्ड देते थे, जिससे बालक हमेशा उनसे डरे हुए रहते थे।

बच्चों की  लिखित व मौखिक अभिव्यक्ति कमजोर थी। विद्यालय का वातावरण नीरस व बोझिल था। बच्चे किसी विषयवस्तु को केवल रटकर याद करना ही जानते थे। प्रार्थना मात्र औपचारिकता थी। विद्यालय में किसी भी प्रकार की सहशैक्षिक गतिविधियों का आयोजन नहीं होता था। बच्चे मैले-कुचैले व बिना विद्यालय गणवेश के आते थे। उस समय विद्यालय में मात्र दो ही कक्षा कक्ष थे। पीने के पानी की समस्या थी। विद्यालय की चारदिवारी अपूर्ण थी। विद्यालय में फर्नीचर व अन्य सुविधाएँ नाम मात्र की थीं। ग्रामवासी विद्यालय के प्रति उदासीन थे।

मैंने इन समस्याओं से जूझने के लिए ये लक्ष्य तय किए

1. बच्चों में व्याप्त भय को दूर करना तथा उनमें आत्मविश्वास का संचार करना।

2. विद्यालय में सह शैक्षिक गतिविधियों का आयोजन करना।

3. साथी अध्यापक के अहम् को ठेस पहुँचाए बिना उनकी सोच में परिवर्तन लाना। उनको अपने नवीन प्रयासों में भागीदार बनाना।

4. ग्रामवासियों का विद्यालय से जुड़ाव बढ़ाना।

5. राष्ट्रीय पर्वों एवं उत्सवों को आकर्षक व प्रभावी बनाना।

6. प्रार्थना कार्यक्रम को सरस व प्रेरणादायी बनाना।

7. बच्चों के शैक्षणिक स्तर में सुधार लाना।

8. विद्यालय वातावरण को साफ-सुथरा व सुसज्जित बनाना।

9. बच्चों में छिपी प्रतिभा की पहचान करके उन्हें आगे बढ़ाना।

10. विद्यालय की पहचान एक आदर्श विद्यालय के रूप में बनाना।

उपर्युक्त सुधार कार्यक्रमों के लिए मैंने अपनी ओर से छह माह की समय सीमा निर्धारित की।

मैंने जो प्रयास किए

बच्चों में व्याप्त भय को दूर करने के लिए उनसे अनौपचारिक बातचीत प्रारम्भ की। उनकी घरेलू स्थिति, परिवार के सदस्यों आदि के बारे में जानकारी प्राप्त की। उनको छोटी-छोटी कविताएँ, गीत, पहाड़े, गिनती आदि बुलवाने का अभ्यास प्रारम्भ किया। इससे उनकी झिझक दूर हुई तथा वे अपने विचारों को खुलकर अभिव्यक्त करने लगे। प्रारम्भ में साथी अध्यापक का व्यवहार नकारात्मक व असहयोगात्मक रहा परन्तु धीरे-धीरे उनकी सोच में परिवर्तन आने लगा। जब उन्होनें बच्चों को खुश रहते देखा तो उन्होनें भी सकारात्मक सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया।

  • विद्यालय में समय-समय पर, खेलकूद, सुलेख, श्रुतलेख, चित्रकला, बालसभा आदि का आयोजन प्रारम्भ किया। इससे बच्चों में आत्म विश्वास का संचार हुआ तथा उनमें छिपी प्रतिभा सामने आने लगी। श्रेष्ठ प्रदर्शन को पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया।
  • ग्रामवासियों से सहयोग प्राप्त करने एवं उनका विद्यालय के प्रति जुड़ाव बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उनको आमंत्रित किया तथा आपसी बातचीत व बैठकों के माध्यम से उनकी भागीदारी बढ़ाई।
  • राष्ट्रीय पर्वों को आकर्षक व प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न रोचक एवं आकर्षक कार्यक्रम जैसे नृत्य, गीत, नाटक, विचित्र वेशभूषा, मूकाभिनय, कविता पाठ आदि की प्रस्तुति की गई। इससे ग्रामवासी बहुत प्रभावित हुए तथा उनका विद्यालय के प्रति रूझान बढ़ा। इन कार्यक्रमों के फोटो लिए गए तथा सी.डी. भी बनवाई गई। इन फोटो को विद्यालय में व्यवस्थित रूप से लगाया गया जो कि विगत 10 वर्षों से विद्यालय में आयोजित कार्यक्रमों के साक्षी हैं।
  • प्रार्थना कार्यक्रम को प्रभावी व सरस बनाने के लिए वाद्य यन्त्रों (ढ़ोलक, मजीरे) सहित प्रार्थना व गीत आदि बोलने का अभ्यास प्रारम्भ किया। प्रार्थना कार्यक्रम की साप्ताहिक योजना बनाकर बदल-बदल कर सरस्वती वन्दना, ईशवन्दा, गुरुवन्दना, गीत आदि बुलवाए जाने लगे जिससे बच्चों को इसमें आनन्द आने लगा। साथ ही प्रार्थना स्थल पर सामान्य ज्ञान, अखबार वाचन आदि का भी नियमित रूप से उपयोग करना प्रारम्भ किया। प्रार्थना स्थल पर बच्चों की स्वच्छता व गणवेश की जाँच नियमित रूप से की जाने लगी।
  • बच्चों के शैक्षणिक स्तर में सुधार लाने के लिए भाषागत कमजोरी को दूर करने के लिए नियमित रूप से सुलेख, श्रुतलेख व पठन का अभ्यास प्रारम्भ किया। जोड़ बाकी, गुणा, भाग, संख्या की पहचान करने का अभ्यास किया जाने लगा। शैक्षणिक रूप से पिछड़े बालक-बालिकाओं की पहचान करके उनके लिए अतिरिक्त कक्षा का आयोजन किया।
  • विद्यालय वातावरण को साफ-सुथरा व सुसज्जित बनाने के लिए विद्यालय में 100 छायादार पेड़ लगवाए उनमें से 60 पेड़ वर्तमान में जीवित अवस्था में है तथा पूर्ण रूप से बड़े वृक्ष के रूप में विकसित हो चुके है। इन पेड़ों की नियमित रूप से देखरेख व पानी व सुरक्षा के लिए बच्चों को उत्तरदायित्व दिए गए। प्रति पौधे को दो-दो बच्चों को नियुक्त करके उनकी देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी। इससे आज विद्यालय में चारों और हरे-भरे पेड़ लगे हुए हैं।
  • विद्यालय को साफ सुथरा रखने के लिए प्रति कक्षाकक्ष, विद्यालय परिसर, बरामदे, शौचालयों आदि की साफ सफाई एवं स्वच्छता के लिए बच्चों को पृथक-पृथक उत्तरदायित्व सौंपे गए। इसकी देखरेख के लिए एक साथी अध्यापक को नियुक्त किया। स्वच्छता की साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक योजना बनाई।
  • बच्चों द्वारा स्वनिर्मित शैक्षणिक चार्टस आदि व महापुरूषों के चित्रों के पोस्टर कक्षा-कक्ष में व्यवस्थित रूप से लगाए गए। समय-समय पर कक्षा सजाओ, बस्ता सजाओ आदि प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।

अन्य उपलब्धियाँ

  • ग्राम बाढ़ छौरिया से लगभग 2 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित ढ़ाणी जेबान, जो कि मूल से राजस्व ग्राम जगतपुरा की ढ़ाणी है, के 15 बालक-बालिकाएँ शिक्षा से वंचित थे। इस ढ़ाणी की दूरी जगतपुरा से चार किलोमीटर व सुनारा, छोरिया से तीन किलोमीटर है। हमने उनके नामांकन अपने विद्यालय में करने का प्रयास किया। प्रारम्भ में उनके माता-पिता इसके लिए तैयार नहीं हुए परन्तु विश्वास दिलाने पर वे सन्तुष्ट हो गए और उन 15 बालक-बालिकाओं को विद्यालय में नामांकित करवाया।
  • वर्तमान में लगभग 50 बालक-बालिकाएँ ग्राम छौरिया, आकोड़िया, सुनारा से इस विद्यालय में अध्ययनरत हैं। यह इस विद्यालय के बेहतर शैक्षणिक वातावरण व स्नेहिल व्यवहार का प्रमाण है।
  • बच्चों में खेलकूद के प्रति लगाव बढ़ाने के लिए नियमित रूप से कबड्डी, खो-खो, दौड़ आदि का अभ्यास प्रारम्भ किया जिसके परिणामस्वरूप प्राथमिक वर्ग खो-खो प्रतियोगिता की जिला स्तरीय बालिका प्रतियोगिता में स्थानीय विद्यालय की छात्राओं ने वनस्थली विद्यापीठ जैसी सक्षम टीम को हराकर फाइनल मैच जीता।
  • बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पहचान शाला के माध्यम से विद्यालय की 15 बालिकाओं को निरन्तर प्रोत्साहित किया। जिससे उनमें से दो छात्राएँ सुनिता मीणा व लाली मीणा ने कक्षा आठ की बोर्ड परीक्षा दी है। इन दो बालिकाओं का विवाह हो चुका था तथा ससुराल पक्ष वाले इन्हें ससुराल ले जाने के लिए बार-बार दबाव डाल रहे थे, तब उनको समझाने व शिक्षा का महत्व बताने के उपरान्त वे इन दो बालिकाओं को पढ़ाने के लिए सहमत हो गए।
  • वर्ष 1992 में ग्राम पंचायत ने विद्यालय में दो कमरों का निर्माण करवाया था जो कि किसी विवाद के कारण अपूर्ण रह गए थे। जो कि विगत 13 वर्षों तक अपूर्ण अवस्था में ही थे। अतः इनको पूर्ण करवाने के लिए ग्राम पंचायत में बात करके प्रस्ताव लिया गया और एस.जे.आर.वाई. योजना के अन्तर्गत उनको पूर्ण करवाया गया।
  • विद्यालय में छात्रों में अल्प बचत को प्रोत्साहित करने के लिए एक मिनी बैंक की स्थापना की है जिसमें लगभग 6000 रू. जमा हैं। इसके लेनदेन की व्यवस्था स्वयं छात्रों द्वारा की जाती है तथा आवश्यकता के समय बालक इसमें से राशि निकलवाकर अपनी शिक्षण उपयोगी सामग्री यथा पेन, पेन्सील, अभ्यास पुस्तिकाएँ आदि खरीद सकते है। ये सामग्री विद्यालय में उचित दर पर बच्चों को दी जाती है तथा इसका संचालन बच्चों द्वारा ही होता है।
  • वर्तमान में विद्यालय में कुल 6 अध्यापक-अध्यापिकाएँ कार्यरत है तथा विगत आठ वर्षों से मैं यहाँ कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत हूँ। साथी अध्यापक/अध्यापिका को उनकी रुचि के अनुरूप दायित्व दिए गए हैं जैसे - परीक्षा, मिड डे मील, क्रीड़ा , साज- सज्जा, वृक्षारोपण, पुस्तकालय आदि जिसको वे पूर्णनिष्ठा के साथ सम्भाल रहे हैं। समय-समय पर उनसे बातचीत उनके दायित्वों के सन्दर्भ में होती रहती है। बेहतर परिणामों के लिए आपसी चर्चा के माध्यम से निष्कर्ष निकालकर उनको लागू करने का प्रयास करते हैं।
  • विद्यालय में साथी अध्यापकों के साथ प्रेम एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण है। किसी भी सरकारी आदेश या नवीन योजना के बारे में सबसे चर्चा की जाती है। एस.डी.एम.सी. खाते में प्राप्त राशि व उसके उपयोग के बारे में सबको बताया जाता है तथा किसी प्रकार का सन्‍देह  नहीं हो इस हेतु समस्त आय व्यय का लेखा-जोखा उनके समक्ष रखा जाता है। साथी अध्यापक/अध्यापिका आवश्यकता पड़ने पर विद्यालय समय से पूर्व व विद्यालय समय के पश्चात् भी अपनी सेवाएँ देने को तत्पर रहते है।
  • समय-समय पर विद्यालय में गौठ (सामूहिक भोज) का आयोजन भी होता है। इसमें आसपास के विद्यालयों के अध्यापक, एस.डी.एम.सी. सदस्यों आदि को आमंत्रित किया जाता है, जिससे ग्रामवासियों एवं अध्यापकों के बीच आपसी सामंजस्य व मेलजोल बढ़े।

मेरा मानना है कि

  • बच्चों के प्रति जातिवाद पूर्वाग्रह न अपनाकर समान रूप से व्यवहार किया जाना चाहिए।
  • यह निश्चित है कि हर बच्चे में कोई न कोई प्रतिभा छिपी होती है तो हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि उसे पहचान कर आगे बढ़ाने का प्रयास करें।
  • समाज में अध्यापकों के प्रति (विशेषतः सरकारी अध्यापक) नकारात्मक सोच व छवि बन रही है। परन्तु यदि हम अपने कर्त्तव्य के प्रति सजग है तथा अपनी सेवा पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से देते हैं, तो आज भी समाज के लोग गुरु को भगवान से बड़ा मानते हैं।
  • परम्परागत सोच को छोड़कर नवीन विचारधाराओं प्रयोगों व प्रयासों को अपनाने का प्रयास करते रहना चाहिए।

गिरिराज सिंह चौहान

  • प्रधान अध्‍यापक
  • राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, बाढ़ छौरिया, पो. सुनारा, तहसील निवाई, जिला टोंक, राजस्‍थान
  • रुचियाँ : संगीत, गायन, ढ़ोलक वादन, चित्रकला

 

 


वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। गिरिराज सिहं चौहान वर्ष 2009 में शाला में 'नेतृत्‍व एवं प्रबन्‍धन' के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने गिरिराज सिंह चौहान से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इसी बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम गिरिराज सिंह चौहान ,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

टिप्पणियाँ

Dr. Mohan Lal Jat का छायाचित्र

आप कार्य प्रति के इमानदारी, लगन और काम करने की सोच से मै काफी प्रभावित हुआ l आपका आलेख को मै प्रारम्भिक विद्यालय के शिक्षकों की आगामी कार्यशाला में गतिविधि के रूप में रखूंगा l

pramodkumar का छायाचित्र

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